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31 May 2013

Sugarcane rate hiked by Rs 40 a qtl in Punjab

Chandigarh, May 31. Punjab government today raised the state advisory price (SAP) of sugarcane by Rs 40 per quintal for the crushing season of 2013-14. Punjab has now fixed new SAP per quintal at Rs 290 for advanced variety, Rs 280 for medium and Rs 275 for late variety. A decision to this effect was taken in a meeting of Sugarcane Control Board chaired by Punjab Chief Minister Parkash Singh Badal here today, an official release said here. The SAP for 2012-13 cane crushing season are Rs 250, Rs 240 and Rs 235 per quintal for advanced, medium and late varieties respectively. The rate hike for cane comes after Punjab keeping its focus on enhancing more area under crops like sugarcane, cotton by reducing area under water-guzzling paddy crop. Punjab this season has plans to bring 92,000 hectares of land under cane as compared to 83,000 hectares brought in last season. On the demand of farmers, the Chief Minister asked the Financial Commissioner Development (FCD) to chalk out a plan to upgrade the Co-operative Sugar Mill Bhogpur by enhancing its crushing capacity. He also mentioned that the state government would make budgetary provisions in future to overcome the situation arising out of gap payments. Badal further said to facilitate farmers, Primary Agricultural societies (PASs) will provide sugarcane harvesting machinery to them at nominal rates for which the government had already initiated a plan to provide all types of agricultural equipments to PAS.

Gold may cheaper by Rs 2,000 in medium term: Report

New Delhi, May 31. Gold prices may fall by Rs 2,000 from the present levels in the near to medium term as the precious metal is losing appeal as an asset, a report by industry body Assocham has said. The report, however, said that gold is unlikely to fall below Rs 25,000 per 10 grams due to a strong buying support at that level and a weak rupee against the US dollar. Gold prices have come down to Rs 27,790 per 10 grams in the national capital this month from the high of Rs 32,990 per 10 grams in April. "A fall of Rs 2,000 or little more from the present level looks plausible in the near to medium term," according to Assocham report on gold. A likely drop in gold prices below Rs 25,000 per ten grams level will attract a strong buying support and may lead to April-like situation, when the downward spiral had made buyers rush to jewellers and banks for enriching their bullion collection, it said. The Assocham paper contended that gold prices are unlikely to fall below Rs 25,000 per ten grams for another reason, that is, continuous weakening of rupee against dollar. "Expensive dollar will push the gold prices in India even as they may decline in the international market. The country meets almost all its gold requirements through imports which will again become expensive as the rupee is likely to see more pressure in the coming days," it added. The report titled ‘Will Gold Retain its Lustre in 2013?’ found that the main reasons for a runaway rise in gold prices in India was lack of investment avenues for the Indian middle and upper middle class. This is more so in the wake of inflation hovering around the double digit figure and investors were finding it difficult to save funds from the general price rise, it said. On the other hand, the report said that most other avenues like property were out of the reach for the middle class investors and the equity market was dull. In this context, the gold units had come in handy. It found that the newly announced inflation indexed bonds will not fit the bill since the instruments have a long maturity period while the secondary bond market in the country has not developed for the retail investors. India, the world's largest gold consumer, is expected to import around 900 tonnes in 2013.

Gold gains on stockists buying, firming global trend

New Delhi, May 31. Prices of both gold and silver surged in the national capital today on increased stockists buying and a firming global trend. While gold prices spurted by Rs 310 to Rs 27,790 per ten gram, silver gained Rs 500 to touch Rs 45,100 per kg. Buying activity gathered momentum on stockists buying, driven by reports that the metal climbed to a two-week high on speculation that the US Federal Reserve will maintain record stimulus to bolster growth. Gold in Singapore, which normally set price trend on the domestic front, gained 0.6 per cent to USD 1,422.10 an ounce. In the national capital, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity shot-up by Rs 310 each to Rs 27,790 and Rs 27590 per ten gram, respectively. Sovereign also rose by Rs 100 to Rs 23,900 per piece of eight gram. Silver ready surged by Rs 500 to Rs 45,100 per kg and weekly-based delivery by Rs 740 to Rs 44,560 per kg on sustained buying by speculators. Silver coins rose by Rs 100 to Rs 77,000 for buying and Rs 78,000 for selling of 100 pieces.

जीएम अनाज अमेरिका में तो सुरक्षित माना जाता है लेकिन भारत में नहीं

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समूह ने जेनेटीकली मॉडीफाइड (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल पर 10 साल की पाबंदी लगाने का सुझाव दिया है। इससे निकट भविष्य में उनकी फसल उगाए जाने की संभवना पर रोक लग जाएगी। कांसार्टियम इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन्स के महासचिव चेंगल रेड्डी ने इसका यह कहकर विरोध किया है कि यह किसानों के हितों के खिलाफ है जिन्हें ज्यादा पैदावार देनेवाली और कम कीटनाशकों का उपयोग करनेवाली जीएम फसलों की जरूरत है । भारतीय उपभोक्ताओं को भी ज्यादा उत्पादन और कीटनाशकों के कम इस्तेमाल से लाभ होगा। सामाजिक कार्यकर्त्ता जीएम फसलों को खतरनाक राक्षस की तरह पेश कर रहे हैं।चेंगल रेड्डी का कहना है कि जीएम फसलें कई दशकों से सुरक्षित तरीके से विश्वभर में उगायी और खायी जा रही है। अमेरिका एक मुकदमा प्रिय देश है। जहां वकील नागरिकों के हितों को नुक्सान होने के बारे में जरा सी भी तथ्य मिलने पर मुकदमा ठोंक देते हैं। उनमें से किसी ने भी अबतक जीएम फूड के खिलाफ क्लास सूट मुकदमा नहीं किया। जीएम फसलों में सबसे ज्यादा मक्का और सोयाबीन उगाया जाता है जिन्हें सीधे खाया जाता है और उनका उपयोग खाने का तेल निकलने के लिए किया जाता है। इससे बड़ी बात यह है कि इसका पशुओं के चारे की तरह उपयोग किया जाता है इस कारण वह सारी मांस और डेयरी श्रंखला का हिस्सा बन जाता है।इसके बावजूद किसी तरह से हानिकारक होने के तथ्य सामने नहीं आए।फिर उसे क्यों राक्षसी अनाज कहा जाए? रेड्डी द्वारा कोर्ट में दायर वक्तव्य में कहा गया है कि 29 देशों में 16करोड़ हेक्टोयर में जीएम फसलें उगायी जाती हैं।और वे देश जो उसे उगाते नहीं हैं वे य़ूरोपीय देशों सहित) आयात करते हैं। उनका कहना है कि 30करोड़ अमेरिकी,135 करोड़ चीनी,28 करोड़ ब्राजीली और अन्य देशों के करोड़ो लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नियमित रूप से जीएम अनाज खाते हैं। फिर उसे भारतीयों के लिए क्यों खतरनाक माना जाए। यह किस तरह अदालतों या विशेषज्ञ कमेटी का मामला है। यूरोपीयों ने जीएम फूड के बारे में बहुत प्रमुख आशंकाएं प्रगट की थी। इसके बावजूद यूरोप जीएम मक्का की फसले उगाने की अनुमति देता है। वह जीएम मक्का और सोयाबीन को जानवरों के चारे की तरह आयात करता है। करोड़ों यूरोपीय अमेरिका और दक्षिण अमेरिका जाते हैं और वहां जीएम फूड़ खाते हैं और किसी तरह के जहरीलेपन का शिकार भी नहीं होते। तीस लाख भारतीय अमेरिकी नागरिक बने हैं।और लाखों पर्यटन और व्यापार के लिए अमेरिका जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और सांसद भी अमेरिका जाते हैं। सोनिया गांधी भी वहां इलाज के लिए गईं थी। किसी को इस आधार पर नहीं रोका गया कि वे अमेरिका में राक्षसी खाद्यान्न खाएंगे।फिर सामाजिक कार्यकर्त्ता कैसे यह दावा कर सकते हैं कि जीएम खाद्यान्न् खतरनाक है और उसे तमाम किस्म की मंजूरियों के बगैर भारत में नहीं उगाया जाना चाहिए जिन्हें अन्य फसलों के लिए जरूरी नहीं माना जाता है। न्याय का प्राथमिक सिद्धांत यह माना जाता है कि जबतक आप दोषी साबित नहीं होते तबतक आपको निर्दोष माना जाता है।लेकिन भारत के सामाजिक कार्यकर्त्ता चाहते हैं कि जीएम फसलों को तबतक दोषी माना जाए जबतक वे स्वयं को निर्दोष न साबित कर दें। उन्होंने स्क्रीनिंग के लिए जो 10 वर्ष की पाबंदी सहित लंबी चौड़ी प्रक्रिया शुरू की है उसके पीछे उनकी यही दलील है। कार्यकर्त्ताओं का कहना है कि अबतक जीएम फसलें हानिकारक साबित नहीं हुईं हैं लेकिन भविष्य में साबित हो सकती हैं इसलिए बहुत सावधानीयुक्त स्रक्रीनिंग की जरूरत है।यह कहना उसी तरह है कि कुछ मुस्लिम आतंकवादी हैं इसलिए सभी मुस्लिमों की कठोर स्क्रीनिंग की जानी चाहिए । बगैर कठोर स्क्रिनिंग के कुछ आतंकवादियों को रोकने में बहुत देर हो जाएगी।तो क्या सभी मुस्लिमों को खतरनाक मानकर व्यवहार करने के लिए यह दलील दी जा सकती है? रेड्डी ने कहा कि परंपरागत कृषि तकनीकों की सीमाएं है और वे उन जटिल समस्याओं को हल नहीं कर सकती जिन्हें जीएम तकनीक हल कर सकती है। वह इस बात से चकित हैं कि कार्यकर्त्ताओं और कथित विशेषज्ञों द्वारा उन सुप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिकों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।जिन्होंने दो दशकों तक बायो तकनीक के विकास का मार्गदर्शन किया है। उन्होंने इस बात पर अचरज जताया कि अदालत ने किसान समूहों से मशविरा नहीं किया। कार्यकर्त्ताओं ने भारत में बीटी काटन का कड़ा विरोध किया और यह दावा करते हुए बोगस रपटे जारी कीं कि व्यावहारिक स्तर पर इसकी फसलें नाकाम रहीं है।लेकिन किसान जल्दी ही अपने अनुभव से जान गए कि कि बीटी काटन बहुत लाभदायक है। तीन करोड उसे अपनाने के लिए तत्पर हो गए। नतीजतन कपास का उत्पादन दोगुना हो गया वह भी बहुत कम कीटनाशकों का इस्तेमाल करके। इससे निर्यात भी बढ़ा। कार्यकर्त्ताओ और कुछ कथित विशेषज्ञों ने यह गुस्ताखी कर दिखाई है कि बीटी काटन से किसानों को कोई लाभ ही नहीं हुआ। यह है झूठे भविष्यद्वक्ताओं से हताश भिक्षावृति। यह कहना किसानों का अपमान है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे ऐसी तकनीक के पीछे भाग रहे हैं जिससे उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा। पंजाब के किसान 30000 रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन लीज पर दे रहे हैं । क्या वे ऐसा करते यदि वह लाभदायक नहीं होता? आखिर में सुप्रीम कोर्ट इस सबमें क्यों पड़ रहा है ? दुनियाभर में कुछ सरकारों ने जीएम फसलों को इजाजत दी है कुछ ने नहीं ।लेकिन कहीं भी यह न्यायिक मुद्दा नहीं बना।सुप्रीम कोर्ट गरीबों और कमजोरों की आवाज सुनने और मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए जनहित याचिकाओं की इजाजत देता है।लेकिन जीएम विरोधी कार्यकर्त्ता ताकतवर लोगों और लाबियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अमेरिकी कोर्ट तो इस विचार को ही हास्यास्पद मानता कि कि जीएम फूड अमेरिकियों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। भारत के सुप्रीम कोर्ट को भी इसी राह पर चलना चाहिए।

जीएम फसलों को अपनाने में विकासशील देशों से पीछे हैं हम

एक ओर जहां दुनिया भर के विकासशील देशों ने जीएम (आनुवांशिक तौर पर संवद्र्घित) फसलों को अपनाने में तेजी दिखाई है वहीं अजीब विडंबना है कि औद्योगीकृत देश भारत बीटी कपास की खासी सफलता के बाद भी इन फसलों को अपनाने में कोताही बरत रहा है। नई जीएम फसलों के लिए खेतों के परीक्षण को फिलहाल टाल दिया गया है और ऐसे में संभावना है कि निकट भविष्य में केवल कपास ही भारत में उगाई जाने वाली जीन संवद्र्घित फसल रह जाएगी। वहीं दूसरे देशों में, जिनमें विकासशील देश भी शामिल हैं, खासतौर पर तैयार की गई 25 जीएम फसलों को कारोबार के लिए नियामकीय मंजूरी मिल चुकी है। जीएम फसलें उगाने वाले 28 में से 20 देश विकासशील हैं। इसके अलावा यह कहा जा रहा है कि 31 दूसरे देशों ने भी जैवप्रौद्योगिकी उत्पादों के खाद्य और चारे के तौर पर इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। इस तरह इन उत्पादों को अपनाने वाले देशों की कुल संख्या 59 हो गई है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र वाले जैवप्रौद्योगिकी उद्योग की गैर लाभकारी संस्था इंटरनैशनल सर्विस फॉर दी एक्वीजिशन ऑफ एग्री बायोटेक ऐप्लीकेशंस (आईएसएएए) ने साल 2012 की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया भर में जीएम फसलों के कुल रकबे में 52 फीसदी हिस्सेदारी विकासशील देशों की है। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि 2012 में विकासशील देशों में जैवप्रौद्योगिकी फसलों की सालाना विकास दर 11 फीसदी रही जो कि विकसित देशों में महज 3 फीसदी ही थी। दुनिया की कुल जैवप्रौद्योगिकी फसलों के रकबे में से 46 फीसदी हिस्सेदारी पांच प्रमुख विकासशील देशों- चीन, भारत, ब्राजील, अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका की है जहां इन फसलों की खेती छोटे-छोटे खेतों में की जाती है। कुल वैश्विक आबादी का 40 फीसदी इन्हीं पांच देशों में पाया जाता है। भारत को खासतौर पर इस बात पर गौर फरमाना चाहिए कि भले ही यूरोप जीएम फसलों और उत्पादों को लेकर सबसे अधिक आशंकित रहा है, मगर यूरोपीय संघ (ईयू) के कम से कम पांच सदस्य इस आलोचना को छोड़कर जैवप्रौद्योगिकी फसलों की खेती को बढ़ावा देने लगे हैं। स्पेन, पुर्तगाल, चेक, स्लोवाकिया और रोमानिया ने 2012 में 1,29,071 हेक्टेयर कृषि भूमि पर जैवप्रौद्योगिकी फसलों के बीज बोये हैं जो कि पिछले साल से 13 फीसदी अधिक है। यूरोप में स्पेन ऐसा देश है जहां सबसे अधिक भूभाग पर बीटी मक्के की खेती की गई है। बीटी मक्के का दोहरा इस्तेमाल किया जाता है, खाद्य उत्पाद के तौर पर भी और चारे के रूप में भी। जैवप्रौद्योगिकी फसलों के भविष्य को लेकर आईएसएएए आशावादी तो है मगर उसने सतर्क रुख भी अख्तियार कर रखा है। विकासशील और औद्योगिक देशों में पहले से इन फसलों को अपनाने की गति काफी तेजी है और इस बीच आईएसएएए ने इसमें ठीक-ठाक सालाना बढ़ोतरी की उम्मीद जताई है। मक्के और गन्ने की ऐसी किस्म जो सूखे को सह सकती है, बीमारियों से निपटने में कामयाब आलू और विटामिन ए से भरपूर गोल्डन राइस उन फसलों में से है जिन्हें अगले कुछ सालों में कई देशों में खेती की मंजूरी मिल सकती है। बड़े दुख की बात है कि पर्यावरणविदों और जीएम का विरोध कर रही लॉबी की ओर से जीएम फसलों के कारण नुकसान होने का झूठा खौफ फैलाने के कारण भारत ऐसी पोषक और बीमारियों से लडऩे में सक्षम जीएमएफ फसलों से महरूम रहेगा। हालांकि कृषि वैज्ञानिकों और खुद कृषि मंत्री शरद पवार समेत सरकार के कुछ बड़े अधिकारियों ने जीएम फसलों का समर्थन किया है, मगर इनकी दलीलों को लॉबीइंग करने वालों के शोर-शराबे के बीच दबा दिया गया है। यह समझने की जरूरत है कि बीटी जीन 2002-03 में बीटी कपास को पेश करने के समय से ही मानव खाद्य शृंखला में शामिल हो चुके हैं। कपास के बीज के रूप में ये खाद्य शृंखला में अपनी जगह बना चुके हैं जिसका इस्तेमाल पशु चारे के तौर पर किया जाता है। इससे न तो पशुओं को और न ही लोगों को किसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ा है। वैश्विक और घरेलू स्तर पर कुछ दूसरे घटनाक्रम भी हैं जो भारत की जीएम नीति की समीक्षा को जरूरी बना देती हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो विख्यात पर्यावरणविद मार्क लाइनस जो 1990 के दशक से ही यूरोप में सफलतापूर्वक जीएम उत्पादों के खिलाफ अभियान चलाते आए हैं, उनके रुख में भी अचानक से बदलाव आया है और एक महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी विकल्प के उपयोग में अड़ंगा लगाने में अपनी भूमिका पर उन्होंने खुद अफसोस जताया है। वह अब मानते हैं कि इस विकल्प से पर्यावरण को फायदा हो सकता है। अगर अपने देश की बात करें तो सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर 1 जनवरी से ऐसे सभी खाद्य उत्पादों पर लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया है जिनमें जीएम उत्पाद शामिल हैं। इस तरह उपभोक्ता खुद इस बात का फैसला कर सकेंगे कि उन्हें जीएम उत्पादों को इस्तेमाल करना है या नहीं। ऐसे में इन उत्पादों के परीक्षण, उत्पादन या आयात पर रोक लगाने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। हालांकि यह सही है कि जीएम उत्पाद, ,खासतौर पर जिनमें असंबद्घ प्रजातियों के बीच जीन का विनिमय होता है, जैसे कि फसलें और जमीन में पनपने वाले बैक्टीरिया, पूरी तरह से जोखिम मुक्त नहीं होते हैं। ऐसे में इन उत्पादों का गंभीरता से परीक्षण बहुत जरूरी है। उत्पादों के दोषपूर्ण विकास और नियमन के लिए एक तकनीकी तौर पर एक सक्षम प्रणाली की जरूरत है और इन उत्पादों के उत्पादन और इनके इस्तेमाल पर रोक लगाने से बात नहीं बनने वाली। जब तक नीतियों में बदलाव नहीं किया जाता है तब तक जैवप्रौद्योगिकी शोध और विकास में निवेश भारत से बाहर जाना तय है।

जीएम फसलों का साथ दे जीएम विरोधी कार्यकर्त्ता, मार्क लिनस

ऑक्सफ़ोर्ड। सुप्रीम कोर्ट के आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के क्षेत्र परीक्षण पर रोक लगाने के फैसले पर केंद्र सरकार ने अपना विरोध दर्ज किया है। गौरतलब है कि जो लोग जीएम् फसलों का विरोध कर रहे थे वह भी अब वैज्ञानिक आधार को लेकर इसके पक्ष में बोलने लगे है। ऑक्सफ़ोर्ड में स्थित लेखक मार्क लिनस जो एक ग्रीन एक्टिविस्ट है, जो आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों का काफी विरोध कर रहे थे। उन्होंने जीएम फसलों के क्षेत्र को भी नष्ट कर दिया था। पर अपने इस कृत्य को निंदनीय बताते हुए माफ़ी भी मांगी है। उन्होंने कहा कि हम एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प को गलत समझकर विकास में रूकावट ला रहे है। साथ ही उन्होंने कहा कि ग्रीनपीस और वंदना शिवा जैसे अन्य कार्यकर्ताओं को भी इसका साथ देने की जरुरत है। रॉयल सोसाइटी द्वारा मार्क लिनस के सिक्स डिगरी किताब को पुरस्कृत किया गया। जिसमें लिनस ने जी एम फसलों के वैज्ञानिक संशोधन का अभ्यास किया और जीएम फसलों के प्रति उनकी जो धारणाये थी उन्हें मिथ्य करार दिया। लिनस ने कहा कि मुझे लगता था जीएम फसलों में रसायनों का प्रयोग बढेगा। यह फसल केवल बड़ी कंपनियों को ही फायदा पहुचायेगी। पर ऐसा न होते हुए यह किसानों को भी फायदा पहुचायेगा और रासयानो के उपयोग से फसल को नष्ट करनेवाले कीटकों के आक्रमण से भी बचायेगा।

जीएम फसलों का जंजाल

देश में आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के अंतर्गत आनुवांशिक बदलाव वाली या जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलों और देश की खाद्य सुरक्षा के संभावित मूल्यांकन को लेकर बहस चल रही है। बीटी फसलों में टॉक्सिन (जहर) बनाने वाली जीन डाली जाती है, जो मिट्टी में पाए जाने वाले एक बैक्टीरिया बैसिलस थूरिजेनेसिस (बीटी) में पाई जाती है। इससे तैयार होने वाली फसल बीटी फसल कहलाती है। यह जीन फसलों पर खुद जहर बनकर उन पर लगने वाले कीट को मार देती है। कुछ बड़ी जैव प्रौद्योगिकी कंपनियां, कृषि वैज्ञानिक और प्रबुद्ध लोगों का एक वर्ग बढ़ती आबादी, घटती खेतिहर भूमि के कारण देश में खाद्य सुरक्षा के लिए जीएम बीज तकनीक को अपनाने पर जोर दे रहा है। मगर क्या वाकई जीएम फसलें हमारे लिए उपयोगी हैं? पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के बीटी बैंगन के व्यावसायीकरण के स्थगन के बाद बहुराष्ट्रीय बीज उद्योग ने भारत में जीएम फसलों के पक्ष में अभियान छेड़ दिया। प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति ने देश की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए जीएम फसल अपनाने की सलाह दे डाली है। स्वयं कृषि मंत्री शरद पवार इसके बड़े पैरोकार हैं। मगर देश में पहले ही हरित क्रांति ने रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग करके भूमि की उर्वरता, भूमिगत जल और पर्यावरण को इस कदर विषैला बना दिया है कि इसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं है। जीएम फसलों के घोड़े पर सवार होकर जो दूसरी कथित हरित क्रांति आ रही है, उससे कृषि पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर पड़ने वाले असर का आकलन करना आवश्यक है। दुनिया भर के विशेषज्ञ पिछले 50 वर्षों में सभी कृषि प्रौद्योगिकियों और पद्धतियों का मूल्यांकन कर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ऐसी कृषि पद्धति, जो पारिस्थितिकी दृष्टिकोण एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाते हुए जैविक खेती का समर्थन करती है, गरीबी कम करने और खाद्य सुरक्षा को आत्मनिर्भर बनाने में ज्यादा सार्थक सिद्ध हुई हैं। स्वामीनाथन टास्क फोर्स ने 2004 में सरकार को सौंपी रिपोर्ट में कहा है कि जीएम फसल अपनाने की तकनीक उन्हीं परिस्थितियों में अपनाई जाए, जब और कोई विकल्प न बचे। वर्तमान में देश के बाजार में उपलब्ध बीटी कपास एकमात्र जीएम फसल है, जिसकी अनुमति भाजपा के शासनकाल में राजनाथ सिंह के कृषि मंत्री रहने के दौरान व्यवसायिक प्रयोग के लिए दी गई थी। कपास उत्पादक किसानों और कपास वैज्ञानिकों की रिपोर्टों का विश्लेषण करने के बाद विभिन्न दलों की बासुदेव आचार्य की अध्यक्षता वाली 31 सांसदों की समिति अपनी रिपोर्ट में इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि बीटी कपास की खेती इतनी उत्साहवर्धक नहीं है, जितनी बताई जा रही है। गौरतलब है कि देश के बीटी कपास की खेती करने वाले प्रांतों महाराष्ट्र (विदर्भ), आंध्र प्रदेश और पंजाब के किसानों ने ही सर्वाधिक आत्महत्या की है। बीटी कपास के बाद मोनसैंटो और उसकी सहयोगी माइको कंपनी बीटी बैंगन को व्यवसायिक खेती के प्रयोग में लाना चाहती है। पूरे देश में व्यापक विरोध को देखते हुए पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसकी व्यवसायिक खेती की अनुमति नहीं दी है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, केरल, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात, ओडिशा, कर्नाटक और पंजाब की सरकारों ने बीटी की जरूरत को सिरे से खारिज कर दिया है। अमेरिकी कृषि विभाग भी स्वीकार कर चुका है कि जीएम मक्का और जीएम सोया की उत्पादकता सामान्य प्रजातियों से कम ही है। चीन में बेशक जीएम धान पर काम चल रहा है, परंतु वहां जल्दबाजी नहीं है। हमारे देश में चावल की हजारों अच्छी किस्में हैं, फिर भी हम जल्दी में क्यों हैं? खाद्य सुरक्षा का भय दिखाकर जीएम फसलों को देश पर थोपने की कोशिश की जा रही है, जबकि देश का अन्न भंडार आवश्यकता से ढाई गुना अधिक है। मूल प्रश्न यह भी है कि भारतीय वैज्ञानिक टिकाऊ खेती की तकनीकी को पर्यावरण एवं परंपरागत कृषि विधियों से क्यों प्रोत्साहित नहीं करते? सरकार को चाहिए कि वह जनहित में बर्बादी की फसलों पर रोक लगाकर भारतीय किसान और कृषि को नष्ट होने से बचाए।

जीएम फसलों का मिथक

हाल ही में अपने एक भाषण में केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा, ‘हम बदलाव के जिन साधनों और तरीकों को तेजी से अपना रहे हैं, उन पर सावधानी से विचार किया जाए। कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी खेती की लागत घटाना। इसके साथ ही आबादी के लिए सुरक्षित भोजन उपलब्ध करवाना भी हमारा लक्ष्य होना चाहिए।’ पवार ने निश्चित रूप से सही बात कही है, लेकिन इसके साथ ही वह उसी समय उत्पादन में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थों की पैरवी करते रहे, जो न केवल विरोधाभासी लगता है, बल्कि बहुत हद तक बेतुका भी। ‘खाद्य उत्पादन दोगुना’ करने के लिए आनुवांशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों को बढ़ावा देने का यह नाटक बायोटेक बीज लॉबी के साथ सम्मेलनों जैसे हास्यास्पद स्तर तक पहुंच गया है। यह सब तब किया जा रहा है, जब कृषि पर गठित संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई तकनीकी विशेषज्ञ समिति की अंतरिम रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की प्रौद्योगिकी को अपनाने के मसले पर सरकार को अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए। रिपोर्ट में इसकी जरूरत पर भी सवाल उठाए गए। � भारत में दुनिया का सबसे बड़ा अनाज भंडार है, लगभग 667 लाख टन का। यह बफर स्टॉक के लिए तय सरकारी सीमा की तुलना में ढाई गुना अधिक है। इतना होने के बाद भी अनाज भूखों तक नहीं पहुंच रहा है। क्या यह गलत नहीं है? फिर किस आधार पर कृषि मंत्री उन जीएम फसलों की जरूरत बता रहे हैं, जो दुनिया भर में विवाद में फंस गई हैं? इससे पहले वैज्ञानिक यह दावा खारिज कर चुके हैं कि जीएम फसलों से खाद्य सुरक्षा और उत्पादन के स्तर को बढ़ाया जा सकता है। यह हमारे सामने उत्पादन और विज्ञान जैसे दो महत्वपूर्ण मुद्दों को लाता है। अगर हम उत्पादन की बात करें, तो हमारे पास हरित क्रांति के अनुभव हैं और भारत में पहली जीएम फसल बीटी कपास को एक दशक हो गया है। आज जीएम फसलों की पैरवी ठीक वैसे ही की जा रही है, जैसे हरित क्रांति को खाद्य सुरक्षा के लिए रामबाण के रूप में पेश किया गया था। लेकिन इसके परिणामों की कभी समीक्षा नहीं की गई। कृषि रसायनों यानी उर्वरकों और कीटनाशकों के बेतहाशा उपयोग ने प्राकृतिक पूंजी यानी धरती की उर्वरता को खत्म कर दिया है। यह खबर नहीं बनती कि देश के सबसे उपजाऊ भागों में भी कृषि उत्पादन तेजी से गिर रहा है। खबरों में उन हजारों किसानों और खेतिहर मजदूरों का उल्लेख भी नहीं होता, जो कथित क्रांति के खूबसूरत दावों के पीछे कैंसर जैसी महामारी भोग रहे हैं। इसी तरह, जब 2002 में बीटी कपास प्रस्तुत किया गया था, तब इस बीज का विकास करने वाले बायोटेक बीज उद्योग और इसे प्रोत्साहित करने वाली सरकार ने ऊंचे दावे किए थे। एक दशक बाद, जमीनी अनुभव इन बीजों की विफलता की एक अलग ही कहानी बताते हैं। बीटी कपास की प्रस्तुति के बाद हमारे देश में कपास की उपज में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई है। 2004-05 में जब गैर बीटी कपास फसल का क्षेत्रफल 94.6 फीसदी था, तब कपास का औसत राष्ट्रीय उत्पादन 470 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था और वर्ष 2011-12 में जब बीटी कपास का क्षेत्रफल कुल कपास की खेती का 93 प्रतिशत पर पहुंच गया, तब कपास का औसत राष्ट्रीय उत्पादन 481 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया। बीज की उपलब्धता और विविधता पर प्रभाव की तो बात ही अलग है। यह भी ध्यान देने वाला तथ्य है कि आज लगभग पूरे कपास बीज बाजार पर अमेरिकी बीज निर्माता कंपनी मोनसेंटो का नियंत्रण है। देश भर के किसानों के साथ बातचीत में यह स्पष्ट हो गया है कि किसानों को भ्रामक विज्ञापनों के जाल में उलझाया गया है। वे चाहकर भी बीटी कपास को छोड़ नहीं सकते, क्योंकि गैर बीटी संकर बीज अब उपलब्ध नहीं हैं। गैर बीटी कपास के बीजों को षड्यंत्रपूर्वक व्यवस्थित रूप से बाजार से बाहर किया गया है, और जो बचा रह गया था, उसे बीटी जीन ने दूषित कर दिया है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के प्रारूप में भी इस बात का उल्लेख किया गया है। इस वास्तविकता को स्वीकार करने की जगह हमारा कृषि मंत्रालय केवल अपना फायदा देख रही एबीएलई और मोनसेंटो जैसी कंपनियों को प्रोत्साहित करता प्रतीत हो रहा है। और अंततः किसान आत्महत्या में भी, जो हमारी कृषि नीतियों का एक वास्तविक प्रतिबिंब है, कमी नहीं आ रही है। बल्कि बीटी कपास के तहत आने वाले क्षेत्रों में तो किसान आत्महत्याओं में वृद्धि ही हुई है। यह सब मुझे इसके विज्ञान के करीब लाता है। किसानों को हमें एक तरह से कृषि का पहला वैज्ञानिक मानना चाहिए। स्कूलों से प्रमाणपत्र और डिग्री लेने वालों जैसा नहीं, जो जमीनी सच्चाइयों से कटे रहते हैं। ये वे वैज्ञानिक हैं, जो घरेलू जंगली प्रजातियों का परीक्षण और प्रयोग कर रहे हैं और सदियों से बीज और ज्ञान बांट रहे हैं। इसकी तुलना में आज उद्योग द्वारा प्रोत्साहित और सरकारों द्वारा तेजी से अपनाया जा रहा कृषि विज्ञान पूरी तरह विपरीत लगता है। दुर्भाग्य से यह कॉरपोरेट मुनाफे के एजेंडे से प्रेरित है। कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को किसानों के पक्ष में काम करना चाहिए, उनके खिलाफ नहीं। और अंत में, सबसे महत्वपूर्ण बात- हमारी नीतियां देश को भोजन देने वाले किसानों की आजीविका की रक्षा करने वाली होनी चाहिए।

सफेद झूठ पर टिका है जीएम फसलों का विरोध

जीन संशोधित (जीएम) फसलों का सबसे ज्यादा विरोध करने वाले और एक दौर में इनके खेत जला देने वाले ग्रीन ऐक्टिविस्ट मार्क लाइनास ने अपनी इस सोच से तौबा कर ली है। यही नहीं, 'एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प को राक्षस की तरह पेश करने के लिए' उन्होंने सार्वजनिक क्षमायाचना भी की है। ग्रीनपीस और वंदना शिवा जैसे ऐक्टिविस्टों को भी अब ऐसा ही करना चाहिए। लाइनास कहते हैं कि जब उन्होंने मोनसांटो के जीएम सोया के बारे में सुना तो सोचा कि एक घटिया अमेरिकी कंपनी जीनों के घालमेल से बना एक और खतरनाक खाद्य बाजार में ला रही है। उन्होंने दुनिया भर में जीएम अनाजों और सब्जियों के प्रति भय पैदा करने की मुहिम चलाई थी और कई देशों में इन पर रोक लगवा दी थी। लेकिन इन फसलों के पीछे मौजूद विज्ञान को आत्मसात करने के बाद, और इसी बीच अपनी किताब 'सिक्स डिग्रीज' पर रॉयल सोसायटी का साइंस बुक प्राइज हासिल कर लेने के बाद उन्हें लगा कि जीएम खाद्य पदार्थों के खिलाफ इतने लंबे समय से बने हुए उनके विश्वास महज एक मिथक हैं। टमिर्नेटर टेक्नॉलजी 'मैंने मान लिया था कि जीएम से केमिकल्स का इस्तेमाल बढ़ेगा। पता चला कि कीट-प्रतिरोधी कपास और मक्का को कम कीटनाशकों की जरूरत पड़ती है। मैं मानता था कि जीएम का फायदा सिर्फ बड़ी कंपनियों को मिलेगा। पता चला, लागत कम पड़ने से किसानों को अरबों डॉलर का फायदा हो रहा है। मेरी धारणा थी कि टमिर्नेटर टेक्नॉलजी (जिसका आरोप मोनसांटो पर लगता था) किसानों के बीज बचाने के अधिकार पर डाका डाल रही है। पता चला कि संकर नस्लें यह काम पहले ही कर चुकी हैं, और टमिर्नेटर जैसा कुछ कभी था ही नहीं। मेरा ख्याल था कि जीएम को कोई नहीं चाहता। हकीकत यह निकली कि बीटी कॉटन को गैरकानूनी ढंग से भारत मंगाया जा रहा था और ब्राजील में राउंड-अप रेडी सोयाबीन उगाया जा रहा था, क्योंकि इन देशों के किसान इन्हें उगाने को बेताब थे। मैं जीएम को खतरनाक मानता था। लेकिन मुझे पता चला कि म्यूटाजेनेसिस जैसे तरीकों से तैयार की गई पारंपरिक फसलों की तुलना में ये कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं। जीएम टेक्नीक में सिर्फ एक-दो जीनों का हेरफेर होता है, लेकिन पारंपरिक संकरण में तो ट्रायल ऐंड एरर का तरीका अपनाकर समूचे जेनोम का ही बंटाधार कर दिया जाता है।' ऑर्गैनिक की हकीकत लाइनस का कहना है कि 2050 में जब दुनिया की जनसंख्या साढ़े नौ अरब हो जाएगी तब उसका पेट भरने के लिए अभी के दोगुने खाद्य उत्पादन की जरूरत पड़ेगी। यह काम कम उपज वाली ऑर्गैनिक फसलों (हरित क्रांति से पहले वाली) के जरिये करना हो तो बड़ी मात्रा में जंगलात और घास वाली जमीनों को साफ करके उन्हें खेती के काम में लाना पड़ेगा। ऐसा हुआ तो पर्यावरण, जैव विविधता और जल आपूर्ति का दिवाला पिट जाएगा। ऐसा नहीं होना चाहिए। दुनिया को बेहतर उपज की जरूरत है और जीएम इसे हासिल करने का अच्छा तरीका है। ऑर्गैनिक फार्मिंग मूलत: हरित क्रांति से पहले वाली तकनीक ही है, जिसने समूचे मानव इतिहास को माल्थस के सिद्धांत वाली भुखमरी के कगार पर बिठाए रखा था। सौभाग्यवश, नोबेल पुरस्कार विजेता नॉर्मन बोरलॉग के नेतृत्व में आधुनिक वैज्ञानिकों ने यह दिखाया कि गेहूं के जींस में फेरबदल करके तैयार की गई हाई-यील्डिंग किस्मों में अधिक खाद का इस्तेमाल करके दोगुनी से भी ज्यादा उपज हासिल की जा सकती है। भारत की नई पीढ़ी को इसका जरा भी अंदाजा नहीं है कि 1965-66 का सूखा कितना भयंकर और अपमानजनक था। हालत यह हो गई थी कि भुखमरी से बचने के लिए हमें पूरी तरह अमेरिकी खाद्य सहायता पर निर्भर हो जाना पड़ा था। सौभाग्यवश, हरित क्रांति की मेहरबानी से ज्यादा उपज वाली खेती ने ऑर्गैनिक खेती की जगह ले ली और इसके बाद न सिर्फ भारत को फिर कभी खाद्यान्न संकट का सामना नहीं करना पड़ा, बल्कि हमारी गिनती आज दुनिया के खाद्य निर्यातकों में हो रही है। बोरलॉग ने कहा कि ऑर्गैनिक फार्निंग अमीर लोगों की श्रेष्ठ और महंगे खाने की मांग पूरी कर सकती है, लेकिन व्यापक जनता की जरूरतें पूरी करना इसके बूते की बात नहीं है। ग्रीनपीस और अन्य कार्यकर्ता यह झूठा दावा करके कि ज्यादा उपज वाली किस्मों जितना अनाज ऑर्गैनिक फार्निंग से भी उपजाया जा सकता है, संसार को दोबारा खाद्यान्न संकट की ओर धकेलने पर तुले हैं। लाइनास का कहना है कि जीएम खाद्य पदार्थों के बारे में झूठी अफवाहें फैलाकर और इनके और ज्यादा परीक्षण की मांग करके ऐक्टिविस्टों ने इनके लिए इजाजत की अवधि 3.7 साल से बढ़वाकर 5 साल करवा दी और किसी जीएम फसल को बाजार में लाने की न्यूनतम लागत को बढ़ाकर 13 करोड़ 90 लाख डॉलर कर दिया। इस खेल में मोनसांटो जैसे सबसे बड़े खिलाड़ी ही टिके रह सकते हैं। यूं कहें कि अपने आंदोलनों के जरिये इन महानुभावों ने ठीक उन्हीं कंपनियों को एकाधिकार की स्थिति में ला दिया है, जिनके विरोध का वे दावा किया करते हैं। फसल जलाने का तर्क पिछले साल ऐक्टिविस्टों ने ऑस्ट्रेलिया में जीएम गेहूं की खड़ी फसल जला डाली। लेकिन इसी फसल के एक अन्य परीक्षण में उपज 30 फीसदी बढ़ी हुई पाई गई। अनाज की एक किस्म को उसके परीक्षण से पहले ही नष्ट कर देना मध्यकाल में चर्च द्वारा किताबें जलाने और ब्रूनो-गैलिलियो को सजा सुनाने जैसा है। लाइनास का कहना है कि जीएम की बहस अब खत्म हो चुकी है। डेढ़ दशक और 30 खरब जीएम भोजनों के बाद भी इससे किसी को कोई नुकसान होने का मामला सामना नहीं आया है। जीएम खाना खाकर बीमार पड़ने की आशंका किसी के उल्कापिंड की चपेट में आकर मारे जाने से भी कम है। वे ऐक्टिविस्टों को बताते हैं कि 'अपना अलग विचार रखने का आपको पूरा हक है, लेकिन विज्ञान इसके पक्ष में नहीं है।' दुनिया को लाइनास जैसे और भी ग्रीन विदोहियों की जरूरत है।

आनुवांशिक कबाड़ को रोकना

हमारी खेती द्वारा पैदा की गई फसलों को अतीत में कभी भी इस तरह के परीक्षण से नहीं गुजरना पड़ा। लेकिन विशेष रूप से जीई (जेनेटिकली इंजीनियर्ड) या जीएम (जनेटिकली मोडिफाइड) फसलों के लिए जांच या परीक्षण जरूरी हैं। जीई फसलें डीएनए को पुनर्संयोजित करने वाली प्रौद्योगिकी (Recombinant DNA technology) के माध्यम से प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार किए गए पादप जीव हैं। आनुवांशिकी इंजीनियरिंग (जीई) की अनिश्चितता और अपरिवर्तनीयता ने इस प्रौद्योगिकी पर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे भी आगे, विभिन्न अध्ययनों ने यह पाया है कि जीई फसलें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं और इससे मानव स्वास्थ्य को संकट की आशंका है। इन सबके परिणामस्वरूप, इस खतरनाक प्रौद्योगिकी को अमल में लाने की आवश्यकता पर दुनिया भर में विवाद खड़ा हो गया है। भारत एवं अन्य बहुत सारे देशों में, पर्यावरण में छोड़े जा रहे जीई या जीएम पौधों-जंतुओं (organism) के विरूद्ध प्रचार के साथ ग्रीनपीस का कृषि पटल पर पदार्पण हुआ। जीई फसलें जिन चीजों का प्रतिनिधित्व करती हैं वे सब हमारी खेती के लिए वाहियात हैं। वे हमारी जैवविविधता के विनाश और हमारे भोजन एवं खेती पर निगमों के बढ़ते नियंत्रण को कायम रखती हैं। अभियान कथा: जीई विरुद्ध अभियान ने देश में जीई फसलों की जरूरत पर एक गंभीर बहस सुनिश्चित करने में योगदान दिया है। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि भारत किसी जीएम खाद्य फसल के व्यावसायीकरण को मंजूरी नहीं देता है। यह अभियान हमारे देश में जीएम फसलों के प्रवेश के विरुद्ध एक साहसिक मोर्चा तैयार करने के लिए किसानों, उपभोक्ताओं, व्यापारियों, वैज्ञानिकों एवं अन्य नागरिक समाज संगठनों को एक साथ लाया है। इसके परिणामस्वरूप, व्यावसायिक उद्देश्य से आए पहले जीएम खाद्य फसल बीटी बैंगन पर अनिश्चितकालीन स्थगन प्राप्त हुआ। यद्यपि बीटी बैंगन को अभी रोक दिया गया है लेकिन आनुवांशिक रूपांतरण से तैयार की जा रही 56 अन्य फसलें मंजूरी के इंतजार में हैं। इन सबके बीच चावल नेतृत्व की भूमिका में है। यदि इसे रोका नहीं गया तो पूरा देश जीएम बीज कंपनियों के लिए एक बड़ी फीडि़ंग प्रयोगशाला (feeding experiment) हो जाएगा। यह अभियान किसी जीएम फसल को देश में प्रवेश से रोकने के लिए मौजूदा नियामक व्यवस्था के छिद्रों को पाटने की कोशिश कर रहा है। हम सरकार से एक जैव-सुरक्षा व्यवस्था (या कानून) के साथ आगे बढ़ने लिए कह रहे हैं जो नागरिकों के स्वास्थ्य, पर्यावरणीय सुरक्षा एवं राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक ढांचे की प्राथमिकता को तय करेगा। चूंकि आम नागरिक एक उपभोक्ता है और उसे जीएम मुक्त भोजन का अधिकार है, हम उपभोक्ताओं को इस बात के लिए जागरूक करते आ रहे हैं एवं देश के खाद्य (फूड) ब्रांडों के साथ लगे हुए हैं ताकि देश के भोजन उद्योग का जीएम मुक्त रहना सुनिश्चित हो सके। देश में पहली बार जीएम खाद्य एवं खाद्य कंपनियों के विरुद्ध एक उपभोक्ता अभियान इस विचार को लेकर आरंभ हुआ है। सारांशतः, हमारी बुनियादी मांगें हैं: 1. पर्यावरण में किसी भी तरह के जीएम जीवों की रिहाई पर पूर्ण प्रतिबंध, चाहे वह व्यावसायिक कृषि के लिए हो या प्रयोग एवं अनुसंधान के लिए। 2. कृषि-पारिस्थितिक पद्धतियों को चिह्नित करने वाले पारिस्थितिक विकल्पों के वैज्ञानिक अनुसंधान पर पुनः ध्यान देना जो बदलते जलवायु के साथ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती हों।

जीएम फसलों से अनावश्यक भय

आनुवंशिक रूप से परिवद्र्धित (जेनेटिकली मॉडिफाइड- जीएम) खाद्य फसलों के बारे में हर तरह के परीक्षण पर फिलहाल रोक न लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने उचित राह अपनाई है। कोर्ट ने तकनीकी विशेषज्ञ समिति (टीईसी) से कहा कि उसकी सिफारिशों पर अनेक क्षेत्रों से आए एतराजों पर वह तमाम तथ्यों की रोशनी में नए सिरे से गौर करे। इस समिति ने ऐसी फसलों के हर तरह के परीक्षण पर दस वर्षों के लिए रोक लगाने की अनुशंसा की थी। मगर केंद्र सरकार और जीएम फसलों पर परीक्षण से जुड़ी एक कंपनी ने इस सिफारिश का विरोध किया है। अनेक जानकार भी इससे सहमत नहीं हैं कि वैज्ञानिक शोध को कुछ आशंकाओं के आधार पर रोक दिया जाए और उससे जुड़ी संभावनाओं का दरवाजा बंद कर दिया जाए। हर नई चीज से भयभीत होना अनेक लोगों की आदत का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इस बुनियाद पर प्रयोग, परीक्षण और प्रगति को रोक देना कतई वांछित नहीं है। सरकार ने यह उचित ही ध्यान दिलाया है कि देश की बढ़ती आबादी को भविष्य में अनाज नसीब हो सके, इसके लिए जीएम फसलें एक उम्मीद हैं। जब बड़ी आबादी वाले तमाम विकासशील देश इन फसलों पर अनुसंधान कर रहे हैं, तब भारत में भी उसे नहीं रोका जा सकता। ऐसी फसलों से सुरक्षा का जो खतरा बताया जाता है, उस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि अगर परीक्षण ही रुक गए, तो फसलों की सुरक्षा से जुड़े प्रयोगों पर भी विराम लग जाएगा। फिर कभी वो समय नहीं आएगा, जब ऐसी फसलों को पूर्णत: सुरक्षित मानकर उनकी खेती की जाए। इस संदर्भ में विनियमन एवं निगरानी की व्यवस्थाएं सबसे अहम मुद्दे हैं। अगर इनकी चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था हो सके तो फिर कोई वजह नहीं है, जिसके आधार पर जीएम फसलों पर प्रयोग या भविष्य में उनके उपयोग को प्रतिबंधित करने की जरूरत पड़े। गौरतलब है कि बीजों में वैज्ञानिक ढंग से सुधार की लंबी परंपरा है, जिससे पैदावार बढ़ाने में लगातार मदद मिली है। देश की हरित क्रांति में भी संकर बीजों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह तकनीक और आगे बढ़ी है। इसके उपयोग में सतर्कता जरूरी है, लेकिन इनसे मुंह मोड़ लेना बुद्धिमानी नहीं है। (Dainik Bhaskar)

30 May 2013

एक माह पहले ही बंद होगी गेहूं की सरकारी खरीद

आर एस राणा नई दिल्ली | May 30, 2013, 00:05AM IST सुस्ती - चालू रबी सीजन में गेहूं की मंडियों में आवक काफी कम रही फीकी सप्लाई ३३५ लाख टन गेहूं की खरीद की गई थी पिछले सीजन में २४९ लाख टन गेहूं की ही खरीद हो पाई है चालू सीजन में ४४० लाख टन खरीद का लक्ष्य तय किया था सरकार ने जून में ही पूरी हो जाएगी गेहूं की खरीद उत्पादक मंडियों में आवक घटने से सरकार ने गेहूं की खरीद एक महीने पहले ही बंद करने की योजना बनाई है। खाद्य मंत्रालय ने इस बावत सभी प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों को पत्र भी लिख दिया है। चालू रबी विपणन सीजन 2013-14 में गेहूं की सरकारी खरीद में 25.5 फीसदी की कमी आकर अभी तक कुल खरीद 249.77 लाख टन की हो पाई है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सामान्यत: रबी विपणन सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद 30 जून तक चलती है, लेकिन उत्पादक मंडियों में दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,350 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर चल रहे हैं, इसलिए सरकारी खरीद केंद्रों पर इस समय गेहूं की आवक घटकर काफी कम रह गई है। 28 मई को एमएसपी पर केवल 18,081 टन गेहूं की खरीद ही हुई है। इसीलिए गेहूं की सरकारी खरीद को महीने भर पहले ही बंद करने का निर्णय लिया है। इस बावत सभी संबंधित राज्यों को पत्र लिखकर सूचित भी कर दिया है। उन्होंने बताया कि चालू रबी विपणन सीजन में सभी प्रमुख उत्पादक राज्यों में गेहूं की सरकारी खरीद में कमी आई है। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार चालू रबी विपणन सीजन में अभी तक एमएसपी पर केवल 249.77 लाख टन गेहूं की खरीद हो पाई है जबकि खरीद का लक्ष्य 440 लाख टन का तय किया था। पिछले रबी विपणन सीजन में एफसीआई ने इस समय तक 335.56 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद की थी जबकि कुल खरीद 381.48 लाख टन की हुई थी। चालू रबी विपणन सीजन में पंजाब से अभी तक एमएसपी पर केवल 108.96 लाख टन गेहूं की खरीद हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 127.51 लाख टन की खरीद हो चुकी थी। इसी तरह से हरियाणा से अभी तक एमएसपी पर केवल 58.72 लाख टन गेहूं ही खरीदा गया है जबकि पिछले साल इस समय तक 86.35 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी थी। उत्तर प्रदेश से 6.69 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 29.06 लाख टन, मध्य प्रदेश से 63.39 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 75.49 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी थी। राजस्थान में पिछले साल के 14.09 लाख टन की तुलना में अभी तक केवल 12.16 लाख टन गेहूं की ही खरीद हो पाई है। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2012-13 में गेहूं का उत्पादन 936.2 लाख टन होने का अनुमान है जो दूसरे आरंभिक अनुमान 923 लाख टन से ज्यादा है।a (Business Bhaskar....R S Rana)

एथेनॉल सुधारेगा चीनी मिलों की सेहत

चीनी मिलों की किस्मत बदल रही है। देश की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने उनको एथेनॉल खरीद के ऑर्डर देना शुरू कर दिया है। यह ऑर्डर औसतन 36-37 रुपये प्रति लीटर एक्स-फैक्टरी कीमत पर खरीद के लिए मिल रहे हैं। यह कीमत पहले से करीब 33 फीसदी ज्यादा है। पिछले साल तक तेल विपणन कंपनियों ने एथेनॉल खरीद की कीमत 27 रुपये प्रति लीटर तय की थी। तेल विपणन कंपनियों इस हरित ईंधन (एथेनॉल) की खरीद पेट्रोल में मिलाने के लिए करती हैं। इस साल जनवरी में तेल विपणन कंपनियों ने 105 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीद के लिए निविदा जारी की थी। इसकी प्रतिक्रिया में चीनी मिलों ने 55 करोड़ लीटर की आपूर्ति की पेशकश की थी। बहुत से घरेलू आपूर्तिकर्ताओं ने कड़ी शर्तों के कारण निविदा में भाग नहीं लिया, जबकि कुछ ने बोलीदाताओं के चयन में संभावित देरी के कारण इससे दूरी बनाई। ऑर्डरों की ऊंची कीमत तय होना चीनी मिलों के लिए काफी अहम है, क्योंकि इससे उनके प्रमुख कार्य-चीनी उत्पादन से होने वाले घाटे की आंशिक भरपाई होगी। एथेनॉल उत्पादन की वर्तमान लागत करीब 34 रुपये प्रति लीटर है। सूत्रों के मुताबिक तेल विपणन कंपनियां पहली 10 खेप में 11 करोड़ लीटर के ऑर्डर उन छोटी और मझोली चीनी मिलों को दे चुकी हैं, जिन्होंने कम कीमत पर एथेनॉल मुहैया कराने की पेशकश की थी। हालांकि दूसरे चरण में तेल विपणन कंपनियों ने 23 से 25 करोड़ लीटर की खरीद के ऑर्डर दिए थे। कंपनियों ने 36-37 रुपये प्रति लीटर की बोली लगाने वाली कंपनियों के साथ कई बार बातचीत की और उनसे कीमत कम करने को कहा। सूत्रों ने कहा कि ज्यादातर बोलीदाताओं ने तेल विपणन कंपनियों के प्रस्ताव पर सहमति जताई है। लिहाजा, करीब 20 करोड़ लीटर के ऑर्डर जून के पहले पखवाड़े में दिए जाने की संभावना है। हालांकि शेष एथेनॉल की मांग आयात के जरिये पूरी होगी। तेल विपणन कंपनियों ने 82.03 करोड़ लीटर के लिए वैश्विक निविदाएं जारी की थी। एक अप्रैल को खुली इनकी वैश्विक बोलियों ने सरकार को अचंभे में डाल दिया। मुंबई की श्री रेणुका शुगर्स (एसआरएस) ने 71-76 रुपये के बीच एथेनॉल आपूर्ति की पेशकश की थी, जो देश के ज्यादातर पंपों पर पेट्रोल की वर्तमान कीमत से ज्यादा है। श्री रेणुका शुगर्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक नरेंद्र मुरकुंबी ने कहा, 'चूंकि फिलहाल निविदा प्रक्रिया जारी है, इसलिए हम अपनी बोली पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।Ó एसआरएस ने 15 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति ब्राजील से करने की पेशकश की थी। ब्राजील में कंपनी का विश्व में सबसे बड़े एथेनॉल उत्पादन संयंत्र है। इससे भी ज्यादा चौंकाते हुए चेन्नई की इंडियन मोलासेज कंपनी (आईएमसी) ने 36 करोड़ लीटर की आपूर्ति 84-92 रुपये पर करने की पेशकश की। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिशन (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'हम तेल विपणन कंपनियों को औसतन 36-37 रुपये प्रति लीटर की एक्स-फैक्टरी कीमत पर आपूर्ति करते हैं। इससे उन्हें 6-7 रुपये प्रति लीटर का फायदा होता है, जो विदेश से ऊंची कीमत पर खरीद करने के कारण थोड़ा कम हो जाता है। लेकिन ऊंची कीमत पर खरीद टालने के लिए हमने सरकार से एक पूरक निविदा जारी करने का आग्रह किया है, जिससे हम एथेनॉल की अतिरिक्त मात्रा की आपूर्ति कर सकेंगे। (BS Hindi)

निर्यात से प्याज में तेजी का आगाज

निर्यात की बढ़ती मांग के कारण प्याज के भावों में फिर से तीखापन आ गया है। निर्यात मांग इतनी मजबूत है कि अप्रैल में मार्च के मुकाबले 40 फीसदी से भी ज्यादा प्याज निर्यात हो चुका है। पिछले माह तक नई आपूर्ति के दबाव में जब भाव गिरे तो निर्यात मांग में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस महीने आपूर्ति का दबाव घटा मगर निर्यात बढऩे का असर पड़ा और प्याज 10 से 25 फीसदी महंगा हो गया। अभी ज्यादा तेजी निर्यात वाले प्याज में आई है लेकिन आगे इस तेजी का असर आम प्याज की कीमतों पर भी तेजी के रुप में दिख सकता है। मुख्य उत्पादक राज्य महाराष्टï्र की लासलगांव मंडी में सप्ताह भर के दौरान प्याज के भाव 500-1000 रुपये से बढ़कर 700-1250 रुपये, पिंपलगांव मंडी में भाव 500-1025 रुपये से चढ़कर 700-1250 रुपये और दिल्ली की आजादपुर मंडी में भाव 50-100 रुपये बढ़कर 650-1150 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। प्याज निर्यातक के के कोचर कहते हैं कि इस साल मार्च तक प्याज के दाम काफी ज्यादा थे। इस कारण इसकी निर्यात मांग बेहद कमजोर थी। लेकिन अप्रैल से कीमतों में भारी गिरावट आने लगी और इस दौरान निर्यात मांग भी तेजी से बढऩे लगी । राष्टï्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठïान (एनएचआरडीएफ) के निदेशक आर पी गुप्ता के अनुसार इस समय प्याज का खूब निर्यात हो रहा है जिससे प्याज महंगा हुआ है। अभी मलेशिया, इंडोनेशिया, दुबई, सिंगापुर समेत खाड़ी देशों से निर्यात मांग अच्छी है। आजादपुर मंडी के प्याज कारोबारी पी एम शर्मा कहते हैं कि दिल्ली में स्थानीय प्याज आ रहा है, जिसका निर्यात नहीं होता है। इसलिए कीमतों में 70-100 रुपये की ही तेजी आई है। अगर निर्यात इसी तरह बढ़ता रहा तो आगे प्याज और महंगा हो सकता है। अप्रैल महीने में करीब 165 लाख टन प्याज निर्यात हुआ है। यह मार्च में निर्यात हुए 1.16 लाख टन से 42 फीसदी ज्यादा है। मई में भी निर्यात बढऩे की संभावना है। मार्च में औसतन 19,250 रुपये टन प्रति के भाव पर निर्यात हुआ था। अप्रैल में यह आंकड़ा 13,375 रुपये प्रति टन रहा। वित्त वर्ष 2012-13 में 1,787 करोड़ रुपये मूल्य के 16.93 लाख टन प्याज का निर्यात हुआ है। (BS Hindi)

Coffee output in 2013-14 likely to be same as last year's

New Delhi, May 30. Coffee production in India is expected to be stagnant at last year's level of 5.2 million bags in the 2013-14 marketing year, a USDA report said today. One bag contains 60 kgs. A slight increase in arabica output is likely to be offset by a small dip in robusta production as rising inputs costs are expected to hit yields, the report noted. India's coffee production in marketing year 2013-14 (starting October) is forecast at 5.2 million bags, similar to the 2012-13 level, the US Department of Agriculture (USDA) said in its report. According to the USDA, Indian producers are gradually shifting to robusta production because it requires less labour and offers higher disease resistance. Robusta production accounted for nearly 70 per cent of the total coffee production in 2012-13. As per Coffee Board's post monsoon estimate, coffee production is pegged at 5.25 million bags for 2012-13 marketing year ending September 2013. Unseasonal sporadic rainfall during the beginning of the harvest in January-February months followed by prolonged dry weather from mid-March somewhat affected the quality of beans in Arabica growing regions, but trade sources indicate that this is not a major issue for marketing the crop, the report said. India accounts for about four per cent of world coffee production and exports. Production is mostly confined to the southern states of Karnataka, Kerala and Tamil Nadu. The report highlighted that Indian growers are gradually shifting towards replanting to replace their ageing plantations at an annual rate of 2-3 per cent per year which leaves a difference of approximately 40,000 ha between harvested and planted area. New-crop arrivals normally begin at the end of December, peaking from March to May. However, arrivals during April were slow according to trade sources, it said. Coffee cultivation is being promoted in tribal regions of Andhra Pradesh, Orissa, and the North-Eastern states with the objective of providing economic opportunity to low income residents of rural areas and afforestation, it added.

Gold spurts on fresh buying driven by firming global trend

New Delhi, May 30. Gold prices surged by Rs 430 to Rs 27,480 per ten gram in the national capital today on stockists buying driven by a firming global trend. After gaining Rs 100 in the previous session, gold shot up as its prices regained USD 1,400 level after one-week, boosting investor demand for safe haven. Gold price in Singapore, which normally sets price trend on the domestic front, rose 1.3 per cent to USD 1,411.27 an ounce, the most expensive since May 22. Silver gained 0.5 per cent to USD 22.59 an ounce. A firming trend was also extended in silver on increased buying by industrial units and coin makers, lifting the prices by 660 to Rs 44,600 per kg, after loosing Rs 60 yesterday. In the national capital, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity rose by Rs 430 each to Rs 27,480 and Rs 27,280 per ten gram, respectively. Sovereign also rose by Rs 100 to Rs 23,800 per piece of eight gram. Silver ready shot up by Rs 660 to Rs 44,600 per kg and weekly-based delivery by Rs 610 to Rs 43,820 per kg on increased buying by speculators. However, silver coins held unchanged at Rs 76,000 for buying and Rs 77,000 for selling of 100 pieces

29 May 2013

केरल में मानसून 6 जून तक पहुंचने की संभावना

अगले दो दिनों में मानसून पूरे अरब सागर व बंगाल की खाड़ी में सक्रिय हो जाएगा अगले दो दिनों में मानसून अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में पूरी तरह सक्रिय हो सकता है। लेकिन केरल तट पर मानसून पहुंचने में कुछ ज्यादा समय लग सकता है। केरल में मानसून 3 से 6 जून के बीच पहुंचने का अनुमान है। प्रादेशिक मौसम विज्ञान केन्द्र मुंबई के प्रमुख अजय कुमार ने बिजनेस भास्कर को बताया कि अगले 2 दिन में मानसून अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में पूरी तरह सक्रिय होने उम्मीद है। जबकि केरल में इस साल मानसून 3 से 6 जून तक पहुंचने का अनुमान है। मानसून केरल पहुंचने में देरी होने की वजह चक्रवाती गतिविधियां व हवाओं का दबाव कमजोर होना है। देश के अन्य भागों जैसे मुंबई में भी इसके 10 जून तक पहुंचने का अनुमान है। जबकि पूरे देश में मानसून डेढ़ महीन में सक्रिय होने का अनुमान लगाया जा रहा है। मानसून आखिरी में राजस्थान पहुंचेगा। मौसम विभाग का अनुमान है कि मानसून इस वर्ष सामान्य रहेगा। जबकि पिछले वर्ष औसतन 10 फीसदी बारिश कम हुई थी। केरल में पहुंचने के साथ अच्छी बारिश हो सकती है। पिछले महीने ही मौसम विभाग ने बताया था कि 98 फीसदी औसत बारिश होने की संभावना है। मानसून चावल, सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी खरीफ फसलों के लिए महत्वपूर्ण है। देश में 60 फीसदी कृषि सिंचाई के लिए वर्षा के जल पर निर्भर है। गौरतलब है कि मौसम विभाग की अल्पकालिक भविष्यवाणियों में काफी अंतर देखने को मिला है। उदाहरण के तौर पर पिछले वर्ष सामान्य मानसून के साथ 99 फीसदी बारिश होने की भविष्यवाणी की गई थी। जबकि औसतन बारिश 90 फीसदी रही। वहीं गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक सूखे की चपेट में थे। वर्ष 2009 में मौसम विभाग द्वारा सामान्य बारिश की भविष्यवाणी की गई थी, जबकि उस वर्ष 22 फीसदी कम बारिश हुई थी। (Business Bhaskar)

राज्यों ने पीडीएस चीनी के लिए सब्सिडी बढ़ाने की उठाई मांग

आर एस राणा नई दिल्ली | May 29, 2013, 01:38AM IST सहमति - 19 राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों ने सीधे खरीद प्रक्रिया पर रजामंदी जताई प्रक्रिया में अग्रणी पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और सिक्किम ने चीनी खरीद के लिए निविदा भी आमंत्रित कीं। इन्हें भी आपत्ति नहीं पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान हैं, जिन्होंने खरीद प्रक्रिया पर सहमति जताई। अलग समस्या ज्यादातर पूर्वोत्तर राज्यों समेत कुछ केंद्र शासित प्रदेशों ने नई प्रक्रिया लागू करने में असमर्थता जताई है और अगले दो साल तक पीडीएस की चीनी पूर्ववत देने की मांग की है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में वितरण के लिए सीधे चीनी खरीदने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर 19 राज्यों ने सहमति तो दे दी है, लेकिन केंद्र द्वारा दी गई सब्सिडी को वे नाकाफी मान रहे हैं। तमाम राज्यों ने सब्सिडी बढ़ाने की मांग की है। चीनी की सीधे खरीद के लिए रजामंद हुए 19 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में से आठ राज्यों ने चीनी की खरीद के लिए टेंडर भी जारी कर दिए है। अन्य राज्यों ने भी खरीद करने की प्रक्रिया आरंभ कर दी है। लेकिन ज्यादातर पूर्वोत्तर राज्यों समेत कुछ केंद्र शासित प्रदेशों ने केंद्र सरकार से अगले दो साल तक पीडीएस में चीनी आवंटन की यथास्थिति बनाए रखने की मांग की है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि पीडीएस में आवंटन करने के लिए 19 राज्यों समेत केंद्र शासित सरकारें खुले बाजार से निविदा के माध्यम से चीनी की खरीद करने पर सहमत हो गई हैं, इनमें से आठ राज्यों पश्चिमी बंगाल, मध्य प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और सिक्किम ने चीनी की खरीद के लिए निविदा भी आमंत्रित कर ली है। सहमति देने वाले में पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान शामिल हैं। हालांकि सहमति देने वाले कई राज्यों ने केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली 18.50 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी को बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने बताया कि पंजाब सरकार ने जून-2013 से पीडीएस की नई व्यवस्था को लागू करने की सहमति दे दी है तथा राज्य सरकार जल्द ही चीनी की खरीद के लिए निविदा आमंत्रित करेगी जबकि हरियाणा सरकार ने केंद्र से सब्सिडी को 18.50 रुपये से बढ़ाकर 22.60 रुपये प्रति किलो करने की मांग की है। हरियाणा सरकार भी जून में पीडीएस में आवंटन के लिए जल्द ही चीनी खरीद के लिए टेंडर जारी करेगी। उत्तर प्रदेश सरकार पीडीएस में आवंटन करने के लिए चीनी की खरीद करने पर तो सहमत हो गई है लेकिन राज्य सरकार का मानना है इससे राज्य पर करीब 110 करोड़ रुपये का अतिरिक्ति भार पड़ेगा। उन्होंने बताया कि दिल्ली सरकार ने चीनी की खरीद के लिए निविदा तो आमंत्रित कर ली है लेकिन केंद्र से 18.50 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी को बढ़ाने की मांग की है। हिमाचल प्रदेश का कहना है कि राज्य में चीनी मिलें नहीं हैं तथा भौगोलिक परिस्थितियां अन्य राज्यों से अलग है इसलिए केंद्र सरकार पीडीएस में आवंटन हेतु चीनी की खरीद के लिए दो साल की सब्सिडी एडवांस जारी करे। छत्तीसगढ़, राजस्थान और उड़ीसा ने भी सब्सिडी बढ़ाने की मांग की है। गुजरात और महाराष्ट्र ने नई व्यवस्था को लागू करने के लिए अगस्त तक का समय देने की मांग की है। (Business Bhaskar....R S Rana)

रुपया गिरकर नौ महीने के न्यूनतम स्तर पर पहुंचा

मुंबई : आयातकों और बैंकों की डॉलर की मांग बढ़ने के कारण अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर की तुलना में 22 पैसे लुढ़ककर नौ महीने के नए न्यूनतम स्तर 56.18 पर पहुंच गया। डीलरों ने कहा कि विदेश में डॉलर के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा में तेजी और घरेलू इक्विटी बाजार की कमजोर शुरुआत के कारण रुपए पर दबाव बना। रुपया कल के कारोबार में 39 पैसे की गिरावट के साथ करीब नौ महीने के न्यूनतम स्तर 55.96 पर बंद हुआ था।

दूसरी तिमाही में होगा 400 टन सोने का आयात

नई दिल्ली।चालू खाता घाटा और व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के लिए सोने के आयात को हत्तोत्साहित करने के सरकार के उपायो के बावजूद इसकी कीमतों मे आई गिरावट और वैवाहिक मांग मे तेजी से चालू वर्ष की दूसरी तिमाही मे देश में 350 से 400 टन सोना आयात होने का अनुमान है जो पिछले वर्ष की इसी अवधि मे हुए आयात की तुलना मे 200 प्रतिशत अधिक है और यह वर्ष 2012 मे हुए कुल आयात का करीब आधा हिस्सा होगा। विश्व स्वर्ण परिषद ने अपनी एक रिपोर्ट मे यह अनुमान लगाते हुये कहा है कि चालू वर्ष की पहली तिमाही मे भारत मे 256 टन सोना आयात हुआ है। रिपोर्ट मे कहा गया है कि देश मे सोने की छडो और सिक्कों मे निवेश मे 52 प्रतिशत की बढोतरी होगी और यह 97 टन पर पहुंच जाएगा। दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्था मे सुधार के संकेतो और केन्द्रीय बैंकों के कठोर मौद्रिक नीति अपनाने की संभावना से इस वर्ष अप्रैल के मध्य मे सोना दो वर्ष के न्यूतनम स्तर 1321.35 डालर प्रति औस तक फिंसल गया था। परिषद ने बुधवार को जारी अपनी रिपोर्ट मे कहा है कि एशियाई देशों मे सोने की मांग मे जबरदस्त तेजी रही है और अप्रैल जून तिमाही मे इसकी मांग रिकार्ड स्तर पर होगी। परिषद ने कहा कि वर्ष 2013 मे भारत में कुल मिलाकर 865 टन से लेकर 965 टन के बीच सोने के आयात का अनुमान है। संगठन ने कहा है कि चीन मे इस वर्ष अप्रैल मे सोने की मांग 160 से 170 टन के आसपास रही है और चालू वर्ष मे कुल मांग 880 टन के करीब रहने का अनुमान है जबकि पहले इसके 780 से 880 टन के बीच रहने की संभावना थी।

सोने का आयात बढ़ेगा: वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल

सोने के इंपोर्ट को कम करने के लिए सरकार और आरबीआई की तमाम कोशिशों के बावजूद वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का दावा है कि इस साल देश में करीब 965 टन सोने का आयात हो सकता है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक एशिया से आने वाली सोने की मांग अप्रैल-जून 2013 के बीच रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती है। वहीं 2013 की दूसरी तिमाही में सोने का आयात बढ़कर 350-400 टन के बीच रह सकता है। आयात का ये स्तर पिछले साल की दूसरी तिमाही के मुकाबले 3 गुना और पिछले साल सोने के कुल आयात का करीब आधा है।

Gold prices gains on firming global trend

New Delhi, May 29 Gold prices gained Rs 100 to Rs 27,050 per ten gram here today on the back of firming global trend. On the other hand, silver lost Rs 60 to Rs 43,940 per kg on lack of follow up support. Traders said gold prices rose on fresh buying by retailers and stockists, driven by a firming global trend, where the metal rose as lower prices lured some investors. Gold in Singapore, which normally set price trend in domestic markets here, climbed 0.7 per cent to USD 1,390.30 an ounce after losing 1.5 per cent yesterday. Traders said silver remained weak on lack of necessary follow up support from industrial units and coin makers as the metal in overseas markets recorded its fourth consecutive monthly loss, the worst run since June. In the national capital, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity rose by Rs 10 each to Rs 27,050 and Rs 26,850 per ten gram, respectively. Sovereign held unchanged at Rs 23,700 per piece of eight gram. However, silver ready lost Rs 50 to Rs 43,940 per kg and weekly-based delivery by Rs 150 to Rs 43,210 per kg on reduced offtake by speculators. Silver coins continued to be asked at last level of Rs 76,000 for buying and Rs 77,000 for selling of 100 pieces.

28 May 2013

किसानों की किस्मत पीली करेगा लाल ग्वार!

काफी विवाद और लंबे इंतजार के बाद ग्वार वायदा कारोबार दोबारा शुरू हुआ तो किसानों के मन में फिर मुनाफे के लड्डू फूटने लगे हैं। राजस्थान और पंजाब की मंडियों में अभी ग्वार की किल्लत है जबकि गुजरात में नई फसल आने से किसानों के पास भरपूर माल है। ऐसे में गुजराती किसान और कारोबारी ग्वार में मुनाफे की चांदी काटने की कोशिश में हैं। लेकिन गुजरात में पैदा हुए ग्वार का रंग लाल है जबकि कमोडिटी एक्सचेंजों ने अपने सर्कुलर में सिर्फ सफेद ग्वार का कारोबार करने की बात कही है। यानी लाल ग्वार का वायदा नहीं चलेगा। गुजरात के किसानों ने देश में पहली बार गर्मियों का ग्वार उगाया है। वायदा शुरू होने से इन किसानों को अपनी फसल के अच्छे दाम मिलने की उम्मीद है लेकिन रंग लाल होने से यह बाजार में सस्ता बिक रहा है। कमोडिटी एक्सचेंजों के अधिकारियों का कहना है कि किसी भी जिंस की गुणवत्ता का पैमाना पहले ही तय कर दिया जाता है। ऐसे में वही ग्वार वायदा कारोबार में शामिल हो सकता है जिसका सर्कुलर में उल्लेख है। एक्सचेंजों ने ग्वार की गुणवत्ता विशेषता में इसका रंग सफेद लिखा है। तो क्या गुजरात के लाल ग्वार को वायदा कारोबार में शामिल नहीं किया जाएगा? इस सवाल पर एक्सचेंज चुप हैं। गुजरात में गर्मियों के ग्वार की पैदावार करीब 20 लाख बोरी हुई है। रोजाना करीब 25 हजार बोरी लाल ग्वार आ रहा है। यही माल कमोडिटी एक्सचेंजों के वेयरहाउसों में भी पहुंच रहा है। एनसीडीईएक्स के एक अधिकारी ने कहा कि लाल और सफेद ग्वार में खास फर्क नहीं है। गुजरात की मिट्टी लाल रंग की है, इसलिए वहां के ग्वार का रंग लाल होता है। हमारे यहां इसके कारोबार पर रोक नहीं है। एमसीएक्स के अधिकारियों का कहना है कि हमारे यहां सिर्फ सफेद ग्वार का ही कारोबार किया जा सकता है, क्योंकि लाल ग्वार गुणवत्ता पर खरा नहीं उतर रहा है। बीकानेर के वायदा कारोबारी और बीकानेर व्यापार उद्योग मंडल के प्रवक्ता पुखराज चोपड़ा कहते हैं कि ग्वार वायदा एक बार फिर सटोरियों की गिरफ्त में जाता दिख रहा है। सटोरियों की सक्रियता इससे पता चलती है कि हाजिर की अपेक्षा वायदा में कीमतें कम हैं। इस समय गंगानगर में ग्वार 9,100 रुपये और बीकानेर में 9,200 रुपये चल रहा है। इसमें 1.67 फीसदी मंडी कर और 2 फीसदी आढ़त देनी होती है। मजदूरी और पैकिंग का खर्च अलग है। इस तरह एक क्ंिवटल ग्वार में करीबन 500 रुपये का अतिरिक्त खर्च आता है जिससे दाम 9,700 रुपये प्रति क्ंिवटल तक पहुंच जाते हैं। वायदा में कीमतें 8,800 रुपये प्रति क्ंिवटल के आसपास हैं। वह कहते हैं कि फिलहाल कीमतें कम नहीं होने वाली हैं क्योंकि मंडियों में माल नहीं आ रहा है। ऐसे में एक्सचेंज जून अनुबंध में डिलिवरी कैसे देंगे जबकि उनके गोदामों में माल भी नहीं है और माल दिया तो वह लाल ग्वार होगा जो मानकों में खरा नहीं है। कमोडिटी एक्सचेजों के गोदामों में माल नहीं है। हाजिर बाजार में कीमतें ज्यादा हैं। नई फसल की बुआई अभी शुरू नहीं हुई है यानी नई फसल आने में कम से कम 100 दिन लगेंगे। इससे आने वाले समय में कीमतें बढ़ेंगी और तब एक्सचेंज ग्राहकों को लाल ग्वार की डिलिवरी देंगे तो विवाद होगा। दरअसल रंग के साथ दोनों की गुणवत्ता में भी फर्क है। सफेद ग्वार में 33 फीसदी गम निकलता है जबकि लाल ग्वार में 26 फीसदी। यही वजह है कि हाजिर बाजार में लाल ग्वार की कीमत सफेद ग्वार से करीब 300 रुपये प्रति क्ंिवटल कम रहती है। एफएमसी के अधिकारियों का कहना है कि ग्वार वायदा पर इस बार नियम सख्त हैं। इससे सटोरियों को मौका नहीं मिलेगा। सटोरियों की गिरफ्त में आने के कारण 21 मार्च 2012 को ग्वार गम 1,00195 रुपये और ग्वार 30,533 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था। इसके बाद 27 मार्च 2012 को इन जिंसों के वायदा कारोबार पर पाबंदी लगी थी। लंबे इंतजार के बाद 14 मई को ग्वार का वायदा दोबारा शुरू किया गया है। (BS Hindi)

मिठास का चीनी मिलों का फॉर्मूला

आगामी ेराई सीजन में चीनी मिलों के लिए शीरा और खोई जैसे उपोत्पाद तारणहार साबित होंगे। ये मिलों के मुख्य कार्य-चीनी उत्पादन में होने वाले नुकसान की आंशिक भरपाई करेंगे। सहायक गतिविधियों जैसे विद्युत उत्पादन और शराब कारखानों (डिस्टिलरी) से आमदनी बढ़ाने के लिए चीनी मिलों ने 2014 में करीब 4,000 करोड़ रुपये की निवेश योजनाएं बनाई हैं। इस समय मिलें गन्ने की कीमत 275 से 290 रुपये प्रति क्ंिवटल चुका रही हैं। इसके आधार पर चीनी उत्पादन की औसत लागत 3,300 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है, जबकि बेंचर्माक कोल्हापुर के हाजिर बाजार में इसकी कीमत 3,000 रुपये क्विंटल है। इसका मतलब कि उद्योग को प्रत्येक एक क्विंटल चीनी के उत्पादन पर औसतन 300 रुपये का नुकसान हो रहा है। लेकिन उपोत्पाद को एथेनॉल और बिजली समेत ऊंची आमदनी देने वाले उत्पादों में बदला जा रहा है। आमतौर पर चीनी कारखाने में उपोत्पाद का कुछ भी मौल नहीं होता है। इस उद्योग की शीर्ष संस्था इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'आने वाले समय में उपोत्पाद चीनी मिलों की सेहत सुधारेंगे, क्योंकि एथेनॉल और बिजली सहित इनसे बनने वाले अंतिम उत्पादों से निकी आमदनी बढ़ रही है।Ó इक्रा की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि खोई और शीरे जैसे उपोत्पादों की कीमतें आगे भी ऊंची रहेंगी, क्योंकि इनका इस्तेमाल करने वाले क्षेत्रों जैसे बिजली, कागज और शराब में इनकी अच्छी मांग है। चालू वित्त वर्ष में फ्यूल एथेनॉल की बेहतर कीमत मिलने से मिलों की उपोत्पादों से होने वाली आमदनी में सुधार होगा। श्री रेणुका शुगर्स के प्रबंध निदेशक नरेंद्र मुरकुंबी ने कहा, 'चीनी बिक्री पर आंशिक रूप से रोक हटने और एथेनॉल की कीमतों में बढ़ोतरी और तेल विपणन कंपनियों के पेट्रोल के साथ मिश्रण के लिए एथेनॉल की समस्त मात्रा की खरीद करने की प्रतिबद्धता जताने से रुझान पूरी तरह बदल गया है। एथेनॉल और बिजली उत्पादन सहित उपोत्पादों में भारी निवेश होगा।Ó चीनी मिलों की कुल आमदनी और लाभ का एक बड़ा हिस्सा उपोत्पाद से आता है। हालांकि उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में सरकारी कंपनियों को बिक्री का भुगतान मिलने से संबधित चिंताएं हैं। हालांकि पिछले कुछ समय से इन इकाइयों से भुगतान मिलने में सुधार आया है। खोई के वर्तमान उत्पादन से चीनी मिलें हर साल 7,500 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर सकती हैं, जबकि अभी वास्तविक उत्पादन 3200 मेगावॉट है। शेष खोई का इस्तेमाल कागज और प्रेस बोर्ड (फर्नीचर का कच्चा माल) के विनिर्माण में किया जाता है। वर्मा ने कहा, 'करीब आधी चीनी मिलों की बिजली उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है।Ó बहुत सी छोटी इकाइयां मूल्य संवर्धन पर निवेश की जरूरत कम करने के लिए खोई बड़ी कंपनियों को बेच देती हैं। इन बड़ी कंपनियों में चीनी क्षेत्र में बजाज हिंदुस्तान और बहुत सी कागज बनाने वाली कंपनियां शामिल हैं। इसके नतीजतन न केवल उपोत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है, बल्कि मिलों की आमदनी में भी अनिश्चितता रहती है। वर्मा ने कहा, 'अन्य को उपोत्पाद बेचने की तुलना में अपनी मूल्य संवर्धन इकाइयों वाली मिलों को ज्यादा आमदनी प्राप्त होगी (BS Hindi)

Gold drops with silver as dollar strengthens before US data

London, May 28. Gold today declined as a stronger dollar curbed demand for an alternative investment and amid speculation the US economy is strengthening. Silver dropped. Gold fell by one per cent to USD 1,380.60 an ounce and silver slid 1.6 per cent to USD 22.30 an ounce. The dollar gained 0.4 per cent against six major currencies before US data today that economists say will show consumer confidence improved and home prices gained. Central banks including Russia and Kazakhstan added gold to reserves in April, International Monetary Fund data showed. Bullion holdings in exchange-traded products are set for a fifth monthly drop. Gold has slumped 18 per cent this year, while the dollar rallied 5.2 per cent against a six-currency basket on speculation the Federal Reserve may scale back quantitative-easing measures that helped bullion cap a 12-year bull run in 2012. Raising interest rates or curbing bond buying too soon would endanger the recovery, Fed Chairman Ben S Bernanke said. He also said the pace of bond purchases could be reduced in the next few meetings if the jobless rate keeps dropping.

Gold, silver tumble on stockists selling, weak global cues

New Delhi, May 28. Both the precious metals, gold and silver fell in the national capital today on stockists selling at existing higher levels, driven by a weak global trend. While gold tumbled by Rs 465 to Rs 26,950 per ten grams, silver shed by Rs 880 to Rs 44,000 per kg on reduced offtake. Sentiment turned bearish after gold declined in global markets, boosting the case for reduced stimulus. Gold in Singapore, which normally set price trend on the domestic front, fell by 0.6 per cent to USD 1,386.22 an ounce and silver by 0.7 per cent to USD 22.48 an ounce in Singapore. In addition, sluggish demand at prevailing higher levels and rising equities lured investors to park their funds in stock markets, which had negative impact on the precious metals. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity tumbled by Rs 465 each to Rs 26,950 and Rs 26,750 per ten grams, respectively. It had gained Rs 465 in the previous two session. Sovereign followed suit and declined by Rs 100 to Rs 23,700 per piece of eight gram. In a similar fashion, silver ready dropped by Rs 880 to Rs 44,000 per kg and weekly-based delivery by Rs 235 to Rs 43,360 per kg. The white metal had gained Rs 880 in last three sessions. However, silver coins held steady at Rs 76,000 for buying and Rs 77,000 for selling of 100 pieces in scattered deals.

25 May 2013

कॉफी उत्पादन हो सकता है कम

देश में कॉफी उत्पादन में पिछले 9 ïवर्षों के दौरान पहली बार भारी गिरावट आने की संभावना है। लंबे समय तक सूखे और असमान बारिश से अरेबिका और रोबस्टा किस्मों में फूल आने और बीज बनने पर असर पड़ा है। भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक है। अक्टूबर 2013 से शुरू होने वाले आगामी फसल वर्ष में काफी का उत्पादन 3 लाख टन के आंकड़े से नीचे आ सकता है। यद्यपि भारतीय कॉफी बोर्ड ने अभी नई फसल के आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए हैं, लेकिन वर्तमान हालात को देखते हुए निजी उत्पादकों ने उत्पादन न्यूनतम 2,65,000 टन और अधिकतम 2,75,000 टन के बीच रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले साल से 5-9 फीसदी कम है। वर्ष 2007-08 में देश में 2,62,000 टन कॉफी का उत्पादन हुआ था, जो पिछले दशक का सबसे निचला स्तर है। उत्पादकों की संस्था कर्नाटक प्लांटर्स एसोसिएशन (केपीए) ने फसल वर्ष 2012-13 के दौरान कॉफी का उत्पादन 2,90,000 टन रहने और कॉफी बोर्ड ने 3,14,000 टन रहने का अनुमान जताया है। हालांकि बोर्ड ने अभी फसल के अंतिम आंकड़े जारी नहीं किए हैं। पिछले तीन वर्षों से कॉफी उत्पादन 3,00,000 टन के आसपास बना हुआ है और 2007-08 के बाद पहली बार उत्पादन तेजी से गिरने की संभावना है। केपीए के चेयरमैन निशांत आर गुर्जर ने कहा, 'सूखे का भारी असर पड़ा है। चिकमगलूर, कोडागु और हासन जिलों के ज्यादातर उत्पादक क्षेत्रों में फूल खिलने के समय होने वाली बारिश असमान थी। चिकमगलूर जिले में तापमान 38-40 फीसदी दर्ज किया गया, जो मार्च और अप्रैल महीने में असामान्य है और ऐसा पिछले 20 सालों में पहली बार देखा गया है।' केपीए का अनुमान है कि 2013-14 में अरेबिका का उत्पादन 75,000 टन और रोबस्टा का उत्पादन 1,90,000 से 2,00,000 टन रहेगा। वर्ष 2012-13 में उत्पादन अरेबिका का 80,000 टन और रोबस्टा का 2,15,000 टन रहा था। रोबस्टा किस्म सूखे के प्रति ज्यादा संवेदनशील है और सूखे से इसके पौधों में व्हाइट स्टेम बोरर कीट का प्रकोप बढ़ सकता है। चिकमगलूर जिले का अरेबिका के कुल उत्पादन में योगदान करीब 35 फीसदी और रोबस्टा में 25-30 फीसदी होता है। उन्होंने कहा कि सभी उत्पादक क्षेत्रों में अप्रैल में बारिश नहीं हुई जिससे फूल खिलने और बीज बनने में देरी हुई है। गुर्जर ने कहा, 'आमतौर पर 15 मार्च से अप्रैल के अंत तक राज्य के उत्पादक क्षेत्रों में 8 से 10 इंच बारिश होती है। हालांकि इस साल यह लगभग के बराबर थी। इस तरह की स्थिति इससे पहले 1983 में रही थी।Ó भारतीय कॉफी निर्यातक संघ के अध्यक्ष रमेश राजा ने कहा कि इस साल कॉफी के वास्तविक उत्पादन के बारे में पुख्ता अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी। मॉनसून के बाद जारी अनुमान से ही सही तस्वीर सामने आएगी। उन्होंने कहा, 'इस साल रोबस्टा का उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम हो सकता है और अरेबिका का उत्पादन पिछले साल के लगभग 85,000 टन के आसपास ही रहेगा। हमारा मानना है कि उत्पादन 10 फीसदी कम हो सकता है और कुल उत्पादन 3 साल बाद एक बार फिर 3,00,000 टन के स्तर से नीचे गिर सकता है।' (BS Hindi)

महाबली बाजार से खली निर्यातकों की उम्मीदें रुत

चीनी प्रधानमंत्री ली खछ्यांग का हाल का भारत दौरा देश के खली निर्यातकों के लिए भारी राहत लेकर आया है। हालांकि भारत से खली के कुल निर्यात में गिरावट के संकेत दिखे हैं, लेकिन एक साल के प्रतिबंध के बाद चीनी बाजार भारतीय खली के लिए खुलने की उम्मीद है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अध्यक्ष विजय डाटा ने कहा, 'इस सप्ताह के प्रारंभ में चीनी प्रधानमंत्री ली खछ्यांग के भारत दौरे के समय चीन ने भारतीय खली के लिए चीनी बाजार को खोलने पर सिद्धांत रुप से सहमति जताई है। यह अच्छी खबर है।' उल्लेखनीय है कि चीन ने जनवरी 2012 में भारत से खली के आयात पर रोक लगा दी थी। इसके लिए उसने खली में नुकसानदेह डाई और मैलकाइट ग्रीन के अंश होने का हवाला दिया था। एसईए के कार्यकारी निदेशक बी वी मेहता ने कहा, 'उस समय चीन और भारत की कारोबारी संस्थाओं के बीच बातचीत हुई थी और एक प्रतिनिधिमंडल ने भारतीय खली विनिर्माण इकाइयों का दौरा करने की इच्छा जताई थी। मगर स्थिति में सकारात्मक बदलाव आ रहा है।' प्रतिबंध से पहले चीन ने भारत से 600-700 करोड़ रुपये की खली आयात की थी। भारत ने 2011-12 में चीन को करीब 5,36,000 टन खली का निर्यात किया था। हालांकि 2011-12 में यह गिरकर 3,54,000 टन रहा, क्योंकि जनवरी, 2012 के बाद आयात पर रोक लगा दी गई थी। भारत से खली निर्यात में गिरावट के रुझान के बीच चीनी अधिकारियों का सकारात्मक कदम खली निर्यातकों के लिए प्रोत्साहन के रूप में आया है। भारत का खली निर्यात पिछले साल 48 लाख टन था, जो 2012-13 में 14.3 फीसदी गिरा है। वर्ष 2011-12 में भारत ने 56 लाख टन खली का निर्यात किया था। यह निर्यात मुख्य रूप से चीन और परंपरागत खरीदार जापान को किया गया था। मेहता ने कहा, 'चीन के प्रतिबंध लगाने के समय ईरान की अहम भूमिका रही। निर्यातकों को चीन का एक विकल्प मिल सका। लेकिन ईरान से साथ भुगतान से संबंधित मुद्दा उलझा हुआ है, इसलिए बहुत से निर्यातक ईरान को निर्यात नहीं करना चाहते हैं। इसलिए चीनी बाजार के खुलने का मतलब है कि उनके पास बहुत से विकल्प होंगे।' उन्होंने कहा, 'चीनी अधिकारियों ने अपना रुख नरम किया है। कुछ औपचारिकताओं पर काम किया जा रहा है और अगले कुछ महीनों में चीन को निर्यात शुरू हो जाएगा।' अप्रैल 2013 में ईरान को खली का निर्यात करीब 31 फीसदी गिरकर 67,500 टन रहा, जो पिछले साल के इसी महीने में 97,900 टन रहा था। एसईए ने अंतरराष्ट्रीय संगठन से मिलाया हाथ सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) ने राइस ब्रान ऑयल (आरबीओ) को प्रोत्साहित करने की खातिर अंतरराष्ट्रीय संगठन स्थापित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय वनस्पति तेल समुदाय के साथ हाथ मिलाया है। इसका मकसद आरबीओ के इस्तेमाल से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी फायदों के बारे में दुनियाभर के वनस्पति तेल उपभोक्ताओं में जागरूकता पैदा करना है। एसईए ने आरबीओ पर अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राइस ब्रॉन ऑयल विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के सुझाए स्तर से मेल खाता है। हाल में एसईए के अध्यक्ष विजय डाटा ने एक बयान में कहा था, 'राइस ब्रान ऑयल पर अंतरराष्ट्रीय परिषद बनाने को लेकर आम सहमति है। इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग को प्रोत्साहन, अंतरराष्ट्रीय व्यापार का विस्तार, दुनियाभर में आरबीओ के गुणों और इसकी खपत को प्रोत्साहित करना है। राइस ब्रान ऑयल पर एक अंतरराष्ट्रीय समिति गठित करने की प्रक्रिया शुरू करने को लेकर एक तदर्थ समिति बनाई गई थी।' (BS Hindi)

चीनी मिलों को वायदा की मिठास

चीनी से नियंत्रण हटने के बाद मिलों को अपने बड़े खरीदारों जैसे आइसक्रीम और पेय कंपनियों को चीनी बेचने की आजादी मिलेगी। राज्य सरकारों से भी धीरे-धीरे मांग आने लगी है। मिलें हर साल करीब 2.5 करोड़ टन चीनी का उत्पादन करती हैं। बड़े खरीदारों को वायदा आधार पर चीनी बेचने से चीनी कंपनियों को कारोबार मिलेगा और बाजार में स्थिरता आएगी। सिंभावली शुगर के निदेशक (वित्त) संजय तापडिय़ा ने कहा, 'चीनी सीजन 2012-13 से लेवी और कोटा व्यवस्था खत्म हो रही है। इससे चीनी मिलों के लिए बड़े खरीदारों जैसे आइसक्रीम और पेय कंपनियों के साथ वायदा अनुबंध करना आसान हो जाएगा। आमतौर पर बड़े खरीदार गर्मियों में अपने उत्पाद बेचने के लिए सर्दी शुरू होने के समय खरीदारी चालू करते हैं।' इस तरह के अनुबंध चीनी मिलों के लिए अहम होंगे, क्योंकि इससे उन्हें स्थिरता मिलेगी। खुले बाजार में उतार-चढ़ाव के समय चीनी बिक्री रोकी जा सकेगी। राबो बैंक के प्रमुख (खाद्य एवं कृषि कारोबार शोध एवं सलाह) असिताव सेन ने कहा, 'चीनी की संस्थागत खाद्य एवं पेय मांग भारत में उपलब्ध कुल चीनी की 30 फीसदी है और यह तेजी से बढ़ रही है।' अब तक बड़े खरीदार वायदा अनुबंध नहीं कर सकते थे, क्योंकि रिलीज प्रणाली जटिल थी। मिलें इस बात को लेकर भी सुनिश्चित नहीं होती थीं कि खुले बाजार में बेचने के लिए कितनी चीनी उपलब्ध हो पाएगी। इसके खत्म होने के कारण अब वायदा अनुबंध हो सकेंगे। इस बीच, नियंत्रण हटने के बाद खुले बाजार में चीनी के दाम नीचे आए हैं, क्योंकि कीमतों के फायदेमंद न होने से निर्यात रुका हुआ है। उत्तर प्रदेश की एक चीनी मिल के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि विनियंत्रण के बाद राज्य सरकारों से कहा गया था कि वे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की खातिर अपनी चीनी जरूरत के लिए खुले बाजार से खरीद करें। उदाहरण के लिए देश के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में चीनी की कीमतें उत्पादन लागत से 3 रुपये प्रति किलोग्राम कम हैं। चीनी मिलें उपोत्पादों पर निर्भरता बढ़ा रही हैं। पिछले महीने पेट्रोल में मिश्रण की खातिर एथेनॉल की आपूर्ति के लिए निविदा जारी की गई थीं। इसमें एथेनॉल की कीमत 35 रुपये प्रति लीटर तय की गई है, जो पिछले साल से 30 फीसदी ज्यादा है। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने चीनी पर अपने विश्लेषण में कहा, 'खोई और शीरा जैसे उपोत्पादों की कीमतें लाभकारी बनी हुई हैं, क्योंकि इनकी खपत वाले क्षेत्रों जैसे ऊर्जा, कागज और एथेनॉल में अच्छी मांग निकल रही है। फ्यूल एथेनॉल से अच्छी आमदनी के कारण चालू वित्त वर्ष में उपोत्पादों से मिलने वाला प्रतिफल सुधर सकता है।' (BS Hindi)

जून से राशन की चीनी बंद

चीनी से अपना अंकुश कुछ हद तक हटाने का केंद्र सरकार का फैसला आगे चलकर अच्छा साबित होगा, लेकिन फिलहाल वह सरकार के लिए मुसीबत ही पैदा कर रहा है। एक जून आते ही 15 राज्यों की राशन की दुकानों में शायद चीनी का एक दाना भी नहीं बचेगा क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए चीनी के कोटे की व्यवस्था खत्म हो चुकी है और इन राज्यों ने खुले बाजार से चीनी खरीद के लिए निविदाएं नहीं मंगाई हैं। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जहां पीडीएस के जरिये सबसे ज्यादा चीनी बांटी जाती है। अधिकारियों का कहना है कि अभी तक केवल आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, गोवा, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और दिल्ली ने या तो निविदाएं मंगाना शुरू कर दिया है या शुरू करने वाले हैं। तीन अन्य राज्यों ने यह प्रक्रिया शुरू करने की इच्छा जताई है। लेकिन 15 राज्य अब भी बच गए हैं, जिन्हें निविदाएं मंगाने तक राशन की दुकानों पर चीनी का टोटा झेलना पड़ेगा। बिहार, झारखंड और उत्तराखंड के बारे में कोई जानकारी नहीं है। दरअसल केंद्र सरकार लेवी चीनी की व्यवस्था खत्म करने के अपने प्रस्ताव के तहत 1 जून से राज्यों को पीडीएस चीनी देना बंद कर देगी। लेवी व्यवस्था के तहत निजी चीनी मिलों को अपने उत्पादन का एक निश्चित हिस्सा कम कीमत पर राशन की दुकानों में भेजना पड़ता था। अब राज्य बाजार से चीनी खरीदेंगे और उसे 13.50 रुपये प्रति किलोग्राम पर बेचेंगे। इस नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार 18.50 रुपये प्रति किलोग्राम सब्सिडी देकर करेगी। अधिकारियों ने बताया कि उत्तर प्रदेश ने नई व्यवस्था लागू करने के लिए छह महीने का और समय मांगा है। ओडिशा सरकार भी दो-तीन महीने ज्यादा लगने की बात कह रही है, जबकि महाराष्ट्र के मुताबिक नई व्यवस्था लागू करने के लिए बहुत कम समय दिया गया है। केंद्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार द्वीप समूह के साथ पूर्वोत्तर के 7 राज्य केंद्र से मिलने वाली चीनी पर ही निर्भर हैं। खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने हाल ही में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से अपील की थी कि वे खुले बाजार से चीनी खरीदने के वास्ते निविदाएं जल्द से जल्द मंगाएं। लेवी चीनी की व्यवस्था खत्म करने से पहले केंद्र सरकार 13.50 रुपये प्रति किलो पर सालाना 27 लाख टन चीनी राशन की दुकानों से बेचती थी। (BS Hindi)

उत्तर भारत में कपास का रकबा 15 फीसदी घटने का अनुमान

उत्तर भारत के प्रमुख उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में चालू खरीफ में कपास की बुवाई में 10 से 15 फीसदी की कमी आने की आशंका है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में अभी तक कपास की बुवाई 7.15 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 7.22 लाख हैक्टेयर में हुई थी। उत्तर भारत कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश राठी ने बताया कि पिछले साल कपास की नई फसल की आवक के समय उत्पादक मंडियों में दाम घटकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी नीचे चले गए थे जबकि किसानों को अन्य फसलों धान और ग्वार का अच्छा भाव मिला था। इसलिए किसान कपास के बजाय धान और ग्वार की बुवाई को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि पंजाब और हरियाणा में किसान कपास के बजाय धान की बुवाई कर रहे हैं जबकि राजस्थान में ग्वार की बुवाई करेंगे। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में हरियाणा में अभी तक कपास की बुवाई 1.50 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 2.44 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। हालांकि पंजाब और राजस्थान में अभी तक बुवाई पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। पंजाब में चालू खरीफ में अभी तक 4.80 लाख हैक्टेयर में कपास की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 3.91 लाख हैक्टेयर में हुई थी। इसी तरह से राजस्थान में चालू खरीद में बुवाई बढ़कर 70 हजार हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 65 हजार हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। रबी विपणन सीजन 2012-13 के लिए केंद्र सरकार ने कपास के एमएसपी में 300 रुपये की बढ़ोतरी कर मीडियम स्टेपल और लांग स्टेपल का भाव क्रमश: 3,600 और 3,900 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था जबकि खरीफ विपणन सीजन 2013-14 के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने कपास के एमएसपी में 100 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 3,700 और 4,000 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की सिफारिश की है। अहमदाबाद मंडी में शंकर-6 किस्म की कपास का भाव इस समय 38,500 से 39,000 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) चल रहा है। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2012-13 में देश में 338 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास का उत्पादन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 352 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ था। उद्योग के अनुमान के अनुसार वर्ष 2012-13 में देश में 352 लाख गांठ कपास का उत्पादन होगा (Business Bhaskar.....R S Rana)

गेहूं में खरीदारी से कमाएं मुनाफा

आर एस राणा नई दिल्ली | May 25, 2013, 01:27AM IST फायदे की बात : वायदा बाजार में चालू महीने में गेहूं की कीमतों में करीब 7 फीसदी की तेजी आ चुकी है : गेहूं की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में आई कमी से पैदावार पिछले साल से कम होने की आशंका है : उत्पादक मंडियों में गेहूं का आवक नहीं के बराबर हो रही है : निर्यातकों की मांग को देखते हुए गेहूं की मौजूदा कीमतों में और भी 40 से 50 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने की संभावना है निर्यातकों के साथ ही रोलर फ्लोर मिलर्स की मांग से गेहूं की कीमतों में तेजी बनी हुई है। लारेंस रोड़ पर महीने भर में गेहूं की कीमतों में करीब 100 रुपये की तेजी आकर भाव 1,580-1,600 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। वायदा बाजार में चालू महीने में गेहूं की कीमतों में करीब 7 फीसदी की तेजी आ चुकी है। गेहूं की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में आई कमी से पैदावार पिछले साल से कम होने की आशंका है जबकि उत्पादक मंडियों में दाम बढऩे से सरकारी खरीद भी कम हो गई है। ऐसे में निर्यातकों की मांग से आगामी दिनों में गेहूं की मौजूदा कीमतों में और भी 40 से 50 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने की संभावना है। एनसीडीईएक्स पर जुलाई महीने के वायदा अनुबंध में चालू महीने में गेहूं की कीमतों में 7 फीसदी की तेजी आकर शुक्रवार को भाव 1,630 रुपये प्रति क्विंटल हो गए जबकि पहली मई को इसका भाव 1,523 रुपये प्रति क्विंटल था। ब्रोकिंग फर्म इंडियाबुल्स कमोडिटी लिमिटेड के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट रिसर्च (कमोडिटी) बद्दरूदीन ने बताया कि गेहूं में निर्यातकों के साथ ही मिलर्स की अच्छी मांग बनी हुई है जबकि उत्पादक मंडियों में आवक कम हो गई है। निर्यातकों की मांग को देखते हुए गेहूं की मौजूदा कीमतों में और भी 40 से 50 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने की संभावना है। श्री बालाजी फूड्स प्रोडक्ट के प्रबंधक संदीप अग्रवाल ने बताया कि चालू सीजन में गेहूं की प्रति हैक्टेयर पैदावार में कमी आई है जिसका असर गेहूं की आवक पर भी पड़ा है। यहीं कारण है कि गेहूं की सरकारी खरीद भी पिछले साल की तुलना में कम हुई है। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार चालू रबी विपणन सीजन 2013-14 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अभी तक केवल 248.24 लाख टन गेहूं की खरीद ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 322.54 लाख हैक्टेयर की हो चुकी थी। चालू रबी में सरकार ने 440 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया था लेकिन आवकों में आई गिरावट से खरीद 250 लाख टन तक ही होने की आशंका है। उत्पादक मंडियों में चालू रबी विपणन सीजन में गेहूं की आवक भी घटकर 282.41 लाख टन की ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 345.33 लाख टन की आवक हुई थी। संदीप अग्रवाल ने बताया कि उत्पादक मंडियों में गेहूं का आवक नहीं के बराबर हो रही है। हालांकि उत्पादक मंडियों में गेहूं के दाम बढऩे से निर्यातकों को पड़ते नहीं लग रहे हैं लेकिन पहले के सौदे के भुगतान के कारण ही उनकी खरीद बनी हुई है। इस समय निर्यातकों को गेहूं निर्यात के 304-305 डॉलर प्रति टन का भाव मिल रहा है जबकि उत्तर प्रदेश की मंडियों में 1,450-1,500 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर गेहूं की खरीद करने से इन भाव में पड़ते नहीं लग रहे हैं। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू रबी में गेहूं का उत्पादन 936.2 लाख टन होने का अनुमान है जबकि दूसरे आरंभिक अनुमान में 923 लाख टन उत्पादन का अनुमान था। (Business Bhaskar....R S Rana)

खाद्य तेलों की कीमतों में गिरावट के आसार

राहत - खाद्य तेलों के दाम घटने से उपभोक्ताओं को होगा फायदा क्या हैं वजहें चालू तेल वर्ष में खाद्य तेलों का आयात 12 फीसदी बढ़ा घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की उपलब्धता मांग से ज्यादा आयातित खाद्य तेलों की कीमतें भी पिछले साल से कम अब तक का हाल पिछले दो महीनों में दम में 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट एमपी की मंडियों में सोयाबीन की कीमतों में करीब 300 रुपये की गिरावट गर्मियों के साथ ही ब्याह-शादियों का सीजन समाप्त होने से जून में खाद्य तेलों की कीमतों में और गिरावट आने की संभावना है। चालू तेल वर्ष में खाद्य तेलों के आयात में 12 फीसदी की बढ़ोतरी से घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की उपलब्धता मांग के मुकाबले ज्यादा है जबकि आयातित खाद्य तेलों की कीमतें भी पिछले साल की तुलना में घटी हैं। दिल्ली वेजिटेबल ऑयल एसोसिएशन के सचिव हेमंत गुप्ता ने बताया कि गर्मियों के कारण खाद्य तेलों की मांग पहले की तुलना में कम हुई है। जून में ब्याह-शादियों का सीजन भी समाप्त हो जायेगा। खाद्य तेलों के आयात में हुई बढ़ोतरी से घरेलू बाजार में कुल उपलब्धता मांग के मुकाबले ज्यादा है। ऐसे में घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की मौजूदा कीमतों में और गिरावट आने की संभावना है। घरेलू बाजार में पिछले दो महीनों में खाद्य तेलों की कीमतों में करीब 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आ भी चुकी है। साई सिमरन फूड्स लिमिटेड के डायरेक्टर नरेश गोयनका ने बताया कि चालू खरीफ में मानसून सामान्य रहने की संभावना है इसीलिए सरसों, सोयाबीन और मूंगफली की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। मध्य प्रदेश की मंडियों में पिछले दो महीनों में सोयाबीन की कीमतों में करीब 300 रुपये की गिरावट आकर भाव 3,800 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। कमजोर मांग को देखते हुए मौजूदा कीमतों में और भी 250 से 300 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आ सकती है। साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू तेल वर्ष के पहले छह महीनों (नवंबर-12 से अप्रैल-13) के दौरान खाद्य तेलों के आयात में करीब 12 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल आयात 52.79 लाख टन का हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 47.14 लाख टन का आयात हुआ था। आरबीडी पामोलीन का भाव बंदरगाह पर पहुंच अप्रैल-13 में 834 डॉलर प्रति टन रह गया जबकि अप्रैल-12 में इसका दाम 1,205 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान क्रूड पाम तेल का भाव 1,184 डॉलर से घटकर 812 डॉलर प्रति टन रह गया। क्रूड सोयाबीन तेल का दाम अप्रैल-13 में घटकर 1,081 डॉलर प्रति टन रह गया जबकि पिछले साल की समान अवधि में 1,318 डॉलर प्रति टन था। खाद्य तेलों के थोक कारोबारी आलोक गुप्ता ने बताया कि दादरी में सरसों तेल का भाव घटकर 650 रुपये प्रति दस किलो रह गया जबकि मार्च में इसका दाम 850 रुपये प्रति 10 किलो था। इसी तरह से सोयाबीन रिफाइंड का दाम इस दौरान 800 रुपये से घटकर 700 रुपये, मूंगफली तेल का राजकोट में 1,300 रुपये से घटकर 1,050 रुपये, क्रूड पाम तेल का 500 रुपये से घटकर 470 रुपये और आरबीडी पामोलीन का 540 रुपये से घटकर 500 रुपये प्रति 10 किलो रह गया। (Business Bhaskar....R S Rana)

Gold up by Rs 100 on scattered buying

New Delhi, May 25. Snapping a three day losing streak, gold prices recovered by Rs 100 to Rs 27,050 per 10 grams in the national capital today on scattered buying by retailers at prevailing lower levels. Silver also advanced by Rs 200 to Rs 44,300 per kg on increased offtake by industrial units. Marketmen said scattered buying by retailers at attractive lower levels mainly led to recovery in gold prices. Increased offtake by industrial units kept silver prices higher for the second day, they said. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity recovered by Rs 100 each to Rs 27,050 and Rs 26,850 per 10 grams, respectively. It had lost Rs 100 in last three sessions. Sovereigns continued to be asked around previous level of Rs 23,700 per piece of eight grams. In line with a general trend, silver ready advanced by Rs 200 to Rs 44,300 per kg and weekly-based delivery by Rs 150 to Rs 43,475 per kg. The white metal had gained Rs 100 yesterday. Silver coins remained stable at Rs 75,000 for buying and Rs 76,000 for selling of 100 pieces.

23 May 2013

खाद्य प्रबंधन नीति दोषपूर्ण : गुलाटी

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन अशोक गुलाटी ने खाद्यान्न की ऊंची कीमतों और सरकारी गोदामों में इसके भारी स्टॉक की विरोधाभासी स्थिति के लिए वर्तमान खाद्य प्रबंधन नीति को जिम्मेदार बताया है। उन्होंने कहा कि खाद्यान्न की जरूरत से ज्यादा खरीदारी कर अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति बढ़ाई जा रही है, लेकिन इस खाद्यान्न की बाजार में आपूर्ति नहीं की जा रही है। बफर स्टॉक नीति पर एक पत्र में गुलाटी ने सरकार को सुझाव दिया है कि देश में खाद्य प्रबंधन को फायदे का सौदा बनाने के लिए अतिरिक्त खाद्यान्न की बिक्री की जानी चाहिए। गुलाटी ने दावा किया कि उनके इस विचार को मूर्तरूप देने से खाद्य महंगाई को नीचे लाने और राजकोषीय घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। कंपनियों को 10.2 करोड़ टन खाद्यान्न के निर्यात की मंजूरी देने से भी देश के बढ़ते चालू खाते के घाटे को नीचे लाने में मदद मिल सकती है। गुलाटी के इस पत्र की सीएसीपी की संयुक्त निदेशक सुरभि जैन सहलेखिका हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक के मद्देनजर जितने बफर स्टॉक की जरूरत है, उससे बहुत ज्यादा खाद्यान्न का स्टॉक केंद्रीय एजेेंसियों के पास है। (BS Hindi)

Gold down by Rs 20 on sustained selling, weak global cues

New Delhi, May 23. Gold prices today fell for the second straight session by losing Rs 20 to Rs 27,000 per 10 grams in the national capital due to sustained selling by stockists amid a weak global trend. Silver also met with resistance at prevailing higher levels and lost Rs 300 at Rs 44,000 per kg. The white metal had gained Rs 2130 in the previous two session. Traders said sustained selling by stockists against sluggish demand and a weak global trend mainly kept pressure on gold prices for the second straight day. Gold in New York, which normally sets the price trend on the domestic front, fell by USD 6.30 to USD 1,369.70 an ounce and silver by 0.71 per cent to USD 22.27 an ounce. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity fell further by Rs 20 to Rs 27,000 and Rs 26,800 per 10 grams, respectively. It had shed Rs 30 yesterday. Sovereigns remained steady at Rs 23,700 per piece of eight grams in restricted buying activity. In line with a general weak trend, silver ready declined by Rs 300 to Rs 44,000 per kg and weekly-based delivery by Rs 1,195 to Rs 43,170 per kg for want of support. On the other hand, silver coins maintained steady trend at Rs 75,000 for buying and Rs 76,000 for selling of 100 pieces.

Gold gains on demand for protection as equities fall

London, May 23. Gold today rose after data showed China’s manufacturing contracted in May for the first time in seven months, boosting demand for the metal as a protection of wealth as equities fell. Gold gained 1.4 per cent to USD 1,390.20 an ounce and silver by 1.3 per cent to USD 22.59 an ounce. The preliminary reading for a Chinese Purchasing Managers’ Index missed analysts’ estimates and came in below the level of 50, indicating a contraction. Commodities and stocks tumbled, with Japanese equities falling the most since the aftermath of the Fukushima disaster two years ago. Bullion also gained as the US dollar declined. Gold jumped 2.8 per cent and fell 1.6 per cent yesterday after the Federal Reserve Chairman Ben Bernanke told lawmakers a premature withdrawal of stimulus could endanger economic recovery, while noting the pace of bond purchasing will be reduced if labour market improvement is sustainable. Some investors have been short-covering, or buying gold to close out bets on falling prices. Assets in the SPDR Gold Trust, the biggest bullion-backed ETP, dropped to 1,020.07 metric tonnes, the lowest level since February 2009.

22 May 2013

Govt does not want to take hasty decision on Food Bill: Anwar

New Delhi, May 22. The government does not want to take any hasty decision on the Food Bill and would like to take all political parties on board for its smooth passage in the next session of Parliament, Minister of State for Agriculture and NCP leader Tariq Anwar said today. "We are not in a hurry to clear the Food Bill. It is a very important bill for us and we do not want to take any hasty decision on the bill, we would like to take all parties into confidence," Anwar told PTI on the sidelines of an event. The NCP leader further said that he was hopeful the bill would come for discussion in the next Parliament session. The government had tried to get the Food bill passed in Lok Sabha in the recently-concluded Budget session. The debate on the proposed legislation could not be concluded amid din. The bill was introduced in December 2011 in Parliament. Recently, Food Minister K V Thomas had virtually ruled out bringing an Ordinance for implementation of Food Bill and favoured discussion on the proposed legislation in the coming Parliament session. The Food Bill aims to give legal right to a uniform quantity of 5 kg foodgrains at a fixed price of Rs 1-3 per kg via ration shops to 67 per cent of the population. Speaking at an award function, Anwar said the quality of planting materials used by the farmers play a major role in achieving high output. "It is essential that new varieties developed by individuals, be it scientist or farmers, is protected and duly compensated," he said. Plant varieties need to be protected as they form the base material for development of new varieties and therefore it is the key for achieving higher farm output, ensuring higher returns to farmers, he said. The minister presented the 'Plant Genome Saviour Community Awards" to four farming communities and 15 individual farmers for their outstanding work in the area of conservation and protection of land races.

Gold prices slip on profit-selling; silver gains

New Delhi, May 22. Gold prices today slipped by Rs 30 to Rs 27,020 per ten grams as a result of profit-selling by stockists in the bullion market here. On the other hand, Silver prices rose due to high demand from industrial units and added Rs 100 to Rs 44,300, after a surge of Rs 2,030 in the previous session. Traders said profit-selling by stockists at prevailing higher levels mainly led to decline in gold prices, which had strengthened by Rs 680 yesterday. Experts said sustained buying in silver by industrial units and coin makers helped the metal to gain further. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity slipped by Rs 30 each to Rs 27,020 and Rs 26,820 per ten grams, respectively. Sovereign remained steady at Rs 23,700 per piece of eight gram in limited deals. Silver ready strengthened by Rs 100 to Rs 44,300 per kg and weekly-based delivery surged by Rs 990 to Rs 44,365 per kg on increased buying by speculators. Silver coins continued to be asked around previous level of Rs 75,000 for buying and Rs 76,000 for selling of 100 pieces in restricted buying.

Gold gains amid stimulus speculation before Bernanke testimony

London, May 22. Gold today gained as speculation that the US Federal Reserve may signal the need for sustained stimulus countered further outflows from investor holdings. The gold rose 1.4 per cent to USD 1,396 an ounce and silver by 1 per cent to USD 22.84 an ounce. The Federal Open Market Committee will publish minutes of its latest meeting today and Fed Chairman Ben S. Bernanke testifies in Congress. Gold fell into a bear market last month on expectations the Fed may scale back quantitative easing and as investment holdings fell. Bullion slid 17 per cent this year after 12 straight annual gains. Holdings in exchange-traded products dropped 10.3 tonnes to 2,177.1 tonnes, the lowest since July 2011.

20 May 2013

Gold hits 21-mth low; silver at its weakest in over 2 years

New Delhi, May 20. Gold today fell to its lowest level in 21 months and silver hit a 31-month low on heavy sell off by stockists, taking weak cues from overseas. While gold dropped by Rs 330 to Rs 26,370 per 10 grams, matching its price on August 10, 2011, silver prices plunged by Rs 1,530 to Rs 42,170 per kg, a level last seen on November 26, 2010. Selling pressure gathered momentum as precious metals in in global markets extended their longest slump in four years as investment holdings contracted and stocks rallied and dollar surged against other currencies. In global markets, which normally sets the price trend on the domestic front, silver tumbled 7 per cent to USD 20.69 an ounce, gold by 1.5 per cent to USD 1,338.85 an ounce. Weak trend at futures trade as speculators offloaded their positions to shift their funds to rising equities, further fuelled the sentiment, they said. Besides, fall in demand due to off marriage season and retail customers expecting more correction in the bullion prices was another dampening factor, they added. On the domestic front, silver ready dropped by Rs 1,530 to Rs 42,170 per kg and weekly-based delivery by Rs 1,485 to Rs 41,170 per kg. Silver coins nosedived by Rs 3,000 to Rs 72,000 for buying and Rs 73,000 for selling of 100 pieces. Similarly, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity tumbled by Rs 330 each to Rs 26,370 and Rs 26,170 per 10 grams, respectively. Sovereigns, too, plunged by Rs 200 to Rs 23,500 per piece of eight grams.

महिंद्रा के 'युवराज' बढ़ाएंगे छोटे किसानों की आमदनी!

उत्तर प्रदेश में प्रयोग :उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए शुगर केन थ्रेशर लांच किया गया है :इससे गन्ने की कटाई की जाती है, उसके बाद गन्ने को साफ किया जाता है : इसके उपयोग से मशीन से ही गन्ने को ट्रक में लोड कर दिया जाता है : उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इसका उपयोग भी शुरू हो गया है बढ़ते कदम : छोटे किसानों के लिए 1.95 लाख रुपये में युवराज ट्रैक्टर लांच किया गया है : उत्तर भारत में ट्रैक्टर और फार्म इक्विपमेंट डीलरों की संख्या 20%बढ़ाएगी कंपनी वित्त वर्ष 2012-13 में उत्तर भारत में महिंद्रा ट्रैक्टर और फार्म इक्विपमेंट डीलरों की संख्या में 20 फीसदी की बढ़ोतरी करेगी। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए महिंद्रा ने एक कंपैक्ट समाधान निकाला है इसमें पूंजी कम लगती है। साथ ही इसके सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के फार्म इक्विपमेंट सेक्टर के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट संजीव गोयल ने बिजनेस भास्कर को बताया कि उत्तर भारत में कंपनी ने वित्त वर्ष 2012-13 में ट्रैक्टर और फार्म इक्विपमेंट डीलरों की संख्या में 20 फीसदी की बढ़ोतरी करने की योजना बनाई है। इस समय उत्तर भारत में कंपनी के 350 ट्रैक्टर डीलर है तथा कंपनी के फार्म उत्पाद बेचने वाले 45 डीलर मौजूद है। कंपनी का लक्ष्य किसानों को उनकी उत्पादकता बढ़ाने में मदद करना है इसीलिए कंपनी ने अपने डीलरशिप को समृद्धि सेंटर के रुप में स्थापित किया है। इन समृद्धि केंद्रों के माध्यम से किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच और उसमें बोई जाने वाली फसल, खाद तथा कीटनाशकों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों की भी इसमें मदद ली जाती है। गोयल का कहना था कि किसानों की जोत लगातार घट रही है। साथ ही, खेती में लागत बढ़ रही है जबकि हर राज्य में कृषि क्षेत्रमें मानव संसाधन संबंधी दिक्कतें आ रही हैं। ऐसे में खेती छोटी जोत के किसानों के लिए लाभकारी नहीं रह गई है। किसान फसलों की उत्पादकता बढ़ाकर ही लाभ कमा सकते हैं। कंपनी ने छोटे किसानों को समृद्ध बनाने के लिए युवराज ट्रैक्टर लांच किया है जिसकी कीमत 1.95 लाख रुपये है। इससे किसान खेतों में तो काम कर ही सकता है साथ ही ऑफ सीजन में अन्य काम करके मुनाफा भी कमा सकता है। समृद्धि केंद्रों के माध्यम से ही किसानों को ट्रैक्टर और फार्म इक्विपमेंट की पूरी जानकारी दी जाती है। गोयल ने बताया कि वाजिब और किफायती दामों पर किसानों को तकनीकी रुप से बेहतरीन उत्पाद उपलब्ध कराने की कोशिश की कड़ी में उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए शुगर केन थ्रेशर लांच किया गया है। ट्रैक्टर के पीछे लगाकर इससे गन्ने की कटाई की जाती है, उसके बाद गन्ने को साफ किया जाता है। साथ ही, मशीन से ही गन्ने को ट्रक में लोड कर दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इसका उपयोग भी शुरू हो गया है। (Business Bhaskar)

18 May 2013

Gold falls on stockists selling, global cues

New Delhi, May 18. Gold prices fell by Rs 110 to Rs 26,700 per ten grams in the national capital today on reduced offtake against stockists selling sparked by a weak global trend. Silver, however, held steady at Rs 43,700 per kg in restricted buying. Traders said stockists selling in tandem with a weak global trend as the dollar jumped to a 34-month high and a Federal Reserve policy maker said US monetary stimulus may be reduced within months, mainly influenced the sentiment. Gold in New York, which normally set price trend on the domestic front, fell 1.6 per cent to USD 1,364.70 an ounce. Besides, retail customers refrained from making fresh purchased on off marriage and festival season, dampened the sentiment. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity fell by Rs 110 each to Rs 26,700 and Rs 26,500 per ten grams, respectively. Sovereign continued to be asked around previous level of Rs 23,700 per piece of eight gram. On the other hand, silver ready held steady at Rs 43,700 per kg while weekly-based delivery declined by Rs 300 to Rs 43,655 per kg on lack of speculators buying support. However, silver coins spurted by Rs 1,000 to Rs 75,000 for buying and Rs 76,000 for selling of 100 pieces.

17 May 2013

MCX June Gold...Copper......Crude....Soyabean...... futures....

Bullion: MCX June Gold futures plunged below the three week’s low in the last week as strong dollar curbed demand for gold as an alternative investment. The dollar index breached 32 month’s high against six major currencies on as claims for U.S. jobless benefits unexpectedly dropped to the lowest level in more than five years. The European Central Bank (ECB) clashed with Germany over how the European Union will handle struggling banks and European economy shrunk more than estimation on extending a record sixth quarter recession for the quarter ending March also provided support to the US dollar. According to World Gold Council, demand for gold dropped 13 percent in the first quarter from a year earlier as ETP sales outweighed a surge in purchases of coins, bars and jewelry in China and India. Drop in investment demand for gold Exchange Trade Fund also added bearish market sentiments. Holdings in the SPDR Gold Trust, the World's largest gold-backed exchange-traded fund, declined to 1041.42 tonnes as on May 16, 2013, down 0.97% as compared to 1051.65 tonnes on May 13, 2013. ¬¬¬¬¬Price Movement in the Last week: MCX June gold prices opened the week at Rs 26,888/10 grams and fell sharply, but found good support at Rs 25860/10 grams and currently trading at Rs 25,983/10 grams (May 17, Friday at 6.30 PM) with a huge loss of Rs 1016/10 grams as compared with previous week’s close. Outlook for this week: MCX June gold is expected to trade lower on account of optimism in global economy. Declining demand of gold investments due to huge gains in dollar is negative for prices. MCX June gold shall find supports at 25,270/25,000 levels and resistances at 26,300/26,590 levels. Spot gold has supports at 1320/1305 and resistances at 1405/1430 levels. Recommendation for this week: Sell MCX June Gold between 26,250-26,300, SL above 26,600 and Target- 25,270/25,000. Copper: MCX June Copper futures traded lower in the beginning of the last week on account of weak China’s economic recovery as fixed asset investment decelerated last month and industrial production grew 9.3 percent from a year earlier and retail sales climber 12.8 percent. Further, reports showed that the Gross Domestic Product of European Union (EU) and Germany failed to meet the estimation. In addition, U.S. industrial production in April declined most in eight months and manufacturing index of New York region unexpectedly shrunk in May. However, from the mid of the last week, base metal prices bounced back on the back optimism in the global economy. Euro area exports increased 2.8 percent in March and imports decreased 1 percent. Trade surplus of the euro zone widened to 18.7 billion euros from 12.7 billion euros. U.S. jobless claims unexpectedly dropped to the lowest level in more than five years and Japan economy grew at 3.5 percent is also provided support for base metals prices. Further, India’s industrial output in March expanded at the fastest pace in five months after the central bank eased interest rates to revive economic growth. Production at factories, utilities and mines climbed 2.5 percent from a year earlier after a revised 0.5 percent gain in February, the Central Statistical Office said in a statement. Price movement in the last week: MCX June Copper prices opened the week at Rs 409.20/kg, initially traded slightly higher and touched a high of Rs 411.55/kg. Later, prices slipped and touched a low of Rs 392.60/kg and currently trading at Rs 405.80/kg (May 17, Friday at 6.25 PM) with a loss of Rs 5/kg as compared with previous week’s close. Outlook for this week: MCX June Copper is expected to trade higher on account of improved global economic growth. More than expected growth of Japan is positive for base metal prices. MCX June Copper shall find a supports at 393/387 levels and resistances at 416/422 levels. Recommendation for this week: Buy MCX June Copper between 393-395, SL 386 and Target- 416/421.50. Crude: MCX May Crude oil futures traded lower in the beginning of last week as the International Energy Agency (IEA) said global trade in light sweet crude oil will drop by 0.5 percent annually from 2012 to 2018 as North America reduces it imports because of rising domestic production. America will add 2.7 million barrel to its existing oil production. Lower demand from the largest oil consuming country, U.S. Fall in New York manufacturing and U.S. industrial production also pressurized oil prices. OPEC boosted crude output in April to the highest in five months as Saudi Arabia increased production. The Organization of Petroleum Exporting Countries produced 30.46 million barrels a day last month, up from 30.18 million in March. Saudi Arabia, the world’s largest crude exporter, pumped 9.27 million barrels a day in April, rising from 9.13 million in March. However, crude oil prices recovered from the mid of the last week after the Energy Information Administration (EIA), in its’ weekly inventory report, showed an unexpected draw down of 624 thousand barrels. The euro-area trade data and higher than estimated Japan’s gross domestic product also provided positive support for crude oil prices. Price movement in the last week: MCX May crude oil prices opened the week at Rs 5237/bbl, initially fell sharply and touched a low of Rs 5064/bbl, Later, prices bounced back sharply from low and currently trading at Rs 5258/bbl (May 17, Friday at 6.25 PM) with a nominal gain of Rs 6/bbl. Outlook for this week: MCX May crude oil is expected to trade higher on account of increased demand due to favorable global economic data, particularly from US and Japan. MCX May crude oil shall find a support at 5130/5000 levels and resistance 5330/5400 levels. Recommendation for this week: Buy MCX May Crude Oil between 5130-5150, SL-below 5000 and Target- 5330/5400. Soybean: NCDEX June soybean futures traded slightly lower on account of lower export figures of domestic oil meals in the month of April 2013 and forecasts of normal monsoon for this year as sowing acreage may increase is also added bearish market sentiments. According to Solvent Extractors’ Association of India, export of oil-meals in the month of April 2013 is heavily reduced to 199,168 tons compared to 403,090 tons in April 2012 i.e. down by 51% mainly due to disparity in crushing and high prices of soybean resulted into less availability for the export. As per USDA’s weekly export sales report, net weekly export sales for soybeans came in at 15,300 tonnes for the current marketing year and 346,600 for the next marketing year for a total of 361,900. As of May 9th, cumulative sales stand at 99% of the USDA forecast vs. a 5 year average of 96%. Sales of 15,000 tonnes are needed each week to reach the USDA forecast, nearly unchanged from the week prior. Net meal sales came in at 82,800 tonnes for the current marketing year and 109,700 for the next marketing year for a total of 192,500. Old crop sales were up noticeably from last week but down 44% from the 4 week average. Cumulative sales stand at 98% of the USDA forecast vs. a 5 year average of 79%. Sales of 9,000 tonnes are needed each week to reach the USDA forecast, down from 12,400 the week prior. Net oil sales showed a cancelation of 5,300 tonnes for the current marketing year and cumulative sales stand at 83% of the USDA forecast vs. a 5 year average of 73%. Sales of 8,000 tonnes are needed each week to reach the USDA forecast, up from 7,700 tonnes the week prior. Outlook: NCDEX June soybean is expected to trade slightly lower on the back of lower export demand of domestic soy meal and forecasts of normal monsoon for this year as soybean sowing acreage may increase (soybean is a kharif crop). NCDEX June soybean shall find a support at 3780/3740 levels and Resistance 3950/4000 levels. Recommendation for this week: Sell NCDEX June Soybean between 3930-3950, SL-above 4000 and Target- 3800/3750.

रबर उत्पादन व खपत पर नहीं असर

इस साल अप्रैल में रबर का उत्पादन और खपत 2012 के अप्रैल महीने के समान रहा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कीमत करीब 40 फीसदी गिरी है, लेकिन रबर उत्पादन में गिरावट का संकेत न होने से उत्पादक खुश हैं। हालांकि उनको इस बात की चिंता है कि भारी गर्मी के कारण उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। खराब मौसम के कारण पिछले वित्त वर्ष के दौरान अप्रैल, मई 2012, फरवरी और मार्च 2013 में मासिक उत्पादन कम था। लेकिन रबर बोर्ड के ताजा अनुमान (प्रारंभिक) अप्रैल में उत्पादन में 0.6 फीसदी बढ़ोतरी का संकेत दे रहे हैं। मासिक उत्पादन 53,000 टन अनुमानित है, जो अप्रैल 2012 में 52,700 टन था। खपत में भी महज 250 टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। खपत 82,000 टन रही, जो पिछले साल अप्रैल में 81,750 टन थी। यह संतोषजनक हो सकता है, क्योंकि वाहन क्षेत्र दबाव से गुजर रहा है। हालांकि मार्च 2013 में खपत 79,000 टन थी, जो अप्रैल में 3.8 फीसदी बढ़ी है। विशेषज्ञों के मुताबिक टायर से इतर क्षेत्रों में कुछ सकारात्मक बदलाव से खपत समान स्तर पर बनी रही। रबर की कीमतों में भारी गिरावट से छोटे और मझोले उद्योग उत्साहित हैं, जिन्होंने कुछ वर्षों से उत्पादन रोक दिया था। अप्रैल में आयात गिरकर 10,871 टन रहा, जो पिछले साल के इसी महीने में 17,509 टन था। निर्यात बढ़कर 1,358 टन रहा, जो पिछले साल अप्रैल में 787 टन था। बोर्ड का अनुमान भी 2,47,000 टन के स्टॉक का संकेत दे रहा है। यह पिछले अप्रैल में 2,26,000 टन था। बोर्ड ने उम्मीद जताई है कि घरेलू बाजार में इस साल कोई कमी नहीं होगी। (BS Hindi)

सेब की बंपर फ सल पर गिरे ओले

सत्र की शुरुआत में हुई अच्छी बर्फबारी से दो साल बाद सेब की बंपर पैदावार होने की संभावना थी लेकिन बीते कुछ दिन पहले जम्मू-कश्मीर व हिमाचल के सेब उत्पादक क्षेत्रों में ओले पडऩे से फसल को नुकसान पहुंचा है। इससे बंपर उत्पादन की संभावना खत्म होती दिख रही है। सेब उत्पादकों का कहना है कि कश्मीर में उत्पादन मौजूदा परिस्थितियों में पिछले साल के बराबर और हिमाचल में पिछले साल से ज्यादा उत्पादन की आस है। हालांकि दोनो राज्यों में उत्पादन सामान्य से कम ही रहेगा। क्योकि पिछले साल सामान्य उत्पादन के मुकाबले भारी कमी आई थी। हिमाचल में सेब की पैदावार सामान्यत: 4 से 5 लाख टन और कश्मीर में 15 से 16 लाख टन है। पिछले साल हिमाचल में 1.50 से 2 लाख टन और कश्मीर में 6 से 7 लाख टन सेब हुआ था। अखिल भारतीय सेब उत्पादक संघ के महासचिव और कश्मीर के सेब उत्पादक हाजी अब्दुल अहद रथर ने बताया कि पिछले माह की 28 तारीख से अगले 15 दिनों तक ओले पड़ते रहे। इस समय सेब के पेड़ों में फूल आ रहे थे। ओले पडऩे से इन्हें नुकसान पहुंचा है और बीमारी लगने का खतरा पैदा हो गया है। रथर ने कहा कि इससे पहले तक मौसम सेब की फसल के अनुकूल था, जिससे इस साल पैदावार बढऩे की उम्मीद थी, लेकिन बदले हालात में अब पैदावार पिछले साल के बराबर होने की उम्मीद है। संघ के अध्यक्ष और हिमाचल के सेब उत्पादक रवींद्र चौहान ने कहा कि ओले से सेब की फसल को नुकसान हुआ है। फिर भी शुरुआती अनुमान के मुताबिक पिछले साल से ज्यादा सेब पैदा होगा। अगर ओले नहीं पड़ते तो हिमाचल में पैदावार सामान्य यानी 4-5 लाख टन हो सकती थी। लेकिन अब पैदावार 2.5 से 2.75 लाख टन तक रह सकती है। हिमाचल प्रदेश सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष लेखराज चौहान ने भी माना कि ओले पडऩे से सेब की फसल को नुकसान हुआ है। वे इस वक्त पैदावार का आंकलन करने को सही नही मानते हैं। I(BS Hindi)