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31 July 2012

सोयाबीन पर एफएमसी ने चलाया मार्जिन का डंडा

जिंस वायदा नियामक वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) ने अस्थायी तौर पर ही सही, दो संवेदनशील अनुबंधों का निलंबन टाल दिया है और इसके बजाय इस पर 20 फीसदी स्पेशल मार्जिन लगा दिया है। लेकिन डर अभी कम नहीं हुआ है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने मंगलवार को फिर बैठक बुलाई है जिसमें स्थिति की समीक्षा की जाएगी। साथ ही कीमतों में नरमी के लिए कदम उठाए जाएंगे। 10 फीसदी व 5 फीसदी के मार्जिन के बाद दो संवेदनशील कृषि जिंसों सोयाबीन और सोयाखली पर अब मार्जिन की दर क्रमश: 50 व 45 फीसदी हो गई है। एफएमसी के एक अधिकारी ने पुष्टि की है कि पिछले शुक्रवार को मार्जिन में 20 फीसदी की बढ़ोतरी की गई। इससे पहले 19 जुलाई को नियामक ने सोया खली पर स्पेशल मार्जिन 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दिया था। यह कदम काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिंसों की कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी को देखते हुए केंद्रीय उपभोक्ता मंत्री के वी थॉमस ने एफएमसी को कदम उठाने का निर्देश दिया था। इससे कारोबारियों के बीच यह डर पैदा हो गया है कि नियामक सोयाबीन और सोया खली वायदा को निलंबित कर सकता है। जिंस वायदा में मार्जिन वह राशि होती है जो किसी क्लाइंट को वायदा अनुबंध में कारोबार शुरू करने से पहले ब्रोकरेज के खाते में जमा करानी होती है। हर जिंस पर मार्जिन की दर अलग-अलग होती है और इसमें बाजार के उतार-चढ़ाव के हिसाब से फेरबदल होता है। अनुबंध से पहले शुरुआती मार्जिन मनी देनी होती है और अनुबंध का निपटारा होने तक मेंटीनेंस मार्जिन जमा रखना होता है, जो शुरुआती मार्जिन के मुकाबले सामान्यत: कम होता है। नियामक से संपर्क कर एक्सचेंज समय-समय पर जरूरत के हिसाब से इसमें संशोधन भी करते हैं। इस सीजन में सामान्य से कम बारिश की खबर के बाद इन दो जिंसों की कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी के चलते ये मंत्रालय की निगाह में थे। एक ओर जहां सोयाबीन का निकट माह में एक्सपायर होने वाला अनुबंध 13.1 फीसदी उछला है और सोमवार को एनसीडीईएक्स पर यह 4472 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ जबकि ऐस कमोडिटी एक्सचेंज पर सोयाखली का अनुबंध पिछले एक महीने में 22 फीसदी बढ़ा है और सोमवार को यह 41,092 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। सोयाबीन और सोया खली की कीमतों में हो रहा उतार-चढ़ाव ग्वार की कहानी के दोहराव का संकेत दे रहा है, जब नियामक ने मार्जिन में 70 फीसदी से ज्यादा का इजाफा किया और इसके बाद भी सटोरिया गतिविधियों के चलते कीमतों में बढ़ोतरी जारी रही। इसके बाद नियामक ने इसके वायदा कारोबार पर पाबंदी लगा दी। अक्टूबर में नई फसल आने तक ग्वार गम और ग्वार के वायदा कारोबार पर पाबंदी लगी हुई है। नियामक हालांकि अपने स्वविवेक से एक्सचेंजों को ग्वार का कारोबार दोबारा शुरू करने की अनुमति दे सकता है। ग्वार के उलट सोयाबीन और सोया खली को फंडामेंटल समर्थन है। भारतीय मौसम विभाग ने सामान्य के मुकाबले करीब 22 फीसदी कम बारिश का अनुमान जाहिर किया है। बारिश की शुरुआत दो हफ्ते देर से हुई और इस सीजन में सोयाबीन की बुआई में भी उसी अनुपात में देर हुई है। कम बारिश के चलते पहले से बोई गई फसल भी प्रभावित होने की संभावना है। सोयाबीन बारिश की फसल है और इसकी बुआई मॉनसून के आगाज के साथ होती है और कटाई अक्टूबर में होती है। अदाणी विल्मर लिमिटेड के सीईओ अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि मध्य भारत में मॉनसून में सुधार हुआ है। लिहाजा सोयाबीन का रकबा बढ़ सकता है। इस तरह सोयाबीन का कुल उत्पादन बढ़कर 114 लाख टन होने की संभावना है जबकि पिछले साल 110 लाख टन सोयाबीन का उत्पादन हुआ था। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि किसानों ने 20 जुलाई तक 86.2 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन की बुआई की है जबकि पिछले साल इसी अवधि मेंं 90.3 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन की बुआई हुई थी। विश्लेषकों ने अनुमान जाहिर किया है कि मध्य भारत के राज्यों में इस हफ्ते बारिश में सुधार के चलते सोयाबीन की खेती में बढ़ोतरी हो सकती है। (BS Hindi)

पिछले साल कृषि निर्यात 88 फीसदी बढ़ा

सरकार द्वारा संचालित निर्यात संवर्धन संस्था एपीडा की निगरानी में कृषि जिंसों का निर्यात पिछले वित्त वर्ष के दौरान 88 फीसदी बढ़कर 82,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी। इस वृद्धि को प्रसंस्कृत खाद्यों, बासमती, गैर-बासमती चावल, ग्वार, मांस उत्पाद तथा मूंगफली के निर्यात में हुई वृद्धि के जरिए हासिल किया गया। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के तहत भारत का कृषि जिंसों का निर्यात वित्त 2010-11 के वित्त वर्ष में 43,626.88 करोड़ रुपये का हुआ। एपीडा के अध्यक्ष असित त्रिपाठी ने बताया, कृषि निर्यात से होने वाली आय वित्त वर्ष 2011-12 में बढ़कर 82,000 करोड़ रुपये हो गई। प्रसंस्कृत खाद्यों के निर्यात से होने वाली आय में जो वृद्धि हुई है, उनमें प्रसंस्कृत फलों और सब्जियों, मांस और पोल्ट्री उत्पादों का योगदान है, जिससे निर्यात की आय 2011-12 में बढ़कर 38,950 करोड़ रुपये हो गई, जो वर्ष भर पहले की समान अवधि में 15,816 करोड़ रुपये थी। प्रीमियम सुगंधित चावल बासमती के निर्यात से होने वाली आय वर्ष 2011-12 में बढ़कर करीब 13,000 करोड़ रुपये हो गई, जो वर्ष 2010-11 में 10,578.68 करोड़ रुपये थी, जबकि गैर-बासमती चावल के निर्यात से होने वाली आय बढ़कर 11,000 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 222.21 करोड़ रुपये थी। मूंगफली के निर्यात से होने वाली आय बढ़कर 12,000 करोड़ रुपये हो गई, जो इससे पिछले साल 2,094.06 करोड़ रुपये थी। त्रिपाठी ने कहा कि कृषि उत्पादों के निर्यात से होने वाली आय में वृद्धि हमारे अनुकूल है। उन्होंने कहा, हमें चालू वित्त वर्ष में यह आय 15 से 20 फीसदी बढऩे की उम्मीद है। (BS Hindi)

ओएमएसएस' में बिक्री बंद होने से गेहूं के भाव बढ़े

सरकार द्वारा खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) में गेहूं की बिक्री बंद कर देने से पिछले दो दिनों में ही इसके दाम 100 रुपये बढ़कर भाव 1,425 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। सरकार ने देशभर की फ्लोर मिलों को ओएमएसएस के तहत 1,170 रुपये प्रति क्विंटल की दर से 13 लाख टन गेहूं की बिक्री जून से अगस्त के दौरान करनी थी, लेकिन अचानक बीच में ही बिक्री बंद कर देने से इसकी कीमतों में तेजी आ गई है। गेहूं के थोक कारोबारी संदीप बंसल ने बताया कि ओएमएसएस में गेहूं की बिक्री रोक देने से पिछले दो दिनों में दाम 100 रुपये बढ़कर 1,425 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। उत्पादक मंडियों में भी दाम बढ़कर 1,400 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य उत्पादक राज्यों में गेहूं का स्टॉक नहीं है, जबकि फ्लोर मिलों के साथ निर्यातकों की भारी खरीद बनी हुई है। ऐसे में मौजूदा कीमतों में 100 रुपये प्रति क्विंटल की और तेजी आने का अनुमान है। निर्यातक कांडला बंदरगाह पर पहुंच 1,600 से 1,650 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं की खरीद कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने 19 जून को देशभर की फ्लोर मिलों को ओएमएसएस के तहत 30 लाख टन गेहूं बेचने का फैसला किया था। इसके तहत 13 लाख टन गेहूं का आंवटन जून से अगस्त के दौरान किया जाना था, लेकिन भारतीय खाद्य निगम ने बीच में ही बिक्री बंद कर दी। (Business Bhaskar....R S Rana)

आलू के वायदा कारोबार पर रोक लगने के आसार

आर. एस. राणा नई दिल्ली 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक भाव चल रहा है दिल्ली की आजादपुर मंडी में 3.80 करोड़ कट्टा आलू का यूपी में स्टॉक, सिर्फ 35 फीसदी निकाला गया मौजूदा तेजी अस्थाई - आलू की कीमतों में आई तेजी अंशकालिक है। अगस्त मध्य के बाद कर्नाटक में हसन की फसल की आवक बढ़ जाएगी जबकि अक्टूबर-नवंबर में पंजाब के होशियारपुर से नया आलू आ जाएगा। ऐसे में मौजूदा तेजी अगस्त-सितंबर तक जारी रह सकती है तथा अक्टूबर में भाव घट जाएंगे। खाद्य पदार्थों की कीमतों में आई तेजी की गाज आलू के वायदा कारोबार पर गिर सकती है। फुटकर बाजार में आलू के दाम बढ़कर 20 से 25 रुपये प्रति किलो हो गए हैं। इसलिए सरकार इसके वायदा कारोबार पर रोक लगाने पर विचार कर रही है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि घरेलू बाजार में आलू की कीमतों में आई तेजी पर लगाम लगाने के लिए इसके वायदा कारोबार पर रोक लगाने का विचार किया जा रहा है। इस बारे में वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) के चेयरमैन से भी विचार-विमर्श किया जा चुका है। जल्द ही इस पर फैसला लिए जाने की संभावना है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर अगस्त महीने के वायदा अनुबंध में महीने भर में आलू की कीमतों में 4.3 फीसदी की तेजी आई है। अगस्त महीने वायदा अनुबंध में 30 जून को आलू का भाव 1,286 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि सोमवार को 1,342 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। अक्टूबर वायदा में इसके भाव 1,520 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। जानकारों के अनुसार आलू की कीमतों में आई तेजी अंशकालिक है। आलू के थोक कारोबारी उमेश अग्रवाल ने बताया कि अगस्त मध्य के बाद कर्नाटक में हसन की फसल की आवक बढ़ जाएगी जबकि अक्टूबर-नवंबर में पंजाब के होशियारपुर से नया आलू आ जाएगा। ऐसे में मौजूदा तेजी अगस्त-सितंबर तक ही जारी रह सकती है तथा अक्टूबर में भाव घट जाएंगे। उन्होंने बताया कि दिल्ली की आजादपुर मंडी में आलू की दैनिक आवक करीब 100 ट्रकों की हो रही है जबकि भाव 1,300 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। फुटकर बाजार में इसके दाम 20 से 25 रुपये प्रति किलो हो गए हैं। आगरा कोल्ड स्टोरेज ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुदर्शन सिंघल ने बताया कि दक्षिण की फसल में देरी के कारण कीमतों में तेजी आई है। उत्तर प्रदेश में चालू सीजन में 3.80 करोड़ कट्टे (एक कट्टा-50 किलो) का स्टॉक हुआ था, इसमें से अभी तक 35 फीसदी ही आलू निकला है। नेशनल हॉर्टीकल्चर बोर्ड (एनएचबी) के मुताबिक वर्ष 2010-11 में देश में करीब 4.02 करोड़ टन आलू का उत्पादन हुआ था जबकि वर्ष 2011-12 में उत्पादन 10 से 12 फीसदी कम होने का अनुमान है। (Business Bhaskar....R S Rana)

किसानों ने बंद की धान की रोपाई

कुरुक्षेत्र मॉनसून की बेरुखी के चलते हरियाणा में सूखे के हालात पैदा हो गए हैं और किसानों ने अपने खेतों में धान की रोपाई बंद कर दी है। अगर अगले एक सप्ताह में अच्छी बारिश नहीं हुई तो धान की पैदावार को बहुत बड़ा झटका लग सकता है। सूखे को देखते हुए चावल के दामों में अभी से तेजी आने लगी है। किसानों का कहना है कि यमुनानगर ,करनाल, कुरुक्षेत्र में खासतौर पर यमुना नहर और यमुना नदी के आसपास धान व गन्ने की फसल भारी पैमाने पर होती है। हालत इतनी खराब होने लगी है कि अगर लगाई हुई धान की फसल में सिंचाई का प्रयास किया जाता है तो गन्ना की फसल में सिंचाई होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। कई वर्षों से लगातार बारिश कम होने गन्ना सूख रहा है और गन्ने की पैदावार कम हो रही है। उधर जिन खेतों में धान की रोपाई की गई है उनमें सूखे के कारण बड़ी बड़ी दरारें पड़ गई हैं। ये दोनों ही फसलें ऐसी हैं जिनमें पानी की अधिक जरूरत होती है। यमुनानगर में पहाड़ी क्षेत्र लगता है और यहां पर काफी बारिश होती रही है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, जून-जुलाई में 580 मिमी. तक बारिश होती थी जबकिइस बार अब तक 160 एमएम बारिश ही हुई है। जून से सितंबर महीने तक औसतन 850 एमएम बारिश होती रही है लेकिन इस सीजन में इसकी 60 प्रतिशत बारिश होने की भी उम्मीद नहीं है। इसबार तो यमुना नदी की हालत काफी दयनीय है। शनिवार को 24 घंटे में हथनी कुंड बैराज में अधिकतम 47134 और शाम को केवल 22 हजार क्यूसेक पानी का बहाव दर्ज किया गया है। (Navbharat Times)

सूखे पर मंत्रि समूह की बैठक आज, बनेगी रणनीति

नई दिल्ली: दक्षिण पश्चिम मॉनसून में सुधार की धीमी रफ्तार के बाद देश के कई इलाकों में सूखे जैसे हालात देखते हुए किसी भी असामान्य स्थिति से निपटने की रणनीति बनाने के लिए गठित अधिकार प्राप्त मंत्रिसमूह की पहली बैठक आज होगी. सरकार को सूखे कि फिक्र सताने लगी है. आज कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता में सूखे पर मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह की बैठक होगी जिसमें कुछ राज्यों में सूखे जैसे हालात से निपटने के उपायों पर चर्चा होगी. भारत में अभी तक 21 प्रतिशत कम बारिश हुई है. कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के पश्चिमी इलाके में हालात सबसे खराब हैं. इससे पहले पवार ने कहा था कि अगर अगले दो महीनों में भी बारिश का यही हाल रहा तो गंभीर समस्याएं खड़ी हो जाएंगी. पवार के मुताबिक, "सबकुछ अगस्त और सितंबर महीने में बारिश के लौटने पर निर्भर करता है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो हालात गंभीर होंगे. देश में खेती बाड़ी के लिहाज से मानसून की बारिश बहुत महत्वपूर्ण है. इस साल बारिश अच्छी नहीं हुई है." पवार की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के समूह में गृह मंत्री पी चिदंबरम, ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे, पेट्रोलियम मंत्री एस जयपाल रेड्डी, शहरी विकास मंत्री कमल नाथ, जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल भी ईजीओएम में शामिल हैं. मंत्रिसमूह कम बारिश वाले राज्यों के जलाशयों में पानी के स्तर, खरीफ फसलों की स्थिति, पेयजल की आपूर्ति और चारे की उपलब्धता की समीक्षा करेगा. इसके अलावा खाद्यान्न की उपलब्धता और राज्यों की बिजली और डीजल पर सब्सिडी की मांग पर भी चर्चा होने की संभावना है. साल 2009 में देश को पिछले 30 साल में सूखे के सबसे खराब दौर से गुजरना पड़ा था (ABP News)

27 July 2012

बारिश की कमी से कॉटन के मूल्य में तेजी का करंट

पिछले एक माह में घरेलू मंडियों में कॉटन के दाम 12 फीसदी बढ़े फसल का हाल प्रमुख कॉटन उत्पादक राज्यों गुजरात, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में मानसूनी की बेरुखी से कॉटन की कीमतों में तेजी आई है। पूरे देश में अभी तक 83.73 लाख हैक्टेयर में कपास की बुवाई हो पाई है जबकि पिछले साल इस अवधि में 92.44 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। मानसूनी बारिश की कमी के साथ ही यार्न मिलों और स्टॉकिस्टों की खरीद बढऩे से महीने भर में कॉटन (जिनिंग की हुई रुई) की कीमतों में 11.9 फीसदी की तेजी आ चुकी है। अहमदाबाद में शंकर-6 किस्म की कॉटन का दाम बढ़कर गुरुवार को 37,200 से 37,500 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) हो गया। प्रमुख उत्पादक राज्यों में आगामी दिनों में मौसम में सुधार नहीं आया तो मौजूदा कीमतों में और भी तेजी आ सकती है। नॉर्थ इंडिया कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश राठी ने बताया कि प्रमुख कॉटन उत्पादक राज्यों गुजरात, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में मानसूनी की बेरुखी से कॉटन की कीमतों में तेजी आई है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम स्थिर बन हुए हैं लेकिन घरेलू बाजार में यार्न मिलों के साथ ही स्टॉकिस्टों की खरीद पहले की तुलना में बढ़ गई है जिससे तेजी को बल मिल रहा है। उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क बोर्ड ऑफ ट्रेड में अक्टूबर महीने के वायदा अनुबंध में कॉटन की कीमतें 24 जुलाई को 70.29 सेंट प्रति पाउंड पर बंद हुई जबकि 26 जून को इसका भाव 70.51 सेंट प्रति पाउंड था। गुजरात जिनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष दलीप पटेल ने बताया कि गुजरात में बारिश नहीं होने से कपास की बुवाई हो चुकी फसल भी प्रभावित होने लगी है। ऐसे में बिकवाली पहले की तुलना में कम हो गई है इसीलिए दाम लगातार बढ़ रहे हैं। सौराष्ट्र और कच्छ में चालू सीजन में सामान्य से 77 फीसदी और गुजरात रीजन में 55 फीसदी कम बारिश हुई है। अहमदाबाद में शंकर-6 किस्म की कपास के दाम 26 जून को 33,000 से 33,500 रुपये प्रति कैंडी थे जो गुरुवार को बढ़कर 37,200 से 37,500 रुपये प्रति कैंडी हो गए। कृषि मंत्रालय के अनुसार गुजरात में कपास की बुवाई 13.39 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 20.21 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी। पूरे देश में अभी तक 83.73 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 92.44 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। कॉटन आयात तिगुना होने का अनुमान मुंबई घरेलू बाजार में कॉटन की सीमित सप्लाई होने और विदेश में भाव कम होने के कारण टैक्सटाइल मिलों ने इसका आयात बढ़ा दिया है। 30 सितंबर को समाप्त होने वाले मौजूदा मार्केटिंग सीजन 2011-12 के दौरान कुल कॉटन आयात बढ़कर तीन गुना हो सकता है। मिलें पांच लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलो) कॉटन का आयात पहले ही कर चुकी हैं। (Buisness Bhaskar.....R S Rana)

पवार की पावर से महंगाई पर फैसला टला

चीनी पर स्टॉक लिमिट लगाकर कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश की जाएगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुरुवार को देश के कुछ हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति और कीमतों पर इसके असर का जायजा लिया। - के वी थॉमस खाद्य व उपभोक्ता मामला मंत्री क्या हुआ राकांपा और कांग्रेस के बीच सप्ताह भर चले गतिरोध के खत्म होने पर कृषि मंत्री पवार गुरुवार को अपने मंत्रालय पहुंचे क्या किया गया पवार के आते ही महंगाई पर फैसला अगले हफ्ते तक के लिए टाल दिया गया, इस पर गुरुवार को ही निर्णय होने की आशा थी और इंतजार अब 31 जुलाई को सूखे पर गठित ईजीओएम की बैठक के बाद ही महंगाई थामने के मसले पर फैसला होने की संभावना गुरुवार का घटनाक्रम * सुबह 11 बजे : थॉमस ने कृषि सचिव, आईएमडी के महानिदेशक, प्रौद्योगिकी सचिव, खाद्य सचिव और उपभोक्ता मामला मंत्रालय के सचिव के साथ बैठक की * सुबह 11:30 बजे : थॉमस ने एफएमसी चेयरमैन रमेश अभिषेक से वायदा कारोबार में कृषि जिंसों की कीमतों में आई तेजी पर विचार-विमर्श किया * दोपहर 1२:00 बजे : शरद पवार ने थॉमस और कृषि व खाद्य मंत्रालय के अलावा आईएमडी अधिकारियों के साथ बैठक की फिर इसके बाद तय प्रेस कांफेंरस रद्द कर दी गई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और कांग्रेस के बीच सप्ताह भर चले गतिरोध के समाप्त होने पर कृषि मंत्री शरद पवार गुरुवार को अपने मंत्रालय पहुंचे, लेकिन उनके आते ही महंगाई पर फैसला अगले हफ्ते तक के लिए टाल दिया गया। इस पर फैसला अब 31 जुलाई को सूखे पर गठित उच्चाधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह (ईजीओएम) की बैठक के बाद होने की संभावना है। खराब मानसून के कारण देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनने से खाद्यान्न की कीमतों में महीने भर में ही 20 से 25 फीसदी की तेजी आ चुकी है। ऐसे में महंगाई से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने गुरुवार को कुछ कड़े कदम उठाने की योजना बनाई थी। इसके लिए दोपहर साढ़े तीन बजे प्रेस कांफें्रस का आयोजन भी किया जाना था। खाद्य एवं उपभोक्ता मामला मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रो. के वी थॉमस ने महंगाई और मानसून पर गुरुवार सुबह कृषि सचिव, भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक, केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी सचिव, खाद्य सचिव और उपभोक्ता मामला मंत्रालय के सचिव के साथ बैठक भी की। यही नहीं, थॉमस ने वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) के चेयरमैन रमेश अभिषेक से भी वायदा कारोबार में कृषि जिंसों की कीमतों में आई तेजी पर विचार-विमर्श किया। लेकिन इसके बाद कृषि मंत्री शरद पवार मंत्रालय पहुंचे और उन्होंने थॉमस और कृषि तथा खाद्य एवं उपभोक्ता मामला मंत्रालय के अलावा आईएमडी अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक के बाद ही प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दी गई। कृषि मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि 31 जुलाई को सूखे पर गठित ईजीओएम की बैठक होगी। उसके बाद ही कोई फैसला किया जाएगा। उन्होंने बताया कि मानसून से प्रभावित राज्यों से मौजूदा स्थिति पर जानकारी मांगी गई है ताकि स्थिति का आकलन किया जा सके। थॉमस ने कहा कि देश के कई राज्यों में मानसूनी बारिश सामान्य से कम होने के कारण चीनी और गेहूं की कीमतों में तेजी आई है। चीनी पर स्टॉक लिमिट लगाकर कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश की जाएगी। एफएमसी के चेयरमैन रमेश अभिषेक ने कहा कि कीमतों में आई तेजी से हम पहले से ही सतर्क हो गए हैं। इस पर कड़ी नजर रखी जा रही है कि वायदा बाजार के निवेशक हाजिर बाजार में जिंसों के दाम प्रभावित नहीं कर सकें। आईएमडी के महानिदेशक डॉ. एल एस राठौर ने कहा कि उत्तर-पश्चिम भारत के अलावा गुजरात में भी मानसूनी बारिश की कमी चिंता का विषय है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में सामान्य से कम वर्षा हुई है, लेकिन आने वाले दिनों में इन राज्यों में अच्छी बारिश होने की उम्मीद है। इससे बारिश में कमी का अंतर कुछ घटने की संभावना है। (Business Bhaskar....R S Rana)

सूखे से निपटने की तैयारी

दक्षिण-पश्चिमी मॉनूसन के सामान्य से कम रहने के कारण देश के कई हिस्सों में सूखे की आशंका बढ़ गई है। सरकार भी इन क्षेत्रों के लिए राहत पैकेज बनाने की तैयारी में जुट गई है। किसानों को राहत देने के लिए सरकार उनके छोटी अवधि के फसल ऋण का पुनर्गठन करने के साथ ही ब्याज पर छूट की अवधि बढ़ा सकती है। हालांकि औपचारिक तौर पर अभी तक किसी भी राज्य को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया गया है। लेकिन अगले 10 दिन में बारिश नहीं हुई, तो महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और राजस्थान का कुछ हिस्सा सूखे की चपेट में आ सकता है। अभी तक मॉनसून सामान्य से 22 फीसदी कम रहा है। अधिकारियों ने बताया कि सूखे से प्रभावित राज्यों के लिए कृषि पैकेज की घोषणा की जा सकती है जिसमें जल्दी फ सल देने वाले बीजों की किस्में, नहर के पानी का बेहतर इस्तेमाल, उर्वरकों का कम उपयोग शामिल है। इसके साथ ही बैंक भी किसानों के छोटी अवधि के फसल ऋणों के पुनर्गठन पर विचार कर सकते हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक सरकारी अधिकारी ने बताया, 'देश के कुछ हिस्सों में कम बारिश के कारण सूखा पड़ सकता है। मुमकिन है कि ऋण भुगतान की अवधि बढ़ाने के लिए प्रभावित किसानों के छोटी अवधि के ऋणों का पुनर्गठन किया जाए।' छोटी अवधि के फसल ऋणों के पुनर्गठन के तहत भुगतान टालना, गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए)का दोबारा वर्गीकरण, ब्याज में अतिरिक्त रियायत और जरूरत हो तो पूरा ऋण माफ कर दिया जाता है। मुमकिन है कि जिन किसानों ने एक साल की अवधि के लिए ऋण लिया है उनके ऋण को एनपीए में डालने के बजाय, इसे चुकाने के लिए उन्हें तीन से पांच साल का समय दिया जाए। केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'मेरा मानना है कि किसानों की मदद करने का सबसे सही तरीका है उनके ऋण का पुनर्गठन करना क्योंकि पानी की कमी के हालात में सिंचाई मुहैया कराने की बात करना सही नहीं है।' सरकार किसानों को ब्याज में अतिरिक्त रियायत देने पर भी विचार कर सकती है। फिलहाल एक साल के लिए ऋण लेने वाले किसान अगर समय पर इसे चुका देते हैं, तो उनसे महज 4 फीसदी ब्याज लिया जाता है। जबकि 3 लाख रुपये तक के ऋण पर औसतन 7 फीसदी ब्याज लगता है। सूखे के कारण फसल खराब होने से किसानों के लिए समय पर भुगतान करना मुमकिन नहीं होगा। ब्याज में रियायत देने के मद में इस साल 11,000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। हालांकि 2008 की तरह ऋण माफी की संभावना इस साल फिलहाल नहीं है। 2008 में सरकार ने किसानों के 52,000 करोड़ रुपये के ऋण माफ किए थे, इससे 3 करोड़ छोटे किसानों को राहत मिली थी। इसके साथ ही बकाये का एकमुश्त भुगतान करने वाले किसानों को 25 फीसदी रियायत दी गई थी। कृषि अर्थशास्त्री और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के चेयरमैन अशोक गुलाटी ने कहा कि प्रभावित इलाकों में सूखा राहत पैकेज के एक हिस्से को सीधे किसानों तक पहुंचाना चाहिए, चाहे वह मुआवजे के रूप में हो या फिर मुफ्त चारा, डीजल या बिजली सब्सिडी के रूप में। बैंकिंग तंत्र के दायरे में देश के 50 फीसदी किसान आते हैं। वित्त वर्ष 2011-12 में कृषि क्षेत्र को कुल 5,09,040 करोड़ रुपये का ऋण दिया गया था। कुल 6.3 करोड़ कृषि ऋण खातों में से छोटे और सीमांत किसानों के ऋण खातों की संख्या 4 लाख थी। चालू वित्त वर्ष के दौरान कृषि ऋण के तौर पर 5,75,000 करोड़ रुपये के आवंटन का लक्ष्य रखा गया है। एमएफआई को भी लगेगा झटका! आंध्र प्रदेश की घटना के बाद कारोबार व्यवस्थित करने में जुटी माइक्रो फाइनैंस कंपनियों (एमएफआई) को एक और झटका लग सकता है। मॉनसून के दौरान बारिश कम होने से ग्रामीण इलाकों में लोगों के कर्ज भुगतान क्षमता पर असर पड़ सकता है, जिससे कर्जदाता कंपनियां भी प्रभावित हो सकती हैं। माइक्रो फाइनैंस इंस्टीट्यूशन नेटवर्क के मुख्य कार्यकारी आलोक प्रसाद ने कहा कि इन इलाकों में कर्ज भुगतान पर दबाव देखा जा सकता है। एमएफआई ऐसी स्थिति में कर्ज अवधि का विस्तार कर कर्जदारों को राहत दे सकते हैं। एमएफआई के करीब 80 फीसदी ग्राहक ग्रामीण इलाकों के ही हैं। ऐसे में सूखे की स्थिति से इन कंपनियों पर भी असर पडऩा लाजिमी है। सरकार उठाएगी जरूरी कदम दक्षिण पश्चिमी मॉनसून में किसी तरह का सुधार नहीं होते देख कृषि मामलों पर अधिकार प्राप्त मंत्रिसमूह अगले मंगलवार को बैठक करेगा। दरअसल उम्मीद के अनुसार मॉनसून नहीं रहने के कारण देश के कई हिस्सों में सूखे जैसे हालात बन गए हैं। मंत्रिसमूह की प्रस्तावित बैठक में सूखे के हालात से निपटने की रणनीति बनाई जाएगी। वायदा बाजार आयोग ने भी सतर्कता बरतते हुए कारोबारियों को चेताया है कि कृषि जिंसों के वायदा भाव में गड़बड़ी पर सख्ती से पेश आएगा और जरूरत पड़ी तो वह इसकी ट्रेडिंग पर पाबंदी भी लगाई जा सकती है। (BS Hindi)

25 July 2012

भारतीय बंदरगाहों पर गेहूं व मक्का की लदान में देरी

भारतीय बंदरगाहों पर अत्यधिक व्यस्तता होने के कारण एशिया व अफ्रीका के तमाम देशों को मक्का और चावल के निर्यात में देरी हो रही है। जबकि अमेरिका में सूखे के कारण विश्व बाजार में खाद्यान्न के भाव लगातार बढ़ रहे हैं। इन हालातों में खाद्यान्न की किल्लत पैदा होने की आशंका हो रही है। व्यापारियों और बंदरगाहों के अधिकारियों ने बताया कि भारत के पूर्वी बंदरगाहों पर जहाजों को लदान के लिए 25 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। इससे एशिया और अफ्रीका की मिलों को अनाज की सप्लाई में देरी हो रही है। ये मिले दक्षिण एशिया की सप्लाई पर अत्यधिक निर्भर हैं क्योंकि अमेरिका व दक्षिण अमेरिका से अनाज की सप्लाई सीमित हो गई है। सिंगापुर के एक व्यापारी ने बताया कि विजाग और काकीनाड़ा पोर्ट पर व्यस्तता काफी ज्यादा है और जहाजों को लदान के लिए 20 से 25 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। सप्लाई की कमी झेल रहे खरीदारों के लिए यह बड़ी समस्या है। अमेरिका का अगले महीने की डिलीवरी का गेहूं वायदा इस सप्ताह के दौरान करीब 11 फीसदी बढ़ चुका है। पिछले पांच सप्ताह से लगातार गेहूं के दाम बढ़ रहे हैं। इस सप्ताह मक्का के मूल्य में 8 फीसदी बढ़त हुई है। मक्का के भाव अमेरिका से सूखे के कारण रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। विजाग पोर्ट पर बर्थ की संख्या काफी कम है, इस वजह से लदान में देरी हो रही है। काकीनाड़ा पोर्ट पर लदान नौकाओं की कमी है। शुक्रवार को काकीनाड़ा पोर्ट पर 22 जहाज मक्का व गेहूं की लदान के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। सिंगापुर के एक अन्य व्यापारी ने कहा कि भारतीय बंदरगाहों पर लदान की गति बहुत धीमी है। यहां की मानसूनी बारिश से हालात खराब ही होंगे। दूसरी ओर भारतीय निर्यातक इंडोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम को मक्का का निर्यात कर रहे हैं। सूखे से विदेश में गेहूं व मक्का महंगा नई दिल्ली अमेरिका और समूचे रूस क्षेत्र में सूखे का मौसम होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तीन सप्ताह के दौरान गेहूं के भाव 21 फीसदी बढ़कर 347 डॉलर प्रति टन हो गए हैं। गेहूं के दाम बढऩे से भारत को फायदा होगा। भारत में प्राइवेट स्तर पर पिछले सितंबर से गेहूं का निर्यात हो रहा है। हाल में सरकार ने अपने गोदामों से 20 लाख टन गेहूं निर्यात करने का फैसला किया है। संयुक्त राष्ट्र के संगठन फूड एंड एग्रीकल्चर (एफएओ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि पिछले तीन सप्ताह में गेहूं के भाव 21 फीसदी बढ़े हैं। बैंचमार्क अमेरिकी गेहूं का एफओबी भाव बढ़कर 347 डॉलर प्रति टन हो गया। पिछले जुला 2011 के मुकाबले गेहूं का भाव करीब 13 फीसदी ज्यादा है। हालांकि मार्च 2008 के मुकाबले भाव अभी भी कम है। (Business Bhaskar)

उत्पादन घटने के अनुमान से चीनी के मूल्य में जोरदार तेजी

एक सप्ताह में ही चीनी 300 रुपये महंगी हुई थोक बाजार में 36-40 रुपये प्रति किलो के भाव पर चीनी बिक रही है फुटकर में क्यों आई चीनी में तेजी - महाराष्ट्र में बारिश की कमी के कारण फसल खराब हो रही है। इससे उत्पादन घटने की आशंका है। अगले सीजन में चीनी का उत्पादन करीब 10 लाख टन घटकर 250 लाख टन रहने का अनुमान है। मौजूदा मानसूनी सीजन में सामान्य के मुकाबले करीब 22 फीसदी कम बारिश होने के कारण अक्टूबर से शुरू होने वाले अगले मार्केटिंग सीजन 2012-13 के दौरान चीनी का उत्पादन कम रहने की संभावना से चीनी के मूल्य में जोरदार तेजी आ रही है। थोक बाजार में चानी के दाम करीब 300 रुपये बढ़कर 3,600-3,850 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। फुटकर में भी चीनी बढ़कर 36 से 40 रुपये प्रति किलो हो गई है। मानसून की बेरुखी से गन्ना उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी के कारण फसल को नुकसान होने की संभावना है। इससे घरेलू बाजार में चीनी के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। पिछले एक सप्ताह में चीनी के थोक भावों में 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक की तेजी दर्ज की गई है। इस दौरान चीनी का भाव 3,400- 3,600 रुपये से बढ़कर 3,600-3,850 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। हालांकि फुटकर में चीनी करीब 36-40 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रही है। कारोबारियों का कहना है कि पिछले एक सप्ताह के दौरान थोक में आई तेजी का असर फुटकर में अभी नहीं आया है। ऐसे में चीनी के भाव फुटकर में कुछ और बढ़ सकते हैं। उद्योग संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के एक अनुमान के अनुसार अगले सीजन में चीनी का उत्पादन करीब 10 लाख टन घटकर 250 लाख टन रहने का अनुमान है। इस सितंबर में समाप्त हो रहे मार्केटिंग सीजन 2011-12 के दौरान करीब 260 लाख टन चीनी का उत्पादन रहा है। हालांकि अगले सीजन का चीनी उत्पादन भी घरेलू खपत करीब 220 लाख टन से ज्यादा रहेगा, इसलिए देश में चीनी की कमी होने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन चालू सीजन में उत्पादन घटने की संभावना से तेजी को बल मिला है। दिल्ली के थोक बाजार खारी बावली के कारोबारी अशोक कुमार के मुताबिक पिछले एक सप्ताह में चीनी के थोक भाव में 300 रुपये प्रति क्विंटल तक की तेजी दर्ज की जा चुकी है। बाजार के जानकारों का कहना है कि गन्ने का रकबा बढऩे के बावजूद बारिश की कमी से फसल को नुकसान होने की आशंका है, जिससे आगामी सीजन में चीनी उत्पादन पर असर पड़ सकता है। महाराष्ट्र में बारिश की कमी के कारण फसल खराब हो रही है। खराब हुई फसल को किसानों चारे के रूप में कर रहे हैं। महाराष्ट्र में गन्ने का उत्पादन घटने की आशंका है। चीनी के थोक कारोबारी सुधीर भालोटिया ने बताया कि वैश्विक स्तर पर भी गन्ने की फसल में हो रही देरी की वजह से भारत से चीनी निर्यात को बढ़ावा मिल रहा है। निर्यात में तेजी के कारण भी चीनी की कीमतों में वृद्धि दर्ज की जा रही है। ब्राजील में गन्ने की कटाई में देरी के कारण भारतीय निर्यातकों को अच्छे ऑर्डर मिलने की संभावना है जिससे भविष्य में भी चीनी की कीमतों में तेजी जारी रह सकती है। (Business Bhaskar)

खाद्यान्न निर्यात पर नजर

आर.एस. राणा नई दिल्ल क्या करेगी समिति चीनी, चावल, गेहूं, मक्का और कपास के निर्यात पर रखेगी नजर घरेलू बाजार में अनाज उपलब्धता को भी ध्यान में रखेगी समिति कितना उत्पादन 2011-12 में रिकॉर्ड 25.74 करोड़ टन का खाद्यान्न उत्पादन चीनी का उत्पादन नए पेराई सीजन में घटकर 250 लाख टन रहने का अनुमान, चालू सीजन में 260 लाख टन का उत्पादन सूखे की आहट को भांप केंद्र सरकार ने बढ़ा दी है अपनी सक्रियता चालू खरीफ सीजन में सूखे की आहट को भांप कर केंद्र सरकार ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने खाद्यान्न निर्यात पर नजर रखने के लिए सचिवों की समिति का गठन किया है। समिति चीनी, चावल, गेहूं, मक्का और कपास के निर्यात पर तो नजर रखेगी ही, इसके साथ ही घरेलू बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता को भी ध्यान में रखेगी। खाद्यान्न की कीमतों में आई तेजी से निपटने के लिए मंगलवार को खाद्य एवं उपभोक्ता मामला मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रो. के वी थॉमस ने मंत्रालय के उच्चाधिकारियों से बैठक की। उपभोक्ता मामला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि घरेलू बाजार में महीने भर में गेहूं, चावल, चीनी, मक्का और कपास की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है, इसलिए सरकार ने चार सचिवों की समिति का गठन किया है। गठित की गई समिति में खाद्य सचिव, उपभोक्ता मामला सचिव, कृषि सचिव और वाणिज्य सचिव को शामिल किया गया है। चालू सप्ताह में गठित की गई समिति की बैठक होने की संभावना है। उन्होंने बताया कि समिति घरेलू बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता के साथ-साथ अभी तक हुए निर्यात की स्थिति की भी समीक्षा करेगी। घरेलू बाजार में महीने भर में चीनी की थोक कीमतों में करीब 400 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। दिल्ली थोक बाजार में मंगलवार को चीनी का दाम बढ़कर 3,600 से 3,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। इसी तरह मक्का की कीमतों में भी इस दौरान 400 रुपये की तेजी आकर भाव 1400-1450 रुपये, गेहूं की कीमतों में 200 रुपये की तेजी आकर भाव 1350 रुपये और परमल सेला चावल की कीमतों में 400 रुपये की तेजी आकर भाव 2600 से 2800 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। इस दौरान अहमदाबाद में शंकर-6 किस्म की कपास की कीमतें 32,700-33,000 रुपये से बढ़कर 37,500-37,700 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी में 356 किलो) हो गईं। सरकार ने सितंबर 2011 में गैर बासमती चावल और गेहूं के निर्यात पर लगी रोक को हटाया था। उसके बाद से अभी तक तकरीबन 53 लाख टन गैर बासमती चावल और 18 लाख टन गेहूं का निर्यात हो चुका है। चालू मक्का सीजन में अभी तक तकरीबन 27 लाख टन का निर्यात हो गया है। कपास का निर्यात भी लगभग 115 लाख गांठ (एक गांठ में 170 किलो) का हो चुका है। केंद्रीय पूल में पहली जुलाई को गेहूं और चावल का क्रमश: 498 और 307 लाख टन का बंपर स्टॉक मौजूद था। उधर, खरीफ सीजन में मक्का की बुवाई प्रभावित हुई है। गन्ने की बुवाई ज्यादा होने के बावजूद चीनी उत्पादन पिछले साल के 260 लाख टन से घटकर 250 लाख टन रह जाने का अनुमान है। मानसूनी बारिश की कमी के चलते इस साल खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 2011-12 के 25.74 करोड़ टन के रिकॉर्ड उत्पादन से कम रहने की आशंका है। (Business Bhaskar.........R S Rana)

21 July 2012

कॉपर में बिकवाली से कमाएं अल्पावधि में मुनाफा

अगले कुछ महीनों में डॉलर के और मजबूत होने की संभावना बन रही है। जिससे कॉपर की मांग प्रभावित होने से इसकी कीमतों में गिरावट आएगी। अल्पावधि में बिकवाली से होगा मुनाफा। यूरो जोन के आर्थिक संकट का कोई हल नहीं निकलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉपर की मांग लगातार प्रभावित हो रही है। ऐसे में घरेलू बाजार में इसकी कीमतों पर दबाव बना रहने की संभावना है। हालांकि वायदा बाजार में पिछले 20 दिन में इसकी कीमतों में करीब एक फीसदी की तेजी दर्ज की गई है। लेकिन फिलहाल वैश्विक स्तर पर अमेरिका, यूरोप व चीन के ग्रोथ आंकड़ों में कमजोरी के रुख से कॉपर की मांग में गिरावट जारी रहने की संभावना है। ऐसे में वायदा बाजार में निवेशक कम अवधि के लिए कॉपर में मौजूदा भाव पर बिकवाली करके मुनाफा कमा सकते हैं। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर 2 जुलाई को कॉपर के अगस्त वायदा अनुबंध का भाव 426 रुपये प्रति किलो के स्तर पर था जो शुक्रवार को शाम पांच बजे तक 430 रुपये प्रति किलो के भाव पर दर्ज किया गया। इस दौरान लंदन मेटल एक्सचेंज (एलएमई) पर भी इसके भाव में 3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। पिछले दस दिन में ही एलएमई पर कॉपर का भाव प्रति टन 210 डॉलर तक बढ़ गया है। 9 जुलाई को कॉपर की तीन माह की खरीद का भाव 7,551 डॉलर प्रति टन के स्तर पर था जो 19 जुलाई को 7,551 डॉलर प्रति टन दर्ज किया गया। शेअरखान कमोडिटीज के रिसर्च विश्लेषक (मेटल्स एंड एनर्जी) प्रवीण सिंह ने बताया कि यूरो जोन के बढ़ते आर्थिक संकट से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेस मेटल्स की मांग पर असर पड़ रहा है। कॉपर के सबसे बड़े उपभोक्ता देश चीन में विकास के आंकड़ों व यूरोप में आर्थिक मंदी के कारण कॉपर में आगे गिरावट आने की संभावना है।डॉलर के मुकाबले यूरो की स्थिति कमजोर होने से भी कीमतें प्रभावित हो रही हैं। अगले कुछ महीनों में डॉलर के और मजबूत होने की संभावना बन रही है। जिससे कॉपर की मांग प्रभावित होने से इसकी कीमतों में गिरावट आएगी। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ दिनों में कॉपर की वायदा कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। यह तेजी वैश्विक स्तर पर यूरो जोन के लिए नीति-निर्माताओं की ओर से लिए जा रहे निर्णयों के कारण दर्ज की गई है। लेकिन अगले कुछ समय में मांग कमजोर बनी रहने के कारण कॉपर के मूल्य में तेजी आने के संकेत नहीं हैं। इसलिए वायदा बाजार में निवेशक मौजूदा भाव पर कॉपर में बिकवाली कर मुनाफा कमा सकते हैं। कर्वी कॉमट्रेड के विश्लेषक (मेटल्स) सुमित मुखर्जी के मुताबिक भी अल्पावधि में कॉपर की कीमतों में मंदी के संकेत हैं। कॉपर आर्थिक दृष्टि से बहुत संवेदनशील धातु है। फिलहाल इसमें उछाल का ट्रेंड देखने को मिल रहा है जो आने वाले एक-डेढ़ माह में नीचे आ सकता है। हालांकि विशेषज्ञ बताते हैं कि तीन माह के बाद कॉपर की कीमतों में सुधार आना शुरू होगा। इसकी सबसे बड़ी वजह वैश्विक बाजार में कॉपर की कमी होना हो सकता है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर उत्पादन में कमी के कारण करीब 93,000 टन कॉपर की कमी आने के संकेत हैं। मुखर्जी ने बताया कि दीर्घावधि में यूरो जोन के हालात सुधरने पर कॉपर की मांग बढ़ेगी, ऐसे में कॉपर के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत होगी।विश्व के बड़े कॉपर उत्पादक देशों ने संकेत दिए हैं कि वे आने वाले समय में कॉपर उत्पादन को बढ़ाएंगे। बड़े उत्पादक देश चिली और पेरू ने भी उत्पादन बढ़ाने के संकेत दिए हैं। कॉपर की कमी को देखते हुए उत्पादक देशों को कॉपर के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक दीर्घावधि में कॉपर की मांग बढ़ी तो उत्पादन कम होने से कीमतों में सुधार आएगा लेकिन अल्पावधि में फिलहाल यूरो जोन के बढ़ते कर्ज संकट से कीमतें नीचे रहने के संकेत हैं। दिल्ली के फ्रेंड्स कॉलोनी मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश चंद गुप्ता ने बताया कि पिछले कई महीनों से रुपये के मुकाबले डॉलर महंगा होने के कारण कॉपर के आयात में कमी आई है। कॉपर का आयात घटकर 50 फीसदी से भी कम रह गया है। ऐसे में घरेलू बाजार में कॉपर की कीमतें बढ़ी हैं। कॉपर महंगा होने के कारण इसके खरीदार कम हो गए हैं और मांग में कम से कम 30 फीसदी गिरावट आई है। कारोबारियों के मुताबिक बारिश के सीजन में कंस्ट्रक्शन रुक जाने की वजह से कॉपर की मांग में और गिरावट आने के आसार हैं। ऐसे में यदि डॉलर की कीमतों में नरमी आती है तो कॉपर के आयात में बढ़ोतरी हो सकती है। कॉपर का आयात बढऩे की स्थिति के साथ घरेलू बाजार में मांग कमजोर होने के कारण आगे कॉपर के मूल्य में कमी आ सकती है। (Business Bhaskar)

भारतीय बंदरगाहों पर गेहूं व मक्का की लदान में देरी

भारतीय बंदरगाहों पर अत्यधिक व्यस्तता होने के कारण एशिया व अफ्रीका के तमाम देशों को मक्का और चावल के निर्यात में देरी हो रही है। जबकि अमेरिका में सूखे के कारण विश्व बाजार में खाद्यान्न के भाव लगातार बढ़ रहे हैं। इन हालातों में खाद्यान्न की किल्लत पैदा होने की आशंका हो रही है। व्यापारियों और बंदरगाहों के अधिकारियों ने बताया कि भारत के पूर्वी बंदरगाहों पर जहाजों को लदान के लिए 25 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। इससे एशिया और अफ्रीका की मिलों को अनाज की सप्लाई में देरी हो रही है। ये मिले दक्षिण एशिया की सप्लाई पर अत्यधिक निर्भर हैं क्योंकि अमेरिका व दक्षिण अमेरिका से अनाज की सप्लाई सीमित हो गई है। सिंगापुर के एक व्यापारी ने बताया कि विजाग और काकीनाड़ा पोर्ट पर व्यस्तता काफी ज्यादा है और जहाजों को लदान के लिए 20 से 25 दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। सप्लाई की कमी झेल रहे खरीदारों के लिए यह बड़ी समस्या है। अमेरिका का अगले महीने की डिलीवरी का गेहूं वायदा इस सप्ताह के दौरान करीब 11 फीसदी बढ़ चुका है। पिछले पांच सप्ताह से लगातार गेहूं के दाम बढ़ रहे हैं। इस सप्ताह मक्का के मूल्य में 8 फीसदी बढ़त हुई है। मक्का के भाव अमेरिका से सूखे के कारण रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। विजाग पोर्ट पर बर्थ की संख्या काफी कम है, इस वजह से लदान में देरी हो रही है। काकीनाड़ा पोर्ट पर लदान नौकाओं की कमी है। शुक्रवार को काकीनाड़ा पोर्ट पर 22 जहाज मक्का व गेहूं की लदान के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। सिंगापुर के एक अन्य व्यापारी ने कहा कि भारतीय बंदरगाहों पर लदान की गति बहुत धीमी है। यहां की मानसूनी बारिश से हालात खराब ही होंगे। दूसरी ओर भारतीय निर्यातक इंडोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम को मक्का का निर्यात कर रहे हैं। सूखे से विदेश में गेहूं व मक्का महंगा नई दिल्ली अमेरिका और समूचे रूस क्षेत्र में सूखे का मौसम होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तीन सप्ताह के दौरान गेहूं के भाव 21 फीसदी बढ़कर 347 डॉलर प्रति टन हो गए हैं। गेहूं के दाम बढऩे से भारत को फायदा होगा। भारत में प्राइवेट स्तर पर पिछले सितंबर से गेहूं का निर्यात हो रहा है। हाल में सरकार ने अपने गोदामों से 20 लाख टन गेहूं निर्यात करने का फैसला किया है। संयुक्त राष्ट्र के संगठन फूड एंड एग्रीकल्चर (एफएओ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि पिछले तीन सप्ताह में गेहूं के भाव 21 फीसदी बढ़े हैं। बैंचमार्क अमेरिकी गेहूं का एफओबी भाव बढ़कर 347 डॉलर प्रति टन हो गया। पिछले जुला 2011 के मुकाबले गेहूं का भाव करीब 13 फीसदी ज्यादा है। हालांकि मार्च 2008 के मुकाबले भाव अभी भी कम है। (Business Bhaskar)

मानसून की बेरुखी की चपेट में सभी फसलें

अभी तक सिर्फ गन्ने की बुवाई हो सकी है पिछले साल से ज्यादा चालू खरीफ में मानसून की बेरुखी का सबसे ज्यादा असर दलहन और मोटे अनाजों की बुवाई पर पड़ा है। शुक्रवार को कृषि मंत्रालय द्वारा जारी बुवाई आंकड़ों के अनुसार दलहन की बुवाई में 31.3 फीसदी और मोटे अनाजों की बुवाई में 24.6% की कमी आई है। इसके अलावा धान की रोपाई और तिलहन की बुवाई में भी 10.3% की कमी आई है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार पहली जून से 19 जुलाई तक देशभर में सामान्य से 22% कम बारिश हुई है। आईएमडी के प्रवक्ता एस.सी. भान ने बताया कि निम्न दबाव बनने के कारण मानसून दोबारा सक्रिय हो रहा है जिससे मध्य भारत में 21 और 22 जुलाई को बारिश होने की संभावना है। आगामी सप्ताह में उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश का अनुमान है। हालांकि चालू मानसून सीजन में पहली जून से 19 जुलाई तक देशभर में सामान्य से 22 फीसदी कम बारिश हुई है। सबसे कम बारिश गुजरात के सौराष्ट्र-कच्छ में सामान्य से 73 फीसदी कम हुई है। पंजाब-हरियाणा में सामान्य से 70 फीसदी, पूर्वी राजस्थान में 58 फीसदी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 58 फीसदी तथा गुजरात रीजन में सामान्य से 49 फीसदी कम बारिश हुई है। चालू खरीफ में दलहन की बुवाई अभी तक केवल 40.19 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुवाई 58.56 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी। इस वर्ष मोटे अनाजों की बुवाई अभी तक 95.43 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 126.7 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी। मोटे अनाजों में बाजरा, ज्वार, रागी और मक्का की बुवाई ज्यादा प्रभावित हुई है। तिलहनों की बुवाई चालू खरीफ में अभी तक केवल 108.84 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में तिलहनों की 121.42 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। हालांकि पिछले आठ-दस दिनों में हुई बारिश से धान की रोपाई में तेजी आई है लेकिन अब भी कुल रोपाई पिछले साल की तुलना में 10.3 फीसदी कम क्षेत्रफल में हुई है। चालू खरीफ में अभी तक 144.59 लाख हैक्टेयर में धान की रोपाई हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 161.27 लाख हैक्टेयर में रोपाई हो चुकी थी। कपास की बुवाई भी पिछले साल के 92.45 लाख हैक्टेयर से घटकर 83.74 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है। हालांकि गन्ने की बुवाई चालू खरीफ में पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। चालू खरीफ में अभी तक गन्ने की बुवाई बढ़कर 52.81 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 50.79 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। (Business Bhaskar.....R S Rana)

मानसून की बेरुखी की चपेट में सभी फसलें

अभी तक सिर्फ गन्ने की बुवाई हो सकी है पिछले साल से ज्यादा चालू खरीफ में मानसून की बेरुखी का सबसे ज्यादा असर दलहन और मोटे अनाजों की बुवाई पर पड़ा है। शुक्रवार को कृषि मंत्रालय द्वारा जारी बुवाई आंकड़ों के अनुसार दलहन की बुवाई में 31.3 फीसदी और मोटे अनाजों की बुवाई में 24.6% की कमी आई है। इसके अलावा धान की रोपाई और तिलहन की बुवाई में भी 10.3% की कमी आई है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार पहली जून से 19 जुलाई तक देशभर में सामान्य से 22% कम बारिश हुई है। आईएमडी के प्रवक्ता एस.सी. भान ने बताया कि निम्न दबाव बनने के कारण मानसून दोबारा सक्रिय हो रहा है जिससे मध्य भारत में 21 और 22 जुलाई को बारिश होने की संभावना है। आगामी सप्ताह में उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश का अनुमान है। हालांकि चालू मानसून सीजन में पहली जून से 19 जुलाई तक देशभर में सामान्य से 22 फीसदी कम बारिश हुई है। सबसे कम बारिश गुजरात के सौराष्ट्र-कच्छ में सामान्य से 73 फीसदी कम हुई है। पंजाब-हरियाणा में सामान्य से 70 फीसदी, पूर्वी राजस्थान में 58 फीसदी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 58 फीसदी तथा गुजरात रीजन में सामान्य से 49 फीसदी कम बारिश हुई है। चालू खरीफ में दलहन की बुवाई अभी तक केवल 40.19 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुवाई 58.56 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी। इस वर्ष मोटे अनाजों की बुवाई अभी तक 95.43 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 126.7 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी। मोटे अनाजों में बाजरा, ज्वार, रागी और मक्का की बुवाई ज्यादा प्रभावित हुई है। तिलहनों की बुवाई चालू खरीफ में अभी तक केवल 108.84 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में तिलहनों की 121.42 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। हालांकि पिछले आठ-दस दिनों में हुई बारिश से धान की रोपाई में तेजी आई है लेकिन अब भी कुल रोपाई पिछले साल की तुलना में 10.3 फीसदी कम क्षेत्रफल में हुई है। चालू खरीफ में अभी तक 144.59 लाख हैक्टेयर में धान की रोपाई हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 161.27 लाख हैक्टेयर में रोपाई हो चुकी थी। कपास की बुवाई भी पिछले साल के 92.45 लाख हैक्टेयर से घटकर 83.74 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है। हालांकि गन्ने की बुवाई चालू खरीफ में पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। चालू खरीफ में अभी तक गन्ने की बुवाई बढ़कर 52.81 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 50.79 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। (Business Bhaskar.....R S Rana)

अब आपात योजना की तरफ बढ़े कदम

देश के कई इलाकों में मॉनसून के निराशाजनक प्रदर्शन को देखते हुए सरकार ने आपात योजना की तरफ कदम बढ़ा दिया है। कृषि मंत्रालय के बाद अब नैशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी (एनआरएए) ने कम बारिश की स्थिति से निपटने के लिए शुक्रवार को राष्ट्रव्यापी आपात योजना जारी की। इस योजना में उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत पर खास तौर से ध्यान केंद्रित किया गया है। एनआरएए एक सलाहकार निकाय है और इस संस्था के पास बारिश पर आश्रित इलाकों में पैदा होने वाली समस्या का समाधान मुहैया कराने की जिम्मेदारी है. इस योजना के तहत कम अवधि में परिपक्व होने वाली फसलों, उत्तर भारत में नहर के पानी का समझदारी से इस्तेमाल, बुआई के वैकल्पिक पैटर्न और जानवरों के लिए चारे की खेती पर ध्यान केंद्रित किया जाना शामिल है। एनआरएए ने कहा है - रोजाना के बारिश के आंकड़ों से पता चलता है कि अब तक दक्षिण पश्चिम मॉनसून सिर्फ 6 दिन ही सामान्य से बेहतर रहा है जबकि दो दिन सामान्य बारिश हुई है और करीब 35 दिन बारिश में कमी दर्ज की गई है। इसने कहा है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। यह योजना सभी राज्यों के साथ साझा की जाएगी, ताकि वे सूखे के चलते फसलों को होने वाले नुकसान से बचने के लिए आपात योजना बना सकें। साथ ही एनआरएए ने खरीफ सीजन के बाद रबी की फसल को बचाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की सूची बनाई है। एनआरएए की आशावादिता कृषि विभाग के अफसरों के साथ भी साझा की जाएगी और भारतीय मौसम विभाग के साथ भी। वास्तव में मौसम विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा - अरब सागर में बादलों का निर्माण बेहतर नहीं हो पा रहा है, जिसकी वजह से केंद्रीय, उत्तरी और पश्चिमी भारत में सामान्य से कम बारिश हुई है। जुलाई में हमें उम्मीद थी कि कम से कम 15 जुलाई तक सामान्य बारिश होगी, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि इस साल ज्यादातर बारिश बंगाल की खाड़ी में हुए बादलों के निर्माण से हुई है, लेकिन अरब सागर में बादलों की स्थिति अभी तक कमजोर रही है। मौसम विभाग दक्षिण पश्चिम मॉनसून के तीसरे चरण की भविष्यवाणी इस महीने जारी कर सकता है। हालांकि आधिकारिक रूप से ज्यादातर अधिकारी भविष्यवाणी के मामले में सख्ती बरत रहे हैं, लेकिन कुछ का कहना है - ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि पूरे सीजन में बारिश का कुल अनुमान सामान्य के मुकाबले सामान्य से नीचे किया जा सकता है। बारिश को सामान्य तभी वर्गीकृत किया जाता है जब दक्षिण पश्चिम मॉनसून 50 साल के औसत का 95 फीसदी से ज्यादा हो। 22 जून में जारी अपने दूसरे पूर्वानुमान में मौसम विभाग ने दक्षिण पश्चिम मॉनसून लंबी अवधि के औसत का 96 फीसदी रहने की बात कही थी, हालांकि इसमें 4 फीसदी की कमी या अधिकता की बात भी शामिल थी। हालांकि आज की तारीख तक दक्षिण पश्चिम मॉनसून देश भर में सामान्य से 22 फीसदी कम रहा है और सबसे ज्यादा झटका उत्तर पश्चिम, केंद्रीय और दक्षिण भारत को लगा है। जुलाई में बारिश सामान्य से 13 फीसदी कम रहा है। एक अधिकारी ने कहा - कुछ ऐसे मॉडल हैं जो बताते हैं कि इस साल भारत में बारिश सामान्य से कम रहेगी और अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हम उन सभी मॉडलों पर नजर डालेंगे। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि अल नीनो का खतरा काफी हद तक कम हो गया है। इस साल सामान्य से कम बारिश को देखते हुए इस हफ्ते की शुरुआत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खाद्यान्न के भंडारण और स्टॉक की स्थिति की समीक्षा की थी। सरकार गेहूं, चावल, चीनी और कपास के निर्यात पर लगाम कसने पर भी विचार कर रहा है और इसका फैसला अगस्त के पहले हफ्ते में हो सकता है। (BS Hindi)

उत्पादन में कटौती नहीं कर रहीं देसी एल्युमीनियम कंपनियां

लंदन मेटल एक्सचेंज (एलएमई) में एल्युमीनियम की बेंचमार्क कीमतें उत्पादन लागत से नीचे आने के बावजूद देश में धातु का उत्पादन करने वाली कंपनियां कम से कम मौजूदा वित्त वर्ष में उत्पादन में कटौती से बच रही हैं। इन कंपनियों को लगता है कि साल की दूसरी छमाही में इसकी कीमतों में सुधार होगा। यह रुख वैश्विक स्तर पर एल्युमीनियम का उत्पादन करने वाली प्रमुख कंपनियों अल्कोआ, रसल, नॉस्र्क हाइड्रो और रियो टिंटो से अलग है, जिन्होंने घाटे के बोझ को कम करने के लिए उत्पादन में कुल मिलाकर करीब 18 लाख टन की कटौती का ऐलान किया है। अपनी मौजूदा क्षमता के साथ उत्पादन जारी रखने का भारतीय एल्युमीनियम कंपनियों का फैसला काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि कीमतों में और गिरावट से यह उनके लिए अनुपयुक्त हो जाएगा। कीमतों में स्थिरता और वैश्विक बाजार में इसमें बढ़ोतरी की उम्मीद ने उन्हें इस तरह का फैसला लेने में मदद की है। बार्कलेज की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में एल्युमीनियम उत्पादन की औसत लागत करीब 2030 डॉलर प्रति टन बैठती है। एक ओर जहां नालको की उत्पादन लागत 1920 डॉलर है, वहीं हिंडाल्को और बालको की उत्पादन लागत क्रमश: 1900 व 2000 डॉलर प्रति टन है। अनिल अग्रवाल द्वारा नियंत्रित कंपनी वेदांत एल्युमीनियम की उत्पादन लागत हालांकि 2300-2400 डॉलर प्रति टन के बीच है, जो बाकी कंपनियों के मुकाबले ज्यादा है। ऐसा इसलिए है क्योंंकि कंपनी खुले बाजार से बॉक्साइट व एल्युमिना की खरीद करती है। कंपनी ने ओडिशा माइनिंग कंपनी से बॉक्साइड खरीद के लिए लंबी अवधि का अनुबंध किया है, लेकिन ओएमसी के लांजीगढ़ खनन स्थल पर स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं। वेदांता एल्युमीनियम लिमिटेड के सीईओ डॉ. मुकेश कुमार ने कहा - मुझे उम्मीद है कि मौजूदा वित्त वर्ष के आखिर तक बॉक्साइट का मुद्दा सुलझ जाएगा, ऐसे में फिलहाल उत्पादन में कटौती की कोई योजना नहीं है। इस बीच, एलएमई पर एल्युमीनियम की बेंचमार्क कीमतें 21 जून को 1900 डॉलर से नीचे चली गई थीं और खपत वाले उद्योगों की तरफ से मांग के अभाव में यह लगातार 1850 और 1910 डॉलर के बीच झूल रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में नरमी के चलते खपत वाले क्षेत्रों मसलन ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग और निर्माण क्षेत्र में निवेश घटा है, जहां कुल वैश्विक उत्पादन का करीब 70 फीसदी खप जाता है। वैश्विक स्तर पर कुल 420 लाख टन एल्युमीनियम का उत्पादन होता है। एलएमई पर पिछले एक साल में कीमतें 1480 डॉलर प्रति टन के स्तर से 26 फीसदी नरम हुई हैं। (BS Hindi)

सूखे पर हरकत में आई सरकार

नई दिल्ली मानसून के दगा देने से पैदा हुई सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार हरकत में आ गई है। खाद्यान्न के मुकाबले पशुचारा और पेयजल आपूर्ति की समस्या के गंभीर होने की आशंका है। इसके मद्देनजर सरकार ने आकस्मिक योजना तैयार की है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और सौराष्ट्र में आकस्मिक योजना लागू करने के निर्देश दे दिए गए हैं। देश की 60 फीसद से अधिक खेती बारिश पर टिकी है। खासतौर पर खरीफ सीजन में धान को छोड़कर बाकी फसलें मानसूनी बारिश के भरोसे ही रहती है। लेकिन इस बार खराब मानसून की वजह से असिंचित क्षेत्र में खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है। इन क्षेत्रों में सबसे बड़ी समस्या मवेशियों के लिए चारा और पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना है। चालू सप्ताह में भी दक्षिण-पश्चिम मानसून के बादल 23 फीसद कम बरसे। असिंचित क्षेत्रों की हालत और भी खराब होने लगी है। कर्नाटक और महाराष्ट्र में सूखा घोषित हो चुका है। केंद्रीय कृषि सचिव आशीष बहुगुणा ने कहा कि इन दोनों राज्यों के लिए आकस्मिक योजना को लागू करने के निर्देश दे दिए गए हैं। योजना आयोग की असिंचित क्षेत्र के लिए तैयार आकस्मिक योजना के मुताबिक बागवानी और जंगली क्षेत्र सूखे से सर्वाधिक प्रभावित हैं। राज्य सरकारों को निर्देश दिए गए हैं कि जहां खरीफ फसलें सूख गईं हों, वहां स्थानीय जलवायु के हिसाब से वैकल्पिक फसलों की खेती कराई जाए। किसानों को हरसंभव मदद मुहैया कराने के लिए रियायती दर पर बीज और खाद की आपूर्ति की जाए। असिंचित क्षेत्रों में वैकल्पिक फसलों की बुवाई के सुझाव भी दिए गए हैं। खासतौर पर दलहन और तिलहन की फसलों को तवज्जो दी जानी चाहिए। पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्रों में नहरों और भूजल से होने वाली सिंचाई के लिए स्पि्रंकल विधि के प्रयोग का सुझाव दिया गया है। इन क्षेत्रों में नलकूपों के लिए विद्युत आपूर्ति व डीजल की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। असिंचित क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति बनाए रखने के लिए जलाशयों, हैंडपंपों और नलकूपों के साथ पानी के टैंकरों की तैयारी कर लेनी चाहिए। पेयजल और पशुचारे की ढुलाई के लिए रेलवे और परिवहन के अन्य साधनों को तैयार करने के लिए सतर्क कर दिया गया है। सूखे का सबसे ज्यादा असर पशुओं पर पड़ता है। चारे की कमी से उनकी परेशानियां और बढ़ सकती हैं। (Dainik Jagran)

19 July 2012

भंडारण सीमा तय करेगी सरकार!

दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के सुस्त होने के आसार देखकर उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय चौकस हो गया है। मंत्रालय अब जरूरी जिंसों की कीमतों पर नियंत्रण रखने की कोशिश में जुट गया है। इसके लिए मंत्रालय दाल, खाद्य तेल और चीनी की भंडारण सीमा तय करने के साथ ही चीनी पर निर्यात शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है। सरकार अगले 15 दिन में चावल, गेहूं और चीनी की निर्यात नीति की समीक्षा करेगी। अधिकारियों ने कहा कि मंत्रालय आने वाले त्योहारी मौसम को ध्यान में रखते हुए कदम उठा रहा है क्योंकि सितंबर के बाद जरूरी खाद्य पदार्थों की मांग आमतौर पर बढ़ जाती है। खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने इस बात की पुष्टि की कि कीमतों पर नियंत्रण रखने और जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ऐसा कर रही है। थॉमस ने कहा, 'हम खाद्य जिंसों की भंडारण सीमा तय करने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।' सरकार खाद्य पदार्थों की जमाखोरी रोकने के लिए इसका इस्तेमाल करती है। पिछले साल बंपर उत्पादन होने पर सरकार ने कई खाद्य पदार्थों की भंडारण सीमा समाप्त कर दी थी। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के चेयरमैन अशोक गुलाटी ने कहा, 'मुझे खासतौर पर दालों की चिंता है। मॉनसून खराब रहने की आशंका में दाल के दाम में तेजी आनी शुरू हो गई है।' उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 1 जून से लेकर अभी तक अरहर दाल का भाव 8 फीसदी बढ़ चुका है। इस दौरान चीनी का भाव 9.3 फीसदी, मूंगफली का तेल 13 फीसदी और सरसों तेल 16 फीसदी चढ़ चुका है। भारतीय कृषि के लिए अहम दक्षिण-पश्चिम मॉनसून अभी तक सामान्य से 21 फीसदी कम रहा है। मंगलवार को ही कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि चावल और गेहूं के भाव नियंत्रण में हैं लेकिन दलहन और तिलहन को लेकर वह चिंतित हैं। जून में खाद्य महंगाई बढ़कर 10.81 फीसदी हो गई, जो मई में 10.74 फीसदी थी। इस दौरान अधिकारियों ने कहा कि चीनी के बढ़ते दाम पर काबू पाने के लिए सरकार लेवी चीनी कोटे को मौजूदा 10 फीसदी से घटाकर 4-5 फीसदी करने पर भी विचार कर रही है। अधिकारी ने कहा, 'इससे बाजार में ज्यादा चीनी आएगी और आपूर्ति बेहतर होगी, जिससे दाम नियंत्रण में रहेंगे।' (BS Hindi)

अप्रैल में मसाला निर्यात 37 फीसदी बढ़ा

देश से मसालों का निर्यात अप्रैल माह में 37 फीसदी बढ़कर 773.55 करोड़ रुपये हो गया। मसाला बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, बड़ी इलायची, मिर्च, मिंट उत्पादों तथा जायफल और जावित्री के लिए बेहतर मूल्य मिलने की वजह से निर्यात में इजाफा हुआ है। एक साल पहले अप्रैल, 2011 में मसाला निर्यात 564.18 करोड़ रुपये का रहा था। मात्रा के हिसाब से मसाला निर्यात 49 फीसदी बढ़कर 58,685 टन रहा, जो पिछले साल इसी महीने में 39,396 टन रहा था। डॉलर मूल्य में अप्रैल में मसाला निर्यात 17 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 14.93 करोड़ डालर रहा, जो पिछले साल इसी महीने में 12.71 करोड़ डॉलर रहा था। माह के दौरान बड़ी इलायची का निर्यात 6.56 करोड़ रुपये का रहा, जो पिछले साल इसी माह में 2.56 करोड़ रुपये रहा था। इसमें 100 टन का निर्यात किया गया। मिर्च का निर्यात 230.70 करोड़ रुपये का रहा। मात्रा के हिसाब से निर्यात 30,000 टन का रहा। पिछले साल अप्रैल में यह 12,963 टन रहा था। मिंट उत्पादों मसलन मिंट तेल तथा मेंथाल आदि का निर्यात बढ़कर 198 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो पिछले साल इसी माह में 104.22 करोड़ रुपये का रहा था। इस दौरान मिंट उत्पादों का निर्यात बढ़कर 1,000 टन पर पहुंच गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 900 टन रहा था। जायफल और जावित्री का निर्यात बढ़कर 10.15 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो पिछले साल अप्रैल में 4.55 करोड़ रुपये रहा था। (BS Hindi)

एफसीआरए बिल पर आज चर्चा

फॉरवर्ड मार्केट्स कमीशन (एफएमसी) को ज्यादा अधिकार देने के लिए कैबिनेट एक विधेयक पर गुरुवार को विचार करेगी। कैबिनेट की पिछली बैठक में यूपीए के सहयोगी दल तृणमूल कांग्रेस के विरोध के बाद फॉरवर्ड कांट्रेक्ट रेग्यूलेशन एक्ट (अमेंडमेंट) बिल (एफसीआरए) को टाल दिया गया था। सूत्रों के अनुसार गुरुवार को होने वाली कैबिनेट बैठक के एजेंडा में एफसीआरए भी शामिल है। एफसीआरए में ऑप्शन जैसे नए फ्यूचर मार्केट डेरिवेटिव शुरू करने का भी प्रस्ताव है। सूत्रों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस के विरोध के बावजूद उपभोक्ता मामलात व खाद्य मंत्रालय ने एफसीआरए बिल में कोई बदलाव नहीं किया है। इस विधेयक को दिसंबर में 2010 में लोकसभा में पेश किया गया था। बाद में इसे संसदीय स्थाई समिति के पास भेज दिया गया। स्थाई समिति ने अपनी सिफारिशों के साथ रिपोर्ट पिछले 22 दिसंबर 2011 को सरकार को सौंप दी। मंत्रालय ने स्थाई समिति की ज्यादातर सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। (Business Bhaskar)

पामोलीन का टैरिफ बढ़ा तो आएगी तेजी

आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीईए) रिफाइंड खाद्य तेल आरबीडी पामोलीन के आयात के लिए टैरिफ वैल्यू को डिफ्रीज करने पर गुरुवार को विचार कर सकती है। जुलाई 2006 में तय की गई टैरिफ वैल्यू 484 डॉलर प्रति टन है। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका मौजूदा भाव 1,000 डॉलर प्रति टन के ऊपर चल रहा है। अगर पामोलीन की टैरिफ वैल्यू में बदलाव किया जाता है तो मौजूदा बाजार भाव पर ज्यादा आयात शुल्क लगेगा और घरेलू बाजार में इसका आयात महंगा पड़ेगा। इस समय पामोलीन पर 7.5 फीसदी की दर से आयात शुल्क लगता है। इससे घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को स्पर्धा लेने में मदद मिलेगी लेकिन उपभोक्ताओं के लिए खाद्य तेल महंगा हो जाएगा। (Business Bhaskar)

गरीबों को राशन में सस्ती दालें देने की तैयारी

आर एस राणा नई दिल्ली राज्य अपनी जरूरत के अनुरूप खुद दलहन आयात का फैसला करेंगे नई व्यवस्था - राज्य सरकारें अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए सार्वजनिक कंपनियों को आयात के लिए कहेंगी। कंपनियां दलहन का आयात करेंगी। आयात राज्यों की मांग पर ही होगा, इसलिए उठाव जल्दी होगा। अगर किसी राज्य को अरहर दाल की आवश्यकता है तो वह अरहर दाल के आयात की ही मांग करेगा। कमजोर मानसून के चलते दलहन का उत्पादन से इसकी कीमतों में तेजी को लेकर सरकार चौकन्ना हो गई है। सरकार ने रियायती दरों पर दालें सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत वितरित करने की योजना दुबारा शुरू करने की योजना बनाई है। इस बार सरकार 20 रुपये प्रति किलो सब्सिडी देगी। सरकार इस बार दाल बिक्री के लिए इसके आयात की जिम्मेदारी राज्यों को सौंपने पर विचार कर रही है। इस योजना के तहत केवल गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों (बीपीएल) को हर महीने एक किलो दाल की आपूर्ति राशन दुकान से की जाएगी। केंद्रीय खाद्य मंत्री के. वी. थॉमस ने संवाददाताओं को बताया कि हम दलहन को लेकर चिंतित हैं क्योंकि दलहन का उत्पादन कम होने की आशंका है। इस वजह से कुछ कदम उठाए जा रहे हैं। खाद्य मंत्रालय सस्ती दलहन वितरण की योजना को अंतिम रूप देने से पहले कृषि मंत्रालय से बातचीत कर रहा है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पीडीएस में आवंटन के लिए दलहन आयात की जिम्मेदारी राज्यों को सौंपने की योजना है। आयात सार्वजनिक कंपनियों पीईसी, एसटीसी, एमएमटीसी और नेफेड के माध्यम से ही किया जाएगा। लेकिन राज्य सरकारें अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिए सार्वजनिक कंपनियों को आयात के लिए कहेंगी। राज्यों की मांग पर कंपनियां दलहन का आयात करेंगी। इससे राज्य आयातित दालों का उठाव करते रहेंगे और जरूरत के अनुरूप दलहन का आयात सुनिश्चित हो सकेगा। अगर किसी राज्य को अरहर दाल की आवश्यकता है तो वह अरहर दाल के आयात की ही मांग करेगा। उन्होंने बताया कि पीडीएस में सब्सिडी युक्त दालों की सप्लाई केवल बीपीएल परिवारों को ही की जाएगी। मंत्रालय योजना आयोग से राज्य के बीपीएल परिवारों के आंकड़े प्राप्त कर लेगा। उसी के आधार पर राज्य को सब्सिडी का भुगतान कर दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस स्कीम में प्रत्येक बीपीएल परिवारों को हर महीने एक दाल की आपूर्ति करने की योजना है तथा सब्सिडी की दर 20 रुपये प्रति किलो होगी। उन्होंने बताया कि पीडीएस में सब्सिडी युक्त दलहन सप्लाई की स्कीम को जून महीने में बंद कर दिया गया था। उस समय केवल पांच-छह राज्य ही इसके तहत दालों का उठाव कर रहे थे तथा सब्सिडी भी 10 रुपये प्रति किलो दी जा रही थी। वर्ष 2011-12 में दलहन की पैदावार में कमी आई है जबकि चालू खरीफ में मानसून की देरी से बुवाई में कमी आई है। इसीलिए घरेलू बाजार में दालों की कीमतों में पिछले पंद्रह दिनों में लगभग 800 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल की भारी तेजी आ चुकी है। (Business Bhaskar..R S Rana)

सूखे की स्थिति नहीं, पर केंद्र व राज्यों की आपात योजना तैयार

बिजनेस भास्कर नई द किसान इंतजार के मूड में नहीं नई दिल्ली देशभर में अभी तक सामान्य से 22 फीसदी कम बारिश से कृषि मंत्री भले ही चिंतित नहीं हों लेकिन किसान अब और इंतजार नहीं करना चाहते। उन्होंने ट्यूबवेल चलाकर धान की रोपाई शुरू कर दी है। सोनीपत जिले के किसान विजयपाल ने बताया कि उन्हें पांच एकड़ में पूसा-1121 धान की रोपाई करनी है। पौध तैयार हो चुकी है लेकिन आधा जुलाई बीतने के बाद भी बारिश नहीं होने से अब वे ट्यूबवेल की मदद ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि मानसून विभाग ने चालू महीने में अच्छी बारिश की संभावना व्यक्त की थी लेकिन 15 दिन बीत चुके हैं और अभी तक बारिश नहीं हुई है। वैसे भी धान की पौध को ज्यादा नहीं रख सकते क्योंकि इसका रंग पीला होने लगता है। रोहतक जिले के किसान राकेश कुमार ने भी बताया कि ट्यूबवेल से ही धान की रोपाई करनी पड़ रही है। बिजली कम आने के कारण डीजल से खेत में पानी दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पहले आठ एकड़ में धान की रोपाई की योजना थी लेकिन कम बारिश को देखते हुए चार-पांच एकड़ में ही रोपाई की योजना है। (ब्यूरो) राज्यों को उपलब्ध कराए गए देर से बोए जाने वाले बीज चालू खरीफ सीजन में मानसून की बारिश अभी तक भले ही सामान्य से 22 फीसदी कम हुई हो लेकिन सरकार का मानना है कि देश में अभी सूखे की स्थिति नहीं बनी है। फिर भी लेट मानसून को देखते हुए केंद्र के साथ कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकारों ने किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने की योजना तैयार कर ली है। कृषि मंत्री शरद पवार ने सोमवार को यहां पत्रकारों से कहा, फिलहाल हमारे सामने सूखे की स्थिति नहीं है। मानसून लुका-छिपी का खेल खेल रहा है। ऐसे में किसानों के लिए पिछले दो साल के प्रदर्शन को बरकरार रखना चुनौती बन गया है। दक्षिण-पश्चिम मानसून ने केरल में 5 जून को प्रवेश किया था लेकिन देश के शेष हिस्से में इसका प्रसार धीमी गति से हुआ है। मानसूनी वर्षा कम होने से धान के साथ ही मोटे अनाज, दलहन और तिलहनों की बुवाई प्रभावित हुई है। किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए केंद्र और कर्नाटक-महाराष्ट्र की सरकारों ने योजना तैयार कर ली है। देर से बोए जाने वाले बीज पर्याप्त मात्रा में राज्यों को उपलब्ध करा दिए गए हैं। पवार ने कहा, ऐसा पहले भी हुआ है जब जुलाई के दूसरे पखवाड़े में अच्छी बारिश हुई है। पिछले सप्ताह कृषि मंत्री ने कहा था कि सरकार कर्नाटक और मध्य महाराष्ट्र में कमजोर बारिश को लेकर चिंतित है। इससे मोटे अनाजों के उत्पादन में कमी आने की आशंका है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार पहली जून से 15 जुलाई तक देशभर में सामान्य से 22 फीसदी कम वर्षा हुई है। इस दौरान उत्तर पश्चिमी भारत में सामान्य से 33 फीसदी, मध्य भारत में 26 फीसदी, दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में 26 फीसदी और पूर्वी-उत्तर पूर्वी राज्यों में सामान्य से 10 फीसदी कम बारिश हुई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के 84वें स्थापना दिवस पर कृषि मंत्री ने कहा कि इस साल हमारे सामने कृषि क्षेत्र की चार फीसदी वृद्धि दर को बरकरार रखने की चुनौती है। कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी मौजूद थे। भारत में जुलाई से जून 2011-12 फसल वर्ष में रिकार्ड 25.25 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था। इस दौरान गेहूं और चावल का रिकार्ड उत्पादन हुआ था। शरद पवार ने कहा कि पिछले वर्ष रिकार्ड उत्पादन के कारण देश से पहली बार रिकार्ड 50 लाख टन से ज्यादा गैर-बासमती चावल, 15 लाख टन गेहूं और 25 लाख चीनी का निर्यात किया गया है। खाद्यान्न नीति में अभी बदलाव की आवश्यकता नहीं है और निर्यात जारी रहेगा। (Businss Bhaskar)

गन्ने का मूल्य बढ़ाने की तैयारी

नई दिल्ली। खेती की लागत में बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार गन्ना किसानों को राहत देने की तैयारी कर रही है। विपणन वर्ष 2012-13 [अक्टूबर-सितंबर] के लिए गन्ने की कीमत में 17 फीसद की बढ़ोतरी पर विचार हो रहा है। गुरुवार को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति [सीसीईए] गन्ने का मूल्य 170 रुपये प्रति क्विंटल करने को हरी झंडी दिखा सकती है। सूत्रों के मुताबिक सीसीईए की बैठक में गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य [एफआरपी] बढ़ाने पर विचार होगा। गन्ने की खेती पर महंगाई की पड़ती मार को देखते हुए कृषि लागत व मूल्य आयोग [सीएसीपी] ने इसमें 17.25 फीसद बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। खाद्य मंत्रालय ने सीएसीपी की सिफारिश स्वीकार कर ली है। गुरुवार को इसे कैबिनेट की बैठक में रखा जाएगा। सीएसीपी की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार फसलों की खरीद कीमत बढ़ाने का फैसला करती है। वैसे उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे गन्ना उत्पादक राज्य अलग से राज्य समर्थित मूल्य [एसएपी] की घोषणा करते हैं। आमतौर पर केंद्र के एफआरपी की तुलना में राज्यों का एसएपी ज्यादा होता है। चालू विपणन वर्ष के लिए गन्ने का एफआरपी 145 रुपये प्रति क्विंटल है। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश का एसएपी 250 रुपये प्रति क्विंटल है। (Dainik Jagran)

गन्ने का एफआरपी 170 रुपये तय होने के आसार

आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीईए) गुरुवार को गन्ने के खरीद मूल्य पर विचार करेगी। सीसीईए अगले मार्केटिंग सीजन 2012-13 के लिए चीनी मिलों द्वारा किसानों से गन्ना खरीद का मूल्य 17 फीसदी बढ़ाकर 170 रुपये प्रति क्विंटल तय कर सकती है। सूत्रों ने बताया कि सीसीईए की बैठक गुरुवार को होगी। इसमें गन्ने का फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) तय करने पर विचार करेगी। सरकार ने अगले अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन के लिए एफआरपी तय करेगी। केंद्र सरकार हर साल गन्ना का एफआरपी घोषित करती है। चीनी मिलें एफआरपी से कम मूल्य पर किसानों से गन्ना नहीं खरीद सकती हैं। मौजूदा सीजन के शुरू में गन्ने का एफआरपी 145 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया था। कृषि मूल्य एवं लागत आयोग (सीएसीपी) ने गन्ना उगाने की बढ़ती लागत को देखते हुए एफआरपी 17.25 फीसदी बढ़ाने की सिफारिश की थी। खाद्य मंत्रालय ने सीएसीपी की सिफारिश स्वीकार करके एफआरपी में वृद्धि के लिए कैबिनेट नोट बनाकर भेजा है। केंद्र द्वारा घोषित एफआरपी के अलावा राज्य सरकार अपने स्तर पर एसएपी की भी घोषणा करती हैं। उत्तर प्रदेश, और तमिलनाडु जैसी राज्य सरकारें एफआरपी से ऊंची दर पर एसएपी तय करती हैं। उस राज्य में मिलों को एसएपी पर किसानों से गन्ना खरीद करनी होती है। उत्तर प्रदेश ने मौजूदा सीजन के शुरू में 250 रुपये प्रति क्विटंल एसएपी तय किया था। (Business bhaskar)

अमेरिका में भीषण सूखा, महंगे होंगे अनाज!

वाशिंगटन : अमेरिका पिछले 25 साल में सर्वाधिक भीषण सूखे की चपेट में है और कृषि मंत्री टॉम वाइलसैक के अनुसार, खाद्यान्न के दाम बढ़ सकते हैं। व्हाइट हाउस में कृषि मंत्री टॉम वाइलसैक ने संवाददाताओं से कहा कि सूखे से देश की करीब 61 फीसदी कृषि भूमि प्रभावित हुई है। अमेरिका दुनिया में मक्का और सोयाबीन का सबसे बड़ा उत्पादक है। लेकिन कृषि मंत्री ने कल यह चेतावनी किसानों द्वारा यह आशंका जताए जाने के बाद दी कि वह समय से पहले फसल काट सकते हैं ताकि पशुओं के लिए चारा भी उपलब्ध हो सके। उन्होंने कहा, मक्के की 78 फीसदी फसल उस भाग में है जो सूखा प्रभावित है। देश में सोयाबीन की 77 फीसदी फसल भी प्रभावित हुई है। सूखा संकट पर राष्ट्रपति बराक ओबामा से संक्षिप्त बातचीत करने के बाद वाइलसैक ने संवाददाताओं से कहा, मैं हर दिन प्रार्थना करता हूं। अगर बारिश मेरे हाथ में होती, तो मैं अपना दायित्व जरूर पूरा करता। जो मैं कर सकता हूं, वह करूंगा। वर्ष 1988 में पड़े सूखे के दौरान खाद्यान्न उत्पादन 20 फीसदी घट गया था और अर्थव्यवस्था पर अरबों डालर का भार पड़ा था। वाइलसैक ने कहा सूखे की वजह से मक्के के दाम तेजी से बढ़ेंगे। एक जून से मक्के के दाम में 38 फीसदी और सोयाबीन के दाम में 24 फीसदी की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सूखे का असर अन्य सामान की कीमतों पर भी पड़ेगा। देश में 38 फीसदी मक्का और 30 फीसदी सोयाबीन को गरीबों और अत्यंत गरीब लोगों के लिए अलग रखा जाता है। लेकिन आशंका है कि इस साल फसलों में कमी आएगी। किसानों की मदद के लिए संघीय सरकार ने कई महत्वपूर्ण फैसले किए हैं। सूखे की वजह से अमेरिकी कृषि निर्यात घटने की भी आशंका है। (Z News)

18 July 2012

खाद्य वस्तुओं की महंगाई रोकने के लिए स्टॉक लिमिट की तैयारी

मानसून की देरी से बढऩे लगीं दालों और खाद्य तेलों की कीमतें महंगाई रोकें राज्य - फुटकर बाजार में दलहन और खाद्य तेलों की कीमतों में आई तेजी को रोकने के लिए राज्य सरकारों को स्टॉक लिमिट लगाने की सलाह दी गई है। आवश्यक वस्तुओं अधिनियम के तहत स्टॉक लिमिट लगाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास ही है। 700-1,500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है दालों में 1,000-1,500 रुपये प्रति क्विंटल भाव बढ़े एक माह में खाद्य तेलों के मानसून की देरी का असर खाद्य वस्तुओं खासकर दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में पडऩा शुरू हो गया है। इन आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार स्टॉक लिमिट पर सख्ती करने जा रही है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर दलहन और तिलहनों पर स्टॉक लिमिट लगाने की सलाह दी है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मानसून की कमी का असर दलहन और खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ रहा है। महीने भर में दालों की थोक कीमतों में करीब 700 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है जबकि इस दौरान तिलहनों के दाम भी 1,000 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़ चुके हैं। हालांकि सरकार द्वारा खरीफ दलहन और तिलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में की गई बढ़ोतरी से भी तेजी को बल मिला है। उन्होंने बताया कि फुटकर बाजार में दलहन और खाद्य तेलों की कीमतों में आई तेजी को रोकने के लिए राज्य सरकारों को स्टॉक लिमिट लगाने की सलाह दी है। आवश्यक वस्तुओं अधिनियम के तहत स्टॉक लिमिट लगाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है इसीलिए मंत्रालय ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर दलहन और तिलहनों पर स्टॉक लिमिट लगाने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि दलहन और तिलहनों पर स्टॉक लिमिट की अवधि 30 सितंबर 2012 तक है लेकिन पिछले दिनों कीमतों में आई कमी के कारण कई राज्यों ने स्टॉक लिमिट को समाप्त कर दिया था। थोक बाजार में चना दाल का दाम जून महीने में 4,800 से 4,900 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि इस समय भाव बढ़कर 5,300 से 5,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। इसी तरह से उड़द दाल का भाव इस दौरान 4,100-5,000 रुपये से बढ़कर 4,900-6,000 रुपये, मूंग दाल का 4,200-5,500 रुपये से बढ़कर 4,900-6,200 रुपये और अरहर दाल का 4,900-5,100 रुपये से बढ़कर 5,200 से 5,600 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। तिलहनों में सोयाबीन के दाम उत्पादक मंडियों में बढ़कर इस दौरान 4,400 रुपये, सरसों के 4,300 रुपये और सनफ्लावर के 3,850 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। खरीफ उड़द के एमएसपी को 3,300 रुपये से बढ़ाकर 4,300 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। जबकि मूंगफली का एमएसपी 37 फीसदी बढ़ाकर 3,700 रुपये प्रति क्विंटल और सोयाबीन (काला) के एमएसपी को 1,650 रुपये से बढ़ाकर 2,200 रुपये तथा सोयाबीन (पीला) का एमएसपी 2,240 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। सनफ्लावर सीड का एमएसपी 2,800 रुपये से बढ़ाकर 3,700 रुपये और शीशम सीड का 3,400 रुपये से बढ़ाकर 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। (Business Bhaskar.....R S Rana)

पिछले फसल वर्ष के खाद्यान्न उत्पादन में बंपर बढ़ोतरी

खाद्यान्न उत्पादन 5.1 फीसदी बढ़कर 25.74 करोड़ टन तक पहुंचेगा 127 लाख टन ज्यादा खाद्यान्न उत्पादन पिछले फसल वर्ष के मुकाबले 49 लाख टन अधिक उत्पादन तीसरे अग्रिम अनुमान की तुलना में मानसूनी बारिश में कमी के कारण जुलाई से शुरू हुए नए फसल वर्ष 2012-13 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन में कमी की आशंका से चिंतित सरकार के लिए यह अच्छी खबर है कि जून में समाप्त हुए पिछले फसल वर्ष 2011-12 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन का आंकड़ा और नई ऊंचाई पर पहुंचने का अनुमान है। पिछले फसल वर्ष (2011-12) के दौरान देश का खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 2010-11 के मुकाबले 5.1 फीसदी बढऩे का अनुमान है। केंद्र सरकार द्वारा मंगलवार को जारी चौथे अग्रिम अनुमानों के अनुसार वर्ष 2011-12 में खाद्यान्न उत्पादन बढ़कर 25.74 करोड़ टन होने का अनुमान है। यह उत्पादन पिछले फसल वर्ष 2010-11 के उत्पादन से भी 127 लाख टन ज्यादा होगा। वर्ष 2010-11 में भी देश में 24.47 करोड़ टन का बंपर उत्पादन हुआ था। सरकार ने तीसरे अनुमान में 25.25 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन की संभावना जताई थी। इस तरह तीसरे अनुमान के मुकाबले उत्पादन में 49 लाख टन की बढ़ोतरी होगी। इस साल गेहूं, चावल और कपास का रिकॉर्ड उत्पादन होने का अनुमान है। लेकिन दलहन और तिलहनों के उत्पादन में पिछले साल की तुलना में कमी आने का अनुमान है। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी चौथे अग्रिम अनुमान के अनुसार तीसरे आरंभिक अनुमान के मुकाबले चावल और गेहूं के उत्पादन में ज्यादा बढ़ोतरी होने का अनुमान है। इस दौरान गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन 939 लाख टन होने का अनुमान है। जबकि वर्ष 2010-11 में गेहूं का उत्पादन 868.7 लाख टन का हुआ था। इसी तरह से चावल का उत्पादन वर्ष 2011-12 में बढ़कर 10.43 करोड़ टन होने का अनुमान है। जबकि पिछले वर्ष इसका उत्पादन 9.59 करोड़ टन का हुआ था। दलहन का उत्पादन वर्ष 2011-12 में घटकर 172.1 लाख टन ही होने का अनुमान है। जबकि वर्ष 2010-11 में दलहन का उत्पादन 182.4 लाख टन का उत्पादन हुआ था। इसी तरह से वर्ष 2011-12 में तिलहनों का उत्पादन घटकर 300.12 लाख टन होने का अनुमान है। इसके पिछले साल इनका उत्पादन 324.79 लाख टन का हुआ था। इसके साथ ही इस दौरान मोटे अनाजों का उत्पादन भी पिछले साल के 436.8 लाख टन से घटकर 420.1 लाख टन होने का अनुमान है। कपास का उत्पादन वर्ष 2011-12 में बढ़कर रिकॉर्ड 352 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) का होने का अनुमान है। जबकि वर्ष 2010-11 में इसका उत्पादन 330 लाख गांठ का हुआ था। तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार गन्ने का उत्पादन पिछले साल के 3,423.82 लाख टन से बढ़कर 3,576.67 लाख टन होने का अनुमान है। जूट का उत्पादन इस दौरान पिछले साल के 106.20 लाख गांठ से बढ़कर 115.69 लाख गांठ (एक गांठ-180 किलो) होने का अनुमान है। (Business Bhaskar....R S Rana)

मंत्रिमंडल करेगा गन्ना मूल्य में 17% वृद्धि पर विचार

मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति 2012-13 के लिये गन्ने की कीमत 17 प्रतिशत बढ़ाकर 170 रुपये प्रति क्विंटल करने के प्रस्ताव पर कल विचार करेगी। एक सूत्र ने कहा कि सीसीईए की गुरुवार को बैठक होने वाली है। बैठक में 2012-13 के विपणन वर्ष (अक्टूबर-सितंबर) के लिये गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) बढ़ाने पर विचार होगा। मौजूदा विपणन वर्ष के लिये एफआरपी 145 रुपये प्रति क्विंटल है। यह वह कीमत है जो किसानों को मिलनी तय है। उत्पादन लागत बढ़ने के कारण कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के चेयरमैन ने एफआरपी में 17.25 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिश की है। सीएसीपी एक सांविधिक निकाय है जो प्रमुख कृषि उत्पादों की कीमत नीति के बारे में सरकार को सलाह देता है। सूत्रों के अनुसार खाद्य मंत्रालय ने सीएसीपी की सिफारिश को स्वीकार कर लिया है और सीसीईए को इस संबंध में नोट भेजा है। इस पर कल विचार किया जाएगा। (Hindustan)

16 July 2012

भरपूर स्टॉक होने के बावजूद उत्तरी राज्यों में गेहूं महंगा

आर. एस. राणा नई दिल्ली उत्तर में तेजी- दक्षिण में सुस्ती - उत्तरी राज्यों में गेहूं की कमी होने से मिलों में खरीद के लिए आपसी स्पर्धा बढ़ी है। ओएमएसएस में खरीद के लिए 1,170 रुपये बेस प्राइस के मुकाबले 1,275-1,327 रुपये प्रति क्विंटल तक की कीमत पर निविदा भरी गईं। जबकि कर्नाटक, महाराष्ट्र व तमिलनाडु में निविदाएं बेस प्राइस के आसपास ही भरी गईं। खुले बाजार में सुलभता सीमित होने से वहां भी गेहूं महंगा हो रहा है। सरकार के गोदामों में गेहूं इतना ज्यादा है कि इसे रखने के लिए जगह नहीं है। पिछले दो साल से उत्पादन भी रिकॉर्ड स्तर पर रहा है। इसके बावजूद उत्तरी राज्यों में गेहूं के दाम बढ़ रहे हैं। चालू महीने में उत्तर प्रदेश में गेहूं के दाम 300 रुपये, मध्य प्रदेश में 200 रुपये और राजस्थान में 250 रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़ चुके हैं। दरअसल, इस साल उत्तरी भारत में फ्लोर मिलों की सरकारी गेहूं की खरीद जोरों पर है। जबकि सरकार ने खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत उत्पादक राज्यों में गेहूं का आवंटन दक्षिणी राज्यों के मुकाबले कम किया है। प्रमुख उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश से ज्यादातर गेहूं सरकारी खरीद के तहत केंद्रीय पूल में जाने से खुले बाजार में सुलभता बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढऩे से निर्यातकों की मांग भी बढ़ी है। केंद्रीय पूल में पहली जुलाई को 498.08 लाख टन गेहूं का भारी-भरकम स्टॉक मौजूद है। जबकि केंद्रीय पूल में कुल खाद्यान्न स्टॉक के मुकाबले भंडारण क्षमता कम होने के कारण करीब 30 लाख टन गेहूं अभी भी कच्चे में भंडारण किया हुआ है। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू रबी में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन 902.3 लाख टन का हुआ है जबकि चालू रबी विपणन सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद 379.63 लाख टन की हुई है। इसके बावजूद गेहूं की दाम बढ़ रहे हैं। श्रीबालाजी फूड प्रोड्क्टस के डायरेक्टर संदीप बंसल ने बताया कि पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में गेहूं का स्टॉक नहीं होने के कारण निर्यातकों के साथ ही देशभर की फ्लोर मिलों की खरीद उत्तर प्रदेश और राजस्थान से बढ़ गई है। इसीलिए उत्तर प्रदेश में गेहूं के दाम बढ़कर 1,400 रुपये, मध्य प्रदेश में 1,375-1,400 रुपये और राजस्थान में 1,400 से 1,425 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। प्रवीन कॉमर्शियल कंपनी के डायरेक्टर नवीन कुमार ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें बढऩे से निर्यातकों की भी खरीद बढ़ गई है। कांडला बंदरगाह पर पहुंच गेहूं की खरीद निर्यातकों द्वारा 1,500 से 1,525 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जा रही है। मध्य प्रदेश रोलर फ्लोर मिलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनिल अग्रवाल ने बताया कि उत्पादक राज्यों में ओएमएसएस के तहत गेहूं का आवंटन दक्षिणी राज्यों के मुकाबले कम किया गया है। मध्य प्रदेश को केवल 7,340 टन गेहूं आवंटित किया गया है। इस वजह से मिलों में गेहूं खरीद के लिए आपसी स्पर्धा बढ़ रही है और निविदा 1,275-1,327 रुपये प्रति क्विंटल तक की कीमत से भरी गई है। जबकि निविदा भरने का बेस प्राइस 1,170 रुपये प्रति क्विंटल है। इसके विपरीत कर्नाटक को 2.34 लाख टन गेहूं का आवंटन किया गया है। कर्नाटक में निविदा 1,170 रुपये प्रति क्विंटल के बेस प्राइस के आसपास ही भरी गई हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु को क्रमश: 1.64 लाख टन और 89,124 टन का आंवटन किया गया है। इन राज्यों में भी 1,170 रुपये प्रति क्विंटल की दर से निविदा भरी गई है। उत्तरी राज्यों में उत्तर प्रदेश को 11,958 टन और राजस्थान के 5,815 टन गेहूं का ही आवंटन किया गया है। (Buisness Bhaskar...R S Rana)

एमईपी हटने पर भी प्याज निर्यात में मामूली बढ़त

देरी का खामियाजा - सरकार ने एमईपी हटाने का फैसला देरी से लिया। इससे प्याज किसानों को फायदा नहीं मिला। पिछले मई में सरकार द्वारा प्याज पर न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) हटाए जाने से भी निर्यात में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। वित्त वर्ष 2012-13 के पहले तीन माह में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले प्याज के निर्यात में सिर्फ 32,000 टन की बढ़ोतरी हुई है। प्याज निर्यात के लिए नोडल एजेंसी नेफेड द्वारा एकत्रित आंकड़ों के मुताबिक इस साल अप्रैल-जून तिमाही के दौरान भारत से 461,854 टन प्याज का निर्यात किया गया जबकि पिछले साल इस दौरान 429,802 टन निर्यात किया गया था। प्याज निर्यात के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) देने वाली प्रमुख एजेंसी है। सरकार ने पिछले मई माह के शुरू में एमईपी हटाने का फैसला किया था। यह फैसला किसानों को प्याज का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए किया गया था। नेशनल हॉर्टीकल्चर रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन (एनएचआरडीएफ) के डायरेक्टर आर. पी. गुप्ता ने बताया कि एमईपी हटने के बाद भी प्याज के निर्यात में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई क्योंकि एमईपी हटने के समय विश्व बाजार में सप्लाई काफी ज्यादा थी। पारंपरिक प्याज आयातक देश पहले ही दूसरे निर्यातक देशों के साथ अनुबंध कर चुके थे। इस वजह से विदेशी बाजार में ज्यादा निर्यात किए जाने की गुंजाइश नहीं थी। प्याज के प्रमुख निर्यातक देशों में खाड़ी देश, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, धुर-पूर्वी देश शामिल हैं। महाराष्ट्र में नासिक जिले की प्रमुख प्याज उत्पादक मंडी लासलगांव की एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) के चेयरमैन जे. एस. होल्कर ने बताया कि सरकार ने एमईपी हटाने का फैसला देरी से लिया। इस वजह से प्याज उत्पादकों को फायदा नहीं मिला। हाालंकि मुंबई के कृषि उपज निर्यातक संघ के अध्यक्ष अजीत शाह ने कहा कि समुद्री जहाजों की कमी होने के कारण भी निर्यात में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। (Business Bhaskar)

एमईपी हटने पर भी प्याज निर्यात में मामूली बढ़त

देरी का खामियाजा - सरकार ने एमईपी हटाने का फैसला देरी से लिया। इससे प्याज किसानों को फायदा नहीं मिला। पिछले मई में सरकार द्वारा प्याज पर न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) हटाए जाने से भी निर्यात में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। वित्त वर्ष 2012-13 के पहले तीन माह में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले प्याज के निर्यात में सिर्फ 32,000 टन की बढ़ोतरी हुई है। प्याज निर्यात के लिए नोडल एजेंसी नेफेड द्वारा एकत्रित आंकड़ों के मुताबिक इस साल अप्रैल-जून तिमाही के दौरान भारत से 461,854 टन प्याज का निर्यात किया गया जबकि पिछले साल इस दौरान 429,802 टन निर्यात किया गया था। प्याज निर्यात के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) देने वाली प्रमुख एजेंसी है। सरकार ने पिछले मई माह के शुरू में एमईपी हटाने का फैसला किया था। यह फैसला किसानों को प्याज का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए किया गया था। नेशनल हॉर्टीकल्चर रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन (एनएचआरडीएफ) के डायरेक्टर आर. पी. गुप्ता ने बताया कि एमईपी हटने के बाद भी प्याज के निर्यात में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई क्योंकि एमईपी हटने के समय विश्व बाजार में सप्लाई काफी ज्यादा थी। पारंपरिक प्याज आयातक देश पहले ही दूसरे निर्यातक देशों के साथ अनुबंध कर चुके थे। इस वजह से विदेशी बाजार में ज्यादा निर्यात किए जाने की गुंजाइश नहीं थी। प्याज के प्रमुख निर्यातक देशों में खाड़ी देश, बांग्लादेश, श्रीलंका, मलेशिया, धुर-पूर्वी देश शामिल हैं। महाराष्ट्र में नासिक जिले की प्रमुख प्याज उत्पादक मंडी लासलगांव की एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) के चेयरमैन जे. एस. होल्कर ने बताया कि सरकार ने एमईपी हटाने का फैसला देरी से लिया। इस वजह से प्याज उत्पादकों को फायदा नहीं मिला। हाालंकि मुंबई के कृषि उपज निर्यातक संघ के अध्यक्ष अजीत शाह ने कहा कि समुद्री जहाजों की कमी होने के कारण भी निर्यात में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। (Business Bhaskar)

भारत का गेहूं विश्व बाजार में सबसे सस्ता

आर एस राणा नई दिल्ली विदेश में तेजी रूस और आस्ट्रेलिया में उत्पादन कम होने और अमेरिका में सूखे की स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम बढ़े केंद्रीय पूल से पहली खेप में तीन लाख टन गेहूं निर्यात होगा रूस और ऑस्ट्रेलिया में गेहूं का उत्पादन कम रहने का अनुमान है। इसका फायदा भारत को मिल सकता है। भारत का गेहूं विश्व बाजार में सबसे सस्ता है। इस अनुकूल माहौल में गेहूं निर्यात करने के लिए सरकारी कंपनियों ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। केंद्रीय पूल से पहली खेप के तहत तीन लाख टन गेहूं निर्यात करने की योजना है। इसमें से 1.90 लाख टन गेहूं निर्यात के लिए सार्वजनिक कंपनियों एसटीसी और पीईसी ने निविदाएं मांगी हैं। एसटीसी ने एक लाख टन और पीईसी ने 90,000 टन गेहूं के निर्यात के लिए विदेशी आयातकों से निविदा मांगी है। एमएमटीसी भी जल्द ही 1.10 लाख टन गेहूं निर्यात के लिए निविदा आमंत्रित करेगी। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों में आई तेजी से निर्यात का उपयुक्त समय है। इसलिए पहली खेप में तीन लाख टन गेहूं का निर्यात सार्वजनिक कंपनियों एसटीसी, पीईसी और एमएमटीसी के माध्यम से करने की योजना है। एसटीसी और पीईसी ने गेहूं निर्यात के लिए निविदा मांग ली है जबकि एमएमटीसी भी जल्द ही निर्यात के लिए निविदा आमंत्रित करेगी। उन्होंने बताया कि सरकार ने तीन जुलाई को केंद्रीय पूल से 20 लाख टन गेहूं निर्यात करने की अनुमति दी थी। गेहूं निर्यात के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) 228 डॉलर प्रति टन रखा था। जबकि इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम 300 से 325 डॉलर प्रति टन है। एसटीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि केंद्रीय पूल से गेहूं के निर्यात के लिए एक लाख टन की निविदा मांगी गई है। निर्यात मूंदड़ा बंदरगाह से होगा तथा विदेशी आयातक ही इसमें भाग ले सकते हैं तथा निविदा भरने की अंतिम तिथि तीन अगस्त 2012 है। उन्होंने बताया कि कंपनी द्वारा पूर्व में मांगी गई निविदा को निरस्त कर दिया गया है। पीईसी लिमिटेड ने भी 90,000 टन गेहूं निर्यात के लिए निविदा मांगी है तथा पीईसी कांडला बंदरगाह से निर्यात करेगी। गेहूं के विश्लेषक टी. पी. एस. नारंग ने बताया कि रूस और ऑस्ट्रेलिया में गेहूं उत्पादन में कमी आने की आशंका है जबकि अमेरिका में सूखे की स्थिति बनी हुई है। रूस ने पिछले सीजन में 220 लाख टन गेहूं का निर्यात किया था जबकि चालू सीजन में 1 से 1.20 लाख टन ही निर्यात होने की संभावना है। उधर, ऑस्ट्रेलिया ने पिछले साल 160 लाख टन गेहूं का निर्यात किया था जबकि चालू सीजन में 1.20 लाख टन ही निर्यात की संभावना है। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़े हैं। ऑस्ट्रेलियाई गेहूं का दाम 321 डॉलर, यूक्रेन का 308 डॉलर और रूस का 310 डॉलर प्रति टन (एफओबी) भाव है। जबकि भारतीय निर्यातक इस समय 310 से 325 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) की दर से निर्यात कर रहे हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं अन्य देशों के मुकाबले सस्ता है। (Business Bhaskar....R S Rana)

12 July 2012

बढ़ेगा रबर का वैश्विक उत्पादन

प्राकृतिक रबर के उत्पादक देशों के संगठन (एएनआरपीसी) की तरफ से रबर का उत्पादन साल 2012-13 में 4.9 फीसदी बढ़कर 109 लाख टन पर पहुंच सकता है। उत्पादन में बढ़ोतरी मुख्य रूप से दूसरे सबसे बड़े उत्पादक देश इंडोनेशिया में उत्पादन में होने वाली उछाल के चलते होगी, जहां 32.6 लाख टन रबर का उत्पादन हो सकता है जबकि मलयेशिया में 10 लाख टन और वियतनाम में 9,15,000 लाख टन रबर का उत्पादन हो सकता है। एएनआरपीसी के 11 सदस्य हैं और इसमें कंबोडिया, चीन, भारत, इंडोनेशिया, मलयेशिया, पापुआ न्यू गिनी, फिलीपींस, सिंगापुर, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं। ये देश वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक रबर के उत्पादन में करीब 92 फीसदी का योगदान करते हैं। एएनआरपीसी ने साल 2012 के लिए पहले उत्पादन अनुमान जनवरी में अनुमानित 104.2 लाख टन से घटाकर 100 लाख टन कर दिया था। यह पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) में हुए उत्पादन पर आधारित था, जो 9.5 फीसदी लुढ़क गया क्योंकि गिरती कीमतों को देखते हुए थाईलैंड व मलयेशिया के किसानों ने टैपिंग का काम धीमा कर दिया था। इन देशों से मिली ताजा जानकारी के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष में उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद है। इस बीच, वैश्विक उत्पादन की सबसे बड़ी चिंता इसकी गिरती कीमतों को लेकर है। पिछले कुछ हफ्तों में वैश्विक कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है और बैंकॉक के बाजार में बुधवार को इसकी कीमतें 176 रुपये प्रति किलोग्राम है जबकि पिछले बुधवार को यह 180 रुपये प्रति किलोग्राम था। भारत में भी इसकी कीमतें फिसल रही हैं और यहां आरएसएस-4 की कीमतें 187 रुपये प्रति किलोग्राम हैं। विश्लेषकों को लगता है कि चीन व भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देशों में नरमी के बावजूद आने वाले महीनों में इसकी कीमतों में तेजी आ सकती है। इन दोनों देशों में इस साल मांग स्थिर रहने की उम्मीद है। पश्चिम एशिया, ब्राजील और रूस जैसे उभरते हुए बाजारों की मांग से भी कीमतों को समर्थन मिलेगा। आपूर्ति पर नजर डालें तो सबसे बड़े उत्पादक देश थाईलैंड में भारी बारिश के चलते टैपिंग का काम बाधित हुआ है और आपूर्ति धीमी पड़ गई है। इस बीच, मलयेशिया व इंडोनेशिया में रबर का उत्पादन बढ़ रहा है और इस वजह से थाईलैंड में घटते उत्पादन की भरपाई काफी हद तक हो सकती है। देश में घटा उत्पादन रबर बोर्ड के प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2012-13 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में उत्पादन 1.7 फीसदी घटकर 1,72,700 लाख टन रह गया है जबकि एक साल पहले की समान अवधि में 1,75,700 टन रबर का उत्पादन हुआ था। वहीं कुल खपत 2.46 लाख टन हो गई है जो पिछले साल की समान अवधि के 2,43,215 टन के मुकाबले 1.1 फीसदी ज्यादा है। पहली तिमाही में आयात में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है और कुल आयात 21,189 टन रहा है जबकि पिछले साल यह 19,118 टन था। इससे संकेत मिलता है कि इस वित्त वर्ष में रबर का रिकॉर्ड आयात होगा। वैश्विक बाजार में रबर की कम कीमतों के चलते भी आयात पर सकारात्मक असर पड़ेगा। साल 2011-12 में कुल 2,05,433 टन रबर का आयात हुआ था और इस वित्त वर्ष में यह 2.50 लाख टन को पार कर सकता है। अप्रैल-जून की अवधि में निर्यात घटकर 2611 टन रह गया जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 9803 टन था। (BS Hindi)

आलू और प्याज पर चौकस सरकार

सब्जियों की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर कृषि मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्तर पर आलू व प्याज के भंडार की रिपोर्ट मांगी है। खाद्य मंत्रालय के सहयोग से कृषि मंत्रालय प्याज, टमाटर और आलू की कीमतों पर नियंत्रण रखता है। ये सब्जियां उपभोक्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय है और इनकी खपत भी सबसे ज्यादा होती है। राष्ट्रीय बागवानी शोध व विकास फाउंडेशन की तरफ से तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के विभिन्न कोल्ड स्टोरेज में 200-220 लाख टन आलू का भंडार है। इनमें से 15 फीसदी आलू का इस्तेमाल हो चुका है। भंडारण के आंकड़ों के अतिरिक्त विभाग ने खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय से भी उन आंकड़ों की मांग की है, जिसका इस्तेमाल खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में हुआ है। साल दर साल के हिसाब से आलू की कीमतें दोगुनी हो गई हैं और फिलहाल यह 1150-2300 रुपये प्रति क्विंटल पर बिक रहा है। यह पिछले साल की समान अवधि में 510-600 रुपये प्रति क्विंटल पर बिक रहा था। हालांकि बाजार के सूत्रों का कहना है कि 4-6 रुपये प्रति किलोग्राम की और बढ़ोतरी के बाद उपभोक्ता की तरफ से प्रतिरोध और इसकी खपत घटाने के फैसले से आलू की कीमतें सीमित दायरे में रह सकती हैं। आधिकारिक सूत्रों ने कहा, राज्यों से इसकी जमाखोरी रोकने को कहा गया है ताकि भंडारित आलू का इस्तेमाल किया जा सके। कई उथ्पादक देसी बाजार में आलू बेचने की बजाय इसके निर्यात में दिलचस्पी रखते हैं ताकि ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके। चूंकि देश में आलू का उत्पादन हर इलाके में नहीं होता है, लिहाजा राज्यों से बाजार हस्तक्षेप योजना लागू करने को कहा गया है, क्योंकि पंजाब जैसे राज्य में दो महीने पहले ज्यादा भंडार की समस्या पैदा हुई थी। सूत्रों ने कहा कि एमआईएस के तहत राज्य सरकार को अतिरिक्त उत्पादन की खरीद करनी होती है और इसकी लागत केंद्र व राज्य सरकार बराबर-बराबर उठाते हैं। अगर स्थिति बिगड़ती है तो मंत्रालय न्यूनतम निर्यात मूल्य की सिफारिश कर सकता है। एनएचआरडीएफ ने यह भी कहा है कि एक ओर जहां पश्चिम बंगाल और बिहार में आलू की फसल खराब होने की खबर है, वहीं बारिश में कमी के चलते खरीफ सीजन में कर्नाटक में बुआई प्रभावित हुई है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में बुआई जारी है, लेकिन यहां की किस्म महंगी है। महाराष्ट्र में खरीफ में आलू की बुआई अभी शुरू हुई है, जो मॉनसून में देरी के चलते नहीं हो पाई थी। इसके अलावा एनएचआरडीएफ ने प्याज पर भी रिपोर्ट तैयार की है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सरकार ने हॉर्टिकल्चर एक्सप्रेस के नाम से रेल सेवा शुरू की है और इसके तहत नासिक से इसका परिवहन पश्चिम बंगाल व बिहार हो रहा है, जहां उत्पादन कम है जबकि मांग ज्यादा। आधिकारिक सूत्रों ने कहा - ऐसा पाया गया है कि रेल के जरिए महज 30 घंटे में माल पहुंच जाता है जबकि सड़क मार्ग से इसमें 100 घंटे लगते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में करीब 29.5 लाख टन प्याज का भंडार है और मंडी में इसकी आवक इसी भंडार से हो रही है। फिलहाल भंडारित प्याज का 5-10 फीसदी हिस्से की खपत हो चुकी है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में खरीफ की फसल पिछले साल के मुकाबले कम रहने की संभावना है। खरीफ में प्याज की बुआई अभी शुरू हुई है, जो बारिश के आने पर ही जोर पकड़ेगा, खास तौर से महाराष्ट्र में। नवंबर तक देश में भंडारित स्टॉक से ही प्याज उपलब्ध होगा। अधिकारियों ने कहा कि खरीफ फसल में देरी की आशंका से भंडारित प्याज की कीमतें धीरे-धीरे बढऩे की संभावना है, लेकिन यह बहुत ज्यादा ऊपर नहीं जा सकती है। (BS Hindi)

मानसून पूरे देश में, फिर भी 23' कम बारिश

कम बारिश से मोटे अनाजों ज्वार, बाजरा व मक्का के उत्पादन पर असर पडऩे की आशंका बिजनेस भास्कर नई दिल्ली मानसून अब पूरे देश में पहुंच चुका है। हालांकि, गत 1 जून से लेकर अब तक देश भर में जितनी मानसूनी बारिश हुई है वह सामान्य से 23 फीसदी कम है। यह जानकारी बुधवार को सरकार की ओर से दी गई। यही नहीं, कर्नाटक और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में मानसून की कमी ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। इन क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश होने का असर मोटे अनाजों मसलन ज्वार, बाजरा और मक्का के उत्पादन पर पडऩे की आशंका है। कृषि मंत्री शरद पवार ने बुधवार को देश भर में मानसून की प्रगति पर चर्चा करने के लिए भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक एल एस राठौर से मुलाकात की। इस अवसर पर शरद पवार ने संवाददाताओं को बताया कि पिछले दस दिनों में मानसून की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में बारिश की कमी का असर मोटे अनाजों की बुवाई पर पड़ा है। इन राज्यों में अभी तक सामान्य से काफी कम बारिश हुई है जिससे मोटे अनाजों के उत्पादन में कमी आने की आशंका है। देशभर में खरीफ फसलों की स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि धान, कपास, गन्ना और सोयाबीन की फसलों को लेकर कोई चिंता नहीं है। हाल ही में हुई बारिश से धान की रोपाई में भी तेजी आएगी। मध्य प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में अच्छी बारिश हुई है, इसलिए धान उत्पादक क्षेत्रों में अभी तक कोई समस्या नहीं है। कृषि मंत्री ने कहा कि गुजरात और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में पिछले दो दिनों में अच्छी बारिश हुई है इससे मूंगफली और सोयाबीन की बुवाई में तेजी आएगी। उन्होंने बताया कि समस्या केवल मोटे अनाजों की है जिनकी बुवाई की स्थिति अभी तक अच्छी नहीं है। उन्होंने कहा कि बारिश की कमी से खाद्यान्न की कीमतों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि केंद्रीय पूल में खाद्यान्न का रिकॉर्ड स्टॉक जमा है। आईएमडी के महानिदेशक एल एस राठौर ने संवाददाताओं से कहा कि पूरे देश में मानसून पहुंच चुका है। हालांकि, 1 जून से लेकर अब तक देश भर में जितनी बारिश हुई है वह सामान्य से 23 फीसदी कम है। उन्होंने बताया कि मराठवाड़ा, कर्नाटक और पश्चिमी राजस्थान में सामान्य से कम बारिश हुई है जिसका असर मोटे अनाजों के उत्पादन पर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में बारिश ज्यादा होगी जिससे अभी तक हुई कमी की भरपाई होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि धान की फसल पर अभी तक कम हुई बारिश से कोई फर्क नहीं पड़ा है। (Business Bhaskar.....R S Rana) मराठवाड़ा, कर्नाटक और पश्चिमी राजस्थान में सामान्य से कम बारिश हुई है जिसका असर मोटे अनाजों के उत्पादन पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में बारिश ज्यादा होगी जिससे अभी तक हुई कमी की भरपाई होने की उम्मीद है। एल एस राठौर, महानिदेशक, भारतीय मौसम विभाग पिछले दस दिनों में मानसून की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में बारिश की कमी का असर मोटे अनाजों की बुवाई पर पड़ा है। धान, कपास, गन्ना और सोयाबीन की फसलों को लेकर कोई चिंता नहीं है। बारिश की कमी से खाद्यान्न की कीमतों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। -शरद पवार, कृषि मंत्री

सितंबर में नेचुरल रबर के दाम और घटने के आसार

रबर के घरेलू भाव पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की नरमी का भी दबाव क्यों आ रही है मूल्य गिरावट- नेचुरल रबर उत्पादक क्षेत्रों में बारिश कम हो रही है जिससे रबर की टेपिंग बराबर हो रही है। साथ ही ऑटो उद्योग की मांग कमजोर है। इस वजह से घरेलू बाजार में नेचुरल रबर के भाव में गिरावट आई है। यूरोप में आर्थिक मंदी के असर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई नरमी का भी घरेलू बाजार पर प्रभाव है। लीन सीजन के बावजूद नेचुरल रबर की कीमतों में गिरावट आ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी नेचुरल रबर की कीमतों में नरमी है। दरअसल ऑटो टायर उद्योग और दूसरे उपभोक्ता उद्योगों की मांग कमजोर रहने से मूल्य में गिरावट आ रही है। लीन सीजन के बावजूद जून महीने में उत्पादन भी करीब 5 फीसदी बढ़ा है। सितंबर से आवक का पीक सीजन शुरू हो जाएगा। उस समय रबर की कीमतों में और भी गिरावट आ सकती है। हरिसंस मलयालम लिमिटेड के रबर सेल्स अधिकारी संतोष कुमार ने बताया कि रबर उत्पादक क्षेत्रों में बारिश कम हो रही है जिससे नेचुरल रबर की टेपिंग बराबर बनी हुई है। साथ ही ऑटो उद्योग की मांग कमजोर है। जिसकी वजह से घरेलू बाजार में नेचुरल रबर के भाव में गिरावट आई है। उत्पादक क्षेत्रों में बारिश शुरू होने के बाद कीमतों में गिरावट रुकने की संभावना है। भारतीय रबर बोर्ड के अनुसार जून महीने में नेचुरल रबर के उत्पादन में करीब 5 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल उत्पादन 62,000 टन का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में उत्पादन 59,200 टन का हुआ था। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जून के दौरान उत्पादन 1.73 लाख टन का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 1.76 लाख टन का हुआ था। जून महीने में नेचुरल रबर की खपत में भी मामूली 0.6 फीसदी की कमी आकर कुल खपत 82,500 टन की हुई है जबकि पिछले साल जून में 83,000 टन की खपत हुई थी। हालांकि अप्रैल से जून के दौरान इसकी खपत पिछले साल के 2.43 लाख टन से बढ़कर 2.46 लाख टन की हुई। रबर मर्चेंट्स एसोसिएशन के सचिव अशोक खुराना ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेचुरल रबर की मांग कमजोर होने से प्रमुख उत्पादक देशों थाइलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया और वियतनाम में नेचुरल रबर की कीमतें घट रही हैं। भारत में चालू वित्त वर्ष के पहले तीन महीनों (अप्रैल से जून) के दौरान इसके आयात में 42 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल आयात 59,582 टन का हुआ है। विनको ऑटो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर एम. एल. गुप्ता ने बताया कि नॉन-टायर उद्योग की मांग भी कमजोर है। यूरोप में आर्थिक मंदी के असर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में नेचुरल रबर के साथ ही सिंथेटिक रबर की कीमतों में भी गिरावट बनी हुई है। कोट्टायम में सात अप्रैल को नेचुरल रबर का भाव 19,800 से 20,000 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि मंगलवार को घटकर 18,100-18,700 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। बैंकाक में मंगलवार को नेचुरल रबर का भाव घटकर 17,700 से 17,800 रुपये प्रति क्विंटल (भारतीय मुद्रा में) रह गया। जबकि अप्रैल से अभी तक इसकी कीमतों में करीब 8.4 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। (Business Bhaskar....R S Rana)

10 July 2012

मानसून बदल सकता है मक्का के मूल्य का रुख

मानसून में देरी होने से बुवाई धीमी और मूल्य में रही तेजी विदेश से तेजी के संकेत अमेरिका के मक्का उत्पादक क्षेत्रों में सूखे की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का की कीमतें बढ़ रही हैं। मक्का की कीमतें वियतनाम में 348 डॉलर और चीन में 339-343 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) हो गई हैं। निर्यातकों का मार्जिन बढऩे से उनकी खरीद अच्छी है। मानसून की देरी के चलते चालू खरीफ में मक्का की बुवाई पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 25 फीसदी कम क्षेत्र में हो पाई है। जबकि पोल्ट्री और स्टार्च मिलों की मांग पहले की तुलना में बढ़ी है। खरीफ मक्का की नई फसल की आवक में दो महीने का समय हो सकता है जबकि निर्यातकों की मांग भी बराबर बनी हुई है। हालांकि मानसून सक्रिय होने से खरीफ में मक्का की बुवाई तेज हो सकती है। इससे मक्का की तेजी की संभावना घट सकती है और मूल्य में नरमी का रुख आ सकता है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में मक्का की बुवाई अभी तक केवल 14.43 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 19.28 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। खरीफ मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्यों में राजस्थान में बुवाई अभी शुरू ही नहीं हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 4.76 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। उधर, कर्नाटक में बुवाई पिछले साल के 5.4 लाख हैक्टेयर से घटकर 2.25 लाख हैक्टेयर में, पंजाब में 1.28 लाख हैक्टेयर से घटकर केवल 90,000 हैक्टेयर में ही हुई है। बीएम इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर एम. एल. अग्रवाल ने बताया कि चालू खरीफ में बुवाई में कमी आई है जबकि पोल्ट्री और स्टार्च मिलों की मांग पहले की तुलना में बढ़ गई है। इसीलिए पिछले पंद्रह दिनों में मक्का की कीमतों में करीब 200 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। दिल्ली में मक्का के दाम बढ़कर 1,200 से 1,250 रुपये और बिहार की मंडियों में 1,100 से 1,150 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। उधर, आंध्र प्रदेश की निजामाबाद मंडी में दाम बढ़कर 1,300 से 1,350 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। अमेरिकी कृषि विभाग में भारतीय प्रतिनिधि अमित सचदेव ने बताया कि अमेरिका के मक्का उत्पादक क्षेत्रों में सूखे की आशंका बनी हुई है जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का की कीमतें बढ़ रही हैं। मक्का की कीमतें वियतनाम में 348 डॉलर प्रति टन और चीन में 339-343 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) हो गए हैं। डॉलर की मजबूती से भारतीय निर्यातकों का मार्जिन भी बढ़ गया है। जबकि चालू मक्का सीजन में सितंबर 2011 से अभी तक करीब 24 लाख टन मक्का का निर्यात हो चुका है। एनसीडीईएक्स पर अगस्त महीने के वायदा अनुबंध में महीनेभर में मक्का की कीमतों में 14.1 फीसदी की तेजी आ चुकी है। सात जून को अगस्त महीने के वायदा अनुबंध में मक्का का दाम 1,165 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि शनिवार को बढ़कर 1,330 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। (Business Bhaskar...R S Rana)

निर्यातकों की मांग से जीरा में तेजी संभव

निर्यातकों के अलावा मसाला निर्माताओं की मांग निकलने से जीरा की कीमतों में और भी तेजी की संभावना है। सीरिया और टर्की में जीरे का उत्पादन कम होने का अनुमान है जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय जीरा सीरिया और टर्की से कम भाव पर बिक रहा है। जैब्स प्राइवेट लिमिटेड डायरेक्टर भास्कर शाह ने बताया कि सीरिया और टर्की में जीरा के उत्पादन में कमी आने का अनुमान है इसीलिए भारत से निर्यात मांग लगातार बढ़ रही है। साथ ही घरेलू मसाला निर्माताओं की मांग भी पहले की तुलना में बढ़ी है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय जीरे का दाम 2,725 डॉलर प्रति टन है जबकि सीरिया और टर्की के जीरा का दाम क्रमश: 3,000 और 3,100 डॉलर प्रति टन है। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2011-12 में जीरा के निर्यात में 40 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 45,500 टन का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसका निर्यात 32,500 टन का ही हुआ था। हनुमान प्रसाद पीयूष कुमार फर्म के प्रबंधक वी. अग्रवाल ने बताया कि ऊंझा मंडी में जीरे की दैनिक आवक 12,000 से 14,000 बोरी (एक बोरी-55 किलो) की हो रही है जबकि दैनिक सौदे 18,000 से 20,000 बोरियों के हो रही है। उत्पादक मंडियों में जीरे का दाम बढ़कर सोमवार को 2,700 रुपये प्रति 20 किलो हो गया। चालू सीजन में जीरा का उत्पादन तो बढ़कर 32-33 लाख बोरी का हुआ है जो पिछले साल के 30 लाख बोरी से ज्यादा था। लेकिन नई फसल के समय बकाया स्टॉक पिछले साल की तुलना में कम था। उत्पादक मंडियों में इस समय जीरा का कुल स्टॉक करीब 14 से 16 लाख बोरी का ही बचा हुआ है। इसीलिए आगामी दिनों में मौजूदा कीमतों में और भी तेजी की संभावना है। निवेशकों की खरीद से एनसीडीईएक्स पर सप्ताहभर में जीरा की कीमतों में 11.7 फीसदी की तेजी आ चुकी है। 30 जून को एनसीडीईएक्स पर जुलाई महीने के वायदा अनुबंध में जीरा का दाम 13,507 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि सोमवार को भाव 15,095 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। (Business Bhaskar R S rana)

खरीफ सीजन में भी जूट बोरी की किल्लत के आसार

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली खरीफ सीजन में चावल की सरकारी खरीद में आ सकती है मुश्किल 18.31लाख गांठ जूट बोरियों की आवश्यकता होगी खरीफ विपणन सीजन में 15 लाख गांठ जूट बोरियों की सुलभता होगी जूट मिलों की क्षमता के अनुसार सलाहकार समिति का सुझाव नए पेराई सीजन में चीनी की 20 फीसदी पैकिंग ही जूट बोरों में होनी चाहिए। इससे चावल की सरकारी खरीद के लिए जूट बोरियों की कमी नहीं होगी। जूट बोरियों में पैकिंग पर चीनी मिलों को 40 पैसे प्रति किलो अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। नए फसल वर्ष 2012-13 की खरीफ विपणन सीजन में भी जूट बैगों की कमी होने से सरकारी खरीद में बाधा आ सकती है। मौजूदा रबी विपणन सीजन में बोरियों की कमी होने की वजह से कई राज्यों में गेहूं की खरीद में बाधाएं आई हैं। जूट पर स्थाई सलाहकार समिति (एसएसी) की हाल ही में हुई बैठक में अगले खरीफ विपणन सीजन के दौरान 18.31 लाख गांठ (एक गांठ-500 बोरी) जूट के बोरों की आवश्यकता होने का अनुमान लगाया है जबकि इस दौरान उपलब्धता लगभग 15 लाख गांठ बोरों की होगी। इस कमी की भरपाई के लिए समिति ने चीनी मिलों को जूट बोरियों में पैकिंग की अनिवार्यता से आंशिक छूट देने का सुझाव दिया है। सूत्रों के अनुसार खाद्य मंत्रालय ने अगले खरीफ विपणन सीजन में विभिन्न खरीद एजेंसियों की मांग के आधार पर करीब 18.31 लाख जूट बोरों की आवश्यकता होने रहने का अनुमान लगाया है। जबकि उद्योग की उत्पादन क्षमता को देखते हुए अगस्त से अक्टूबर के दौरान 15 लाख गांठ जूट बोरों की कुल उपलब्धता रहेगी। ऐसे में करीब 3.5 लाख गांठ जूट बोरों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। एसएसी ने सरकार को सुझाव दिया है कि विपणन सीजन 2012-13 में जूट बोरों की कमी को देखते हुए लगभग 3.5 लाख गांठ प्लास्टिक बोरों के उपयोग की अनुमति दी जाए। खरीद एजेंसियों द्वारा खरीद गए गेहूं और चावल तथा चीनी मिलों को चीनी की 100 फीसदी पैकिंग जूट बोरो में करना अनिवार्य है। रबी विपणन सीजन में भी कई राज्यों को जूट बोरों की कमी का सामना करना पड़ा था, जिसकी वजह से केंद्र सरकार ने प्लास्टिक बैगों के उपयोग की अनुमति दी थी। एसएसी के अनुसार 50 किलो के जूट के बोरे की कीमत करीब 35 रुपये आती है जबकि प्लास्टिक बैग की कीमत 15 रुपये प्रति बैग है। चीनी की पैकिंग जूट बोरों में करने पर 40 पैसे प्रति किलो का अतिरिक्त खर्च आता है। एसएसी ने सुझाव दिया है कि नए पेराई सीजन में चीनी की 20 फीसदी पैकिंग ही जूट बोरों में अनिवार्य की जाए तथा बाकी पैकिंग के लिए प्लास्टिक बोरों के उपयोग की अनुमति दी जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो जूट बोरों की कमी के कारण खरीफ विपणन सीजन में खरीद गए खाद्यान्न को खुले में रखना पड़ सकता है। इंडियन जूट मिल एसोसिएशन (इज्मा) के अध्यक्ष मनीष पोद्दार ने भी माना कि अगस्त से अक्टूबर के दौरान करीब 15 लाख गांठ जूट बोरों की उपलब्धता रहेगी। उन्होंने बताया कि अगस्त महीने के बाद जूट की नई फसल की आवक शुरू हो जाएगी तथा जूट का उत्पादन पिछले साल के लगभग बराबर ही रहने का अनुमान है। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2011-12 में जूट का उत्पादन 108.90 लाख गांठ (एक गांठ-180 किलो) होने का अनुमान है। (Business bhaskar.....R S Rana)

कमोडिटी बाजार: सोने-चांदी की तेजी पर लगाम

सोने और चांदी की तेजी पर लगाम लग गई है। दुनिया भर में सोने-चांदी की कीमतें सीमित दायरे में कारोबार कर रही है। एसीएक्स पर सोने में 0.30 फीसदी की गिरावट के साथ 29,574 रुपये के स्तर पर कारोबार हो रहा है, जबकि चांदी आधे फीसदी से ज्यादा टूट चुकी है। वहीं घरेलू बाजार में गोल्ड ईटीएफ की होल्डिंग में भारी कमी आई है, जून महीने में निवेशकों ने रिकॉर्ड 230 करोड़ रुपये निकाले हैं। जिसके चलते गोल्ड ईटीएफ की होल्डिंग करीब 2.5 फीसदी घट गई है। हालांकि दुनिया भर बाजारों में मंदी गहराती जा रही है। बावजूद इसके सोने में निवेशकों को रुझान कम होता जा रहा है। कच्चे तेल में आज जोरदार गिरावट आई है, घरेलू बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 1 से ज्यादा फीसदी तक गिरावट आ चुकी है। वहीं भाव 4,800 रुपये से फिसलकर 4,750 रुपये के भी नीचे आ गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल की कीमतें 1-2 फीसदी टूट चुकी हैं। नार्वे में तेल कंपनियों की हड़ताल खत्म होने से ब्रेंट क्रूड में सबसे ज्यादा गिरावट आई है। वहीं आज चीन में ट्रेड डाटा भी जारी होने वाला है। जिसका असर भी कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ेगा। एमसीएक्स पर बेस मेटल्स में भी दबाव की स्थिति देखी जा रही है। घरेलू बाजार में सभी मेटल्स में लाल निशान के साथ कारोबार हो रहा है। एल्युमीनियम, कॉपर, निकेल और लेड 0.30 फीसदी तक टूट चुके हैं। एलएमई पर भी कॉपर में गिरावट के साथ ही कारोबार हो रहा है। एनसडीईएक्स पर इस सप्ताह लगातार दूसरे दिन हल्दी में 4 फीसदी का ऊपरी सर्किट लग गया है। हल्दी अगस्त वायदा का भाव 4,800 रुपये के भी पार जा पहुंचा है। वहीं पिछले 1 महीनें में हल्दी की कीमतों में 35 फीसदी तक का उछाल दर्ज किया गया है। साथ ही सोयाबनी के भाव ने 4,300 रुपये के ऊपर एक नया रिकॉर्ड कायम कर लिया है। हालांकि घरेलू स्तर पर सोयाबीन की बुआई शुरू हो चुकी है और मॉनसून भी लगभग पूरे देश में पहुंच चुका है। (Money control.com)

07 July 2012

इस साल घटेगा कपास का उत्पादन : आईसीएसी

पिछले दो साल से रिकॉर्ड उत्पादन के बाद देश में कपास का उत्पादन साल 2012-13 में 7 फीसदी घटकर 54 लाख टन रहने की संभावना है। साल 2011-12 में 59 लाख टन कपास का उत्पादन हुआ था। कपास की घटती कीमतों के चलते इसका रकबा 10 फीसदी घटकर 110 लाख हेक्टेयर रह जाएगा। हालांकि घटती कीमतों और वैश्विक आर्थिक हालात में सुधार के कारण देश में कपास का इस्तेमाल साल 2012-13 में 7 फीसदी बढ़कर 47 लाख टन पर पहुंच जाएगा जबकि साल 2011-12 के दौरान इसमें 4 फीसदी की गिरावट आई थी। अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति (आईसीएसी) के कार्यकारी निदेशक टेरी टाउनसेंड ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया - 'देश से 7.5 लाख टन निर्यात का अनुमान है, जो पिछले सीजन के मुकाबले 61 फीसदी कम है। घटते उत्पादन और देसी मिलों में ज्यादा खपत के साथ-साथ दूसरे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण ऐसा होगा।' उन्होंने कहा कि भारत में साल 2012-13 के दौरान उत्पादन में गिरावट वैश्विक गिरावट (8 फीसदी कम यानी 249 लाख टन) के मुताबिक ही होगी और इसकी वजह वैश्विक स्तर पर कपास की कीमतों में गिरावट है। कपास उत्पादक व खपत वाले देशों की सरकारों के संगठन आईसीएसी ने अपने अनुमान में कहा है कि चीन के कम खरीद अनुमान के कारण वैश्विक कपास कारोबार 18 फीसदी लुढ़ककर 76 लाख टन रह जाएगा। वैश्विक स्तर पर कपास के भंडार में लगातार इजाफे और कारोबार में गिरावट का असर इसकी कीमतों पर पड़ेगा। साल 2011-12 में कपास के कारोबार में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी और यह 92 लाख टन पर पहुंच गया था, जो साल 2012-13 में 18 फीसदी घटकर 76 लाख टन रह जाने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर 2012-13 के दौरान 249 लाख टन कपास उत्पादन का अनुमान है, जो पिछले सीजन के मुकाबले 8 फीसदी कम है। आईसीएसी ने कहा, 'कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक अर्थव्यवस्था में नरमी के चलते सूती धागे की मांग पर भी असर पड़ा है। हालांकि कपास की कमी दूर करने के लिए चीन की मिलों ने कपास का काफी आयात किया। चीन सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर भंडार तैयार किया था।' आईसीएसी के मुताबिक मांग में सुधार के चलते कपास का आयात मजबूत होगा, लेकिन यह उतना नहीं है कि चीन की कमी की भरपाई कर दे, क्योंकि चीन के पास काफी स्टॉक है। (BS Hindi)

सरकार फिर जारी करेगी गेहूं निर्यात की निविदा

केंद्र सरकार ने गेहूं निर्यात के लिए फिर से निविदा जारी करने का फैसला किया है। सरकार केंद्रीय भंडार से 20 लाख टन गेहूं का निर्यात करना चाहती है क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों में वैश्विक कीमतों में मजबूती देखने को मिली है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कैबिनेट ने पिछले हफ्ते न केवल 90,000 टन गेहूं के लिए पहले जारी निविदा को रद्द करने का पैसला किया बल्कि पूरी मात्रा के लिए फिर निविदा जारी करने का भी निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि पिछली निविदा में बिक्री मूल्य 228 डॉलर प्रति टन रखा गया था, वहीं अब वैश्विक बाजार में गेहूं की कीमत 260 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई है। नई निविदा पूरी मात्रा के लिए होगी और इसे एक बार में नहीं बेचा जाएगा। अधिकारी ने यह भी कहा कि केंद्रीय भंडार से गेहूं का निर्यात करने के लिए अगले एक साल में करीब 10-15 निविदा जारी होगी। यह कदम करीब छह साल बाद गेहूं के बढ़ते भंडार को कम करने के लिए उठाया गया है। पिछले हफ्ते आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने खाद्य मंत्रालय के उस प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी, जिसमें 20 लाख टन गेहूं के निर्यात का प्रस्ताव रखा गया था। इससे पहले सरकारी उपक्रम स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ने 90,000 टन गेहूं निर्यात के लिए निविदा जारी की थी और यह निविदा भारतीय गेहूं की वैश्विक बाजार में मिलने वाली कीमतों का अंदाजा लगाने के लिए जारी हुई थी। निविदा में उच्चतम कीमत 228 डॉलर प्रति टन मिली। हालांकि तब से वैश्विक कीमतों में मजबूती आई है क्योंकि कुछ प्रमुख निर्यातक देशों में खड़ी फसलों के नुकसान की खबर है। अधिकारी ने कहा कि मौजूदा परिदृश्य में भारतीय गेहूं को वैश्विक बाजार में 260 डॉलर (14,300 रुपये प्रति टन) प्रति टन का भाव मिल सकता है। पहले यह 12,850 रुपये प्रति टन बैठता था। आधार कीमत को लचीला रखा गया है और हर निविदा में अलग-अलग आधार कीमत होगी, लेकिन सरकार 228 डॉलर प्रति टन से नीचे का भाव स्वीकार नहीं करेगी। न्यूनतम रिजर्व कीमत से सरकार को पुराना स्टॉक निकालने में मदद मिलेगी, जिसकी मौजूदा कीमतें कम हैं। उन्होंने कहा कि वाणिज्य सचिव की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति निविदा का आकलन करेगी। समिति में एसटीसी व अन्य कारोबारी संस्थानों के अधिकारी शामिल होंगे। हालांकि सरकार ने 20 लाख टन गेहूं निर्यात का फैसला किया है, लेकिन इस कदम को देसी आटा मिलों व कारोबारियों का समर्थन नहीं मिला है। चंडीगढ़ संवाददाता के अनुसार कारोबारियों ने आरोप लगाया है कि निर्यात की अनुमति दिए जाने के फैसले से कीमतों में उतार-चढ़ाव हो सकता है। वे चाहते हैं कि सरकार गेहूं निर्यात की बजाय वैल्यू ऐडेड उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करे। ऑल इंडिया ग्रेन एक्सपोट्र्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डी पी सिंह ने कहा कि आदर्श रूप में सरकार को निर्यात की मंशा जाहिर नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव को बढ़ावा मिलता है। रोलर फ्लोर मिलर्स एसोसिएशन ऑफ गुजरात के अध्यक्ष रमेश सर्राफ के मुताबिक गेहूं का आपूर्ति करने वालों ने पिछले कुछ दिनों में गेहूं की कीमतें 60-70 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ा दी हैं। इस साल गेहूं की बंपर पैदावार से सरकारी गोदामों में 820 लाख टन अनाज का रिकॉर्ड भंडार है जबकि भंडारण की क्षमता महज 640 लाख टन है। (BS Hindi)

बढ़ सकती हैं चीनी की कीमतें

मॉनसून का दगा अब मिठास कम करेगा। दरअसल रकबा बढऩे के बावजूद कम बारिश के कारण चीनी का उत्पादन कम रहने की आशंका है, जिससे फिलहाल सस्ती मिल रही चीनी महंगी हो सकती है। पिछले चार दिन में 120 रुपये प्रति क्विंटल तक महंगी हो चुकी चीनी में आगे भी मजबूती आने की आशंका जताई जा रही है। चीनी विक्रेता कंपनी एसएनबी इंटरप्राइजेज के मालिक सुधीर भालोटिया ने बताया कि उत्पादन घटने की आशंका से उत्तर प्रदेश में चीनी का एक्स फैक्ट्री भाव 100-120 रुपये चढ़कर 3,130 से 3,175 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। महाराष्ट्र में दाम 3,000 से 3,025 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। चीनी कारोबारी आरपी गर्ग के मुताबिक दिल्ली में तीन दिन पहले चीनी का थोक भाव 3,150-3,230 रुपये था, जो अब 3,300 से 3,350 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी करीब 35 डॉलर महंगी होकर 608 डॉलर प्रति टन बिक रही है। ब्राजील में भी भारी बारिश के कारण फसल बिगड़ी है। भालोटिया के मुताबिक दोनों प्रमुख देशों में फसल प्रभावित होने से चीनी के दाम बढऩे के पूरे आसार हैं। इस साल 28 जून तक गन्ने का रकबा 4.6 फीसदी बढ़कर 52.2 लाख हेक्टेयर हो गया, लेकिन बारिश की कमी से उत्पादन में गिरावट की आशंका है। कमोडिटीइनसाइट डॉट कॉम के वरिष्ठï जिंस विश्लेषक प्रशांत कपूर कहते हैं कि कम बारिश से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश में चीनी की रिकवरी घट सकती है। भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) का भी मानना है कि वर्ष 2012-13 में चीनी उत्पादन कम रहेगा। (BS Hindi)

छोटी मात्रा में कई टेंडरों के जरिये होगा गेहूं का निर्यात

बेहतर मूल्य पाने को सरकारी कंपनियां डेढ़-डेढ़ लाख टन के टेंडर जारी करेंगी सार्वजनिक क्षेत्र की ट्रेडिंग कंपनियां एसटीसी, एमएमटीसी और पीईसी 20 लाख टन गेहूं निर्यात करने के लिए छोटी मात्रा के कई वैश्विक टेंडर जारी कर सकती हैं। सरकार ने इस सप्ताह के शुरू में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों स 20 लाख टन गेहूं निर्यात की अनुमति दी थी। सूत्रों के अनुसार बेहतर मूल्य पाने के लिए प्रत्येक निर्यात टेंडर में 1.5 लाख टन गेहूं निर्यात के लिए बिड आमंत्रित की जाएंगी। आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीईए) ने नई फसल के गेहूं के लिए गोदाम खाली करने के मकसद से 20 लाख टन गेहूं निर्यात की अनुमति दी है। सीसीईए ने सरकार की ओर से गेहूं निर्यात करने के लिए ट्रेडिंग कंपनियों को निर्देश दिया है। निर्यात के लिए न्यूनतम मूल्य 228 डॉलर प्रति टन तय किया गया है। सूत्रों के अनुसार ट्रेडिंग कंपनियों को बंदरगाहों पर समुद्री जहाजों की दिक्कत को देखते हुए छोटी मात्रा में निर्यात के लिए कंपनियों को 10 से 15 टेंडर जारी करने को कहा गया है। हाल में एसटीसी ने गेहूं निर्यात का मूल्य पता लगाने के लिए टेंडर जारी किया गया था। लेकिन निर्यात नई बिड के आधार पर किया जाएगा। हालांकि प्रत्येक टेंडर का फ्लोर प्राइस वाणिज्य सचिव की अगुवाई वाली एक कमेटी तय करेगी। हाल में केंद्रीय खाद्य मंत्री के. वी. थॉमस ने कहा था कि सरकार एक बार में सारा 20 लाख टन गेहूं निर्यात नहीं करेगी, बल्कि कमेटी वैश्विक मूल्य का जायदा लेगी और सही समय पर निर्यात का फैसला करेगी। उन्होंने कहा था कि हम निर्यात की जल्दी में नहीं है। वैश्विक बाजार पर नजर रखी जा रही है क्योंकि मूल्य में सुधार हो रहा है। पिछले दो सप्ताह के दौरान शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (सीबॉट) में गेहूं के दाम करीब 20 फीसदी बढ़ गए। सरकार द्वारा खरीदे गए गेहूं की आर्थिक लागत 18,220 रुपये प्रति क्विटंल बैठ रही है। कम भाव पर 20 लाख टन गेहूं का निर्यात करने पर सरकार को करीब 1500 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना होगा। (Business Bhaskar)