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31 December 2012

उम्मीदें होंगी गुलजार

कड़े नियामकीय कदमों के बाद कमोडिटी डेरिवेटिव मार्केट खासा उत्साहित दिख रहा है। इन कदमों से कृषि जिंसों की कीमतों में अनिश्चितता 2012 के शुरुआती 4 प्रतिशत से कम होकर 1 प्रतिशत रह गई है। बाजार उम्मीद कर रहा है कि एफसीआरए (संशोधन) विधेयक से इस साल जिंस वादा कारोबार में तेजी आएगी। 2012 में हुई पांच प्रमुख चीजें सोना आयात पर शुल्क हुआ चार गुना अधिक सरकार ने सोना पर आयात शुल्क जनवरी में दोगुना कर 2 प्रतिशत और मार्च में इसे बढ़ाकर 4 प्रतिशत कर दिया। इससे सोना और महंगा हो गया। जानकारों का मानना है कि इससे सोने की तस्करी को बढ़ावा मिलेगा और आधिकारिक माध्यम से आयात 50 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। कृषि जिंसों की रिकॉर्ड कीमतें भारत और अमेरिका में बारिश कम होने से कई कृषि जिंसों की कीमतें उछल गईं। शुरू में कम बारिश से न केवल बुआई पर असर पड़ा बल्कि इससे खरीफ फसल को भी नुकसान पहुंचा जिससे कीमतें स्वत: बढ़ गईं। ग्वार वायदा पर प्रतिबंध ग्वार सीड की कीमतों में नाटकीय बढ़ोतरी हुई। यह नवंबर 2011 के 4,000 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर मार्च 2012 में 30,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गर्ईं। कीमतों में अनिश्चितता और कारोबार में धांधली के कई मामलों के बाद बाजार नियामक को मार्च 2012 में ग्वार सीड का वायदा कारोबार रोकना पड़ा। इसे मार्च-जून की अवधि में कारोबारी मात्रा खासी कम हो गई। कपास सरकार ने मार्च में कपास के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया लेकिन तुरंत ही रोक हटा दी। चूंकि, चीन ने कपास की खरीदारी में कमी कर दी। इसलिए वस्त्र मंत्रालय का 2013 में कपास निर्यात का अनुमान पिछले साल के स्तर का आधा रहेगा। वित्त मंत्रालय से सकारात्मक संकेत वित्त मंत्रालय ने पहली बार एफसीआरए (संशोधन) विधेयक पर सकारात्मक रुख दिखाया। इस विधेयक में वायदा बाजार आयोग को अधिक अधिकार देने की बात कही गई है। इस विधेयक में बैंकों को जिंस वायदा कारोबार में भाग लेने की अनुमति दी गई थी मगर विपक्षी दलों के विरोध के बाद यह प्रावधान वापस ले लिया गया। 2013 में उम्मीदें अमेरिकी 'फिस्कल क्लिफ' खर्च में कटौती के खतरे और कांग्रेस के विरोध के बाद जिंस बाजार अनिश्चितता में गोते लगा रहा है। बाजार जहां जनवरी के पहले सप्ताह में इस मुद्दे पर स्थिति साफ होने की उम्मीद कर रहा है, वहीं बाजार में रकम का प्रवाह बढऩे से मूल धातुओं को मदद मिलेगी। एफसीआरए (संशोधन) विधेयक को मंजूरी बजट सत्र में एफसीआरए (संशोधन) विधेयक पारित होने की उम्मीद है। इसका पारित होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि बिना अधिकारों के नियामक नियमों का उल्लंघन करने वालों को सजा देने में असमर्थ हो पाएगा। इस विधेयक से एफएमसी को अमूर्त जिंस अनुबंधों के सौदों की भी अनुमति देने का अधिकार होगा। अबाधित आपूर्ति के लिए डब्ल्यूडीआरए सरकार ने वेयरहाउसिंग विकास और नियामक प्राधिकरण (डब्ल्यूडीआर) बनाया। लेकिन वेयरहाउस की रसीदों (डब्ल्यूआर) के लेन-देन का प्राथमिक लक्ष्य अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। हालांकि इस बारे में अंतिम दिशानिर्देश अभी जारी होने हैं लेकिन 2013 में डब्ल्यूआर का सूचीबद्ध होना संभव है। इससे भारत में जिंस क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी। एक और एक्सचेंज उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने यूनिवर्सल कमोडिटी एक्सचेंज बनने का रास्ता साफ कर दिया है। यह भारत का राष्ट्रीय स्तर का छठा कमोडिटी डेरिवेटिव प्लेटफॉर्म होगा और 2013 से काम करना शुरू कर देगा। सलाहकार उप-समिति उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने 40 सदस्यों की सलाहकार समिति बनाई है जिसके अध्यक्ष एफएमसी प्रमुख रमेश अभिषेक हैं। पैनल ने कारेबार से जुड़ी समस्याओं की सूचना देने के लिए एक उप-समिति बनाई है। (BS Hindi)

नए एक्ट से कमोडिटी फ्यूचर्स को लगेंगे पंख

आर. एस. राणा नई दिल्ली | Jan 01, 2013 एफसीआरए एक्ट नए साल में पारित होने की उम्मीद रास्ता मुश्किलों भरा :पूरे साल सरकार प्रयास करके भी एफसीआर पारित नहीं करवा पाई :तृणमूल कांग्रेस और वामदलों का विरोधी अभी भी बरकरार :शीतकालीन सत्र में विधेयक पेश, लेकिन पास नहीं हो पाया :लंबे अरसे अटका है एफसीआरए पास कराने का काम नए वर्ष के दौरान फॉरवर्ड कॉन्ट्रेक्ट रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) विधेयक पारित होने से कमोडिटी के वायदा कारोबार में लिक्विडिटी बढऩे की संभावना है। इससे वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को ज्यादा अधिकार मिलेंगे, जिससे बैंक, एफआईआई और संस्थागत निवेश का रास्ता साफ होगा। एफसीआरए बिल लागू होने के बाद कमोडिटी ट्रेडिंग में ऑप्शंस ट्रेडिंग (पुट और कॉल) की सुविधा भी शुरू हो सकेगी। साथ ही, नए प्रोडक्ट मसलन फ्रेट और मौसम की ऑप्शन ट्रेडिंग शुरू करने में भी मदद मिलेगी। जिसका सीधा फायदा सभी संबंधित पक्षकारों को होगा। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एफसीआरए विधेयक पास होने से एफएमसी को ज्यादा अधिकार तो मिलेंगे ही, साथ में एफएमसी स्वयं ही कर्मचारियों और अधिकारियों की नियुक्तियां भी कर सकेगा। इससे जिंस वायदा कारोबार में मजबूती आएगी, जिसका किसानों और छोटे निवेशकों को निश्चित रूप से लाभ होगा। उन्होंने बताया कि हाल ही में समाप्त हुए संसद सत्र में एफसीआरए को संसद की सूची में तो शामिल किया गया था, लेकिन उस पर चर्चा नहीं हो पाई। उन्होंने बताया कि अब एफसीआरए को आगामी बजट सत्र में संसद में पेश किया जाएगा। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के साथ ही वाम दलों द्वारा एफसीआरए का लगातार विरोध किया जाता रहा है। यही कारण है कि सप्रंग से तृणमूल कांग्रेस के अलग होने के बाद ही अक्टूबर में कैबिनेट कमेटी एफसीआरए बिल को मंजूरी दे पाई। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के पूर्व सचिव राजीव अग्रवाल के अनुसार एफसीआरए विधेयक पास होने के बाद एफएमसी को ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे। हालांकि यह सही है कि जिंस वायदा बाजार में कीमतें बढऩे का फायदा किसानों तक पहुंचाने के लिए एफएमसी को और कड़े कदम उठाने होंगे। एफसीआरए के आने से किसानों को भी इसका फायदा मिले, इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत बनाना होगा। एफसीआरए बिल आने से कमोडिटी एक्सचेंजों के कारोबार में पारदर्शिता बढ़ जाएगी। उन्होंने बताया कि अभी तक एफएमसी डिफॉल्टरों पर केवल 1,000 से 25,000 रुपये तक की ही पेनाल्टी लगा सकता था लेकिन एफसीआरए बिल में पेनाल्टी की राशि को बढ़ाकर 50 लाख रुपये तक करने का प्रावधान किया गया है इससे डिफॉल्टरों की संख्या में कमी आएगी। इसी तरह से सदस्यों की सेवानिवृति आयु को मौजूदा 60 साल से बढ़ाकर 65 साल करने का प्रस्ताव किया गया है। एफएमसी के सदस्यों की संख्या को भी वर्तमान सदस्यों 4 से बढ़ाकर 9 करने का इसमें प्रस्ताव इस विधेयक में किया गया है। एफसीआरए बिल लागू होने के बाद एफएमसी एक्सचेंजों से फीस के रूप में राजस्व भी जुटा सकेगा, जिससे उसके लिए आत्मनिर्भर बनना संभव हो सकेगा। एफएमसी के सूत्रों के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2012-13 में अप्रैल से 15 दिसंबर तक कुल जिंसों का वायदा कारोबार 123 लाख करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 130 लाख करोड़ रुपये का हुआ था। इस दौरान एग्री कमोडिटी के वायदा कारोबार में जहां 20.21 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है वहीं बुलियन वायदा के कारोबार में 26.24 फीसदी की कमी आई है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. निलांजन घोष ने बताया कि कमोडिटी वायदा कारोबार में इस समय निवेशक केवल जिंसों की वायदा ट्रेडिंग ही कर सकते हैं जबकि एफसीआरए विधेयक पास होने के बाद ऑप्शन और इंडेक्स जैसे उत्पाद भी शामिल किए जा सकेंगे। जिसका सबसे ज्यादा फायदा किसानों और छोटे निवेशकों को मिलेगा। एफएमसी के पास अधिकार ज्यादा होंगे तो कीमतों के जोखिम प्रबंधन में कमी लाई जा सकेगी, साथ ही गड़बड़ी की आशंकाओं में भी कमी आएगी। नेशनल कमोडिटी एवं डेरीवेटिव एक्सचेंज लिमिटेड (एनसीडीएक्स) के चीफ बिजनेस ऑफिसर विजय कुमार ने बताया कि एफसीआरए बिल लागू होने के बाद बैंक, एफआईआई और संस्थागत निवेशकों की ओर से निवेश होने की संभावना भी बन सकती है। छोटे निवेशकों के साथ-साथ कॉरपोरेट की रुचि भी कमोडिटी वायदा कारोबार में बढ़ेगी, जिससे जिंस वायदा कारोबार में लिक्विडिटी बढ़ जाएगी। एफएमसी के पास प्रोडक्ट मंजूरी का अधिकार आ जाएगा। ऐसे में एफसीआरए को मंजूरी मिलने के बाद फ्रेट और मौसम की ऑप्शन ट्रेडिंग शुरू की जा सकती है, साथ ही और भी नए प्रोडक्ट लॉच करने का रास्ता साफ होगा। मौसम की ऑप्शन ट्रेडिंग शुरू होने से जिंस वायदा कारोबार में किसानों की भागीदारी, जो इस समय काफी है, भी बढऩे की संभावना है। एसएमसी इन्वेस्टमेंट एंड एडवायजर लिमिटेड के चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर डी. के. अग्रवाल ने बताया कि एफसीआरए बिल लागू होने के बाद एफएमसी एक्सचेंजों से फीस के रूप में राजस्व जुटा सकेगा। सेबी की तरह अधिकार मिलने के बाद एफएमसी के लिए नए उत्पादों मसलन ऑप्शन और फ्यूचर पेश करना संभव हो जाएगा। साथ ही, शिकायत आदि का निपटारा एफएमसी द्वारा स्वयं ही किया जा सकेगा। सरकार से अनुमति लिए बगैर ही जिंस वायदा कारोबार के लिए दिशा-निर्देश तय किए जा सकेंगे। एफसीआरए बिल को मंजूरी मिलने से नियमन बेहतर होगा, जिसका फायदा निश्चित रूप से निवेशकों को मिलेगा। (Business bhaskar.....R S Rana)

happy new year 2013

Dear All Happy New Year 2013....May every day of the New Year glow with good cheer and happiness for you & your family.

फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए 1,000 करोड़ रुपये जारी

आर एस राणा नई दिल्ली | Dec 31, 2012 एनएफएसएम के तहत चालू वित्त वर्ष में कुल 1,850 करोड़ रुपये आवंटित 1,000 करोड़ रुपये आवंटित दलहन की खेती के लिए 425 करोड़ रुपये खर्च होंगे गेहूं की पैदावार बढ़ाने पर 425 करोड़ रुपये आवंटित किए गए चावल के लिए दलहन, गेहूं और चावल की पैदावार में बढ़ोतरी के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत चालू वित्त वर्ष 2012-13 में अभी तक 1,000 करोड़ रुपये की राशि जारी की चुकी है। एनएफएसएम के तहत आवंटित रकम से किसानों को प्रमाणित बीज और सब्सिडी युक्त खाद का आवंटन किया जाना है। एनएफएसएम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दलहन, गेहूं और चावल की पैदावार बढ़ाने के लिए चालू वित्त वर्ष 2012-13 में एनएफएसएम के तहत 1,850 करोड़ रुपये का आवंटन किया जाना है। गेहूं और चावल का उत्पादन तय लक्ष्य से ज्यादा हो रहा है इसीलिए चालू वित्त वर्ष में दलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। यही वजह है कि कुल आवंटित राशि में दलहन उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए खरीफ और रबी सीजन के लिए 1,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जबकि गेहूं की पैदावार में बढ़ोतरी के लिए 425 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इसी तरह चावल की पैदावार में बढ़ोतरी के लिए भी 425 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष में अभी तक राज्यों को एनएफएसएम के तहत 1,000 करोड़ रुपये की राशि जारी की चुकी है। बाकी रकम भी राज्यों की मांग के आधार पर जारी की जा रही है। एनएफएसएम के तहत आवंटित राशि से किसानों को प्रमाणित बीजों का वितरण किया जाता है। साथ ही, खाद पर भी किसानों को सब्सिडी दी जाती है। उन्होंने बताया कि चालू रबी में दलहन उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए कुल आवंटित राशि में 100 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी कर कुल 700 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इसके तहत रबी में अतिरिक्त 14 लाख हैक्टेयर में दलहन की बुवाई का लक्ष्य तय किया गया है जबकि गर्मियों के सीजन में भी 5 लाख हैक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्रफल में मूंग की बुवाई का लक्ष्य तय किया गया है। उन्होंने बताया कि खरीफ सीजन में दलहन की पैदावार में आई कमी की भरपाई रबी सीजन में होने का अनुमान है। चालू रबी में दालों की बुवाई 132.52 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जो सामान्य क्षेत्रफल 128.71 लाख हैक्टेयर से ज्यादा है। एनएफएसएम के तहत किसानों को दालों के प्रमाणित बीजों के वितरण के परिणामस्वरूप ही रबी में दलहन के बुवाई क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है। चालू रबी में अभी तक मौसम भी फसलों के अनुकूल बना हुआ है। ऐसे में रबी सीजन में दालों का उत्पादन बढऩे की संभावना है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई 272.79 लाख हैक्टेयर में, मोटे अनाजों की बुवाई 56.22 लाख हैक्टेयर में और तिलहनों की बुवाई 78.86 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। (Business bhaskar.....R S Rana)

Gold recovers on low level buying, global cues

New Delhi, Dec. Gold prices recovered by Rs 65 to Rs 30,990 per 10 gm in the bullion market today on emergence of low level buying by retailers amid a firm global trend. However, silver lacked necessary buying support from industrial units and coin makers and dropped by Rs 600 to Rs 57,000 per kg. Buying activity in gold picked up as retailers indulged in low level buying for the coming wedding season, traders said. In Singapore, gold rose by 0.5 per cent to USD 1,664.23 and silver by 0.8 per cent to USD 30.25 an ounce. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity recovered by Rs 65 each to Rs 30,990 and Rs 30,790 per 10 gm, respectively. The metal had lost Rs 85 in the previous session on Saturday. Sovereign continued to be asked around previous level of Rs 25,450 per piece of 8 gram. On the other hand, silver ready dropped by Rs 600 to Rs 57,000 per kg, while weekly-based delivery rose by Rs 255 to Rs 57,855 per kg on speculative buying. Silver coins remained steady at Rs 79,000 for buying and Rs 80,000 for selling of 100 pieces.

MILK PRODUCTION LIKELY TO EXCEED 133 MILLION TONNE IN 2012-13

India, the largest producer of milk in the world, is set to produce over 133 million tonne milk this year. In 1986-87 – 25 years back – India produced just 46.7 million tonne milk. The production of various animal products has shown a steady increase over the years. Not only milk but also meat and eggs have seen significant rise in production, leading to better availability of these highly nutritious foods. Animals are important for the economy from employment and income-security points of view too. In India, farmers of marginal, small and semi-medium operational holdings (area less than 4 ha) own 87.7% of the livestock. It has been found that small and marginal farmers with livestock are better able to withstand the impact of drought. The table and graphic below show the production of milk, meat and eggs over the last five years. Milk India continues to be the largest producer of milk in the world. The estimate of the milk production in 2011-12 is 127.9 million tonne and is likely to reach 133.7 million tonne this year. Per capita availability of milk at national level has increased from 260 gram per day in 2007-08 to 290 gram per day in 2011-12. Meat The total meat production from cattle, buffalo, sheep, goat, pig and poultry is estimated to be 5.51 million tonne in 2011-12 and is likely to reach 5.9 million tonne in 2012-13. Eggs The estimate of egg production in the year 2011-12 is 66.45 billion and is likely to climb to 72.5 billion in the current year. As per CSO estimates of the value of livestock output for 2010-11, value from milk group [at constant price of 2004-05] was Rs.1,60,424 crore, meat group Rs. 41,933 crore, and eggs Rs. 8,052 crore. The Gross Domestic Product (GDP) at current price for the livestock sector was 3.64 % of total GDP during 2010-11. (PIB)

वर्ष 2012 में सोयाबीन का रहा बोलबाला

साल 2012 में मॉनसून की लेट-लतीफी का सीधा असर कृषि जिंसों की कीमतों पर पड़ा। इस साल कई कृषि जिंसों की कीमतें अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं। अमेरिका में पिछले 56 साल का सबसे भयानक सूखा और मॉनसून के शुरुआती दो महीनों में कमजोर बारिश के कारण कृषि जिसों की कीमतों में ज्यादा गरमाहट जून-जुलाई में देखने को मिली। अगस्त में मॉनसून की धमाकेदार वापसी और रबी फसलों की जोरदार बुआई के कारण अंतिम तिमाही में कृषि जिंस नरम हो गए। वर्ष 2012 निवेशकों को सबसे ज्यादा रिटर्न सोयाबीन से मिला। सोयाबीन से 32 फीसदी, गेहूं से 28 फीसदी, चने से 19 फीसदी, सरसों से 18 फीसदी, चीनी से 12 फीसदी और मेंथा से 10 फीसदी रिटर्न प्राप्त हुआ। उठापटक वाले बाजार में हल्दी की कीमतें पूरे साल दबाव में रहीं, लेकिन अंतिम तिमाही में जब ज्यादातर जिंसों में गिरावट देखी जा रही थी तो हल्दी चटख होने लगी। यही वजह है कि सालाना रिटर्न के लिहाज से हल्दी हाजिर बाजार में मुश्किल से 5 फीसदी जबकि वायदा में करीब 36 फीसदी रिटर्न दे रही है। हाजिर बाजार में काली मिर्च की कीमतें 14 फीसदी तेज हुईं जबकि वायदा में महज 5 फीसदी बढ़ीं। फसल के शुरुआती दिनों में खरीदारों की बाट जोह रहा आलू भी करीब 18 फीसदी मुनाफा दे गया। हाजिर बाजार में जो आलू पिछले साल दिसंबर में 306 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा था, वह इस समय 900 रुपये के करीब है यानी कीमतों में लगभग 200 फीसदी की बढ़ोतरी। सीपीओ यानी कच्चा पाम तेल पर दांव लगाने वाले निवेशकों को निराश हाथ लगी। मलयेशिया में पाम तेल के रिकॉर्ड उत्पादन के कारण इसमें करीब 25 फीसदी का नुकसान हुआ जबकि जीरा, काली मिर्च और हल्दी साल भर नफे-नुकसान की सीमा पर खड़े नजर आए। तेजी से घट-बढ़ का शिकार होने वाला कृषि बाजार मांग और आपूर्ति की ताल पर नाचता है। इसमें आयात-निर्यात के साथ सरकार की नीतियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। इस साल गेहूं, चीनी और कपास का उत्पादन कम होने की आशंका है, लेकिन देश में इन जिंसों का भरपूर स्टॉक है, ऐसे में 2013 में सरकार की निर्यात नीति इनकी दिशा तय करेगी। 2012 में साल भर दबाव में रहने वाली चीनी के बुरे दिन खत्म होते नजर आ रहे हैं। इस साल की अंतिम तिमाही में इसकी कीमतों में तेजी से सुधार हुआ है। फिलहाल चीनी मिलें उत्पादन लागत के आसपास कारोबार कर रही हैं। 2013-14 का मौसम इनकी कीमतें तय करने वाला साबित होगा। फिलहाल कपास सहित अधिकांश जिंस अपने न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर हैं। ऐसे में कोई भी खराब खबर इनकी कीमतें गिरा सकती है। ऐंजल कमोडिटी के प्रमुख नवीन माथुर के अनुसार वर्ष 2013 में दलहन फसलों में अच्छा रिटर्न मिलने की उम्मीद है। हालांकि इस साल दलहन का रकबा बढऩे की बात कही जा रही है, इसके बावजूद वैश्विक संकेतों और लगातार बढ़ती मांग से इनकी कीमतें बढ़ सकती हैं। हल्दी संभवत: अपने निवेशकों को निराश नहीं करेगी जबकि जीरे और काली मिर्च की कीमतें बढऩे की पूरी उम्मीद है। ग्वार जैसी जिंस का फिर से वायदा कारोबार रिटर्न के मामले में सब पर भारी पड़ सकता है। मेंथा भी इस साल छुपा रुस्तम साबित हो सकता है। (BS Hindi)

तेजी की चमक बिखेरता रहेगा सोना

अगले साल भी सोना तेजी की चमक बिखेरता रहेगा। विश्लेषकों के मुताबिक, अर्थव्यवस्था में तेजी आने के आसार एवं कुछ निश्चित वैश्विक कारकों से सोने की कीमत 33,000 रुपये के स्तर पर पहुंच सकती है। कोटक कमोडिटी सर्विसेज की विश्लेषक माधवी मेहता ने कहा कि दीर्घकाल में सोने में तेजी का रुख बने रहने की संभावना है क्योंकि ज्यादातर देशों के केंद्रीय बैंक सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ब्राजील और रूस के केंद्रीय बैंकों की योजना अगले साल सोने का भंडार बढ़ाने की है। 'वर्ष 2013 के लिए हमारा अनुमान है सोना 28,000-33,000 के दायरे में रहेगा।' हालांकि, रुपये में स्थिरता और अमेरिका का राजकोषीय असंतुलन सोने में नरमी ला सकता है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार और एफआईआई की तरफ से शेयर बाजार में खरीद-फरोख्त बढऩे से भी सोने को समर्थन मिल सकता है। पिछले सप्ताह, सोना 30,600 रुपये प्रति दस ग्राम पर रहा, जबकि वैश्विक बाजारों में यह 1,658 डालर प्रति आउंस पर रहा। मेहता ने कहा कि मुनाफावसूली के चलते दिसंबर में सोने में थोड़ी गिरावट आ चुकी है और निकट भविष्य में सोने का भाव 29,800-31,500 रुपये प्रति 10 ग्राम के दायरे में रहने का अनुमान है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी राजकोथीय संकट के बीच बाजार को उम्मीद है कि अमेरिकी सरकार कम से कम आंशिक समझौता करने में सक्षम होगी और ये चीजें बाजार के लिए सकारात्मक होंगी, जो सोने के लिए बेहतर साबित होगा। ऐसे में मेहता तो जनवरी 2013 में सोने की कीमतें बढऩे का अनुमान है। इसी तरह का विचार व्यक्त करते हुए कामट्रेंडज रिसर्च के निदेशक ज्ञानशेखर त्यागराजन ने कहा कि बाजार लंबे समय से अमेरिका में राजकोषीय असंतुलन दूर करने के लिए प्रस्ताव पारित होने का इंतजार कर रहा है। उन्होंने कहा कि दीर्घकाल में घरेलू बाजार में सोने की कीमत 33,000 रुपये से 34,000 रुपये के स्तर पर पहुंच सकती है। हालांकि अगर अमेरिका में प्रस्ताव पारित होने से रह जाता है तो सोने में गिरावट आएगी। उन्होंने कहा कि अल्पकाल में सोना टूटकर 1,565 डॉलर पर आ सकता है। अल्पावधि में सोने की कीमतें वैश्विक बाजार में घटकर 1565 डॉलर पर आ सकती है और इसके 1900 डॉलर तक ऊपर जाने की भी संभावनाएं हैं। लेकिन देसी बाजार में यह 28,500-31,500 रुपये के दायरे में रहेगा। ऐंजल ब्रोकिंग के सहायक निदेशक नवीन माथुर ने कहा कि अल्पावधि में सोना 30,500-31,000 रुपये के दायरे में रहेगा क्योंकि डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत हुआ है। वैश्विक बाजार में इसके 1650-1700 डॉलर प्रति आउंस पर रहने के आसार हैं। रुपये में मजबूती से देसी बाजार में सोने की कीमतें नियंत्रित रहेंगी। (BS Hindi)

29 December 2012

Gold, silver fall on sluggish demand, global cues

New Delhi. Both the precious metals, gold and silver, fell in the national capital today on sluggish retailers demand and a weak global trend. While gold fell by Rs 85 to Rs 30,925 per 10 gm, silver declined by Rs 100 to Rs 57,600 per kg on fall in demand among industrial units and coin makers. Sentiment turned bearish on sluggish retailers demand following ending of marriage season amid a weak global trend as a stronger dollar curbed demand for the metal as an alternative investment. The dollar rose to a two-week high against a basket of currencies ahead of US President Barack Obama's meeting with Democratic and Republican congressional leaders as a year-end budget deadline approaches. Gold in New York, which normally set price trend on the domestic front, fell 0.2 per cent to USD 1,661 an ounce and silver by 0.6 per cent to USD 30.05 an ounce. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity fell by Rs 85 each to Rs 30,925 and Rs 30,725 per 10 gm, respectively. The metal had gained Rs 110 yesterday. Sovereign held steady at Rs 25,450 per piece of eight gram. In line with a general weak trend, silver ready declined by Rs 100 to Rs 57,600 per kg and weekly-based delivery by Rs 440 to Rs 57,600 per kg. However, silver coins held steady at Rs 79,000 for buying and Rs 80,000 for selling of 100 pieces.

दलहन व गेहूं की बुवाई अभी भी धीमी

चालू रबी में दलहन की बुवाई सामान्य क्षेत्रफल के लगभग बराबर पहुंच गई है। जबकि तिलहनों की बुवाई पिछले साल से बढ़ी है लेकिन गेहूं की बुवाई पिछले साल की तुलना में थोड़ी पिछड़ी है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू सीजन में देशभर में रबी फसलों की कुल बुवाई 542.26 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 547.01 लाख हैक्टेयर में हुई थी। दलहनी फसलों की बुवाई चालू रबी में सामान्य क्षेत्रफल के लगभग बराबर हो गई है। अभी तक 132.52 लाख हैक्टेयर में दालों की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल समान अवधि में 134.14 लाख हैक्टेयर में दलहन की बुवाई हुई है। चालू रबी सीजन में तिलहनों की बुवाई बढ़कर 78.86 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक देशभर में 77.88 लाख हैक्टेयर में तिलहनों की बुवाई हुई थी। चालू रबी में गेहूं की बुवाई 272.79 लाख हैक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 276.81 लाख हैक्टेयर में गेहूं की बुवाई हुई थी। मोटे अनाजों की बुवाई चालू रबी में अभी तक 56.22 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल इस समय तक देशभर में 55.16 लाख हैक्टेयर में मोटे अनाजों की बुवाई हुई थी। सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार पिछले एक सप्ताह में करीब 25 लाख हैक्टेयर में रबी फसलों की बुवाई हुई है। गेहूं की बुवाई का रकबा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले थोड़ा कम है। लेकिन उत्पादक क्षेत्रों में गेहूं की बुवाई पूरे जोरों पर चल रही है। (Business Bhaskar)

सब्सिडी सोच-समझ कर दी जाए: पवार

कृषि मंत्री शरद पवार ने शुक्रवार को कहा कि प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत सब्सिडी की सीमा पर दोबारा सोचने की जरूरत है क्योंकि उनकी राय में आबादी के बहुत बड़े हिस्से को बहुत अधिक सस्ता अनाज देने से उल्टे देश की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। यह विधेयक सत्तारूढ संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी की प्रिय परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पवार ने कहा कि इस विधेयक के तहत बहुत अधिक लोगों को बहुत अधिक सब्सिडी दी गयी तो अनाज के भाव कम होंगे और किसान उसकी खेती बंद कर देंगे। पवार ने यहां अपनी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) कार्यालय का उद्घाटन करने के बाद पार्टी कार्यकाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि इस बात पर विचार किया जाना चाहिये कि देश की 70 प्रतिशत आबादी को रियायत देना क्या जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोकप्रियता हासिल करने में कुछ भी गलत नहीं है लेकिन बड़ी हकीकत को भी ध्यान रखा जाना चाहिये। इस कार्यालय का जीर्णोंद्धार किया गया है। पवार ने कहा कि अब हम खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने जा रहे हैं। खाद्यान्न हर किसी की जरुरत है तथा इस बात में कोई शक नहीं है। हालांकि हम गेहूं 18 रुपए प्रति किग्रा की दर से खरीदते हैं और लगभग 68 फीसदी आबादी को इसे दो रुपए प्रति किग्रा की दर पर देने की इच्छा कर रहे हैं। पवार ने कहा कि मुझे केवल एक बात कहनी है। अगर लागत 18 रुपए की आती है तो 50 प्रतिशत या 75 प्रतिशत की सब्सिडी दे दीजिये। पर मेरी चिंता कुछ और है। जब देश की 70 फीसदी आबादी को बाजार में गेहूं दो रुपए की दर पर मिलता है, यह बढ़त अच्छी बात है, पर उस किसान का क्या होगा जो उसका उत्पादन करता है। उसे कौन उसके उत्पाद का लाभकारी मूल्य देगा जबकि वही माल बाजार में इतने सस्ते दर पर उपलब्ध है। पवार ने कहा कि मेरा मानना है कि (किसान के उत्पाद की) कीमत कम होगी। अगर ऐसा होता है तो वह किसान उसे छोड़ दूसरी फसल की खेती की ओर रुख करेगा। और अगर वह ऐसा करता है तो तो देश में खाद्य सुरक्षा की समस्या गंभीर हो जायेगी। पवार ने कहा कि लोकप्रियता हासिल करने के चक्कर में ऐसी अति नहीं की जानी कि सब कुछ स्वाहा हो जाये। राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की संख्या में प्रति वर्ष दो प्रतिशत से गिरावट आने का जिक्र था। उन्होंने कहा कि गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालों की संख्या घट रही है लेकिन हमारी रियायतें बढ़ रही हैं। पवार ने कहा कि आज महाराष्ट्र में जो भी लोग महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में काम कर रहे हैं उन्हें 145 रुपए प्रति दिन की दिहाड़ी मिलती है। अगर वह आदमी दो रुपए प्रति किग्रा की दर से अपना 35 किग्रा का महीने का स्टाक खरीदता है तो वह अपने महीने का स्टाक 70 रुपए में खरीदता है तो वह 140 रुपए में (एक दिन की दिहाड़ी में) दो महीने का स्टाक खरीद लेगा। उन्होंने कहा कि किसी ऐसे आदमी को सारी रियायत दें जिसके पास खाने को कुछ न हो लेकिन पूरे देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी को रियायत देना क्या जरूरी है। उन्होंने कहा कि कमजोर तबके, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए भिन्न रुख अख्तियार करने में कुछ भी गलत नहीं है। (Dainik Hindustan)

27 December 2012

गेहूं के एमएसपी में 65 रुपये का इजाफा

विपणन सीजन 2013-14 के लिए गेहूं का एमएसपी 1,350 रुपये तय सीसीईए के फैसले केंद्रीय पूल से 25 लाख टन और गेहूं के निर्यात की अनुमति कुंभ मेले के आयोजन के लिए यूपी को बीपीएल मूल्य पर 16,200 टन गेहूं व 96,000 टन चावल का आवंटन होगा आखिरकार लंबे इंतजार और मंत्रालयों के अंतर्विरोध के बाद केंद्र सरकार ने गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में 65 रुपये की बढ़ोतरी कर ही दी। विपणन सीजन 2013-14 के लिए गेहूं का एमएसपी 1,350 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। इसके अलावा केंद्रीय पूल से 25 लाख टन और गेहूं के निर्यात की अनुमति भी दी गई है। आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की बुधवार को हुई बैठक में विपणन सीजन 2013-14 के लिए गेहूं के एमएसपी में 65 रुपये की बढ़ोतरी कर मूल्य 1,350 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया। विपणन सीजन 2012-13 के लिए गेहूं का एमएसपी 1,285 रुपये प्रति क्विंटल था। बैठक के बाद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पत्रकारों को बताया कि केंद्रीय पूल से 25 लाख टन और गेहूं के निर्यात की अनुमति दी गई है। इस गेहूं का निर्यात सार्वजनिक कंपनियों एसटीसी, पीईसी और एमएमटीसी के माध्यम से किया जाएगा। इसके अलावा कुंभ मेले के आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश को बीपीएल के दाम पर 16,200 टन गेहूं और 96,000 टन चावल का आवंटन किया जाएगा। गेहूं के एमएसपी को लेकर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी), खाद्य मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और कृषि मंत्रालय की सिफारिशें भिन्न-भिन्न होने के कारण नवंबर में कैबिनेट कमेटी की बैठक में फैसला नहीं हो सका था। कृषि मंत्रालय ने खाद, डीजल, बीज और कीटनाशकों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए एमएसपी में 100 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 1,385 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की सिफारिश की थी। इसके उलट सीएसीपी ने केंद्रीय पूल में बंपर स्टॉक का हवाला देकर एमएसपी को 1,285 रुपये प्रति क्विंटल के पूर्व स्तर पर ही स्थिर रखने की सिफारिश की थी, लेकिन इसके साथ ही किसानों को 40 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने की सिफारिश की थी। सीसीईए ने केंद्रीय पूल से 25 लाख टन और गेहूं के निर्यात की अनुमति दी है, जबकि इससे पहले केंद्रीय पूल से 20 लाख टन गेहूं के निर्यात की इजाजत दी गई थी। इसमें से सार्वजनिक कंपनियों द्वारा 20 लाख टन गेहूं की निविदा को अंतिम रूप दिया भी जा चुका है। एसटीसी को गेहूं निर्यात के लिए हाल ही में 328 डॉलर प्रति टन की ऊंची बोली मिली है। केंद्रीय पूल में पहली दिसंबर को 376.52 लाख टन गेहूं का बंपर स्टॉक मौजूद था जो बफर के तय मानकों के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।अप्रैल महीने में गेहूं की नई फसल की आवक शुरू हो जाएगी। बुवाई और अभी तक के मौसम को देखते नए सीजन में भी गेहूं की पैदावार बढऩे का अनुमान है। (Business Bhaskar.....R S Rana)

रबर पर आयात शुल्क घटाने की मांग

रबर उद्योग ने तैयार उत्पाद पर वसूले जाने वाले शुल्क के मुकाबले कच्चे माल पर आयात शुल्क कम रखने का अनुरोध केंद्र सरकार से किया है। अखिल भारतीय रबर उद्योग संघ (एआईआरआईए) के बजट-पूर्व ज्ञापन के मुताबिक भारतीय रबर उद्योग का प्रमुख कच्चा माल प्राकृतिक रबर है और कुल लागत में इसकी हिस्सेदारी 30 से 45 फीसदी है। संघ ने कहा है कि प्राकृतिक रबर पर सीमा शुल्क मौजूदा 20 फीसदी या 20 रुपये प्रति किलोग्राम (जो भी कम हो) को घटाकर 7.5 फीसदी या 10 रुपये प्रति किलोग्राम (जो भी कम हो) किया जाए। इस समय प्राकृतिक रबर की वैश्विक कीमतें 160 रुपये प्रति किलो है और 20 रुपये आयात शुल्क के साथ ये करीब 12.5 फीसदी बैठती हैं, जो तैयार उत्पाद पर वसूले जाने वाले 10 फीसदी आयात शुल्क के मुकाबले ज्यादा है। एआईआरआईए के अध्यक्ष नीरज ठक्कर ने कहा कि चीन ने प्राकृतिक रबर पर आयात शुल्क 1600 युआन से घटाकर अधिकतम 1200 युआन कर दिया है और यह जनवरी से प्रभावी होगा। फिलहाल वैश्विक कीमतें करीब 25,000 युआन प्रति टन हैं और इस हिसाब से आयात शुल्क महज 5 फीसदी बैठता है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा के लिए उद्योग को समान मौका उपलब्ध कराने की दरकार है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर कच्चे माल पर आयात शुल्क की दरें काफी ऊंची हैं और यह 20 से 70 फीसदी तक है। ऐसे में आयातित कच्चे माल से तैयार होने वाले उत्पाद की लागत ज्यादा पड़ती है। इससे पड़ोसी देशों से तैयार उत्पादों का आयात होता है और देसी उत्पादकों को नुकसान पहुंचता है। एआईआरआईए के मुताबिक अगले वित्त वर्ष में प्राकृतिक रबर की मांग-आपूर्ति का अंतर 1.5 लाख टन से ज्यादा रहने का अनुमान है। इस खाई को पाटने के लिए संगठन ने 1 लाख टन रबर के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति मांगी है। संगठन ने आसियान के साथ मुक्त व्यापार समझौते के तहत रियायती दर पर आयातित माल से तैयार उत्पादों की तर्ज पर प्राकृतिक रबर के आयात की भी अनुमति देने की मांग की है। उसका कहना है कि रबर आधारित स्थानीय इकाइयों को भी समान मौका उपलब्ध कराया जाए। देश में 6,000 से ज्यादा इकाइयां हैं और उनमें से ज्यादातर इकाइयां कच्चे माल की लागत बढऩे और चीन जैसे देशों से सस्ते उत्पादों के आयात से संकट में हैं। एआईआरआईए के मुताबिक चीन और दूसरे देशों से रबर के सस्ते उत्पादों के आयात में बढ़ोतरी से देसी रबर उद्योग की चिंता बढ़ी है। 35,000 से ज्यादा रबर उत्पाद होने के चलते डंपिंग का आरोप साबित करना मुश्किल होता है और ज्यादातर विनिर्माता छोटे हैं और उनके पास कानून के मुताबिक एंटी-डंपिंग की कार्यवाही शुरू करने के लिए संसाधन नहीं होता। दूसरी ओर, कार्बन ब्लैक और रबर केमिकल (उद्योग का प्रमुख कच्चा माल) पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाए जाने से आयातित रबर से तैयार उत्पादों के मुकाबले भारतीय रबर उत्पाद ज्यादा महंगा हो जाता है। संघ के मुताबिक रबर उद्योग के लिए ऐसे कच्चे माल के आयात पर भी सीमा शुल्क ज्यादा है, जिसका उत्पादन देश में नहीं होता है। इसलिए उद्योग को अपना अस्तित्व बचाए रखने और तैयार उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने में मुश्किलें हो रही हैं। इसलिए संघ ने देश में न बनने वाले ब्यूटाइल रबर और अन्य हाईटेक सिंथेटिक रबर जैसे कच्चे माल पर सीमा शुल्क नहीं वसूलने की भी मांग की है। कच्चे माल पर उच्च सीमा शुल्क ढांचे से उद्योग पर भारी असर पड़ा है और इस कारण कम क्षमता का इस्तेमाल हो रहा है। यहां तक कि रबर विनिर्माण इकाइयां बंद भी हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक रबर उत्पाद बनाने वाली करीब 294 इकाइयां पिछले पांच साल में बंद हो चुकी हैं। कई ऐसे विनिर्माताओं ने उत्पादन बंद कर दिया है, जहां काफी कम यानी 100 टन से कम रबर की खपत होती है । (BS Hindi)

PM for shifting farmers to non-agri jobs to raise income

New Delhi. Prime Minister Manmohan Singh today emphasised on the need to shift large surplus farmers to non-agriculture sector, saying per capita income of farmers would rise only when fewer people engage in farming. He also said farmers' income and agri-land yields need to be enhanced to meet the growing foodgrains demand in the coming years, building on the success of the 11th Plan. Addressing the 57th meeting of the National Development Council (NDC), Singh said: "Paradoxically, we should not aim at increasing total employment in agriculture. In fact, we need to move people out of agriculture by giving them gainful employment in the non-agricultural sector." "It is only when fewer people depend upon agriculture that per capita incomes in agriculture will rise significantly and sufficiently to make farming an attractive proposition." Although the agriculture share in GDP has fallen to 15 per cent, about half of the population still relies on farm activities as its principal income source, he added. Since large population is engaged in farm activities, Singh said, "what happens in agriculture is therefore critical for the success of inclusiveness." Better agricultural performance during the 11th Plan is an important reason why poverty declined faster, he added. Agriculture being a state subject, the Prime Minister said that most of the policy initiatives needed are in the realm of state governments. However, the 12th Plan strategy contains many elements which will ensure growth is as inclusive as possible, he said. During the 11th Plan (2007-12), the average agriculture sector growth reached 3.3 per cent from 2.4 per cent in the previous Plan period, while farm wages grew annually at 6.8 per cent in the recent years, compared to only 1.1 per cent in the period before 2004-05, he added.

Explore PPP model in agriculture on large scale: Pawar

New Delhi. India should explore the Public- Private-Parternship model on a large scale in the 12th Five Year Plan (2012-17) to sustain momentum of higher foodgrain production in the coming years, Agriculture Minister Sharad Pawar said today. He also said higher investment in agriculture and allied sectors was necessary to achieve food security and improve farm incomes. Besides, APMC Acts need to be amended to encourage setting up of private markets and contract farming. Addressing the 57th meeting of National Development Council (NDC), Pawar said: "The private public partnership (PPP) model should be explored on a larger and wider scale." The Centre's strategy for agriculture for 12th Plan would comprise assuring remunerative prices to farmers, facilitating a greater role for the private sector in farm sector, focus on small and marginal farmers through promotion of farmer interest groups and farmers producer companies, he said. The government will also emphasise on ensuring supply of quality seeds at reasonable prices, making other inputs available on a timely basis, pushing crop diversification besides providing more credit facilities, Pawar said. That apart, concerted efforts will be made for improving productivity in rain-fed areas and creating a more competitive environment for agricultural marketing, he added. Stressing the need to improve irrigation facilities, Pawar said: "It is extremely important that ongoing irrigation projects are completed on time, without cost & time overruns." With about 55 per cent area still dependent on rains for agriculture, the focus should be on development of dryland, rainfed areas and water harvesting, he said. Noting that drought proofing of the agriculture sector still remains elusive, the minister said, "...issues of improving water use efficiency, micro irrigation and coordinated efforts of various agencies of government towards rainfed agriculture have to be addressed in the coming years." On farmers' suicides, Pawar said, "Though the declining trend of farmers' suicides is a matter of some satisfaction, we cannot remain complacent. We have to redouble our efforts to address the problem of agrarian distress in certain parts of the country." The government needs to make all efforts to realise the 12th Plan's broad vision of 'Faster, Sustainable, and More Inclusive Growth', leading to improvement in socio-economic condition of people, he added. He also said that the oilseed sector continues to be an area of concern where the country's dependence on imports of edible oil is rising. Stressing the need to give impetus to research efforts in agriculture, Pawar said that number of new initiatives would be taken during the 12th Plan period. New schemes would also be launched to boost livestock sector. He urged the state governments to fill up all vacant posts created after modification of guidelines of 'Support to State Extension Programmes for Extension Reforms' scheme on priority basis.

Gold drops as some investors sell amid US budget negotiations

Singapore. Gold today fell for the first time in five days as some investors sold the metal amid negotiations between US lawmakers to strike a budget deal before the year-end. Gold lost 0.4 per cent to 1,653.55 dollar an ounce. Bullion is 6 per cent higher this year, set for a 12th annual gain, as investors sought the metal as a protection of wealth after central banks around the world took steps to stimulate economies. Silver was little changed at 30 dollar an ounce, after swinging between gains and losses. The metal has climbed 7.8 per cent in 2012 as holdings in exchange-traded products rose 9.4 per cent this year to a record 18,915.13 metric tonnes. President Barack Obama and Congress return to Washington today and have five days to reach a deal to avert more than USD 600 billion in automatic spending cuts and tax increases from January 1, known as the fiscal cliff. Treasury Secretary Timothy F Geithner said he will take "extraordinary measures" to postpone a US default into early 2013 amid the stalled talks.

Gold ends below Rs 31k level on sustained selling, global cues

New Delhi. Gold prices dip below Rs 31,000 level per 10 gm in the national capital today on sustained selling by stockists in tandem with a weak global trend. The yellow-metal declined by Rs 100 to Rs 30,900 per 10 gm. However, silver recovered by Rs 100 to Rs 57,500 per kg on scattered enquiries from industrial units. Sentiments in gold remained bearish for the second straight day after it fell in overseas markets as some investors sold the metal amid negotiations among US lawmakers to strike a budget deal before the year-end. The gold in global markets, which normally set price trend on the domestic front, lost 0.4 per cent to USD 1,653.55 an ounce in Singapore. Besides, sluggish demand from retail customers due to end of marriage season further fuelled the downtrend. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity fell further by Rs 100 each to Rs 30,900 and Rs 30,700 per 10 gm, respectively. The metal had lost Rs 220 yesterday. Sovereign followed suit and shed Rs 50 to Rs 25,400 per piece of 8 gram. On the other hand, silver ready recovered by Rs 100 to Rs 59,500 per kg, while silver weekly-based delivery fell further by Rs 60 to Rs 57,555 per kg. Meanwhile, price of silver coins were unchanged at Rs 79,000 for buying and Rs 80,000 for selling of 100 pieces.

NDC की बैठक में तल्खी, जयललिता ने कहा मेरा अपमान हुआ

नई दिल्ली।। एनडीसी की 52वीं बैठक घोर विवादों में घिर गई है। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता बैठक से वॉकआउट कर गई हैं। जयललिता ने कहा कि मुझे अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि मैं जब बात रख रही थी तब 10 मिनट के बाद ही बजर बजने लगा। जयललिता ने कहा कि ऐसी हरकत मेरा अपमान है जो कि मुझे बर्दाश्त नहीं है। उन्होंने पूछा कि क्या मुख्यमंत्री को बात रखने का मौका नहीं दिया जाएगा? यदि ऐसा ही था तो बुलाया क्यों गया था? उन्होंने कहा कि मैं यहां आकर अपमानित महसूस कर रही हूं। जयललिता ने कहा कि असम के मुख्यमंत्री को 35 मिनट का समय दिया गया। मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया? उन्होंने कहा कि मुझे केंद्र सरकार से कई मुद्दों पर करनी थी। मुझे उम्मीद थी कि केंद्र सरकार मेरी बातों और समस्याओं को सुनेगी ले्किन इस सरकार के पास सुनने तक का वक्त नहीं है।

जयललिता के आहत होने के बाद केंद्र सरकार की तरफ से केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा कि एक दिन में ही बैठक खत्म करनी होती है इसलिए वक्त का अभाव होता है। इसलिए समय का निर्धारण किया जाता है। राजीव शुक्ला ने कहा कि 396 मिनट में सभी मुख्यमंत्रियों को बात रखनी होती है। समय का पर्याप्त अभाव होता है। इस मुद्दे पर पर जयललिता जी राजनीति कर रही हैं। शुक्ला ने कहा कि जयललिता जैसी सीनियर नेता को इस तरह की बात कहना शोभा नहीं देता है। उनका आरोप बिल्कुल बेबुनियाद है। ऐसा केवल उनके साथ ही नहीं किया गया है। देश के सारे मुख्यमंत्रियों को भी इतना ही समय दिया गया है।

हालांकि इसकी उम्मीद पहले से ही की जा रही थी कि राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक तल्ख रहेगी। गैरकांग्रेसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कई शिकायतें पहले से ही हैं। उम्मीद है कि ममता बनर्जी भी केंद्र सरकार पर जोरदार हमला करेंगी। बीजेपी शासित राज्य भी भेदभाव के आरोप लगाते रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार से विशेष राज्य का दर्जा मांग रहे हैं। उन्होंने भी कई बार इस मांग के लिए केंद्र सरकार पर हमला बोला है।

इससे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एनडीसी(राष्ट्रीय विकास परिषद) की बैठक ने कहा कि हम आर्थिक मंदी से जूझ रहे हैं। देश की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। मंदी से निपटना हमारी पहली प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 12वीं योजना में 8 फीसदी ग्रोथ रेट का टारगेट रखा है। उन्होंने कहा कि हमने आर्थिक हालत सुधारने के लिए कुछ सख्त कदम उठाए हैं। आने वाले वक्त में इसका असर भी साफ दिखेगा।

कृष क्षेत्र में हमारा प्रदर्शन बढ़िया है। बिजली प्रॉजेक्ट पर तेजी से काम करना है। बिना बिजली उत्पादन बढ़ाए विकास की गति को बढ़ा नहीं सकते। प्रधानमंत्री ने कहा कि पूरी दुनिया आर्थिक मंदी से जूझ रही है इसके बावजूद हम थोड़े बेहतर हालत में हैं। प्रधानमंत्री ने दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय विकास परिषद के 52वीं बैठक में देश की आर्थिक हालत और रणनीति पर कई अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना से सिस्टम में पारदर्शिता आएगी और जरूरतमंदों की जरूतें सुनिश्चित होंगी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हम महिलाओं को पूरा हक नहीं दे पाए हैं। रेप की बढ़ती घटनाएं और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाना देश के लिए बेहद चिंता का विषय है। हमने जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में रेप कानून को और सख्त बनाने के लिए कमिटी गठित की है। सरकार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित और प्रतिबद्ध है। हम हर हाल में महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहते हैं। यह हमारी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने कहा कि रेप कानून की गंभीर समीक्षा की जाएगी। समीक्षा के बाद हम बदलाव को अंतिम रूप देंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्र और राज्य दोनों को मिलकर काम करने की जरूरत है। (Navbharat)

26 December 2012

महाराष्ट्र के कपास उत्पादकों ने सरकार से मांगी सब्सिडी

घटती कीमतों और उत्पादन की ऊंची लागत के बीच पिस रहे महाराष्ट्र के कपास किसानों ने सब्सिडी की मांग की है। उनका कहना है कि उन्हें या तो केंद्र सब्सिडी उपलब्ध कराए या फिर राज्य सरकार। उन्होंने कहा है कि सरकार खुद तय कर ले कि उसे किसानों को सब्सिडी प्रति एकड़ के हिसाब से देनी है या फिर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से। उनका कहना है कि कीमत-उत्पादन में बढ़ते अंतर को पाटने के लिए यह आवश्यक है। इस मामले ने इसलिए जोर पकड़ा है कि महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव कॉटन ग्रोअर्स मार्केटिंग फेडरेशन 3900 रुपये के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कपास की खरीद कर रहा था जबकि उत्पादन लागत प्रति हेक्टेयर 5000-5500 रुपये प्रति क्विंटल रही है।
हालांकि हाल में राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र में सत्ताधारी कांग्रेस-राकांपा और विपक्षी शिव सेना, भाजपा, एमएनएस ने कपास किसानों के लिए खरीद की ऊंची कीमतों की वकालत की थी। उन्होंने कहा कि चीन की तरफ से मांग बढऩे के चलते तीन साल पहले कीमतें 7,000 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गई थीं। उनकी मांग थी कि कपास की खरीदारी कम से कम 6,000 रुपये प्रति क्विंटल पर की जानी चाहिए।
कपास किसानों ने राज्य सरकार से यह भी अनुरोध किया है कि वह फौरन कदम उठाते हुए पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश व गुजरात की तरफ से 4,000-6,000 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बड़ी मात्रा में हो रही कपास की खरीद पर रोक लगाए क्योंकि वहां उत्पादन कम हुआ है। कपास उत्पादकों का कहना है कि आंध्र व गुजरात के कारोबारियों व जिनिंग मिलों की खरीदारी का सही तरीके से  लेखाजोखा नहीं रखा जा रहा है। आंध्र व गुजरात की मिलें जिनिंग व प्रेसिंग के जरिए कपास की शंकर-6 किस्म को निर्यात के मकसद के लिए तैयार कर देती हैं।
अक्टूबर में कपास सलाहकार बोर्ड ने देश में 2012-13 के कपास सीजन में 334 लाख गांठ कपास उत्पादन का अनुमान जाहिर किया था, जिसमें से महाराष्ट्र में 80 लाख गांठ उत्पादन होने का अनुमान है। हालांकि राज्य कृषि विभाग व फेडरेशन के अधिकारियों का अनुमान है कि कम बारिश के चलते उत्पादन घटेगा।
महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव कॉटन ग्रोअर्स मार्केटिंग फेडरेशन के चेयरमैन डॉ. एन पी हिरानी ने कहा कि अब तक फेडरेशन ने 4320 क्विंटल कपास की खरीदारी 3900 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर की है। वहीं कारोबारियों ने 58.8 लाख क्विंटल कपास ऊंचे भाव पर खरीदा है। कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की तरफ ने अब तक 11,509 क्विंटल कपास खरीदा है। कपास किसान इस समय उत्पादन लागत और समर्थन मूल्य के बीच बढ़ती खाई से जूझ रहे हैं और उनके लिए बढ़ती लागत का भार उठाना मुश्किल हो रहा है। प्रति हेक्टेयर कपास उत्पादन की लागत 5,000-5,500 रुपये है, जिसमें उर्वरक, मजदूरी और अन्य खर्चे शामिल हैं जबकि उन्हें तैयार उत्पाद का भाव महज 3900 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है। इसलिए केंद्र या राज्य सरकार को प्राथमिकता के आधार पर सब्सिडी मुहैया कराना चाहिए। हिरानी ने कहा कि दो साल पहले किसानों को परेशानी के समय ऐसी सब्सिडी दी गई थी।
हिरानी ने स्पष्ट किया कि किसानों को अगर ज्यादा कीमतें मिलती है तो फेडरेशन इसके खिलाफ नहीं है, खास तौर से गुजरात व आंध्र प्रदेश के निजी कारोबारी व जिनिंग और प्रेसिंग की तरफ से। लेकिन कुल मिलाकर यह लेन-देन पूरी तरह दो नंबर का है क्योंकि ऐसी खरीद का कहीं लेखाजोखा नहीं है। सरकार को भी वैट का नुकसान हो रहा है और इससे राज्य का तेल उद्योग भी प्रभावित हो रहा है। इसलिए राज्य सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए और ऐसी खरीद पर रोक लगानी चाहिए। (BS Hindi)

'भारत के पास होगा 150 लाख गांठ अतिरिक्त कपास'

कमजोर मॉनसून के चलते इस खरीफ सीजन में कपास के रकबे में गिरावट के बावजूद देश में कपास वर्ष 2012-13 (अक्टूबर-सितंबर) के दौरान करीब 150 लाख गांठ सरप्लस होगा। भारतीय कपास संघ (सीएआई) के ताजा अनुमान के मुताबिक देश में इस साल 350 लाख गांठ कपास का उत्पादन होगा और कुल खपत करीब 265 लाख गांठ रहने की उम्मीद है। इस तरह देश में करीब 150 लाख गांठ कपास का भंडार रहेगा। सीएआई के अध्यक्ष धीरेन शेठ ने एसोसिएशन की सालाना आम बैठक में कहा कि कपास के रकबे में पिछले साल के मुकाबले 3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में मॉनसून सीजन के दूसरे हिस्से में बेहतर बारिश के चलते फसल शानदार रही है। उन्होंने कहा कि इस साल कपास का उत्पादन 350 लाख गांठ से कम नहीं रहेगा, वहीं इसकी खपत करीब 265 लाख गांठ रहने की उम्मीद है। इस तरह करीब 150 लाख गांठ कपास का सरप्लस रहेगा। वैश्विक स्तर पर भी मांग के मुकाबले ज्यादा कपास की आपूर्ति की संभावना है। वॉशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति (आईसीएसी) के मुताबिक वैश्विक स्तर पर कपास का उत्पादन और मिलों में इसकी खपत साल 2012-13 में क्रमश: 259 लाख टन व 234 लाख टन रहने की संभावना है, ऐसे में वहां 24 लाख टन ज्यादा कपास की आपूर्ति होगी। शेठ ने कहा कि साल 2011-12 में अप्रत्याशित उछाल के बाद वैश्विक स्तर पर कपास के कारोबार में इस सत्र के दौरान 21 फीसदी की गिरावट की संभावना है और यह 77 लाख टन रह सकता है क्योंकि चीन की तरफ से मांग घटी है। लेकिन विश्व के बाकी देशों की तरफ से आयात में 18 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। वैश्विक बाजार में कपास की कीमतों पर नजर डालें तो अप्रैल 2012 से ही यहां कीमतों में गिरावट का रुख नजर आया है। उस समय वैश्विक स्तर पर कपास की कीमतें 100.1 सेंट प्रति पाउंड थी। कॉटनलुक ए इंडेक्स के मासिक औसत के मुताबिक नवंबर 2012 में कपास की कीमतें 80.87 सेंट प्रति पाउंड रही हैं। हालांकि घरेलू बाजार में कपास की कीमतें सीमित दायरे में रहीं। अप्रैल 2012 में कपास की हाजिर कीमतें करीब 34,600 रुपये प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) थीं, वहीं नवंबर 2012 में इसका भाव 34,100 रुपये प्रति कैंडी रहा। कपास क्षेत्र के परिदृश्य के बारे में शेठ ने कहा कि देश में कपास का रकबा साल 2001-02 में 87.3 लाख हेक्टेयर था जो 2011-12 में बढ़कर 121.78 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन बहुत ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं रहा है, वहीं देश में कपास की सफलता की कहानी शानदार रही है। साल 2001-02 में देश में 158 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ था, जो एक दशक में बढ़कर दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। उत्पादकता में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है और यह साल 2001-02 के 308 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के मुकाबले बढ़कर साल 2011-12 में 500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर पहुंच गया है। इस बीच कपास सलाहकार बोर्ड (सीएबी) के अनुमान में कहा गया है कि कपास वर्ष 2012-13 (अक्टूबर-सितंबर) में 334 लाख गांठ कपास का उत्पादन होगा। 2012-13 में कुल रकबा 116.14 लाख हेक्टेयर रहने का अनुमान है। 90वीं सालाना आम बैठक में शेठ ने कहा कि कपास निर्यात से देश को मिलने वाली रकम साल 2001-02 में 44 करोड़ रुपये थी, जो साल 2011-12 में बढ़कर 14,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि ऐसी कामयाबी से देश को सबसे बड़ा कपास उत्पादक व उपभोक्ता होने का खिताब मिला है। पूरी दुनिया में भारत कपास का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक भी है और कपास के रकबे के मामले में भी इसे अग्रणी स्थान हासिल है। (BS Hindi)

निवेशकों को मिलेगी एक साल से 'अटकी' रकम

जिंस वायदा बाजार में निवेशकों और कारोबारियों की रकम सुरक्षित होने का अहम संकेत देते हुए दो अग्रणी एक्सचेंज जल्द ही निवेशकों की वह रकम वापस करना शुरू करेंगे, जो ब्रोकर के डिफॉल्ट होने के चलते एक साल से अटकी पड़ी थी। एक साल पहले एमसीएक्स व एनसीडीईएक्स के सदस्य भविष्य एडवाइजरी ऐंड कॉमट्रेड प्राइवेट लिमिटेड को डिफॉल्टर घोषित किया गया था। उनके क्लाइंट ने भी रकम गंवा दी थी। चूंकि जिंस बाजार नियामक वायदा बाजार आयोग ने पहल करते हुए निवेशक सुरक्षा कोष को औपचारिक रूप देने की बात कही थी, लिहाजा ब्रोकर के डिफॉल्ट के कारण रकम गंवाने वाले निवेशकों को अब इस कोष के जरिए भुगतान करना संभव होगा। अब एमसीएक्स व एनसीडीईएक्स जल्द ही निवेशकों को भुगतान शुरू करेंगे। दोनों एक्सचेंजों के अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि अभी मध्यस्थता की जाती है और इसके बाद निवेशकों को भुगतान किया जाता है। हालांकि यह शायद पहला ऐसा मामला होगा। एफएमसी के अधिकारियों ने कहा कि निवेशक सुरक्षा कोष की तर्ज पर एक्सचेंजों से सही मायने में निपटान व गारंटी फंड बनाने को कहा गया है और इसमें उस रकम को जमा करने को कहा गया है जो इस मकसद के लिए सामान्य कारोबार के दौरान इकट्ठा की गई हो। इस समय जिंस एक्सचेंजों के कोलेटरल सदस्य ब्रोकर जो कुछ मुहैया कराते हैं, उसे उनकी खरीद के लिए मार्जिन माना जाता है। ब्रोकर के डिफॉल्ट की सूरत में क्लाइंट को होने वाले नुकसान के लिए कुछ भी देने को नहीं रहता। एफएमसी के चेयरमैन रमेश अभिषेक ने कहा कि एक्सचेंज के सदस्यों के लिए हम पूंजी पर्याप्तता के नए नियम को अंतिम रूप दे रहे हैं, जिसमें पूंजी के एक हिस्से को खरीद के लिए दिए जाने वाले मार्जिन में शामिल नहीं किया जाएगा। इस न्यूनतम आधार पूंजी को एक्सचेंज के पास नकद व सावधि जमा के तौर पर रखना होगा और सदस्यता की समाप्ति पर इसे वापस किया जाएगा। एक ओर जहां सदस्यों को अतिरिक्त पूंजी के लिए समय दिया जाएगा, वहीं ऐसे करने में नाकाम रहने पर उनके मौजूदा कोलेटरल को न्यूनतम आधार पूंजी में तब्दील कर दिया जाएगा और खरीद के लिए दिए जाने वाले मार्जिन का आकलन करने में इस रकम को शामिल नहीं किया जाएगा। एफएमसी ने एक्सचेंजों से कहा है कि वह सदस्यों की तरफ से किए जाने वाले कारोबार आदि के बारे में निवेशकों को एसएमएस या ईमेल अलर्ट रोजाना भेजने की व्यवस्था करे। ऐसा पाया गया था कि क्लाइंट अपने खाते में होने वाले कारोबार के बारे में अनभिज्ञ था, क्योंकि उसे ऐसा अलर्ट नहीं मिल रहा था वरना वह तुरंत ही ब्रोकर से बातचीत कर सकता था। (BS Hindi)

बासमती महंगा होने से निर्यात में कमी आने का अनुमान

आर एस राणा नई दिल्ली | Dec 26, 2012 निर्यात योग्य बासमती महंगा होने से विदेश से ऑर्डर में कमी विदेशी बाजार अप्रैल-नवंबर के दौरान निर्यात सौदे 16 फीसदी बढ़कर 21.8 लाख टन पिछले साल की समान अवधि में 18.8 लाख टन निर्यात सौदे हुए अप्रैल से अगस्त के दौरान 15 लाख टन बासमती का शिपमेंट पिछले साल की इस अवधि में 12.20 लाख टन की शिपमेंट वित्त वर्ष 2011-12 में कुल 32.11 लाख टन बासमती का निर्यात घरेलू बाजार में बासमती चावल की कीमतों में आई तेजी से चालू वित्त वर्ष २०१२-१३ की अंतिम तिमाही (जनवरी से मार्च) के दौरान निर्यात 15 फीसदी घटने की आशंका है। अक्टूबर से अभी तक घरेलू बाजार में पूसा-1,121 बासमती चावल सेला की कीमतों में 17.8 फीसदी की तेजी आकर भाव 5,600 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। हालांकि अप्रैल से नवंबर के दौरान 16 फीसदी बढ़ोतरी के साथ कुल 21.8 लाख टन बासमती चावल के निर्यात सौदों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है। केआरबीएल लिमिटेड के चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर अनिल मित्तल ने बताया कि चालू खरीफ में बासमती चावल की पैदावार 25 से 30 फीसदी घटने की आशंका है। यही कारण है कि उत्पादक मंडियों में बासमती धान और चावल की कीमतों में तेजी आई है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पूसा-1,121 बासमती चावल सेला का भाव बढ़कर 1,200 डॉलर प्रति टन हो गया जबकि सीजन के शुरू में भाव 850-900 डॉलर प्रति टन था। हालांकि इन भावों में निर्यातकों को मार्जिन अच्छा मिल रहा है लेकिन निर्यात सौदों में कमी आई है। ऐसे में अंतिम तिमाही में निर्यात करीब 15 फीसदी घटने की आशंका है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष 2012-13 के पहले आठ महीनों (अप्रैल से नवंबर) के दौरान बासमती चावल के निर्यात सौदों के रजिस्ट्रेशन में 16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान 21.8 लाख टन बासमती चावल के निर्यात सौदों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 18.8 लाख टन का हुआ था। अप्रैल से अगस्त के दौरान 15 लाख टन की शिपमेंट भी हो चुकी हैं जबकि पिछले साल की समान अवधि में 12.20 लाख टन की शिपमेंट हुई थी। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2011-12 में 32.11 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था। खुरानिया एग्रो के प्रबंधक रामविलास खुरानयिा ने बताया कि चालू सीजन में बासमती धान की पैदावार में आई कमी से कीमतों में तेजी आई है। सीजन के शुरू में पूसा-1,121 बासमती सेला चावल का दाम 4,750-4,800 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि इस समय भाव 5,600 रुपये प्रति क्विंटल है। इसी तरह से पूसा-1,121 बासमती धान का भाव इस दौरान 2,350-2,400 रुपये से बढ़कर 3,200 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। मौजूदा कीमतों में और भी 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने की संभावना है। (Business Bhaskar....R S Rana)

Govt hikes Wheat MSP by Rs 65 a quintal

New Delhi, Dec 26. The government today announced Rs 65 per quintal hike in the support price of wheat to Rs 1,350 per quintal and allowed additional exports of 2.5 million tonnes of wheat from its godowns to clear surplus stock and ease storage crunch. The Cabinet Committee on Economic Affairs (CCEA) approved these two decisions in its meeting held here. The minimum support price of wheat has been increased by Rs 65 per quintal to Rs 1,350 per quintal, Finance Minister P Chidambaram told reporters here after the meeting. The CCEA had not fixed the minimum support price (MSP) of wheat while approving the MSPs of other rabi crops for 2012-13 crop year (July-June) in its meeting held in November. It had asked the CACP, government body that suggests farm pricing policy, to relook into the issue following differences between the Agriculture and Finance ministries. In its proposal, the Agriculture Ministry had suggested an increase of Rs 100 per quintal in wheat MSP. Earlier, sources had said that the ministry turned down the recommendation of the Commission for Agricultural Costs and Prices (CACP) to freeze wheat MSP at last year's level and provide a bonus of Rs 40 per quintal to farmers. The increase in wheat MSP would enthuse farmers to cover more area under crop. Till last week, farmers have sown wheat in 25.3 million hectare, marginally lower than 25.7 million hectare in the same period last year. The CCEA also approved a proposal of the Food Ministry to allow export of an additional 2.5 million tonnes of wheat from the FCI godowns. In June, the government had allowed export of 2 million tonnes of wheat from FCI godowns to clear surplus stocks. The entire quantity has been contracted for shipment and 1 million tonnes of it has already been exported. This takes the total approval for wheat exports to 4.5 million tonnes.

25 December 2012

पंजाब में पूरा हुआ गेहूं की बुआई का लक्ष्य

उत्तरी क्षेत्र में गेहूं की बुआई का काम करीब-करीब पूरा हो गया है और इसके साथ ही अनुमान है कि पंजाब में इसका रकबा 35 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के पार कर चुका है जबकि हरियाणा में बुआई 25.05 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य तक पहुंच जाने की उम्मीद है। पंजाब कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को यहां कहा, पंजाब के खेतों से आ रही खबरों के आधार पर चालू रबी बुआई सत्र में गेहूं का रकबा 35 लाख हेक्टेयर होने की उम्मीद है। अभी तक 34.52 लाख हेक्टेयर रकबे को गेहूं खेती के दायरे में लाया जा चुका है, जो पिछले सत्र की समान अवधि में 35 लाख हेक्टेयर था। उन्होंने कहा, फिर भी बठिंडा और होशियारपुर के उप-पर्वतीय क्षेत्र के कपास क्षेत्र में कुछ हिस्से ऐसे हैं, जहां गेहूं बुआई का काम पूरा होना बाकी है। अधिकारी ने कहा कि पंजाब ने बुआई शुरू होने से पहले 35 लाख हेक्टेयर गेहूं खेती का रकबा होने का अनुमान व्यक्त किया था, जो रकबा पिछले सत्र में 35.28 लाख हेक्टेयर था। हरियाणा में गेहूं बुआई का काम 24 लाख हेक्टेयर में पूरा हो चुका है, जो चालू सत्र में लक्षित रकबे का करीब 95 फीसदी है। हरियाणा ने गेहूं खेती के रकबा 25.05 लाख हेक्टेयर होना निर्धारित किया, जो पिछले वर्ष करीब 25.22 लाख हेक्टेयर था। हरियाणा और पंजाब जैसे गेहूं उत्पादक राज्यों ने रबी बुआई सत्र 2012-13 में 285 लाख टन गेहूं उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जो पिछले सत्र के सर्वकालिक रिकॉर्ड फसल उत्पादन से 8 फीसदी कम है। धान फसल की देर से हुई कटाई के कारण पंजाब और हरियाणा में गेहूं बुआई में करीब सप्ताह भर की देर हुई थी। (BS Hindi)

महंगे गन्ने से सिकुड़ जाएगा चीनी उत्पादक कंपनियों का मुनाफा

गन्ने की ऊंची कीमतें और सरकारी हस्तक्षेप के कारण बढ़ती लागत का भार उपभोक्ताओं पर डालने में असमर्थ हो रहीं चीनी उत्पादक कंपनियों का मुनाफा इस पेराई सीजन में घट सकता है। अग्रणी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा की सहायक कंपनी आईएमएसीएस का अनुमान है कि कैरीओवर स्टॉक ज्यादा रहने से निकट भविष्य में चीनी की कीमतें निचले स्तर पर रहेगा। भारतीय चीनी उद्योग पर आईएमएसीएस की टिप्पणी में कहा गया है कि गन्ने की ऊंची कीमतों के अलावा वैश्विक बाजार में चीनी की घटती कीमतें और इस वजह से निर्यात से मिलने वाली रकम में कमी के चलते कंपनियों का मुनाफे में कमी बरकरार रहेगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साल 2012-13 में निर्यात घटने की संभावना है क्योंकि देश में उत्पादन कम रहेगा और ऊर्जा की लागत बढ़ेगी जबकि कच्ची चीनी की रिफाइनिंग में ज्यादा मुनाफा मिलेगा। चीनी वर्ष 2013 में देश में चीनी का उत्पादन घटकर 24-26 लाख टन घटकर 240 लाख टन रह जाएगा। चीनी वर्ष 2012 के करीब 68 लाख टन चीनी के कैरीओवर स्टॉक को जोड़ लें तो चीनी की कुल उपलब्धता 307-310 लाख टन होगी। रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में खपत बढ़कर 227-230 लाख टन पहुंच जाएगी, ऐसे में देश में करीब 80 लाख टन चीनी सरप्लस होगी। चीनी का अंतिम स्टॉक 61 लाख टन मानें तो चीनी वर्ष 2013 में निर्यात घटकर 20-22 लाख टन पर आ जाएगा जबकि चीनी वर्ष 2012 में कुल निर्यात 35 लाख टन रहा है। साल 2012-13 में चीनी उत्पादन में अनुमानित गिरावट और सरकार के एथेनॉल की कम कीमत तय करने से एथेनॉल जैसे उपोत्पाद का परिदृश्य अनिश्चित है। चीनी उद्योग की विकास दर लगातार तीन साल ऊंची रही है, जबकि उत्पादन में सालाना 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। लेकिन चीनी वर्ष 2013 में देश में चीनी का उत्पादन करीब 8-9 फीसदी घटकर 240 लाख टन रह सकता है क्योंकि गन्ने का उत्पादन घटा है। कीमतें ज्यादा होने से गुड़ उत्पादन में गन्ने का ज्यादा इस्तेमाल, उत्पाद की स्थिर कीमतें, गन्ने की बकाया राशि में बढ़ोतरी आदि से चीनी मिलों की वित्तीय सेहत कमजोर होगी। देश में चीनी का उत्पादन गन्ने के उत्पादन व इसकी उपलब्धता और गुड़, चीनी व खांडसारी में इसके इस्तेमाल पर निर्भर है। इस चीनी वर्ष में देश में गन्ने का उत्पादन 6.2 फीसदी घटने का अनुमान है क्योंकि मॉनसून सीजन की शुरुआत में कम बारिश के कारण इसके रकबे में 6.5 फीसदी की गिरावट आर्ई है। देश में चावल, गेहूं और वनस्पति तेल के साथ-साथ चीनी भी आम लोगों के जरूरत की चीज है और रोजाना की कैलोरी में इसका योगदान करीब 9 फीसदी है। देश में उत्पादन व कीमतों में उतारचढ़ाव के बावजूद चीनी की खपत 3 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ रही है। गुड़ की बजाय चीनी के इस्तेमाल में बढ़ोतरी, बढ़ती आय और आबादी में इजाफे से देश में चीनी की खपत 2.5-3 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढऩे का अनुमान है। ग्रामीण इलाकों में हालांकि गुड़ व खांडसारी का इस्तेमाल अभी भी प्रमुखता से हो रहा है, लेकिन चीनी की कुल मांग व प्रति व्यक्ति मांग में इजाफा जारी रहने की संभावना है। खाद्य उद्योगों व अन्य गैर क्षेत्रों में चीनी की खपत में हो रही बढ़ोतरी का योगदान कुल खपत में करीब 60 फीसदी रहने का अनुमान है। ये चीजें दीर्घावधि में बाजार के विकास में अतिरिक्त योगदान कर सकती हैं। 2012-13 का परिदृश्य सकारात्मक रहने से वैश्विक बाजार में कीमतें घटने की संभावना है। वैश्विक स्तर पर लगातार तीसरे साल उत्पादन ज्यादा रहने से कीमतों पर दबाव रह सकता है। चीनी वर्ष 2013 में तीसरे साल अंतिम स्टॉक बढऩे का अनुमान है और स्टॉक में बढ़ोतरी से वैश्विक स्तर पर चीनी की कीमतों पर दबाव रहेगा। (BS Hindi)

'जांच' के बिना नहीं होगा काली मिर्च वायदा

कृषि जिंसों के गुणवत्ता मानकों से जुड़े नियमों को मजबूत करते हुए वायदा बाजार आयोग दूसरे वैधानिक निकायों द्वारा तय मानकों को शामिल करने के लिए कॉन्सेप्ट पेपर का मसौदा तैयार करने में जुटा हुआ है। ये वैधानिक निकाय हैं खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) आदि। यह फैसला एफएसएसएआई की तरफ से 18 दिसंबर को एनसीडीईएक्स के छह गोदामों में जमा 180 करोड़ रुपये की कीमत वाले 5,000 टन काली मिर्च को जब्त करने के मद्देनजर लिया गया है। एफएसएसएआई ने एक्सचेंज के छह गोदामों को सील कर दिया है। एफएसएसएआई ने काली मिर्च में मिनरल ऑयल पाया है, जिसका इस्तेमाल इसकी पॉलिसिंग के लिए किया गया था। एफएमसी चेयरमैन रमेश अभिषेक की अगुआई वाली 40 सदस्यीय सलाहकार समिति ने 7 अक्टूबर की बैठक में दूसरे वैधानिक निकायों द्वारा तय गुणवत्ता मानकों को यहां भी लागू करने पर विचार किया था, ताकि देश भर में गुणवत्ता के एकसमान मानक हो जाएं। यह एक पखवाड़े में तैयार होने की संभावना है, ऐसे में काली मिर्च की गुणवत्ता की जांच उपरोक्त वर्णित निकायों के अलावा अन्य वैधानिक निकायों मसलन एगमार्क और हजार्ड एनालिसिस ऐंड क्रिटिकल कंट्रोल पॉइंट (एचएसीसीपी) के मानकों के आधार पर भी होगी। बाद में एफएमसी जनता की राय लेगा, जो नियामक की तरफ से दिशानिर्देश को अंतिम रूप देने से पहले सामान्य चलन हो गया है। एफएमसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, हम सामान्य तौर पर काली मिर्च में अन्य मानकों मसलन भार, नमी की मात्रा और अन्य अशुद्धियों की जांच करते हैं, जो नौ साल पहले अनुबंध शुरू करने के समय से ही चलन में है। मिनरल ऑयल की जांच का मसला हमारे लिए नया है, जो आयोग एक्सचेंज के प्लैटफॉर्म पर पेश होने वाले नए अनुबंध में लागू करेगा। वास्तव में, एफएमसी ने काली मिर्च के अनुबंध पेश करने वाले तीन एक्सचेंजों एनसीडीईएक्स, एनएमसीई और इंडिया पेपर ऐंड स्पाइस ट्रेड एसोसिएशन को आयोग के पूर्वानुमति के बिना काली मिर्च का नया अनुबंध पेश करने से मना किया है। अधिकारी ने कहा, हम एक्सचेंजों से काली मिर्च के अनुबंध में मिनरल ऑयल की जांच संबंधी शर्त जोडऩे को कहेंगे और इसके बिना अनुबंध की अनुमति नहीं दी जाएगी। प्रयोगशालाओं में ऐसी सुविधा के लिए होने वाले खर्च पर अधिकारी ने कहा कि मिनरल ऑयल जांच से जुड़ी मशीन में भारी निवेश की दरकार नहीं होती है। ऐसे में प्रयोगशालाओं में इसे लगाने में कोई समस्या नहीं होगी। अगर विभिन्न वैधानिक निकायों के कोई और नियम होंगे तो आयोग उस पर विचार करेगा और यह जानने की कोशिश करेगा कि ऐसी जांच के लिए प्रयोगशालाओं में कितने निवेश की दरकार होगी। काली मिर्च के स्टॉक को सील किए जाने को कारोबारियों ने नियामकीय खामी बताया है क्योंकि अनुबंध में मिनरल ऑयल की जांच का मामला शामिल नहीं किया गया था। स्पष्ट तौर पर कारोबारी इस बात का फायदा उठा रहे थे कि एनसीडीईएक्स के अनुबंध में मिनरल ऑयल की जांच को शामिल नहीं किया गया था। अधिकारी के मुताबिक, एफएमसी ने मसाला बोर्ड के साथ संपर्क करने के बाद मौजूदा अनुबंध की अनुमति दी थी। इस बीच, 20 दिसंबर को समाप्त अनुबंध में कारोबारियों ने महज 29 टन की डिलिवरी की मांग की है। चूंकि एफएसएसएआई ने काली मिर्च की पूरी मात्रा एनसीडीईएक्स के गोदामों में सील कर दी है, ऐसे में डिलिवरी कोई बड़ी समस्या नहीं होगी और न ही यह डिफॉल्ट में तब्दील हो पाएगा। डिलिवरी संबंधी चिंताओं के बीच कारोबारियों ने पिछले 10 दिनों में एनसीडीईएक्स पर दिसंबर वायदा की बिकवाली कर दी है, ऐसे में कुल ओपन इंटरेस्ट (खड़े सौदे) महज 29 टन का है जबकि 10 दिसंबर को यह 2437 टन था। आयोग हालांकि इस पक्ष में नहीं है कि स्थानीय कारोबार के लिए उपलब्ध काली मिर्च की जांच अन्य वैधानिक निकायों के मानदंड के मुताबिक करवाने के लिए कारोबारी भारी भरकम खर्च करे। (BS Hindi)

क्रिसमस पूर्व बर्फबारी से सेब की अच्छी पैदावार के आसार

हिमाचल प्रदेश व कश्मीर के सेब उत्पादक क्षेत्रों में हुई ताजा बर्फबारी से उत्पादकों को आगामी सीजन में उत्पादन बढऩे की उम्मीद है। उनका मानना है कि जल्द बर्फबारी शुरू होने से सेब के बगीचों को फायदा मिलेगा। हर बार क्रिसमस के बाद बर्फबारी शुरू होती है लेकिन इस साल पहले ही बर्फबारी शुरू होने से लंबे समय तक मौसम ठंडा रहने की उम्मीद है। अगले एक-डेढ़ माह में दो-चार बार और बर्फ गिरने से सेब के पेड़ों के लिए फायदा मिलेगा। इससे इस साल सीजन में सेब का उत्पादन बढऩे की संभावना है। हिमाचल प्रदेश सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष रविन्द्र सिंह ने बताया कि दिसंबर के मध्य में ही बर्फबारी से इस साल सेब के बगीचों को लाभ पहुंचने की संभावना बढ़ गई है। 60 से 80 सेंटीमीटर तक की बर्फबारी दो-चार बार और होने पर सेब के पेड़ों को काफी फायदा होगा। इससे वर्ष 2013 के सीजन में सेब का उत्पादन बढऩे की उम्मीद है। फिलहाल बगीचों में सेब के पेड़ सुसुप्तावस्था (डंठल के रूप) में हैं। बर्फबारी से इनकी जड़ों में पानी की मात्रा बढ़ेगी, जिससे लंबे समय तक नमी रहेगी। यह सेब के बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक होती है। कश्मीर स्थित सेब के थोक व्यापारी फारुख अहमद भट के मुताबिक दिसंबर मध्य में ही बर्फबारी से सेब का उत्पादन बढऩे की उम्मीद बढ़ गई है। पेड़ों में मार्च के दौरान आने वाली पत्तियों व अप्रैल में आने वाले फूलों के लिए बर्फबारी फायदेमंद साबित होगी। जड़ों में नमी से अच्छे फूल आएंगे, जिससे सेब उत्पादन भी अधिक होगा। आजादपुर मंडी में सेब के थोक कारोबारी आनंद सैनी ने बताया कि मंडी में स्टोर्ड सेब का भाव पिछले एक माह में बढ़ गए हैं। फिलहाल सेब का भाव 600 रुपये से 1,200 रुपये प्रति पेटी (12 से 16 किलो प्रति पेटी) के स्तर पर हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश व कश्मीर में बर्फबारी से इस साल उत्पादन बढऩे की उम्मीद दिखाई दे रही है। इससे भाव स्थिर रह सकते हैं। वहीं, जनवरी में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया से भी स्थानीय मंडियों में सेब की आवक शुरू हो जाएगी। जिससे भावों में स्थिरता रहने की संभावना है। (Business Bhaskar)

Sugar tasted sweeter this yr; industry sees decontrol in 2013

New Delhi. Sugar tasted sweeter this year for the Rs 80,000 crore industry which saw bumper production, higher exports and signs of freedom from government control, but consumers had to pay Rs 10 per kg more for the commodity through the year. High retail prices helped sugar industry recover costs and clear almost entire cane payments to farmers -- worth Rs 52,000 crore in 2011-12 marketing year (October-September). The year started on a good note with the Prime Minister appointing an expert panel in January to examine the decontrol of the sugar sector, ending on a hope that 2013 could be a landmark year with government freeing the only industry left under its control. Sugar industry, on which five crore cane farmers depend, is controlled right from fixing the cane price to marketing of the sweetener. Much to the industry's liking, the expert panel headed by PMEAC Chairman C Rangarajan submitted a positive report on the decontrol of sugar sector in October with recommendation of immediate removal of two major controls - regulated release system and levy sugar obligation. Through the release mechanism, the Centre fixes the sugar quota that can be sold in the open market and under the levy system, it asks mills to contribute 10 per cent of output to run the ration shops costing industry Rs 3,000 crore a year. Even before the report was submitted, the government had started to loosen its grip on the sector by relaxing the regulated release mechanism in April from monthly basis to quarterly, and then later to a four-monthly exercise. The move has helped mills manage inventories and cash-flows better. The government has hinted that it would eventually phase out sugar quota allocation for open market sale. It has also started the consultation process with states on removing levy obligations and sugarcane pricing. At the fag end of the year, Food Minister K V Thomas assured the industry leaders that Rangarajan report would not meet the fate of earlier reports. "The decision on some of the recommendations will be taken in the next 4-5 months. It will take some time, we cannot take decision in haste. We are taking views of the state governments," Food Secretary Sudhir Kumar said. Way back in 1971-72 and 1978-79, the government had made attempts on decontrol. Agriculture Minister Sharad Pawar also tried for the decontrol in 2010 when he was holding the charge of Food Minister, but without any result. Besides some action on the decontrol front, the year also witnessed surplus sugar production, prompting the government to initially allow exports of 2 million tonnes and then freeing shipments altogether in May. Sugar output rose to 26.34 million tonne in the 2011-12 marketing year (October-September), as against 24.4 million tonne in the previous year. Exports from India, the world's second largest producer but biggest consumer, stood at 3.4 million tonne, as against 2.6 million tonne in this period. The government provided another major boost to the sugar industry by allowing price of ethanol (a bye-product of sugarcane) to be decided by the market forces. In November, the Cabinet Committee on Economic Affairs (CCEA) approved that procurement price of ethanol would be determined by oil marketing companies and ethanol suppliers. It had fixed an ad-hoc price of Rs 27 per litre in 2010. The CCEA's direction to oil firms on the implementation of 5 per cent mandatory ethanol blending with petrol against the current level of 2 per cent would be beneficial for the sugar mills with expected rise in demand for ethanol. The year turned out to be fruitful for sugarcane farmers as well; they got better price from the industry and cane payment arrears were also not very high at Rs 444 crore for 2011-12 marketing year that ended in September. Higher cane price pushed up retail rates by about Rs 10 in last one year to Rs 44-45 per kg, adding to burden on consumers who are already facing the burnt of high inflation. Branded, packed sugar is being sold at about Rs 50 a kilo. However, there was not much hue and cry this year on sugar price rise as had happened in 2009-10, when rates touched Rs 50 per kg. The reason being gradual increase in the prices and not sudden spurt in rates. The price of the sweetener could go up further next year with the Centre increasing cane rates to Rs 170/quintal for 2012-13, from Rs 145 in the previous year. Moreover, Uttar Pradesh, which declares its own cane price, has increased rates to Rs 280-290/quintal, from Rs 240-250. Not only that, sugar production is expected to decline to 23.5 million tonne in 2012-13 although output will remain higher than annual domestic demand of 21-22 million tonne for the third consecutive year. "There was this atmosphere that sugar production might fall drastically due to drought situation. But the situation has improved. Earlier we were expecting 23 million tonne production, but now 23.5 million tonne. So, the situation is comfortable and prices are under control," the Food Secretary said. Indian Sugar Mills Association (ISMA) too was satisfied with the year coming to a close. "It was a good year for the sugar sector. Mills could recover cost from July onwards. The cane price arrears to farmers have almost been cleared," ISMA Director General Abinash Verma told PTI. "The Rangarajan Committee report on decontrol has come during 2012 which was on expected lines. We look forward to its acceptance by the government in 2013," Verma added.

Gold rises for third day on sustained buying, global cues

New Delhi. Gold prices rose by Rs 90 to Rs 31,220 per 10 gm in the national capital today on sustained buying, driven by Christmas festival demand amid a firm Asian cues. However, silver held steady at Rs 58,000 per kg in restricted trading activities. Rising for the third day, the gold in the Asian region, which influence trading in the domestic markets here, advanced 1.2 per cent to 1,657 dollar an ounce in Tokyo. Markets in the US and UK are closed today for Christmas Day. Traders said sustained buying by stockists and retailers in view of Christmas festival amid a firm trend in the Asian region mainly kept gold higher for the third day. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity rose by Rs 90 each to Rs 31,220 and Rs 31,020 per ten grams respectively. The metal had gained Rs 260 in last two sessions. Sovereign remained steady at Rs 25,450 per piece of eight gram. On the other hand, silver ready held steady at Rs 58,000 per kg while weekly-based delivery shot up by Rs 1315 to Rs 59,500 per kg on speculative buying. Meanwhile, silver coin continued to be asked around previous level of Rs 79,000 for buying and Rs 80,000 for selling of 100 pieces.

24 December 2012

Gold gains on local buying, firm global trend

New Delhi, Dec 24 (PTI) A divergent trend developed on the bullion market today as gold advanced further on local buying amid firming global trend, while silver lacked the necessary follow up support and ended with losses. While gold climbed by Rs 100 to Rs 31,130 per 10 gm in continuation to a rise of Rs 160 in the previous session, silver declined by Rs 800 to Rs 58,000 per kg. Traders said gold prices rose on retailers buying ornaments for the Christmas festival and a firming global trend as investors weighed concerns about whether U.S. lawmakers will fail to agree on a deal before a year-end budget deadline as talks stalled. The gold in overseas markets, which normally set price trend on the domestic front, rose 0.3 per cent to 1,662.38 dollar an ounce in Singapore. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity rose by Rs 100 each to Rs 31,130 and Rs 30,930 per ten gram respectively. Sovereign held steady at Rs 25,450 per piece of eight gram. On the other hand, silver ready fell by Rs 800 to Rs 58,000 per kg while weekly-based delivery improved by Rs 60 to Rs 58,185 per kg on speculative support. Silver coins dropped by Rs 1,000 to Rs 79,000 for buying and Rs 80,000 for selling of 100 pieces.

Rising gold prices maintain last decade's trend in 2012

Mumbai, Dec 24 Continuing with last decade's northward journey, gold prices breached the psychological Rs 30,000 level during 2012 to hit an intra-trade historical high of Rs 32,530 in November, amid sustained investment enquiries throughout the year. Gold that showed strong co-relation with international prices, continued its record setting feat and registered a huge rise of Rs 3,440 or 12.65 per cent till December 22, 2012, driven by all-round buying support. In the year 2011, it had spurted by Rs 6,605 or 32.09 per cent. Silver too was in great demand scoring impressive rise of Rs 7,220 or 14.17 per cent on December 22, over its last year-end close though remained below the intra-trade all-time high of 75,020 recorded last year (April 25, 2011). The bullion market witness a brief closure during March due to traders protest against the budget proposal to hike import duty and levy on branded jewellery, which was rolled back by the government later in April. The bullish sentiment was largely fanned by weaker dollar in global market and fears of inflation after Federal Reserve pledged to hold US interest rates near zero until the end of 2014. In Europe, gold prices rose on high euro amid hectic shot-covering as the precious metal once again returned to "Safe haven" tag. Gold visited USD 1,700 mark in June following bleak US employment data caused by eurozone crisis that spurred heavy demand. The atmosphere created by faltering growth data from across the globe raised hopes of further quantitative easing by Federal Reserve, prompting investors to go for gold and treasuries in global markets. Although, gold in the international market could not surpass its all-time record registered in September last year, the yellow metal in domestic market logged its all-time peak in the current year. This was due to, among other things, fall in rupee value which was trading nearly 3.7 percent lower against the US dollar on December 21, 2012. On the domestic scene, standard gold (99.5 purity) opened the year higher at Rs 27,205 per ten grams in January and surged to cross Rs 30,000-mark in June. It then rose to Rs 31,000 and Rs 32,000 levels in September before touching an all-time high of Rs 32,530 on November 27. It stood at Rs 30,630 on December 22, 2012, as against last year-end's close of Rs 27,190, showing a rise of Rs 3,440 or 12.65 per cent. Pure gold (99.9 purity) also resumed higher at Rs 27,335 per ten grams and shot up further to an all-time high of Rs 32,665 on November 26 before ending at Rs 30,760 on December 22, a surge of Rs 3,430 or 12.55 per cent. The silver ready (.999 fineness) commenced strong at Rs 51,090 per kilo and touched a high of 64,470 before finishing at 58,190 on December 22, exhibiting a gain of Rs 7,220 or 14.17 per cent.(PTI)

दूसरे राज्यों से कपास खरीद रही हैं गुजरात की मिलें

इस साल कपास का उत्पादन अनुमान से कम रहने के चलते गुजरात की जिनिंग मिलें कच्चे माल के लिए दूसरे राज्यों पर आश्रित होने के लिए बाध्य हो गई हैं। इस समय जिनिंग के लिए उपलब्ध कपास में करीब 50 फीसदी हिस्सा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और दूसरे उत्पादक राज्यों से आ रहा है। सौराष्ट्र जिनर्स एसोसिएशन के सचिव आनंद पोपट ने कहा, 'हर साल दूसरे राज्यों से सिर्फ 20-25 फीसदी कपास ही कताई के लिए गुजरात आता है क्योंकि हमारे पास बड़ी संख्या में प्रसंस्करण इकाइयां हैं। लेकिन इस साल स्थितियां अलग हैं क्योंकि हमारे यहां उत्पादन घटा है और ज्यादातर कताई मिलें दूसरे राज्यों से 50 फीसदी से ज्यादा कच्चा माल मंगवाने को बाध्य हुई हैं।' पोपट के मुताबिक मुख्य रूप से सौराष्ट्र के किसान कपास बेचने से परहेज कर रहे हैं क्योंकि वे इसकी ज्यादा कीमतें चाहते हैं। दूसरी ओर अन्य राज्यों में ज्यादा उत्पादन के चलते कपास की कीमतें कम हैं। गुजरात में रोजाना औसतन करीब 40,000 गांठ कपास की आवक होती है। इसमें से करीब 20,000-22,000 गांठ कपास की आवक इस साल महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और राजस्थान से हो रही है जबकि पिछले साल इन राज्यों से करीब 8,000 गांठ कपास की आïवक हुई थी। यहां कपास की कीमतें 850-900 रुपये प्रति 20 किलोग्राम हैं। अहमदाबाद के कारोबारी और निर्यातक अरुणभाई दलाल ने कहा, 'फिलहाल गुजरात के किसान बहुत ज्यादा कपास नहीं बेच रहे हैं क्योंकि उन्होंने पिछले साल इसका भाव 951-1000 रुपये प्रति 20 किलोग्राम देखा है। जब एक बार कीमतें इस स्तर पर पहुंच जाएंगी तो किसान कपास की बिक्री में इजाफा करेंगे। लेकिन फिलहाल यह वास्तविकता है कि हम महाराष्ट्र और आंध्र पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं।' दलाल के मुताबिक गुजरात में अब तक करीब 18-19 लाख गांठ कपास की आवक हुई है और इसमें से 7-8 लाख गांठ कपास की आवक दूसरे राज्यों से हुई है। मिलों की तरफ से बेहतर मांग के चलते इस हफ्ते कपास की कीमतें बढ़ी हैं। बाजार के सूत्रों के मुताबिक, मांग में और इजाफा होगा क्योंकि सूती धागे की निर्यात मांग अच्छी है। साल 2012-13 में गुजरात में 70-75 लाख गांठ कपास उत्पादन की संभावना है जबकि पिछले साल 120 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ था। इसमें से सौराष्ट्र का उत्पादन इस साल शायद ही 30-35 लाख गांठ को पार कर पाएगा और यह उत्पादन पिछले साल के मुकाबले करीब 50 फीसदी कम है। मौजूदा वित्त वर्ष में धागा निर्माताओं को निर्यात में 20 फीसदी की बढ़ोतरी की उम्मीद है, लिहाजा उन्होंने कपास की खरीदारी की है और इसी वजह से स्थानीय बाजार में कीमतें बढ़ी। किसान कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से कपास की खरीदारी की मांग कर रहे हैं ताकि समर्थन मूल्य को सहारा मिल सके। कपास के बाजार में फिलहाल बहुत ज्यादा तेजी नहीं है। (BS Hindi)

संप्रग के खाद्य सुरक्षा विधेयक की बुनियाद में ही खामियां हैं : अशोक गुलाटी

मनरेगा के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम शायद राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक है। सरकार को इस पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट की प्रतीक्षा है। लेकिन पूर्व खाद्य व कृषि सचिव टी नंदकुमार, कृषि लागत व मूल्य आयोग के चेयरमैन अशोक गुलाटी समेत विभिन्न विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधेयक निरर्थक है और इससे खाद्य सब्सिडी में इजाफा होगा। अनाज बाजार के सामान्य कामकाज में अवरोध पैदा होगा। संजीव मुखर्जी को दिए साक्षात्कार में सीएसीपी के चेयरमैन अशोक गुलाटी ने कहा कि इसके बजाय सरकार को अगले दो साल के दौरान देश में नकद खाद्य सब्सिडी के वितरण पर ध्यान देना चाहिए। उनसे बातचीत: खाद्य सुरक्षा विधेयक में किस तरह की गड़बडिय़ां दिखती हैं और इसे लागू करना मुश्किल क्यों है? खाद्य विधेयक में बुनियादी गड़बड़ी यह है कि इसमें कीमत नीति के जरिए बराबरी लाने की कोशिश हो रही है। यह अनाज बाजार के कामकाज में हस्तक्षेप करेगा, गड़बडिय़ां होंगी (हमारे अनुमान के मुताबिक पीडीएस का करीब 40 फीसदी अनाज गलत हाथों में चला जाता है) और कार्यक्षमता का भी नुकसान होगा, जो उभरते हुए कृषि विशाखन के विपरीत है। ध्यान रखा जाना चाहिए कि कीमत व कारोबारी नीतियों की भूमिका संसाधनों का आवंटन सक्षमता के साथ करने पर होना चाहिए और इस तरह से विकास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। विधेयक के मौजूदा स्वरूप में ये चीजें उसकी भेंट चढ़ जाएंगी। समानता का लक्ष्य हासिल करने का बेहतर तरीका आय की नीति है। इसीलिए हम अपने पत्र में सशर्त नकद हस्तांतरण का समर्थन कर रहे हैं, जो वैश्विक स्तर पर गरीबों व जरूरतमंदों की मदद का बेहतर तरीका है। सीएसीपी अपनी रिपोर्ट में ऐसी सिफारिशें पहले ही कर चुका है। कानून लागू हुआ तो सरकार पर कितना वित्तीय बोझ बढ़ेगा? सबसे पहले खाद्य सब्सिडी का खर्च बढ़ेगा और मौजूदा सरकारी आकलन के मुताबिक पहले साल में यह 1.2 लाख करोड़ रुपये होगा, जो तीसरे साल 1.5 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच सकता है अगर एमएसपी में बढ़ोतरी होती रहे और इसे जारी करने की कीमत स्थिर रहे। अगर हम इस विधेयक में कुपोषण समाप्त करने, भंडारण व अनाज की ढुलाई के लिए बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो यह आसानी से सालाना 2 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा। हमें खाद्यान्न उत्पादन को भी स्थिर रखने की दरकार होगी। यह विधेयक अभी संसदीय समिति के पास है और सरकार ने दूसरी योजनाओं के साथ नकद खाद्य सब्सिडी देने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। क्या दोनों ही मसलों के हल के लिए विधेयक में बदलाव किया जा सकता है? अगर हां तो कैसे? हां, हमें लगता है कि सशर्त नकद हस्तांतरण का नजरिया अभी भी विधेयक में शामिल किया जा सकता है। इसमें नवीनता लाने के लिए राज्य स्तर पर और यहां तक कि जिला स्तर पर विचार हो सकता है। लचीलेपन से काफी फायदा होगा, जो कि स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी। हमें लगता है कि नकद हस्तांतरण का काम 10 लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहरों में चालू किया जा सकता है, जहां आईटी व वित्तीय ढांचा और आधार संख्या है। इसका विस्तार धीरे-धीरे अनाज के आधिक्य वाले राज्यों में किया जा सकता है और अंत में अनाज की कमी वाले इलाकों में। दूरदराज के इलाकों में भी अनाज की डिलिवरी किए जाने की दरकार है। पूरा काम दो साल में हो सकता है। विधेयक के मसौदे में नकदी वितरण तभी अपनाने का विकल्प है जब अनाज आपूर्ति की किल्लत हो। क्या यह तरीका सही है? अगर आपने वित्तीय ढांचा के विकास नहीं किया हो तो आप नकदी का वितरण कैसे करेंगे। यह उसी तरह का मसला है, जैसे सूखे के समय कुआं खोदने की बात हो रही हो। यह काम नहीं करेगा। हमारा मानना है कि अनाज या नकद में से एक चुनने का विकल्प शुरू में ही दिया जाना चाहिए और वास्तव में गरीबों की मदद करने की योजना धीरे-धीरे नकद हस्तांतरण की ओर बढ़ानी चाहिए। सरकार ने खाद्य विधेयक के लिए योजना-बी की रूपरेखा तैयार की है, जिसमें लाभार्थियों की संख्या 64 से 68 फीसदी करते हुए हर महीने 35 किलो की बजाय 25 किलो अनाज दने की बात है। क्या यह मौजूदा मसौदे से बेहतर होगा या फिर समस्या जस की तस रहेगी? हमारे लिए मूल प्रश्न 35 या 25 किलो नहीं है बल्कि इसे कीमत नीति से आय नीति की ओर बढ़ाने का है। इसका मतलब यह हुआ कि भारी सब्सिडी वाले अनाज की बजाय उन्हें कुछ शर्तों के साथ नकदी दें या उनके बच्चों को स्कूल भेजें, उन्हें दक्ष बनाएं आदि। इससे यह ज्यादा सक्षमता के साथ काम करेगा, जैसा कि ब्राजील, मैक्सिको और फिलीपींस आदि में पाया गया है। परेशानियां आएंगी, जैसी बड़ी योजनाओं में होती हैं, लेकिन 650 लाख टन अनाज वितरण की बजाय इसका प्रबंधन ज्यादा आसान होगा क्योंकि इस अनाज का आधा हिस्सा कभी भी लाभार्थियों के पास नहीं पहुंचता। ऐसे में नकदी हस्तांतरण में हमें ज्यादा बचत नजर आ रही है। (BS Hindi)

6 warehouses sealed in Kerala after adulteration plaints

Mumbai. Six commodity warehouses in Kerala have been sealed over the complaint of adulteration in black pepper stock and authorities of Food Safety there are now awaiting laboratory reports. The warehouses, accredited by the National Commodity & Derivatives Exchange (NCDEX), were sealed on Friday. "We have sealed six warehouses in Ernakulam and Alappuzha district in Kerala over the complaint of adulteration in pepper stock, received last week. We have collected the samples of the said commodity and send the same to laboratory for inspection," Commissioner Food Safety-Kerala, Biju Prabhakar told PTI here. "We need to check and proper valuation needs to be done of this commodity. We are waiting for the laboratory reports, Prabhakar said. NCDEX chief, Corporate Services, M K Ananda Kumar said, "We were accepting black pepper deposits as per our standard specifications only. The mineral oil issue has been raised for the first time. We are looking into the complaint lodged by buyers for mineral oil content. We are in touch with Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) for further course of action." The seized stock of pepper allegedly contains mineral oil which is an adulterant and not allowed to be used in any human consumption commodity, sources familiar with the development said, adding that it must have been used to suppress fungus/ moulds and give more weight and dark black colour to pepper. According to Food Safety and Security Act of India, under the Ministry of Health and Family Welfare, there is no permission on use of any mineral oil in pepper. Sources said pepper stocks of 5,000/7000 tonnes costing around Rs 250-300 crore have been seized. Traders fear no delivery of pepper on the NCDEX platform, as the exchange does not have any in any other warehouse.

रबी की पैदावार से लबालब हो सकते हैं गोदाम

आर एस राणा नई दिल्ली | Dec 24, 2012 पिछले मानसून की हल्की बारिश से खरीफ फसलों का उत्पादन कम रहने के बाद कृषि क्षेत्र की अब बेहतर प्रगति भरपूर खाद्यान्न बुवाई की प्रगति : 253 लाख हैक्टेयर में गेहूं की बुवाई, मध्य जनवरी तक जारी : 128.26 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल में दालों की बुवाई : चना की बुवाई पिछले साल से ज्यादा 86.62 लाख हैक्टेयर में : तिलहनों की बुवाई 79.58 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है : सरसों की बुवाई बढ़कर 64.43 लाख हैक्टेयर में हुई फसल से उम्मीद : इस साल फिर गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने के आसार : रबी दलहनों का कुल उत्पादन 105 लाख टन होने का अनुमान : चालू रबी में 79.6 लाख टन चने के कुल उत्पादन का अनुमान : 115 लाख टन तिलहनों की पैदावार का लक्ष्य तय : इस साल 81.93 लाख टन सरसों के उत्पादन का अनुमान देश में रबी फसलों यानि सर्दियों के सीजन की बुवाई काफी हद तक पूरी हो चुकी है। भले ही पिछला मानसून कमजोर रहने से खरीफ सीजन की फसलों का उत्पादन थोड़ा कम रहा लेकिन लेट मानसून से खेतों को मिली अच्छी नमी और अनुकूल मौसम से उम्मीद है कि रबी सीजन की फसलों के उत्पादन से देश के गोदाम फिर से लबालब भर जाएंगे। इस साल अच्छी बात यह है कि न सिर्फ अनाज बल्कि दलहन और तिलहनी फसलों की भी बुवाई अच्छी रही है। इससे देश में दालों और खाद्य तेलों की सुलभता भी बढऩे की आस की जा सकती है। चालू रबी में दलहन और तिलहनों की पैदावार बढऩे का अनुमान है जिससे आयात पर निर्भरता में कमी आएगी। दलहन की बुवाई सामान्य क्षेत्रफल के लगभग बराबर हो चुकी है जबकि तिलहनों की बुवाई पिछले साल की समान अवधि से बढ़ी है। गेहूं और मोटे अनाजों का बुवाई भी कार्य भी संतोषजनक चल रहा है। रबी फसलों की पैदावार फरवरी-मार्च महीने में रहने वाले मौसम पर निर्भर करेगी। कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि चालू रबी में दलहन की बुवाई सामान्य क्षेत्रफल के लगभग बराबर हो गई है जबकि तिलहनों की बुवाई पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। उन्होंने बताया कि दलहनी फसलों को ज्यादा जाड़े से नुकसान की आशंका बनी रहती है लेकिन अभी तक प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम फसलों के अनुकूल ही बना हुआ है। तिलहनों के बुवाई क्षेत्रफल में 3.77 लाख हैक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में चालू रबी में दलहन और तिलहनों का उत्पादन बढऩे का अनुमान है। देशभर में 128.26 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल में दालों की बुवाई हो चुकी है जबकि रबी में 128.71 लाख हैक्टेयर में दलहन की बुवाई होती है। रबी दलहन की प्रमुख फसल चने की बुवाई बढ़कर 86.62 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 83.55 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। चालू रबी में 79.6 लाख टन चने के उत्पादन का अनुमान है जबकि रबी में दलहनों के कुल उत्पादन का अनुमान 105 लाख टन का है। तिलहनों की बुवाई चालू रबी में 79.58 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जो पिछले साल के 75.81 लाख हैक्टेयर से ज्यादा है। रबी तिलहनों की प्रमुख फसल सरसों की बुवाई बढ़कर 64.43 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 62.65 लाख हैक्टेयर में हुई थी। कृषि मंत्रालय ने चालू रबी में 115 लाख टन तिलहनों की पैदावार का लक्ष्य तय किया है इसमें 81.93 लाख टन सरसों के उत्पादन का अनुमान है। उन्होंने बताया कि पिछले साल फरवरी-मार्च में मौसम फसलों के अनुकूल रहा था। सर्दी का सीजन लंबा चला था, जिसकी वजह से वर्ष 2011-12 में देश में खाद्यान्न की रिकॉर्ड पैदावार 25.74 करोड़ टन की हुई थी। चालू रबी में गेहूं की बुवाई अभी तक 253.17 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है तथा देशभर में 286.36 लाख हैक्टेयर में गेहूं की बुवाई होती है। बुवाई का कार्य जनवरी के प्रथम पखवाड़े तक चलेगा। ऐसे में गेहूं की पैदावार भी बढऩे का अनुमान है। चालू रबी में 860 लाख टन गेहूं की पैदावार का लक्ष्य तय किया है। मोटे अनाजों की बुवाई चालू रबी में बढ़कर 54.81 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 53.75 लाख हैक्टेयर में हुई थी। (Business Bhaskar....R S Rana)

लेवी चीनी के बिक्री नियमों में मिलों को राहत देने की तैयारी

बिजनेस भास्कर नई दिल्ली | Dec 24, 2012 छूट धीरे-धीरे मिलों को लेवी चीनी बेचने की अनुमति मिलने से फायदा होगा खुले बाजार के लिए मासिक कोटे के बजाय चार माह का एकसाथ कोटा अब मिलों के लिए छह माह का बिक्री कोटा तय करने की तैयारी रॉ शुगर पर आयात शुल्क बढ़ाने पर भी खाद्य मंत्रालय ने सलाह मांगी आयात शुल्क बढ़ा तो घरेलू बाजार में दाम बढऩे से भी मिलों को लाभ चीनी उद्योग को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने लेवी चीनी के बिक्री नियमों में छूट देने की तैयारी कर ली है। वर्तमान में चीनी मिलें बची हुई लेवी चीनी की बिक्री दो साल तक नहीं कर सकती है। खाद्य मंत्रालय ने इस अवधि को घटाकर छह महीने करने की योजना बनाई है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में मिलें बची हुई लेवी चीनी की दो साल तक बिक्री नहीं सकती है। खाद्य मंत्रालय ने लेवी चीनी की बची हुई मात्रा की बिक्री की अवधि को दो साल से कम करके छह महीने करने की योजना बनाई है। चीनी मिलों को इस समय कुल उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा लेवी चीनी में देना अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि लेवी चीनी के बिक्री नियमों में छूट मिलने से चीनी मिलों को फायदा होगा। इससे पहले खाद्य मंत्रालय ने चीनी बिक्री के मासिक कोटे को भी चार महीने कर दिया था। उन्होंने बताया कि इसे चार महीने से बढ़ाकर छह महीने करने की योजना है। देश में लेवी चीनी की सालाना खपत करीब 27 लाख टन की होती है। पेराई सीजन 2011-12 (अक्टूबर से सितंबर) में लेवी चीनी की खरीद का दाम सरकार ने बढ़ाकर 19.50 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। उन्होंने बताया कि चालू पेराई सीजन 2012-13 के लिए लेवी चीनी के खरीद मूल्य में भी बढ़ोतरी की जाएगी। जल्दी ही इसके दाम तय किए जाने की संभावना है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में चीनी का आवंटन 13.50 रुपये प्रति क्विंटल की दर से किया जाता है। उन्होंने बताया कि रंगराजन समिति द्वारा चीनी डिकंट्रोल के लिए की गई कुछ सिफारिशों पर खाद्य मंत्रालय विचार कर रहा है। इनमें से कुछ सिफारिशों पर जल्द ही अमल किया जाएगा। उद्योग की रॉ-शुगर पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी के प्रस्ताव पर खाद्य मंत्रालय ने संबंधित मंत्रालयों को पत्र लिख दिया है। चीनी की घटती कीमतों के कारण उद्योग ने रॉ-शुगर के आयात पर शुल्क बढ़ाने की मांग की है। इस समय रॉ-शुगर पर अभी 10 फीसदी आयात शुल्क लगता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम कम होने के कारण दक्षिण भारत की चीनी मिलें रॉ-शुगर का आयात कर रही है। इससे घरेलू बाजार में चीनी के मूल्यों पर अंकुश लगा हुआ है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के अनुसार चालू पेराई सीजन में 240 लाख टन चीनी का उत्पादन होने का अनुमान है जो वर्ष 2011-12 के 263 लाख टन से कम है। चीनी के दाम थोक बाजार में 3,300 से 3,600 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं जबकि उत्तर प्रदेश में एक्स-फैक्ट्री चीनी के दाम 3,100 से 3,520 रुपये प्रति क्विंटल हैं। (Business Bhaskar....R S Rana)

22 December 2012

खाद्य सुरक्षा के लिए सहभागिता जरूरी

डॉ. विशेश्वर मिश्र लेखक आजकल देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति को सुधारने के लिए प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक चर्चा का विषय बना हुआ है. और विभिन्न राजनीतिक दलों, राज्य सरकारों और यहां तक की सत्तारूढ़ कांग्रेस एवं उसकी सरकार के बीच इस मुद्दे पर मतभेद बने हुए हैं. हाल ही में इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा वर्ष 2012 के लिए प्रकाशित भुखमरी सूचकांक के अनुसार दुनिया में भूख से पीड़ित 79 देशों की सूची में भारत को 65वें स्थान पर रखा गया है. यह एक दुखद आश्चर्य की बात है कि भारत जैसा देश, जहां संसाधनों और खाद्यानों की कोई कमी नहीं है, वह खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से पड़ोसी पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका आदि से भी बदतर स्थिति में है. संपूर्ण एशिया में मात्र बांग्लादेश से भारत की स्थिति बेहतर है. यहां यह चर्चा करने की आवश्यकता है कि पोषण संबंधी योजनाओं एवं कार्यक्रमों पर भारत सरकार का कुल खर्च 1,55,848 करोड़ रुपए (2012-13) है. इसमें 11,937 करोड़ रुपए मध्यान्ह भोजन, 15,850 करोड़ रुपए समेकित बाल विकास कार्यक्रम, 60573 करोड़ रुपए सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबों को चावल, गेहूं, चीनी एवं मिट्टी के तेल पर दी जाने वाली छूट के लिए, 34,488 करोड़ रुपए स्वास्थ्य सेवाओं पर और 33000 करोड़ रुपए मनरेगा पर खर्च की जाने वाली राशि शामिल है. लेकिन इतने भारीभरकम खर्च के बावजूद भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं. योजना आयोग द्वारा वर्ष 2005 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा गरीबों के लिए दी जा रही छूट का वास्तविक लाभ मात्र 32 प्रतिशत लाभार्थियों तक ही पहुंच पा रहा है, अर्थात बाकी के 68 प्रतिशत (41189.64 करोड़ रुपए) व्यर्थ ही चले जाते हैं. परिणामस्वरूप पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के 43.5 प्रतिशत बच्चे और गर्भधारण करने की आयु वाली 36 प्रतिशत महिलाओं का वजन आवश्यकता से कम है. यह दुखद है कि इतने अधिक संसाधनों के बावजूद भारत भूख की समस्या से मुक्त नहीं हो पा रहा है. एक ओर गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं है, खुले में अनाज सड़ जाता है और दूसरी ओर करोड़ों पेट खाली रह जाते हैं. खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर सबसे अधिक जोर है, पर वांछित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं. इस स्थिति से निबटने के लिए एक विकल्प यह उभर कर आ रहा है कि गरीबों को कम कीमत पर खाद्य उपलब्ध कराने के बजाए छूट की राशि सीधे उनके बैंक एकाउंट में स्थानांतरित कर दी जाए. प्रायोगिक तौर पर दिल्ली सरकार और सेवा दिल्ली के सौजन्य से पश्चिमी दिल्ली के 100 गरीब परिवारों को उनकी सहमति से यह सुविधा उनके एकाउंट में एक हजार रुपए प्रति माह हस्तांतरित करके प्रदान की गई. इसके कई अच्छे परिणाम सामने आए. इन परिवारों को स्वेच्छा से इस धनराशि को शिक्षा, स्वास्थ्य खाद्यान्न पर खर्चने या अन्य कोई जरूरत का सामान खरीदने की आजादी मिली. परिणामत: उचित दर की दुकानें अधिक समय तक खुली रहने लगीं ताकि और अधिक लोग नकद राशि का विकल्प न दे दें और उनकी दुकान बंद न हो जाए. इससे खाद्यानों के भंडारण, रख-रखाव, परिवहन एवं वितरण से जुड़ी हुई समस्याओं से भी निजात मिल जाती है. सबसे बड़ी बात यह है कि इसका लाभ केवल 32 प्रतिशत की बजाय शत-प्रतिशत लोगों तक पहुंचता है, इसलिए इस सफल प्रयोग को बड़े पैमाने पर अपनाया जाना स्वागतयोग्य है. सेवा भारत की राष्ट्रीय समन्वयक सुश्री रेनाना झाबवाला का मानना है कि यह चुनाव लाभान्वितों पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे खाद्य लेना चाहेंगे या नकद राशि. साथ ही यह राशि परिवार की महिला के बैंक एकाउंट में ही हस्तांतरित की जाए, ताकि इस राशि का दुरुपयोग शराबखोरी के लिए न हो. ज्ञातव्य है कि खाद्य सुरक्षा हेतु चावल, गेहूं और दालों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 29 फरवरी, 2008 से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन की शुरुआत की गई थी और इसके द्वारा उपरोक्त फसलों के उत्पादन में वृद्धि हेतु विशेष प्रयास जारी हैं. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत केंद्र द्वारा वर्ष 2012 में 1800 करोड़ रुपए की धनराशि आवंटित की गई है, ताकि 12वीं योजना के कार्यकाल में खाद्यान्नों का उत्पादन 25 मिलियन टन बढ़ाया जा सके. इस कार्यक्रम के अंतर्गत सबसे अधिक 276.9 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश को प्राप्त हुए. मध्यप्रदेश को 226.87 करोड़ रुपए, महाराष्ट्र को 196 करोड़ रुपए, आंध्रप्रदेश को 142 करोड़ रुपए, राजस्थान को 135.95 करोड़ रुपए, कर्नाटक को 104.83 करोड़ रुपए और बिहार को 97.87 करोड़ रुपए मिले हैं. इस कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों को सुधरे हुए प्रमाणित बीज, अच्छी तकनीक एवं अन्य लाभ उपलब्ध कराया जाता है. इन सभी कदमों के फलस्वरूप 2010-11 में देश में 241 मिलियन टन का रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन हुआ. वर्ष 2009 में कृषि मंत्रालय द्वारा 2011-12 के लिए लगाए गए अनुमान के अनुसार चावल और गेहूं के मामले क्रमश: 5.42 एवं 6.25 मिलियन टन आवश्यकता से अधिक उत्पादन होगा, परंतु मोटे अनाज, दालों और तिलहन के उत्पादन में कमी आंकी गई थी. इसी प्रकार दूध, अंडा और मांस का उत्पादन भी जरूरत से कम है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा सुझाए गए प्रति व्यक्ति उपभोग के मानक के आधार पर दूध में 34 ग्राम प्रतिदिन, अंडा 150 प्रति वर्ष और मांस में 7.71 किलोग्राम प्रति वर्ष प्रतिव्यक्ति की कमी है. देश की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवश्यकता के अनुसार खाद्यान्न उपलब्ध रहे, इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा 2007 में गठित एक समिति ने उत्पादन को प्रभावित करने वाले कारकों को चिन्हित करते हुए निजी एवं सरकारी क्षेत्रों द्वारा कृषि एवं ग्रामीण आधारभूत संरचनाओं जैसे सिंचाई, तकनीकी सुधार, कृषि का विविधीकरण तथा उर्वरकों में निवेश को शामिल किया गया. देश की खाद्य सुरक्षा के लिए द्वितीय हरित क्रांति की भी चर्चा चलती रहती है, जिसमें विशेषकर पूर्वी एवं पूर्वोत्तर राज्यों की कृषि संबंधी अगाध संभावनाओं के उपयोग की बात होती है. जमीन, जल और जलवायु की दृष्टि से उत्तम होने के बावजूद देश के ये राज्य कृषि क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं क्योंकि यहां आधारभूत संरचनाओं की कमी के साथ-साथ तकनीकी प्रचार-प्रसार पर इतना जोर नहीं दिया गया जितना कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में; अन्यथा भारत खाद्यान्न के मामले में विश्वका एक अग्रणी राष्ट्र हो सकता था. आज हमारे नीति निर्धारकों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि उपलब्ध संसाधनों का खाद्य सुरक्षा के लिए सही उपयोग हो सके। इसके लिए बनाई गई किसी भी रणनीति में लोगों की सक्रिय सहभागिता से ही अपेक्षित परिणाम मिल पाएंगे, इस बात का विशेष ध्यान होना चाहिए. लेकिन असल मुद्दा तो यह है कि आम आदमी विशेषकर गरीब परिवारों की इन तक आसान पहुंच कैसे बढ़े. वर्तमान समय में जब चारों ओर महंगाई से भय का माहौल बना हुआ है, आम आदमी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस नीतिगत फैसलों की जरूरत है.

लोकसभा में आया खाद्य सुरक्षा बिल

देश की 63.5 प्रतिशत आबादी को सस्ते खाद्यान्न का कानूनी अधिकार देने वाला महत्वाकांक्षी खाद्य सुरक्षा विधेयक दिसंबर को लोकसभा में पेश किया गया। गरीबों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के संबंध में दुनिया के सबसे बड़े प्रयोग के रूप में देख जा रहे इस विधेयक को सदन में खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने पेश किया। इसका कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित सत्ता पक्ष के सदस्यों ने मेजे थपथपा स्वागत किया। सोनिया को इस विधेयक का प्रेरक माना जा रहा है। इस योजना को अमल करने में साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए की लागत और 95 हजार करोड़ रुपए की सब्सिडी का अनुमान व्यक्त किया गया है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 के दायरे में ग्रामीण क्षेत्रों के 75 प्रतिशत लोगों को लाया जाएगा जिसमें से 46 प्रतिशत सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबी रेखाGet Fabulous Photos of Rekha नीचे गुजर बसर करने वाले लोग शामिल हैं। इस विधेयक के दायरे में शहरी क्षेत्र की 50 प्रतिशत आबादी को लाए जाने का प्रस्ताव है जिसमें 28 प्रतिशत लोग प्राथमिकता वाले क्षेत्र यानी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वाले हैं। इस विधेयक के तहत प्राथमिकता वाले क्षेत्र के पात्र लोगों को प्रतिमाह प्रति व्यक्ति सात किलोग्रमा खाद्यान्न प्राप्त करने का कानूनी अधिकार होगा जिसमें चावल, गेहूं और मोटा अनाज शामिल है। इसके तहत चावल प्रति किलो तीन रुपए, गेहूं प्रति किलो दो रुपए और मोटा अनाज प्रति किलो एक रुपए प्रदान किया जाएगा। (भाषा)

खाद्य सुरक्षा विधेयक कितना कारगर होगा ?

केंद्र सरकार शिक्षा के अधिकार के बाद अब शीघ्र ही खाद्य सुरक्षा विधेयक पेश करने जा रही है। गौरतलब है कि पहली बार गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को भोजन का अधिकार दिया जा रहा है। बीपीएल सूची के अंतर्गत आने वाले परिवारों को प्रति माह 25 किलो चावल या गेहूं दिया जायेगा । यह अनाज 3 रूपये प्रति किलों की दर से मिलेगा । सोचने वाली बात है , जो देश वैश्विक सूचकांक के 88 देशों की सूची में 66 वें पायदान पर है वहां इस कानून के लागू होने का क्या मतलब है ? यह बात दीगर है कि कौन गरीब है के आंकड़ों में उलझी सरकार के लिए यह कह पाना मुश्किल हो रहा है कि सही मायने में गरीब कौन है ? वो जिसे सुरेश तेन्दुलकर का अर्थशास्त्र गरीब मानता है या वो जिसे एनसी सक्सेना साहब का मनोविज्ञान गरीब मानता है या फिर वो जिसके बारे में अर्जुन सेना गुप्ता कहते है कि 77 फीसदी की हैसियत तो 20 रूपये से ज्यादा खर्च करने की है ही नही। बहरहाल मसले और भी है जो इस विधेयक से जुडे है। इस बात की भी प्रबल संभावनाऐं कि सरकार 25 किलों खाद्यान्न की सीमा बढाकर 35 किलो कर सकती है। संभावना इस बात की भी है कि सरकार तेन्दुलकर के गरीबी के आंकडों को गले लगा सकती है। क्योंकि इस रिपोर्ट को अपनाने से सरकार की सेहत मे ज्यादा असर नही पडेगा। वर्तमान में सरकार पीडीएस के माध्यम से 6 करोड 52 लाख परीवारों का पेट भरती है। मतलब 36 करोड़ की आबादी को बीपीएल और अन्तोदय अन्न योजना के तहत सस्ता राशन मुहैया कराती है। अब अगर 1 करोड़ बढ़ भी जाए तो सरकार की सेहत पर कोई खास असर नही पडने वाला। अब सरकार के समक्ष चुनौती गरीबों तक राशन पहुंचाने की होगी। इसलिए सरकार यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि जरूरत मन्दों तक इसका फायदा जरूर पहुंचे। सरकार यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि कौन सा ऐसा तन्त्र विकसित किया जाए ताकि इसका हाल भी लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसा न हो। लिहाज माथापच्ची इसी बात पर है कि कैसे इसे लागू किया जायेगा . इससे पहले यूपीए सरकार तीन ऐतिहासिक कानून सूचना का कानून, रोजगार का कानून और शिक्षा का कानून लागू कर चुकी है। यानि अब परीक्षा भोजन के अधिकार कानून को लेकर है जो यूपीए के चुनावी वादों का अहम हिस्सा था । यह तो हो गई पेट भरने की बात ! मगर पेट भर राशन आएगा कहां से ? यानि दूसरा सवाल खाद्यान्न सुरक्षा का है । मौजूदा समय में देश- विदेशों में इस बात के लिए मन्थन चल रहा है कि खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर कैसे बना जाये। कैसे खाद्यान्न की उत्पादकता बढाई जाए। हमारे देश में गेहूं चावल की उत्पादकता में सुधार जरूर हुआ है मगर यह नाकाफी है। दूसरे देशों के मुकाबले हमारी उत्पादकता काफी कम है। जहां तक सवाल पंजाब और हरियाणा का है जिन्हें भारत की खाद्य सुरक्षा का स्तम्भ माना जाता है वहां अनाज की उत्पादकता दूसरे देशों के उत्पादन के आसपास है। इसका एक बडा कारण वहॉं सिंचाई की पर्याप्ता व्यवस्था भी है। मगर यूपी और बिहार के मामले में यह तस्वीर बिलकुल उलट जाती है। उत्पादकता के मामले में यह राज्य काफी पीछे है। यूपी में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता है 21 क्वींटल के आसपास जबकि बिहार इससे भी नीचे है। उत्पादकता कम होने के कई कारण भी है। उदाहरण के तौर पर हमारे देश में प्रति हेक्टेयर उत्पादन 3000 किलो ग्राम के आसपास है जबकि चीन में यही उत्पादन 6074 जापान 5850 और अमेरिका में 7448 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास है। इससे स्पश्ट होता है कि अभी खाद्यान्न सुरक्षा के लिहाज से हमें एक लंबी मंज़िल तय करनी है। इसका उपाय भी भारत के मेहनती किसान के पास है। पहली बार यूपीए सरकार ने यह अच्छा काम किया कि ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे कि हर कीमत पर किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले। आज हम धान का भाव दे रहे है 1000 प्रति क्वींटल साथ ही 50 रूपये बोनस के तौर पर। वही गेहूं के लिए हम दे रहे है 1080 रूपये प्रति क्वींटल। वर्तमान में महज 24 वस्तुओं ही न्यूनतम समर्थन मल्य के दायरे में आती है। मतलब केवल 24 वस्तुओं का ही सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है। कृषि मन्त्रालय से सम्बंधित स्थाई समिति ने सरकार को ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं को न्यूनतम समर्थन मल्य के दायरे में लाने की सिफारिश की है। इस समय सरकार कई महत्वकांक्षी कार्यक्रम चला रही है, है। जिनमें प्रमुख है राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और राष्ट्रीय बागवानी मिशन । राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत 11वीं पंचवर्षीय योजना के अन्त तक चावल का उत्पादन 1 करोड़ टन, गेहूं का उत्पादन 80 लाख टन और दालों का उत्पादन 20 लाख टन करने का लक्ष्य रखा गया है। मगर अब तक के आंकडों के देखकर लगता नही कि सरकार इस लक्ष्य को पूरा कर पायेगी। इसका सबसे बडा कारण है कि बीते साढे तीन सालों में जितना आवंटन इस योजना के लिए हुआ था उसका 50 फीसदी से ज्यादा कभी खर्च नही हो पाया। दूसरी तरफ रखरखाव क अभाव में सालाना तकरीबन 60 हजार करोड़ का अनाज बेकार हो जाता है। यह बात सही है कि इस बार बजट में भण्डारण के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता लाने के लिए कई घोशणाऐं की गई है। हमारे देश में चावल की कई किस्में मौजूद है मगर किसान को इसकी जानकारी नही। हर जिले में कृषि विज्ञान केन्द्र खुले हुए है दुर्भाग्य यह है कि इनकी पहुंच किसानों के खेत तक नही हो पा रही है। आज हमारे पास चावल की कई किस्में मौजूद है। जरूरत है तो इसे किसानों तक पहुंंचाने की। किसान को जागरूक बनाने की। देश मे प्रथम हरित क्रान्ति के पुरोधा डां स्वामिनाथन के मुताबिक मौजूदा संसाधन के आधार पर भी हम अपनी उत्पदकता 50 फीसदी तक बढा सकते है। (Ramesh Bhat)