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31 January 2014

नेचुरल रबर के दाम चार साल में सबसे कम

14,300 रुपये प्रति 100 किलोग्राम रही कीमतें आरएसएस-2 रबर की गुरुवार को 200 रुपये प्रति 100 किलोग्राम की आई है गिरावट कीमतों में भारत में नेचुरल रबर की कीमतें गुरुवार को पिछले चार साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। ऐसा पर्याप्त आपूर्ति और विदेशी बाजारों में आई गिरावट के कारण हुआ है। भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेचुरल रबर उत्पादक देश है। नेचुरल रबर की कीमतों में गिरावट का सबसे अधिक लाभ टायर निर्माताओं को होगा। एक टायर की कुल लागत में 40 फीसदी हिस्सा अकेले नेचुरल रबर का होता है और इसकी कीमतों मे गिरावट से टायर निर्माताओं की उत्पादन लागत कम होने से उनका लाभ बढ़ेगा। केरला के कोट्टायम मंडी में गुरुवार को आरएसएस-4 रबर के दाम 200 रुपये गिरकर 14,300 रुपये प्रति 100 किलोग्राम रहे। यह एक मार्च 2010 के बाद से अब तक का सबसे निचला स्तर है। इंडियन रबर डीलर्स फेडरेशन के अध्यक्ष जॉर्ज वेली के मुताबिक रबर की आपूर्ति पर्याप्त बनी रहने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट के कारण स्थानीय कीमतों पर इसका असर हुआ है। सिएट लिमिटेड, जेके टायर एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, एमआरएफ लिमिटेड, बालकृष्ण इंडस्ट्रीज लिमिटेड और अपोलो टायर्स लिमिटेड को रबर की कीमतों में गिरावट का लाभ मिलेगा। (Business Bhaskar)

काजू के निर्यात में 16 फीसदी बढ़ोतरी

पिछले एक साल से स्थिर बने हुए भारत के काजू गिरी के निर्यात में फिर तेजी आ सकती है। दिसंबर, 2013 में समाप्त चालू वित्त वर्ष के पहले 9 महीनों के दौरान देश से इसका निर्यात 16 फीसदी बढ़कर 90,244 टन रहा है, जो पिछले साल की इसी अवधि में 77,869 टन था। दिसंबर, 2013 में समाप्त चालू वित्त वर्ष की पहली तीन तिमाहियों के दौरान भारतीय निर्यातकों को काजू गिरी के निर्यात से 3,764 करोड़ रुपये की आमदनी हुई है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 24.2 फीसदी ज्यादा है। अप्रैल से दिसंबर, 2012 के दौरान निर्यातकों की आमदनी 3,031 करोड़ रुपये रही थी। निर्यात के वर्तमान रुझान को देखते हुए चालू वित्त वर्ष में देश से निर्यात का आंकड़ा अब तक का दूसरे सर्वोच्च स्तर पर पहुंच सकता है। अब तक भारत का सबसे ज्यादा काजू गिरी का निर्यात वर्ष 2011-12 में 1,31,000 टन रहा था, जिसकी कीमत 4,390 करोड रुपये थी। वर्ष 2012-13 में भारत का निर्यात गिरकर 1,00,105 टन रहा, जिसकी कीमत 4,046 करोड़ रुपये थी। मंगलूर स्थित निर्यात कंपनी अचल कैशूज के प्रबंध निदेशक जी गिरिधर प्रभु ने कहा, 'पिछले 5 वर्षों के दौरान केवल एक वर्ष को छोड़कर काजू गिरी का निर्यात 1 लाख टन के आसपास स्थिर बना हुआ है। इस साल कच्चे काजू के आयात और काजू गिरी के निर्यात में महत्त्वपूर्ण बढ़ोतरी रही है। इसके अलावा गिरी के आयात में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। यह इस बात को दर्शाता है कि हमने स्थिरता के रुझान को मात दी है और अब तक के सर्वोच्च निर्यात की दिशा में बढ़ रहे हैं।' इस साल का अच्छा रुझान यह है कि अप्रैल से दिसंबर 2013 के दौरान कच्चे काजू का आयात पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 10 फीसदी गिरकर 6,62,795 टन रहा है। उन्होंने कहा कि आयात की औसत लागत में 23 फीसदी गिरावट आई है। इसके अलावा निर्यात बढऩे में प्रति इकाई कीमत प्राप्ति का भी अहम योगदान रहा है। (BS HIndi)

उत्तर प्रदेश की मिलों में चीनी का उत्पादन इस बार 25 फीसदी घटा

आरएस राणा : नई दिल्ली... | Jan 31, 2014, 01:08AM IST समस्या : भुगतान संकट के कारण इस बार देरी से शुरू हुआ है पेराई सीजन 25.93 लाख टन हुआ है चीनी का उत्पादन इस साल 28 जनवरी तक 34.60 लाख टन हुआ था पिछले साल की समान अवधि में चीनी का उत्पादन 5,571.58 करोड़ रुपये का भुगतान करना था मिलों को 14 दिन पेमेंट के आधार पर किसानों को 2,156.51 करोड़ रुपये का ही भुगतान कर सकी हैं चीनी मिलें इस दौरान गन्ना किसानों को चालू पेराई सीजन 2013-14 (अक्टूबर से सितंबर) में 28 जनवरी तक उत्तर प्रदेश में चीनी का उत्पादन 25 फीसदी घटकर 25.93 लाख टन का ही हुआ है। इस दौरान राज्य की चीनी मिलों ने किसानों को 14 दिन की पेमेंट के आधार पर 5,571.58 करोड़ रुपये मूल्य का भुगतान करना था लेकिन चीनी मिलें इस दौरान केवल 2,156.51 करोड़ रुपये का ही भुगतान कर पाई हैं। उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिएशन (यूपीएसएमए) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि देरी से शुरू होने के कारण चालू पेराई सीजन में 28 जनवरी तक उत्तर प्रदेश में केवल 25.93 लाख टन चीनी का उत्पादन ही हुआ है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 34.60 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। हालांकि रिकवरी की दर पिछले साल के लगभग बराबर 8.85 फीसदी की आ रही है। चालू पेराई सीजन में राज्य में 119 चीनी मिलों में गन्ने की पेराई हो रही है, जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में 121 चीनी मिलों में पेराई चल रही थी। उन्होंने बताया कि राज्य की चीनी मिलों ने चालू पेराई सीजन में अभी तक 2,929.50 लाख क्विंटल गन्ने की खरीद की है, जबकि पिछले साल इस समय तक 3,907.28 लाख क्विंटल गन्ने की खरीद की थी। उन्होंने बताया कि चालू पेराई सीजन में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को 14 दिन की पेमेंट के आधार पर किसानों को 5,571.58 करोड़ रुपये का भुगतान करना था लेकिन मिलों ने इस दौरान केवल 2,156 करोड़ रुपये का ही भुगतान किया है। ऐसे में चीनी मिलों पर किसानों का चालू पेराई सीजन का ही 3,415.07 करोड़ रुपये का बकाया हो चुका है। बकाये की राशि में सबसे ज्यादा राज्य की प्राइवेट चीनी मिलों पर 3,157.22 करोड़ रुपये है। राज्य की कॉ-ऑपरेटिव चीनी मिलों पर इस दौरान का करीब 251.29 करोड़ रुपये बकाया बचा हुआ है। उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर पेराई सीजन 2012-13 का भी 1,331.96 करोड़ रुपये किसानों का बकाया बचा हुआ है। आर्थिक घाटे से जूझ रहे चीनी उद्योग के नकदी संकट को दूर करने के लिए केंद्र सरकार पहले ही 6,600 करोड़ रुपये के ब्याज मुक्त ऋण को मंजूरी दे चुकी है। इसका भुगतान किसानों के बकाया पेमेंट के लिए ही किया जाना अनिवार्य है। (Business Bhaskar....R S Rana)

30 January 2014

गेहूं बिक्री बढ़ाने पर जोर देगी सरकार

आर एस राणा : नई दिल्ली... | Jan 30, 2014, 08:33AM IST अगली समीक्षा बैठक में निर्यात और अगले सीजन की खरीद पर भी विचार होगा सरकार केंद्रीय पूल से गेहूं की बिक्री, निर्यात और रबी विपणन सीजन 2014-15 में गेहूं की सरकारी खरीद की समीक्षा के लिए बैठक आयोजित करेगी। 30 जनवरी को होने वाली बैठक की अध्यक्षता खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रो. के वी थॉमस करेंगे। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत केंद्रीय पूल से गेहूं की बिक्री बढ़ाने के साथ ही सार्वजनिक कंपनियों द्वारा किए जा रहे निर्यात सौदों की समीक्षा की जायेगी। केंद्र सरकार ने ओएमएसएस के तहत बिक्री के लिए 95 लाख टन गेहूं का आवंटन किया था, जिसमें से ओएमएसएस के तहत अभी तक केवल 38.35 लाख टन गेहूं की ही बिक्री हो पाई है। वर्तमान में हो रही बिक्री के आधार पर 31 मार्च 2014 तक ओएमएसएस के तहत केवल 52-55 लाख टन गेहूं की ही बिक्री होने का अनुमान है। इसी तरह से सार्वजनिक कंपनियों के माध्यम से केंद्र सरकार ने 20 लाख टन गेहूं निर्यात की अनुमति दी हुई है, जिसमें से अभी तक केवल 10 लाख टन गेहूं के निर्यात सौदे ही हो पाए है जबकि अभी तक 5 लाख टन गेहूं के निर्यात की शिपमेंट हुई है। उन्होंने बताया कि अप्रैल से शुरू होने वाले रबी विपणन सीजन 2014-15 में गेहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद की समीक्षा भी बैठक में की जायेगी। खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद केंद्रीय पूल में अधिक खाद्यान्न की जरूरत होगी। चालू रबी में गेहूं बुवाई में हुई बढ़ोतरी से पैदावार बढऩे का अनुमान है तथा केंद्र सरकार ने रबी विपणन सीजन 2014-15 के लिए गेहूं का एमएसपी 1,400 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। ऐसे में गेहूं की सरकारी खरीद विपणन सीजन 2013-14 के 381.48 लाख टन गेहूं से ज्यादा ही होने का अनुमान है। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने 8 अगस्त 2013 को भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों से 20 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दी गई थी। (Business Bhaskar,......R S Rana)

बंपर पैदावार होने के बावजूद महंगी हो रही हैं दालें

कमाल : स्टॉकिस्टों की सक्रियता से दालें महीने भर में 1500 रुपये तक तेज 190 लाख टन दालों का उत्पादन हो सकता है चालू फसल वर्ष में 184.5 लाख टन उत्पादन हुआ था पिछले सीजन के दौरान चालू रबी में दलहन की पैदावार बढऩे का अनुमान है, इसके बावजूद चालू महीने में मूंग, अरहर, मसूर और उड़द की कीमतों में तेजी की संभावना है। महीनेभर में दालों की थोक कीमतों में 200 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2013-14 में दालों की पैदावार 190 लाख टन होने का अनुमान है। ग्लोबल दाल इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर सी एस नादर ने बताया कि दालों में मांग कमजोर बनी हुई है लेकिन स्टॉकिस्टों की सक्रियता से दाम बढ़ रहे हैं। महीने भर में मूंग की थोक कीमतों में करीब 1,500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आकर भाव 6,700 से 7,500 रुपये, अरहर साबुत की कीमतों में 200 रुपये की तेजी आकर भाव 4,250 रुपये, मसूर की कीमतों में 250 रुपये की तेजी आकर भाव 4,500 रुपये और उड़द की कीमतों में 250 रुपये की तेजी आकर भाव 4,500 से 4,750 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। श्रीकृष्ण मुरारी कन्वेंसिंग कंपनी के प्रबंधक दुर्गा प्रसाद ने बताया कि आयात पड़ते महंगे होने के कारण अरहर, उड़द, मसूर और मूंग की कीमतों में ओर भी तेजी की संभावना है। रबी में चने की पैदावार तो बढऩे का अनुमान है लेकिन उड़द और मूंग के उत्पादन में कमी आने की आशंका है, जिससे कीमतों में तेजी को बल मिल रहा है। दालों के थोक विक्रेता निशांत मित्तल ने बताया कि अरहर दाल की कीमतें बढ़कर 7,000 रुपये, उड़द धोया का भाव 6,250 रुपये, मसूर मलका का भाव 5,100 रुपये और मूंग धोया की कीमतें बढ़कर 8,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गई। फुटकर बाजार में मूंग दाल के दाम 80-85 रुपये, उड़द दाल के 66-70 रुपये, अरहर दाल के 70-75 रुपये और मसूर दाल के 61-65 रुपये प्रति किलो हो गए। हालांकि चना दाल के दाम 45 से 48 रुपये प्रति किलो पर स्थिर बने हुए हैं। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में दलहन की बुवाई 149.02 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 156.57 लाख हैक्टेयर में हुई है। चना की बुवाई 93.29 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 101.23 लाख हैक्टेयर में हुई है। हालांकि उड़द की बुवाई पिछले साल के 8.35 लाख हैक्टेयर से घटकर 7.09 लाख हैक्टेयर में ही हुई है। मूंग की बुवाई चालू रबी में 6.04 लाख हैक्टेयर में हुई है। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2013-14 में दलहन की पैदावार 190 लाख टन से ज्यादा होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2012-13 में 184.5 लाख टन दालों की पैदावार हुई थी। (Business bhaskar....R S Rana)

सरसों उत्पादन पर पाले का असर

रबी सीजन की मुख्य तिलहन फसल सरसों की रिकॉर्ड बुआई होने के बावजूद उत्पादन का नया कीर्तिमान बनना मुश्किल लगने लगा है। प्रमुख सरसों उत्पादक राज्यों में हुई बारिश और अब पाले के कारण सरसों की फसल बुरी तरह प्रभावित हुई है। पाले की मार से सरसों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन पांच साल के निचले स्तर पर जाने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि मौजूदा स्टॉक के कारण फिलहाल कीमतों में ज्यादा वृद्धि नहीं होगी। पिछले तीन महीने से सरसों की कीमतों में लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है। सरसों के दाम 4,000 रुपये प्रति क्विंटल से घटकर 3,360 रुपये पर आ गए हैं। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक चालू रबी सीजन में सरसों का रकबा 71.10 लाख हेक्टेयर पर पहुंच चुका है, जबकि पिछले साल की इसी अवधि तक 67 लाख हेक्टेयर में बुआई हो सकी थी। फसल बुआई के आंकड़ों के आधार पर सरकार इस साल उत्पादन बढऩे का अनुमान लगा रही है। कृषि मंत्रालय के चौथे अग्रिम फसल उत्पादन अनुमान में वर्ष 2013-14 में सरसों का उत्पादन बढ़कर 78.2 लाख टन होने का अनुमान व्यक्त किया गया है, जबकि पिछले वर्ष 2012-13 में 71.50 लाख टन का उत्पादन हुआ था। सरकारी अनुमान और रकबे को आधार बनाकर तैयार की गई कमोडिटी एंजेसियों की रिपोर्ट में 2013-14 में उत्पादन 66 लाख टन से 82 लाख टन के बीच रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। हाजिर बाजार के कारोबारियों का कहना है कि जनवरी में लगातार दो सप्ताह तक बारिश होने के कारण इस बार उत्पादन पिछले साल से भी कम हो सकता है। चालू सीजन में रिकॉर्ड सरसों का उत्पादन होने की वजह देश में प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक होने का अनुमान है। कोटक कमोडिटी के फैयाज हुदायनी कहते हैं कि इस साल खेतों में बेहतर नमी और अनुकूल मौसम से अनुमान लगाया जा रहा था कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन पिछले साल के 1,050 किलोग्राम बढ़कर 1,070 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो जाएगा। लेकिन अब यह अनुमान पूरा होना मुश्किल है, क्योंकि हाल में उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में जनवरी में हुई लंबी बारिश और तेज हवाओं के कारण सरसों की फसल को काफी नुकसान हुआ है। वह कहते हैं कि इसके बावजूद उत्पादन के बारे में अभी अनुमान लगाना सही नहीं होगा क्योंकि मौसम का मिजाज कभी भी बदल सकता है। बारिश के बाद पाले के प्रकोप का भी कहर पीले फूलों को झेलना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन प्रभावित होगा। राजस्थान के तिलहन कारोबारी सुरेश तोतलानी कहते हैं कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन कहीं सबसे कम उत्पादन का रिकॉर्ड न बना दे। वह कहते हैं कि मौसम में हर दिन अचानक बदलाव फसल को प्रभावित कर रहा है, जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्रभावित होगा। गौरतलब है कि अभी तक देश में 2010-11 में प्रति हेक्टेयर उत्पादन सबसे ज्यादा 1,151 किलोग्राम था और सबसे कम उत्पादन वर्ष 2007-08 में 1,001 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया है। कमोडिटी जानकारों का मानना है कि इसके बावजूद कीमतों में खास असर नहीं होगा, क्योंकि इस समय सरसों 3,350 रुपये प्रति क्विंटल के आस-पास है। ऐसे में उत्पादन अधिक होता है और कीमतें गिरती भी हैं तो 3,050 रुपये के नीचे नहीं जाएंगी, क्योंकि सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,050 रुपये प्रति क्विंटल है और फसल खराब होने से उत्पादन कम भी होता तो भी 3,600 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर नहीं पहुंच पाएगी, क्योंकि घरेलू बाजार में तिलहन की कीमतें वैश्विक कीमतों पर भी निर्भर करती हैं। (BS Hindi)

आढ़त पर बढ़ी सांसत आढ़तिए जाएंगे अदालत

दिल्ली सरकार और दिल्ली कृषि विपणन बोर्ड (डीएएमबी) ने मंडियों में आढ़त (कमीशन) अब किसानों के बजाय खरीदारों से लेने का फैसला किया है। इस फैसले से नाखुश आढ़तिए इसके खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील करने की तैयारी में हैं। दरअसल वर्ष 1999 में कृषि उपज विपणन समिति अधिनियम के एक प्रावधान में संशोधन कर मंडियों में बिकने आने वाले माल पर आढ़त किसानों की जगह खरीदारों से वसूलने की व्यवस्था दी गई थी। लेकिन दिल्ली में किसानों से ही आढ़त (6 फीसदी) लिया जा रहा था, जिसके विरोध में हिमाचल सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी। याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायालय ने जून 2010 में आदेश दिया कि आढ़त किसानों की जगह खरीदारों से वसूला जाए। बावजूद इसके राजनेताओं व आढ़तियों के दबाव में यह आदेश लागू नहीं हो सका। आजादपुर चैंबर ऑफ फ्रूट ऐंड वेजिटेबल के चेयरमैन मीठाराम कृपलानी ने बताया कि डीएएमबी और एपीएमसी ने आढ़तियों को विश्वास में लिए बिना यह फैसला लागू कर दिया है। इस आदेश के तहत खरीदारों से आढ़त वसूलने के कारण उन्हें फल व सब्जी के लिए अधिक दाम चुकाने होंगे, जिसका भार अंतत: आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। इस फैसले के विरोध में आढ़तियों की बैठक में सोमवार से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने निर्णय हुआ है। कृपालनी कहते हैं कि कायदे से अधिकारियों को इस फैसले के खिलाफ अदालत में अपील करनी चाहिए थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो चैंबर अदालत का दरवाजा खटखटाएगा। (Business Bhaskar)

Hybrid pigeonpea technology gives bumper yield to farmers

Hyderabad, Jan 30 (PTI) Despite various challenges associated with cultivation, over 70 small-holder farmers and seed producers from six states have posted a significant rise in hybrid pigeonpea yield, according to the city-based International Crops Research Institute for the Semi-Arid Tropics (ICRISAT). The hybrids in the crop (first in world in any legume) are the results of the crop improvement efforts by ICRISAT. Despite facing challenges such as resource scarcity, climate change and degradation of soil fertility, farmers from Andhra Pradesh, Odisha, Maharashtra, Madhya Pradesh, Rajasthan and Gujarat cultivating the ICRISAT hybrids have reaped a record rise in the yield, ICRISAT said. According to the institution, the farmers collectively endorsed and recognised the contribution of hybrid pigeonpea in achieving food and nutrition security, resilience and improved livelihood. A medium-duration ICRISAT hybrid--ICPH 2740--has demonstrated 38 per cent higher yield than other local varieties. The Review Meeting on Hybrid Pigeonpea Seed Production, held at the ICRISAT headquarters last week, brought together, farmers, seed producers, entrepreneurs, non-governmental organisations and scientists to formulate a road map on expansion of pigeonpea production in India. ICRISAT raised its target to achieve a pigeonpea yield of 5 tonne/ha, (by developing the high-yielding hybrids), which is expected to help small-holder farmers maximise the returns while securing their food and nutritional needs, a release said. "Hybrid pigeonpea technology has great potential to lift millions of farmers in Asia and sub-Saharan Africa out of the hunger trap. We are equipped with the means, science and technology and most importantly a strong will to achieve our targets and efficiently serve the interests of the agricultural community", said ICRISAT Director General, William Dar. The scientists at Acharya N G Ranga Agricultural University’s (ANGRAU) Agricultural Research Station (ARS) in Tandur of Ranga Reddy district in Andhra Pradesh, reported a pigeonpea yield of nearly 3 tonne/ha in their on-station fields using the ICPH 2740 hybrid, according to the statement by ICRISAT. ICRISAT said many farmers who attended the meeting took inspiration from one Gurubhagawan Reddy, a farmer from remote Vasantapuram village in Mahabubnagar district, who managed to sell his pigeonpea hybrid seed at Rs 12,000 (approximately USD 190) per 100 kg.

29 January 2014

जीरे में 10% गिरावट का अनुमान

चालू फसल सीजन में जीरे की घरेलू पैदावार दस फीसदी बढ़कर करीब 48-50 लाख बोरी (एक बोरी-55 किलो) होने का अनुमान है। नई फसल की पैदावार में बढ़ोतरी की संभावना से आयातक देशों की मांग पहले की तुलना में घटी है। ऐसे में फरवरी महीने में जीरे की मौजूदा कीमतों में 10 से 12 फीसदी की गिरावट आने की संभावना है। जैब्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंधक भास्कर शाह ने बताया कि चालू सीजन में जीरे की पैदावार पिछले साल से ज्यादा होने का अनुमान है, साथ ही जीरे का बकाया स्टॉक भी पिछले साल की तुलना में ज्यादा है। इसीलिए आयातक देशों की मांग पहले की तुलना में कम हो गई है। हालांकि बांग्लादेश की आयात मांग अभी भी अच्छी बनी हुई है लेकिन कुल उपलब्धता मांग के मुकाबले ज्यादा होने के कारण फरवरी महीने के आखिर में आने वाली जीरे की नई फसल तक मौजूदा कीमतों में करीब 1,400-1,500 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आने की संभावना है। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2013-14 के पहले छह महीनों (अप्रैल से सितंबर) के दौरान जीरे के निर्यात में 93 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 67,500 टन का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 35,018 टन जीरे का निर्यात हुआ था। भारतीय जीरे का दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में 3.26 डॉलर प्रति किलो है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसका भाव 3.88 डॉलर प्रति किलो था। हनुमान प्रसाद पीयूष कुमार के प्रबंधक विरेंदर अग्रवाल ने बताया कि चालू सीजन में जीरे की पैदावार बढ़कर 48-50 लाख बोरी होने का अनुमान है जबकि पिछले साल पैदावार 42-45 लाख बोरी की पैदावार हुई थी। फरवरी महीने में आने वाली नई फसल के समय जीरे का बकाया स्टॉक भी करीब पांच से सात लाख बोरी बचने का अनुमान है। जीरे के दैनिक सौदे 7,000 से 8,000 बोरियों के हो रहे हैं तथा निर्यातक 2,000 से 3,000 बोरियों के सौदे कर रहे हैं। ऊंझा मंडी में मंगलवार को जीरे का भाव घटकर 12,300 से 12,400 रुपये प्रति क्विंटल रहा तथा सप्ताहभर में इसकी कीमतों में 300-400 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आ चुकी है। एनसीडीईएक्स पर मार्च महीने के वायदा अनुबंध में जीरे की कीमतों में पिछले आठ दिनों में 2.6 फीसदी की गिरावट आकर बुधवार को भाव 12,420 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुए जबकि 21 जनवरी को मार्च महीने के वायदा अनुबंध में जीरे का भाव 12,757 रुपये प्रति क्विंटल था। ब्रोकिंग फर्म एसएमसी कॉम ट्रेड के रिसर्च एनॉलिस्ट अनुसार जीरे की कुल बुवाई 4.54 लाख हैक्टेयर में हुई जबकि गुजरात में 1.05 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई है। (Business Bhaskar...R S Rana)

केंद्रीय पूल से 38 लाख टन गेहूं की खुले बाजार में बिक्री

4 लाख टन गेहूं हर सप्ताह बिक रहा है ओएमएसएस के तहत 55 लाख टन गेहूं की कुल बिक्री हो सकती है मार्च अंत तक केंद्रीय पूल से खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत गेहूं की साप्ताहिक बिक्री बढ़कर चार लाख टन की हो गई है। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा बिक्री राज्यवार करने के बाद से अभी तक 38.35 लाख टन गेहूं की बिक्री हो चुकी है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि ओएमएसएस के तहत गेहूं की बिक्री में पहले की तुलना में तेजी आई है। इस समय साप्ताहिक बिक्री बढ़कर चार लाख टन की हो गई है। ओएमएसएस के तहत अभी तक कुल बिक्री 38.35 लाख टन की हो चुकी है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में हो रही बिक्री के आधार पर 31 मार्च 2014 तक ओएमएसएस के तहत कुल बिक्री करीब 54 से 55 लाख टन गेहूं की होने का अनुमान है। अभी तक हुई कुल बिक्री में सबसे ज्यादा गेहूं हरियाणा से 7.62 लाख टन, पंजाब से 5.04 लाख टन, दिल्ली से 4.88 लाख टन, राजस्थान से 2.72 लाख टन, तमिलनाडु से 2.22 लाख टन, मध्य प्रदेश से 2.79 लाख टन, महाराष्ट्र से 2.81 लाख टन, जम्मू-कश्मीर से 1.12 लाख टन, आंध्र प्रदेश से 1.16 लाख टन और गोवा से 1.46 लाख टन बिका है। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने 21 जून को ओएमएसएस के तहत 95 लाख टन गेहूं बेचने का फैसला किया था। इसके तहत 85 लाख टन गेहूं की बिक्री बल्क कंज्यूमर को और 10 लाख टन की बिक्री स्मॉल ट्रेडर्स को करनी है। केंद्रीय पूल में पहली दिसंबर को 427.45 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक मौजूद है। कुल खाद्यान्न के स्टॉक में 280.47 लाख टन गेहूं और 146.98 लाख टन चावल मौजूद है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 314.78 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जो पिछले साल की समान अवधि के 296.09 लाख हैक्टेयर से ज्यादा है। चालू रबी में बुवाई क्षेत्रफल में हुई बढ़ोतरी से गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार होने का अनुमान है। मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2012-13 में 924.6 लाख टन गेहूं की पैदावार हुई है, जबकि वर्ष 2011-12 में देश में रिकॉर्ड पैदावार 948.8 लाख टन की हुई थी। (Business Bhaskar....R S Rana)

CCEA may consider tomorrow incentives for raw sugar export

New Delhi, Jan 29. The Cabinet Committee on Economic Affairs (CCEA) is likely to consider tomorrow a proposal to give a cash subsidy of Rs 2,000 per tonne for export of four million tonnes of raw sugar for a period of two years. "There are differences of opinion among the various ministries on the quantum of cash subsidy, which the CCEA will take a final call at tomorrow's meeting," sources said. The Food Ministry has proposed a cash incentive of Rs 2,000 per tonne to the beleaguered sugar industry for export of four million tonnes of raw sugar. Total subsidy outgo has been pegged at Rs 800 crore spread over two years to be adjusted from the Sugar Development Fund (SDF). But the Agriculture Ministry has a different view on the quantum of subsidy although the incentives proposed by the Food Ministry are in line with the recommendation made by a high-level informal group of ministers, headed by Agriculture Minister Sharad Pawar. In 2007-08, too government had given subsidy of Rs 1,450 per tonne to export six million tonnes of sugar. The current incentive is being worked on the same lines, sources said. Sources further said: "Pawar is in favour of a reasonable subsidy so that export of raw sugar kick starts. He in support of an incentive not less than Rs 3,500 per tonne." The industry body Indian Sugar Mills Association (ISMA) has also suggested an incentive of Rs 3,500 per tonne on raw sugar export in view of weak global prices. Currently, raw sugar exports from India are not viable as global prices are ruling much lower than the domestic production cost of Rs 26,500 per tonne. India, the world's second biggest sugar producer but largest consumer, does not manufacture raw sugar and only makes white sugar for domestic consumption. At present, sugar mills are facing cash crunch as sugar prices have come down below the cost of production in view of surplus supplies.They are also saddled with huge cane arrears. To improve cash flow of sugar mills, the government has already announced interest subsidy on bank loans to be availed by them exclusively for paying cane farmers. This has been done in line with the recommendation of the Pawar-headed panel.

Gold, silver fall on stockists selling, global cues

New Delhi, Jan 29. Gold prices decline for the second straight day by losing Rs 140 to Rs 30,360 per ten gram in the national capital today on sustained selling amid a weakening global trend. Silver also plunged by Rs 800 to Rs 44,200 per kg on poor offtake by industrial units and coin makers. A similar trend was seen in Mumbai as gold of 99.9 and 99.5 per cent purity fell by Rs 70 and Rs 75 to Rs 30,080 and Rs 29,925 per ten gram, respectively, while silver tumbled by Rs 850 to Rs 44,900 per kg on sustained stockists selling. Traders said sustained selling by stockists in line with a weak global trend, where gold dropped amid expectations that stimulus will be cut further as the US Federal Reserve decides on monetary policy, mainly dampened the sentiment. Gold in Singapore, which normally sets price trend on the domestic front, lost 0.6 per cent to USD 1,248.90 an ounce. Besides, strengthening rupee against the American currency which make the import of the dollar-priced precious metals cheaper further influenced the sentiment, they said. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity surrendered further by Rs 140 each to Rs 30,360 and Rs 30,160 per ten gram, respectively.It had lost Rs 70 yesterday. Sovereign, however, remained in some demand and advanced by Rs 50 to Rs 25,250 per piece of eight gram. In a similar fashion, silver ready dropped further by Rs 800 to Rs 44,200 per kg and weekly-based delivery by the same margin to Rs 44,100 per kg. The white metal had shed Rs 75 in the previous session. Silver coins too plunged by Rs 1,000 to Rs 86,000 for buying and Rs 87,000 for selling of 100 pieces.

28 January 2014

आभूषणों की बिक्री में भारी बढ़ोतरी

नोटों को वापस लेने पर जारी आरबीआई की घोषणा से कालाधन रखने वाले लोगों ने हड़बड़ी में सोमवार को आभूषणों की भारी खरीदारी की। इससे आभूषणों की बिक्री में 10-15 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई। कालाधन रखने वाले 2005 से पहले छपे नोटों को आभूषणों में तब्दील करने के लिए भारी संख्या में उमड़े। आभूषणों की भारी बिक्री के चलते सोमवार को देश में सोने की बिक्री पर प्रीमियम 33 फीसदी घटकर 80 डॉलर प्रति औंस पर आ गया, जो शुक्रवार को 120 डॉलर प्रति औंस था। खुदरा आभूषण विक्रेताओं और सराफा डीलरों ने कम कीमत के लालच में ग्राहकों को लुभाया। उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक की इस घोषणा से चिंता है कि 2005 से पहले के नोटों को 1 अप्रैल 2014 से वापस लेकर इनकी जगह नए नोट जारी किए जाएंगे, जिनमें सुरक्षा के कुछ फीचर्स जोड़े जाएंगे। आरबीआई के इस कदम का मकसद सिस्टम में कालेधन को आने से रोकना है। लेकिन कालाधन चरणबद्ध तरीके से आभूषण क्षेत्र में आने की संभावना है। शादी-विवाह का सीजन होने से बिक्री पहले ही अच्छी बनी हुई है, लेकिन आरबीआई की घोषणा के बाद बिक्री में और बढ़ोतरी होना काफी अहम है, क्योंकि खुदरा आभूषण विक्रेताओं का कारोबार पिछले 18 महीनों से कमजोर बना हुआ है। विशेष रूप से वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा सोने के आयात पर प्रतिबंध लगाने और आरबीआई के 80:20 की योजना लागू करने के बाद बिक्री कम हो गई थी। इस योजना के तहत आयातित सोने का 20 फीसदी हिस्सा निर्यातकों को उपलब्ध कराना अनिवार्य है। सोने की कम उपलब्धता से सोने की गढ़ाई कम हो गई थी। मुंबई के जवेरी बाजार में प्रमुख खुदरा आभूषण विक्रेता उमेदमल तिलकचंदजी जवेरी के निदेशक कुमार जैन ने कहा, 'बैंकों में 2005 से पहले के नोट सीधे नए नोटों मे बदले जा रहे हैं। इसलिए इन्हें लेने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन ऐसा लगता है कि आभूषण क्षेत्र में कालाधन आने लगा है, क्योंकि वैवाहिक सीजन की भारी मांग के अलावा बिक्री में 10-15 फीसदी की असामान्य बढ़ोतरी हुई है।' खरीदार 5 लाख रुपये से ज्यादा का एक बिल लेने से बच रहे हैं, क्योंकि इससे उन पर आयकर विभाग की नजर टिक जाएगी। 5 लाख रुपये से ज्यादा के आभूषण खरीदने पर स्थायी खाता संख्या (पैन) दिखाने की जरूरत होती है। एक आभूषण कंपनी के अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, 'इसलिए एक ग्राहक ही अपने परिवार के सदस्यों के नाम पर कई बिल लेता है। लेकिन वे चाहते हैं कि उनका बिल 5 लाख रुपये से नीचे रहे, जिसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन हम आयकर विभाग द्वारा किसी बिल की मांगी गई जानकारी के लिए उपलब्ध उपलबध विवरण मुहैया कराते हैं।' मुंबई के जवेरी बाजार में संगठित और असंगठित क्षेत्र के खुदरा आभूषण स्टोरों में ग्राहकों की आवक बढ़ी है और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से ज्यादातर वास्तविक खरीदार हैं और खरीदारी कर रहे हैं। 2005 से पहले के नोट लेकर भारी तादाद में ग्राहक आने शुरू हो गए हैं और 31 मार्च की अंतिम तिथि के नजदीक आने पर इसमें बढ़ोतरी होने की संभावना है। जैन ने कहा, 'इस समय ज्वैैलरों द्वारा ऐसे नोट स्वीकार करने के लिए कोई ऑफर नहीं दिया जा रहा है। लेकिन हम इस बात की संभावना से इनकार नहीं करते कि मार्च के अंत तक कटौती 15 फीसदी तक पहुंच सकती है।' इस बीच इस कारोबार के अन्य बहुत से ज्वैलरों ने विश्वस्त और लंबे समय से जुड़े हुए खरीदारों से भी 2005 से पहले के नोट लेना बंद कर दिया है, ताकि अनावश्यक दिक्कतों को टाला जा सके। एक ज्वैलर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, 'जोखिम लेने के बजाय सुरक्षित कदम उठाना बेहतर है।' पुण्य गोल्ड के निदेशक मुकेश मेहता के मुताबिक, 'हालांकि आभूषणों की बिक्री बढ़ी है, लेकिन इसका श्रेय 2005 से पहले के नोटों को देना मुश्किल है।' (BS Hindi)

सोने पर आयात शुल्क घटाने का कोई प्रस्ताव नहीं: चिदंबरम

उम्मीद कब तक अगले बजट में राहत पर हो सकता है विचार मार्च तक सीएडी की स्थिति स्पष्ट होगी वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि फिलहाल सोने के आयात शुल्क में कमी करने और दूसरी पाबंदियां हटाने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने दावोस में चल रहे वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम में एक भारतीय न्यूज चैनल को बताया कि जब तक करेंट एकाउंट डिफिशिट (सीएडी) पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ जाता है, तब तक इस तरह का कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। चिदंबरम ने कहा कि जब तक सीएडी पर पूरी नियंत्रण नहीं नियंत्रण नहीं हो जाएगा, तब तक तक किसी तरह की राहत देने के बारे में विचार नहीं किया जाएगा। सीएडी के बारे में हमारे पास स्पष्ट योजना है। अगले वित्त वर्ष 2014-15 का आम बजट पेश करते समय और चालू वित्त वर्ष की समाप्ति पर ही सोना आयात के बारे में कोई विचार हो सकता है। वित्त मंत्री से एक टीवी रिपोर्ट के बारे में सवाल किया गया था। रिपोर्ट आई थी कि कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने सरकार को पत्र लिखकर सोने के आयात पर लगी पाबंदियों में राहत देने का अनुरोध किया था। इस बर वित्त मंत्री ने कहा कि उन्होंने ऐसा कोई पत्र नहीं देखा है। देश में इस समय सोने पर 10 फीसदी आयात शुल्क लग रहा है। आयात शुल्क की यह दर रिकॉर्ड स्तर पर ऊंची है। इसके अलावा आयात किए गए सोने में से कम से कम 20 फीसदी ज्वैलरी के रूप में निर्यात किए जाने का भी नियम लागू किया गया है। पाबंदियां लगने से पहले भारत दुनिया का सबसे बड़ा सोना आयातक देश था। पिछले वित्त वर्ष में सरकार का सीएडी बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। (Business Bhaskar)

एनएसईएल व पीडी के बीच नहीं सुलझा मसला

करनाल की पी डी एग्रोप्रोसेसर्स (पीडी) और मुश्किल दौर से गुजर रहे नैशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल) के बीच अकाउंट सैटलमेंट का प्रस्ताव दावे की राशि में भारी अंतर के कारण परवान नहीं चढ़ सका। एनएसईएल ने दावा किया कि पीडी तीसरी सबसे बड़ी बकायेदार है, जिस पर 644.55 करोड़ रुपये बकाया हैं, जबकि बासमती चावल का उत्पादन करने वाली दुनार फूड्स लिमिटेड की प्रवर्तक पीडी ने 260 करोड़ रुपये एनएनईएल को चुकाने पर सहमति जताई। रोचक बात यह है कि दोनों पक्ष शुक्रवार को सैटलमेंट समझौता करने जा रहे थे। लेकिन अनिश्चितता की वजह से प्रस्ताव को टाल दिया गया, क्योंकि पीडी एनएसईएल से करीब 260 करोड़ रुपये की देनदारी पर संयुक्त बयान जारी करवाना चाहती थी। इस मामले की जांच कर रही मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने भी इस निपटारे को प्रोत्साहित किया था। ईओडब्ल्यू ने पीडी के 10 परिसरों पर छापेमारी की थी और इसके खाते फ्रीज कर दिए थे। पीडी के निदेशक अभिमन्यू अत्री ने कहा, 'एनएसईएल द्वारा जिस राशि का दावा किया जा रहा है, उसमें अनावश्यक आंकड़े भी शामिल हैं। उदाहरण के लिए एनएसईएल ने रोलओवर शुल्क की भारी राशि थोपी है। हमें ये शुल्क क्यों वहन करने चाहिए? हम वास्तविक राशि चुकाने को तैयार हैं, जो हमारे हिसाब से करीब 260 करोड़ रुपये है। इसलिए हमने एनएसईएल से संयुक्त बयान जारी करने की मांग की, जो उन्होंने अभी जारी नहीं किया है। उनकी ओर से बयान जारी होने पर हम तत्काल बकाये का भुगतान कर देंगे।' (BS Hindi)

पहली छमाही में एक अरब डॉलर के मसालों का निर्यात

अमेरिका बना रहा भारतीय मसालों का सबसे बड़ा आयातक चालू वित्त वर्ष 2013-14 की पहली छमाही अप्रैल-सितंबर के दौरान लाल मिर्च और जीरे का जोरदार निर्यात हुआ। इसकी बदौलत मसालों का कुल निर्यात इस अवधि में 31 फीसदी बढ़कर 3.78 लाख टन हो गया। इसकी कुल कीमत करीब एक अरब डॉलर है। स्पाइसेज बोर्ड के डायरेक्टर (मार्केटिंग) के. सी. बाबू ने बताया कि मसालों के निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी में लाल मिर्च और जीरे का सबसे ज्यादा योगदान रहा। देश में बेहतरीन किस्म के मसालों का उत्पादन होता है। अमेरिका जैसे तमाम देशों में इनकी जोरदार मांग रही। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 78. 75 करोड़ डॉलर के मसालों का निर्यात किया गया था। बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में जीरे का निर्यात 93 फीसदी ज्यादा रहा जबकि लाल मिर्च के निर्यात में 6 फीसदी का इजाफा हुआ। इसके अलावा काली मिर्च, हल्दी, इलायची और सौंफ के निर्यात में बढ़ोतरी हुई। मात्रा के लिहाज से मसालों का निर्यात 3.14 लाख टन से बढ़कर 3.78 लाख टन हो गया। इस दौरान भारतीय मसालों का सबसे बड़ा खरीदार अमेरिका ही बना रहा। इसके अलावा मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, चीन, जर्मनी, सिंगापुर और ब्रिटेन भारतीय मसालों के बड़े आयातक देश हैं। पिछले वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान मसालों का निर्यात 22 फीसदी बढ़कर 699,170 टन हो गया था। इस दौरान मसाला निर्यात मूल्य के हिसाब से 14 फीसदी बढ़कर 11,171.16 करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2011-12 के दौरान 9783.42 करोड़ रुपये मूल्य के मसालों का निर्यात किया गाय था। (Business Bhaskar)

चीनी मिलों को 800 करोड़ का एक और पैकेज देने की तैयारी

आर एस राणा : नई दिल्ली... | Jan 28, 2014, 16:21PM IST 2,000 रुपये प्रति टन की दर से मिलेगा इंसेंटिव 20 लाख टन रॉ शुगर निर्यात होगा चालू सीजन में 40 लाख टन कुल रॉ शुगर निर्यात के लिए पैकेज 800 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा शुगर डेवलपमेंट फंड पर आर्थिक घाटे से जूझ रही चीनी मिलों को केंद्र सरकार ने ओर 800 करोड़ रुपये का राहत पैकेज देने की तैयारी कर ली है। चीनी मिलों को 40 लाख टन रॉ-शुगर के निर्यात पर 2,000 रुपये प्रति टन की दर से इंसेंटिव देने की योजना बनाई है। इस पर आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की आगामी बैठक में फैसला होने की संभावना है। केंद्र सरकार ने इससे पहले 19 दिसंबर 2013 को चीनी मिलों को 6,600 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त ऋण का पैकेज देने का फैसला किया था। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि मंत्रालय ने चीनी मिलों को 40 लाख टन रॉ-शुगर के निर्यात पर 2,000 रुपये प्रति टन की दर से इंसेंटिव देने का प्रस्ताव तैयार किया है। इससे केंद्र सरकार पर करीब 800 करोड़ रुपये की सब्सिडी का अतिरिक्त भार पड़ेगा। हालांकि इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) ने 40 लाख टन रॉ-शुगर के निर्यात पर 3,500 रुपये प्रति टन की दर से इंसेंटिव देने की मांग खाद्य मंत्रालय के समक्ष उठाई थी। खाद्य मंत्रालय द्वारा तैयार प्रस्ताव में चालू पेराई सीजन 2013-14 के लिए 20 लाख टन और आगामी पेराई सीजन 2014-15 के लिए 20 लाख टन रॉ-शुगर के निर्यात पर इंसेंटिव दिया जायेगा। चीनी मिलें इसके तहत रॉ-शुगर का ही निर्यात करें, इसलिए इसकी निगरानी वाणिज्य मंत्रालय करेगा। चीनी मिलों को रॉ-शुगर निर्यात के लिए वाणिज्य मंत्रालय के पास रजिस्ट्रेशन कराना होगा। उन्होंने बताया कि चीनी मिलों को मार्केटिंग एंड प्रमोशन के आधार पर रॉ-शुगर के निर्यात पर इंसेंटिव देने का प्रस्ताव है। चीनी मिलों को 40 लाख टन रॉ-शुगर के निर्यात पर इंसेंटिव का भुगतान शुगर डवलपमेंट फंड (एसडीएफ) से किया जायेगा। खाद्य मंत्रालय द्वारा तैयार नोट के अनुसार यह योजना 6 दिसंबर 2013 या फिर अधिसूचना जारी होने वाली तारीख से इसे लागू की जाएगी। हालांकि कृषि मंत्रालय चालू पेराई सीजन 2013-14 में पहली अक्टूबर से इस योजना को लागू कराना चाहता है। कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता में अनौपचारिक मंत्रियों का समूह (जीओएम) 40 लाख टन रॉ-शुगर के निर्यात पर इंसेंटिव देने के प्रस्ताव को पहले ही हरी झंडी दे चुका है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2007-08 में भी 60 लाख टन चीनी के निर्यात पर करीब 1,450 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी थी। इस्मा के अनुसार चालू पेराई सीजन 2013-14 में 250 लाख टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है। हालांकि मिलों में पेराई देरी से आरंभ होने के कारण 15 जनवरी तक चीनी उत्पादन 21 फीसदी घटकर 85.50 लाख टन का ही हुआ है। (Business Bhaskar.....R S Rana)

25 January 2014

सोना छुएगा 1,330 डॉलर का स्तर!

चालू तिमाही में सोना वर्तमान कीमत स्तर से 5 फीसदी बढ़कर वर्ष के सर्वोच्च स्तर 1,330 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच सकता है। थॉमसन रॉयटर्स जीएफएमएस के एक अध्ययन में कहा गया है कि आभूषणों की गढ़ाई में अच्छी मांग के चलते भारी हाजिर खरीदारी से सोने में मजबूती आएगी। फिलहाल लंदन के हाजिर बाजार में पीली धातु 1,260 डॉलर प्रति औंस है। इस तरह भारत में इसका भाव 30,000 रुपये प्रति 10 ग्राम बैठता है। 10 फीसदी आयात शुल्क और इस समय बने हुए 120 डॉलर प्रति औंस के प्रीमियम से भारतीय बाजार में सोने की कीमत कम से कम 1,300 रुपये प्रति 10 ग्राम ज्यादा रहेगी। कीमतों में भारी गिरावट आने से निजी निवेशक बड़ी मात्रा में सोना खरीद रहे हैं, लेकिन पेशेवर निवेशक खरीदारी से पूरी तरह दूरी बनाए हुए हैं। यह स्थिति 2014 में भी बनी रहने की संभावना है। लेकिन 2014 की पहली तिमाही में शॉर्ट कवरिंग रैली की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जो सोने के हाल में 1,185 डॉलर प्रति औंस पर स्थिर होने से हो सकती है। अध्ययन में कहा गया है, 'इसलिए संभव है कि चालू तिमाही के समाप्त होने से पहले सोना 1,330 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर पहुंचे। 2008 से 2011 तक सोना उच्च स्तर पर रहा, लेकिन इसके बाद यह स्तर फिर हासिल नहीं कर पाया है और इस साल भी इसके ऐसा कर पाने की संभावना नहीं है।' जिस तरह दूसरी तिमाही में कीमतें गिरी थीं, वैसा अमेरिका के बॉन्ड खरीद में कमी करने का सोने के बाजार पर असर नहीं पड़ा है। इसका असर इतना पड़ा कि एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों (ईटीएफ) ने 2013 के दौरान जहां 880 टन सोना बेचा, वहीं सोने की बार होर्डिंग पूर्वी एशिया, भारतीय उपमहाद्वीप और पश्चिम एशिया में 1,066 टन और पूरे विश्वभर में कुल 1,338 टन रही। वर्ष 2013 में सोने में हुए भौतिक निवेश में ईटीएफ होल्डिंग और बार होर्डिंग की मांग 458 टन रही, जो 2012 में 1,285 टन थी। अमेरिका मे बॉन्ड खरीद कम से कम 2014 के अंत तक जारी रहने की संभावना है। तब तक ब्याज दरों के बारे दिशानिर्देश घोषित हो सकते हैं। सुधरते आर्थिक रुझानों से निवेशकों को जोखिम लेने की प्रेरणा मिलेगी, इसलिए सोने में भारी निवेश की संभावना नहीं है। हालांकि सोने में वर्ष के शुरुआत में कुछ तेजी आ सकती है, लेकिन यह 2011 के बाद आई गिरावट की भरपाई नहीं कर पाएगी। थॉमसन रॉयटर्स के प्रमुख (धातु शोध एवं अनुमान) रहोना ओ कोन्नेल ने कहा, 'निवेश मांग कम है, इसलिए सोना हाल के वर्षों के रुझान के बजाय परंपरागत सीजनल पैटर्न दिखाएगा। यह इस ओर इशारा करता है कि निवेशकों के दूरी बनाने से दूसरी और तीसरी तिमाही में थोड़े समय के लिए सोना 1,000 डॉलर के स्तर तक भी गिर सकता है। लेकिन अच्छी हाजिर मांग की वजह से सोना इस स्तर पर ज्यादा समय नहीं टिकेगा।' इस साल सोना अन्य परिसंपत्ति वर्गों से पीछे रहेगा, लेकिन अच्छी हाजिर मांग से इस साल औसत कीमत ठीक रहेगी। वर्ष 2013 के दौरान आभूषणों की गढ़ाई सबसे ज्यादा चीन में हुई, जिसका विश्व में हुए आभूषणों के कुल विनिर्माण में 33 फीसदी हिस्सा रहा। लेकिन भारत में सरकार के सोने के आयात पर प्रतिबंध लगाने से आभूषण उद्योग की वृद्धि कमजोर पड़ी। चीन और भारत में विश्व के 51 फीसदी आभूषणों का विनिर्माण होता है। (BS Hindi)

एमसीएक्स बना रहेगा प्रतिभूति बाजार में

एमसीएक्स के शेयरधारकों ने प्रतिभूति बाजार से हटने का प्रस्ताव खारिज कर दिया है। देश के इस सबसे बड़े जिंस वायदा एक्सचेंज की एमसीएक्स-एसएक्स में 5 फीसदी हिस्सेदारी है। एमसीएक्स-एसएक्स में जिग्नेश शाह प्रवर्तित फाइनैंशियल टेक्नोलॉजिस (एफटीआईएल) का भी 5 फीसदी हिस्सा है। एमसीएक्स ने मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन (एमओए) के मुख्य उद्देश्यों में से 'सिक्योरिटी' और 'रेडी' शब्दों को हटाकर इसमें संशोधन का प्रस्ताव रखा था। इन उद्देश्यों में कहा गया है कि एक्सचेंज किन क्षेत्रों में काम कर सकता है। 68.5 फीसदी शेयरधारकों ने इस कदम के खिलाफ मत दिया। एमसीएक्स ने मत पेटियों के नतीजों की घोषणा बीएसई को दी सूचना में की है। इसका मतलब है कि एमसीएक्स स्टॉक एक्सचेंज के कारोबार में बना रह सकता है, जो प्रतिभूतियों से संबंधित है। एमसीएक्स के पास स्टॉक एक्सचेंज में अपनी हिस्सेदारी के बदले मिले वारंट भी हैं, जिन्हें एक्सचेंज ने हिस्सेदारी घटाने की नियामकीय शर्तों को पूरा करने के लिए कम कर दिया है। (BS Hindi)

विदेश में तेजी आने से घरेलू बाजार में भी महंगी हुई कपास

आर एस राणा : नई दिल्ली... | Jan 24, 2014, 01:03AM IST पैदावार : मौजूदा वर्ष में कपास उत्पादन 353 लाख गांठ होने का अनुमान विदेश में कपास 5 सेंट बढ़कर 89 सेंट प्रति पाउंड हो गई निर्यात फायदेमंद होने से निर्यातकों की मांग सुधरी मिलों ने भी कपास की खरीद तेज कर दी भाव बढ़कर 43500 रुपये प्रति कैंडी मजबूत मांग से भाव में आगे भी तेजी की संभावना निर्यातकों के साथ घरेलू मिलों की मांग बढऩे से कपास की कीमतों में और भी तेजी की संभावना है। चालू महीने में उत्पादक मंडियों में कपास की कीमतों में करीब 3,000 रुपये से ज्यादा की तेजी आकर गुरुवार को भाव 43,000 से 43,500 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) हो गए। अक्टूबर से शुरू हुए नए फसल सीजन में अभी तक करीब 45 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास की शिपमेंट हो चुकी है। कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (सीसीआई) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि कपास में चीन, पाकिस्तान, टर्की और बांग्लादेश के आयातकों की अच्छी मांग बनी हुई है जबकि उत्पादक मंडियों में दैनिक आवक पहले की तुलना में घटी है। चालू फसल सीजन 2013-14 (अक्टूबर से सितंबर) में अभी तक करीब 60 लाख गांठ कपास के निर्यात सौदों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है तथा 45 लाख गांठ की शिपमेंट भी हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास का भाव 22 जनवरी को बढ़कर 89 सेंट प्रति पाउंड हो गया। सप्ताहभर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास के दाम करीब 5 सेंट प्रति पाउंड बढ़े हैं। निगम ने चालू फसल सीजन में अभी तक 2 लाख गांठ कपास की व्यावसायिक खरीद की है तथा इसमें से करीब 65,000 गांठ की बिक्री भी कर दी है। नॉर्थ इंडिया कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश राठी ने बताया कि विदेशी बाजार में दाम बढऩे से कपास के निर्यात सौदों में तेजी आई है। उत्पादक मंडियों में चालू महीने में कपास की कीमतों में करीब 3,000 रुपये प्रति कैंडी की तेजी आ चुकी है। अहमदाबाद में गुरुवार को शंकर-6 किस्म की कपास का भाव बढ़कर 43,000 से 43,500 रुपये प्रति कैंडी हो गया। कीमतों में आई तेजी के साथ ही मौसम खराब होने के कारण भी उत्पादक मंडियों में कपास की दैनिक आवक घटी है तथा घरेलू यार्न मिलों की मांग भी अच्छी बनी हुई है। ऐसे में घरेलू बाजार में कपास की मौजूदा कीमतों में और तेजी की संभावना है। मुक्तसर कॉटन प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर नवीन ग्रोवर ने बताया कि चालू सीजन में उत्पादक मंडियों में अभी तक 140 लाख गांठ कपास की आवक हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 160 लाख गांठ की आवक हो चुकी थी। कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2013-14 में कपास की पैदावार 353 लाख गांठ होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2012-13 में 340 लाख गांठ की पैदावार हुई थी। उधर, कॉटन एडवायजरी बोर्ड (सीएबी) के अनुसार चालू सीजन में कपास की पैदावार 375 लाख गांठ होने का अनुमान है। (Business Bhaskar....R S Rana)

रबी फसलों की बुवाई में पांच फीसदी की बढ़ोतरी

गेहूं का रकबा 296 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 314 लाख हैक्टेयर अनुकूल मौसम से चालू रबी में जिंसों की बुवाई में 5.2 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल बुवाई 635.13 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 603.39 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। रबी की प्रमुख फसल गेहूं के साथ ही चना और सरसों की बुवाई पिछले साल की तुलना में ज्यादा हुई है। रबी की प्रमुख फसल गेहूं की बुवाई बढ़कर 314.78 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 296.09 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। चने की बुवाई पिछले साल के 93.29 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 101.23 लाख हैक्टेयर में और सरसों की बुवाई 67.04 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 71.07 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। दलहन की कुल बुवाई चालू रबी में पिछले साल के 149.02 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 156.57 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। रबी दलहन में चना की बुवाई तो बढ़ी है लेकिन उड़द की बुवाई पिछले साल से घटी है। मोटे अनाजों की कुल बुवाई चालू रबी में पिछले साल के 61.92 लाख हैक्टेयर से घटकर 60.12 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है। ज्वार की बुवाई पिछले साल के 38.79 लाख हैक्टेयर से घटकर 36.24 लाख हैक्टेयर में हुई है। जौ की बुवाई 7.94 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 8.04 लाख हैक्टेयर में और मक्का की बुवाई पिछले साल के 14.27 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 15.09 लाख हैक्टेयर में हुई है। रबी धान की रोपाई चालू रबी में पिछले साल के 10.73 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 15.26 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। चालू रबी में देशभर में 88.40 लाख हैक्टेयर में तिलहनों की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 85.65 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। सरसों की बुवाई तो बढ़ी है लेकिन मूंगफली की बुवाई घटी है। मूंगफली की बुवाई पिछले साल के 7.89 लाख हैक्टेयर से घटकर 6.92 लाख हैक्टेयर में और सनफ्लावर की बुवाई पिछले साल के 4.77 लाख हैक्टेयर से घटकर 4.05 लाख हैक्टेयर में हुई है। (Business Bhaskar....R S Rana)

सिंजेंटा पर जीएम मक्का बीज की बिक्री रोकने का दबाव

चीन को लेकर मुश्किल अमेरिका के दो संगठनों ने बीजों की बिक्री रोकने की मांग उठाई चीन में सिंजेंटा की दो जीएम मक्का किस्मों को नहीं मिली मंजूरी प्रतिबंधित विपटेरा मक्का की खेपें रद्दा हो रही हैं चीन में इससे अमेरिका में उत्पादकों और कारोबारियों को भारी नुकसान अमेरिका में अनाज उत्पादकों के दो संगठनों ने सिंजेंटा एजी से मक्का की दो जेनेटिकली मॉडीफाइनड (जीएम) किस्मों की व्यावसायिक खेती रोकने की मांग की है। चीन की सरकार ने अभी तक दुनिया की सबसे बीज कंपनी सिंजेंटा द्वारा विकसित मक्का की इन किस्मों को मंजूरी नहीं दी है। इन किस्मों की मक्का की खेपें चीन सरकार नामंजूर कर रही है। पिछले नवंबर से इन दोनों किस्मों वाली मक्का की खेपें चीन में रद्द होने के कारण उत्पादकों के संगठनों ने सिंजेंटा से अनुरोध किया है। नवंबर से अब तक चीन के अधिकारी करीब छह लाख टन अमेरिकी मक्का रद्द कर चुके हैं। यह मक्का सिंजेंटा द्वारा विकसित एग्रीस्योर विपटेरा जीएम (एमआईआर 162 के रूप में प्रचलित) किस्म की है। दो वर्षों से ज्यादा समय से मक्का की इस किस्म को चीन में मंजूरी मिलने की प्रतीक्षा की जा रही है। अमेरिका में 2010 में इसे मंजूरी दे चुका है। नेशनल ग्रेन एंड फीड एसोसिएशन (एनजीएफए) और नॉर्थ अमेरिकन एक्सपोर्ट ग्रेन एसोसिएशन (एनएईजीए) ने सिंजेंटा को पत्र लिखा है कि जब तक चीन और दूसरे आयातक मंजूरी नहीं दे देते हैं, तब तक विपटेरा और ड्यूरासेड किस्मों की मक्का की खेती स्थगित रखनी चाहिए। विपटेरा किस्म की खेती अमेरिका, अर्जेंटीना और ब्राजील में पिछले तीन वर्षों से हो रही है। सिंजेंटा कॉर्प के प्रवक्ता पॉल माइनहर्ट ने कहा कि अमेरिका में हमारी मार्केटिंग योजना बदलने से अब प्रचलित अनाज किस्मों और चीन द्वारा मक्का आयात पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उधर, अनाज उत्पादकों के संगठनों का कहना है कि आयातक देशों में मंजूरी मिलने से पहले जीएम बीजों की बिक्री शुरू होने से निर्यात बाजार पर खतरा पैदा हो गया है। दोनों ही संगठन मौजूदा स्थिति से अत्यंत चिंतित हैं। सिंजेंटा के मौजूदा नजरिये की वजह से निर्यातकों, कारोबारियों और अंतत: उत्पादकों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। सिंजेंटा इस साल ड्यूरासेड किस्म की मक्का लांच करने वाला है। बुधवार को भेजे पत्र में उत्पादक संगठनों ने कहा है कि इससे जोखिम बढ़ जाएगा और नुकसान भी कहीं ज्यादा होगा। तात्कालिक रूप से आवश्यक है कि कंपनी इस नुकसान को रोकने का कदम उठाए। दूसरी ओर चीन की सरकार तक तक किसी जीएम किस्मों का पुनरीक्षण शुरू नहीं करती है, जब तक अमेरिकी सरकार उसे मंजूरी न दे दे। ड्यूरासेड के मामले में अमेरिका ने फरवरी 2013 में मंजूरी दी थी। इसके बाद कंपनी ने मार्च 2013 में चीन में इसके परीक्षण के लिए आवेदन किया। कंपनी के प्रवक्ता का कहना है कि असली मसला आयातक देशों में मंजूरी के लिए प्रक्रिया एक साथ शुरू न होने की है। उत्पादक देशों से खरीद के लिए आयातक देशों को अपनी नियामक संबंधी प्रक्रिया समन्वित तरीके से पूरी करनी चाहिए, जिससे बाजार में समय पर नई तकनीक का माल आ सके और कारोबार में कोई बाधा न हो। एनजीएफए के अध्यक्ष रैंडी गॉर्डन ने एक इंटरव्यू में कहा कि कंपनी ने 2014 में ड्यूरासेड लांच करने के लिए जो समय रखा है, वह मंजूरियों के लिए पर्याप्त नहीं है। चीन में इसको मंजूरी मिलने में ज्यादा समय लग सकता है। उन्होंने कहा कि चिंताओं पर सिंजेंटा को अवगत कराने के लिए संगठनों को और ज्यादा बातचीत करने की जरूरत होगी। संगठनों ने किसानों से भी अपील की है कि वह 2014 की मक्का फसल बोने से पहले समूचे मुद्दे की आकलन कर लें। नेशनल कॉर्न ग्रोवर्स एसोसिएशन ने कहा है कि उसे कोई समाधान निकलने की उम्मीद है जिससे उत्पादक नई तकनीक का लाभ ले सकें और वैश्विक व्यापार सुचारु रूप से चल सके। (Business Bhaskar)

Gold extends gains for 2nd day on sustained buying,global cues

New Delhi, Jan 25. Gold prices gained further by Rs 130 to Rs 30,500 per 10 grams in the national capital today on sustained buying by stockists in line with firm global trend. However, silver held steady at Rs 45,000 per kg on lack of buying support from industrial units and coin makers. Traders said sustained buying by stockists in line with a firming global trend as declines in global equities spurred demand for the metal as an alternative investment, mainly boosting the sentiment. Gold in New York, which normally set price trend on the domestic front, advanced 0.2 per cent to USD 1,264.50 an ounce. Weak rupee against the American currency which make the import of the dollar-priced precious metals costlier further influenced the sentiment, they said. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity advanced by Rs 130 each to Rs 30,500 and Rs 30,300 per 10 grams, respectively. It had gained Rs 200 in yesterday. Sovereigns followed suit and rose by Rs 50 to Rs 25,150 per piece of eight grams. On the other hand, silver ready held steady at Rs 45,000 per kg , while weekly-based delivery lost Rs 260 at Rs 44,690 per per kg. Silver coins maintained steady trend at Rs 86,000 for buying and Rs 87,000 for selling of 100 pieces in restricted buying activity at prevailing higher levels.

23 January 2014

Gold rises from two-week low as investors weigh demand

London, Jan 23. Gold today climbed from the lowest price in almost two weeks as investors weighed signs of stronger physical demand in China and expectations that the US Federal Reserve will reduce stimulus. Gold added 0.7 per cent to USD 1,246.18 an ounce. Prices earlier today dropped to USD 1,231.85, the lowest since January 10. Silver rose by 1.6 per cent to USD 20.11 an ounce. In China, which probably overtook India as the biggest bullion consumer last year, volumes for the benchmark contract on the Shanghai Gold Exchange were the most since January 6, when levels reached an eight-month high. China is the fifth- biggest holder by country, World Gold Council data show. Bullion slid 28 per cent last year, the most since 1981, as some investors lost faith in the metal as a store of value. Fed policy makers said they would cut monthly bond purchases to USD 75 billion from USD 85 billion purchases.

Gold falls on sluggish demand, global cues

New Delhi, Jan 23. Gold fell by Rs 30 to Rs 30,170 per ten grams in the national capital today due to slackened demand at prevailing higher levels amid a weak global trend. However, silver held steady at Rs 44,500 per kg on lack of buying support from industrial units and coin makers. A similar trend was witnessed in Mumbai as gold declined on fresh selling while silver held steady in limited deals. Gold of 99.9 and 99.5 per cent purity traded lower by Rs 105 each to Rs 29,925 and Rs 29,775 per ten grams but silver remained unchanged at Rs 45,250 per kg. Traders said besides sluggish demand at prevailing higher levels, weak global trend where gold dropped to a two-week low, mainly led to the fall in gold prices. Gold in Singapore, which normally sets price trend at the domestic front, fell by 0.4 per cent to USD 1,231.85 an ounce, the lowest level since January 10. At the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity fell by Rs 30 each to Rs 30,170 and Rs 29,970 per ten grams, respectively, while sovereign remained steady at Rs 25,100 per piece of eight grams. On the other hand, silver ready held steady at Rs 44,500 per kg while weekly-based delivery declined by Rs 120 to Rs 44,250 per kg on lack of buying support by speculators. Silver coins remained flat at Rs 86,000 for buying and Rs 87,000 for selling of 100 pieces

बेमौसम बारिश से होगा जीरे को नुकसान!

पिछले कुछ दिनों के दौरान बेमौसम बारिश से खेतों में खड़ी जीरे और तंबाकू की फसल को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि यह गेहूं और रबी की अन्य फसलों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। आणंद कृषि विश्वविद्यालय (एएयू) के कुलपति ए एम शेख ने कहा, 'हाल में हुई बारिश से मिट्टी में नमी बढ़ेगी। लेकिन इसका नकारात्मक पहलू यह है कि जमीन में नमी से खेतों में खड़ी जीरे और तंबाकू जैसी फसलों में बीमारियों को बढ़ावा मिल सकता है।' उन्होंने कहा कि इस बारिश से जीरे की फसल को और ज्यादा नुकसान पहुंचने की आशंका है। शेख के मुताबिक वातावरण में नमी के कारण आम में फूल आने पर असर पड़ सकता है। गुजरात के कृषि मंत्री गोविंद पटेल ने कहा, 'अभी फसल को नुकसान पहुंचने की कोई खबर नहीं है, लेकिन हाल में हुई बेमौसम बारिश से जीरा, धनिया और सौंफ जैसी फसलों को नुकसान पहुंच सकता है।' राजकोट में कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक पी डी राठौड़ ने दावा किया, 'हाल की बारिश से करीब 5-10 फीसदी जीरे की फसल को नुकसान पहुंच सकता है और यदि बारिश आगे भी जारी रही तो जीरे को और ज्यादा नुकसान होगा।Ó उन्होंने कहा कि जीरे की फसल में कुम्हलाने की बीमारी होने की आशंका है। 20 जनवरी तक गुजरात में जीरे की बुआई 4,55,000 हेक्टेयर में हो चुकी थी, जो पिछले साल इस समय तक 3,35,200 हेक्टेयर थी। इसी तरह गेहूं की बुआई 14.1 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जो पिछले साल की समान अवधि में 10.4 लाख हेक्टेयर थी। राज्य में तंबाकू की बुआई 949 हेक्टेयर में पूरी हो चुकी है। जीरे की फसल को नुकसान पहुंचने की आशंका से इस जिंस की कीमतें चढ़ गई हैं। पिछले दो दिनों के दौरान जीरे का भाव 50 रुपये बढ़कर 2,200-2,350 रुपये प्रति 20 किलोग्राम हो गया है। ऊंझा के एक जीरा कारोबारी ने कहा, 'गुजरात में बेमौसम बारिश के बाद बाजार की धारणा बदली है और जीरे की कीमत बढ़ी है।' गुजरात कृषि विभाग के मुताबिक 2013-14 में रबी सीजन की बुआई 6 जनवरी तक 38,4 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जो पिछले साल की समान अवधि में 29.6 लाख हेक्टेयर थी। (BS Hindi)

नवंबर तक चाय उत्पादन 7.5 करोड़ किलो ज्यादा

भारतीय चाय उद्योग ने इस साल नवंबर तक चाय का उत्पादन 100 करोड़ किलोग्राम से ज्यादा दर्ज किया है, जो पिछले साल के पूरे वर्ष के उत्पादन से थोड़ा ही कम है। इंडियन टी एसोसिएशन (आईटीए) के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी से नवंबर तक देशभर में चाय का उत्पादन 106.60 करोड़ किलोग्राम रहा है, जबकि पिछले वर्ष जनवरी से दिसंबर तक उत्पादन 112.60 करोड़ किलोग्राम रहा था। नवंबर तक का उत्पादन पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 7.5 करोड़ किलोग्राम ज्यादा है। टी बोर्ड ऑफ इंडिया ने पत्तियां खरीदने वाली फैक्टरियों को शामिल करने के लिए अपने 2011 के आंकड़ों में संशोधन किया है। पत्तियां खरीदने वाली फैक्टरियां वे छोटी उत्पादक हैं, जो अपनी फैक्टरियों में प्रसंस्करण होने वाली करीब दो-तिहाई पत्तियां अन्य उत्पादकों से खरीदती हैं। उद्योग के एक प्रतिनिधि ने कहा, 'अगर यह रुझान जारी रहा तो हम उत्पादन का नया रिकॉर्ड बना सकते हैं। हालांकि दिसंबर के दौरान आईटीए के उत्तरी भारत के कुछ सदस्यों की फसल को नुकसान पहुंचा है।' नवंबर तक उत्तरी भारत का उत्पादन 7.05 करोड़ किलोग्राम ज्यादा था। हालांकि नवंबर में उत्पादन 58.8 लाख किलोग्राम कम रहा। दक्षिण भारत में उत्पादन नवंबर तक 45.5 लाख किलोग्राम ज्यादा उत्पादन दर्ज किया है। वहीं इस दौरान पूरे विश्व में चाय का उत्पादन 15.2 करोड़ किलोग्राम ज्यादा दर्ज किया गया है। ज्यादा उत्पादन के बावजूद नीलानी कीमत ऊंची बनी हुई है। इसकी संभावित वजह उद्योग के तंत्र में अल्पआपूॢर्त थी। इस सीजन की शुरुआत 10 करोड़ किलोग्राम कम चाय के साथ हुई थी। पूरे भारत में नीलामी की औसत कीमत 128.97 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो 8.22 रुपये प्रति किलोग्राम ज्यादा है। वर्ष 2013-14 में अप्रैल से नवंबर तक कीमतें 131.61 रुपये प्रति किलोग्राम थीं, जो 1.76 रुपये प्रति किलोग्राम ज्यादा हैं। दार्जिलिंग की चाय की कीमत जनवरी से नवंबर के दौरान गिरकर 324.51 रुपये प्रति किलोग्राम रही, जो पहले 372.43 रुपये प्रति किलोग्राम थी। भारत का निर्यात सितंबर तक 67 लाख किलोग्राम ज्यादा था, जबकि आयात 13.3 लाख किलोग्राम अधिक था। (BS Hindi)

21 January 2014

Gold, silver fall on fresh selling by stockists

New Delhi, Jan 21. Snapping its two-day rising streak, gold prices fell by Rs 20 to Rs 30,180 per ten grams in the national capital today on selling by stockists at existing higher levels amid a weak global trend. Silver followed suit and lost Rs 350 at Rs 44,900 per kg on lack of buying support from industrial units and coin makers. The two precious metals also fell in Mumbai on fresh wave of selling by stockists. Gold of 99.9 and 99.5 per cent purity fell by Rs 60 each to Rs 30,110 and Rs 29,960 per ten grams and silver lost Rs 350 at Rs 45,650 per kg. Traders said selling by stockists in line with a weak global trend led to decline in gold and silver prices. Gold in Singapore, which normally sets price trend on the domestic front, fell by 0.3 per cent to USD 1,251.34 an ounce and silver by 0.5 per cent to USD 20.21 an ounce. At the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity declined by Rs 20 each to Rs 30,180 and Rs 29,980 per ten grams, respectively. It had gained Rs 230 in last two sessions. Sovereign also moved up by Rs 100 to Rs 25,100 per piece of eight grams. In a similar fashion, silver ready dropped by Rs 350 to Rs 44,900 per kg and weekly-based delivery by Rs 380 to Rs 44,820 per kg. The white metal had gained Rs 650 in the previous two sessions. Silver coins, however, held steady at Rs 86,000 for buying and Rs 87,000 for selling of 100 pieces in restricted buying.

संकट में फंसा जूट उद्योग

जूट आयुक्त ने जूट उद्योग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यह ज्यादा ऊंची कीमत हासिल करने के लिए जूट की बोरियों को खुले बाजार में बेचकर अपनी आपूर्ति प्रतिबद्धता को तोड़ रहा है। ये बोरियां सरकारी खरीद एजेंसियों को आपूर्ति करने के लिए थीं, जिनका इस्तेमाल 2012-13 के दौरान खाद्यान्न की भराई के लिए किया जाना था। उद्योग पर आरोप है कि इसने आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) द्वारा लिए गए फैसलों पर भ्रामक बयान जारी किए हैं। 28 नवंबर को सीसीईए ने जूट पैकेजिंग मैटेरियल्स ऐक्ट (जेपीएमए) को अनारक्षित करने का फैसला लिया था और प्लास्टिक कट्टों के इस्तेमाल की स्वीकृति दी थी। समिति ने अधिनियम में बदलाव करते हुए 2013-14 के दौरान देश में उत्पादित 80 फीसदी चीनी और 10 फीसदी अनाज की भराई जूट बोरियों में भराई का प्रावधान किया था। अधिनियम के तहत सरकारी खरीद एजेंसियों के लिए पूरे अनाज और चीनी की भराई जूट बोरियों में करना अनिवार्य है। वहीं जूट बोरियों की मांग में 9 लाख गांठ की भारी गिरावट के चलते इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन ने अनिवार्य पैकेजिंग में कटौती के आदेश को पलटने की मांग की है। केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय को भेजे पत्र में जूट आयुक्त सुब्रत गुप्ता ने कहा कि 2012-13 में जूट मिलों ने अपना माल खुले बाजार में बेचने को तरजीह दी और इस तरह उन्होंने खाद्यान्न की भराई के लिए सरकार को बोरियों की निर्धारित मात्रा में आपूर्ति नहीं की। इस स्थिति का सामना करने के लिए सरकार को आरक्षित आदेश को पलटने के लिए बाध्य होना पड़ा। वर्ष 2012-13 में सीसीईए ने चीनी की भराई के लिए 60 फीसदी और अनाज की भराई के लिए 10 फीसदी प्लास्टिक बोरियों के इस्तेमाल का फैसला लिया था। गुप्ता ने कहा कि ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो यह साबित करते हैं कि जूट उद्योग आपूर्ति करने में असमर्थ रहा है, इसलिए सरकार ने प्लास्टिक कट्टों के इस्तेमाल का फैसला लिया है। खरीफ 2012-13 में खाद्यान्न की भराई में करीब 3,50,000 गांठ (180 किलोग्राम प्रति गांठ) और 2013-14 में 8,61,000 गांठ गैर-जूट सामग्री का इस्तेमाल किया गया। जूट आयुक्त कार्यालय के मुताबिक नवंबर 2012 और अप्रैल 2013 के बीच माह के अंत में जूट बोरियों की बकाया आपूर्ति 3 से 45 फीसदी रही। हालांकि जूट उद्योग ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है। हेस्टिंग्स जूट मिल के प्रबंध निदेशक संजय कजारिया ने कहा, 'जूट उद्योग ने अपनी आपूर्ति प्रतिबद्धता में कोताही नहीं बरती है।' (BS Hindi)

एफएमसी ने जिंस वायदा में सतत कारोबार को मंजूरी दी

एफएमसी ने जिंस वायदा में सतत कारोबार को मंजूरी दी भाषा / नई दिल्ली January 21, 2014 Ads by Google Get New Customers Online : Advertise On Google. Get 2000 INR Advertising Credit When You Sign-Up www.google.com/AdWords जिंस बाजार के नियामक एफएमसी ने सालाना आधार पर अनुमति देने के बजाय एमसीएक्स, एनसीडीईएक्स, एनएमसीई और एसीई जैसे चार एक्सचेंजों को कुछ निश्चित समूह के वायदा अनुबंधों में कारोबार शुरू करने को स्थाई मंजूरी प्रदान की है। यह ढील कुछ शर्तो के साथ और एक्सचेंजों में होने वाले व्यापार के आकार के हिसाब से तथा किसी विशेष अनुबंध में व्यापारियों की भागीदारी के आधार पर चार राष्ट्रीय एक्सचेंजों को दी गई है। इन चार एक्सचेंजों के अलावा देश में आईसीईएक्स और यूसीएक्स दो अन्य राष्ट्रीय स्तर के एक्सचेंज तथा 10 क्षेत्रीय स्तर के जिंस एक्सचेंज हैं। हाल के आदेश में वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) ने कहा कि यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है कि जिंस वायदा बाजार मूल्य जोखिम प्रबंधन के लिए सक्षमता के साथ कामकाज कर सके तथा 'हेजर्स' एवं किसानों जैसे अंशधारकों को किसी जिंस का भविष्य का मूल्य पता लगाने में सक्षम हों। एफएमसी ने एमसीएक्स में 21 जिंसों के वायदा अनुबंधों में, एनसीडीईएक्स में 22 जिंसों, एनएमसीई में 12 जिंसों और एसीई में 12 जिसों में निरंतर कारोबार को अनुमति दी है। (BS Hindi)

गुजरात में रुक गई मूंगफली की खरीद

गुजरात में पर्याप्त गोदाम नहीं होने से किसानों से मूंगफली की खरीद लगभग बंद हो गई है। किसानों को बेहतर कीमत देने और खरीद प्रक्रिया की शुरुआत करने वाला गुजरात पहला राज्य था। गुजरात सरकार ने अपनी एजेंसी गुजरात राज्य सहकारी विपणन संघ की मदद से दो महीने पहले ही मूंगफली खरीद प्रक्रिया की शुरुआत की थी। इस बीच उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक जैसे अन्य उत्पादक राज्यों में भी नेफेड की खरीद प्रक्रिया पर खराब आर्थिक हालात का असर पड़ता दिख रहा है। नेफेड इन दिनों आर्थिक परेशानी के दौर से गुजर रहा है जिसकी वजह से एजेंसी ने कर्मचारियों के वेतन में कटौती का भी फैसला किया है। पिछले 30 दिसंबर को हुई निदेशक मंडल की बैठक में नेफेड ने कर्मचारियों के वेतन में 10 फीसदी कटौती का फैसला किया था, साथ ही एजेंसी ने सरकार से भी वित्तीय मदद की गुहार लगाई है। गुजरात सरकार की एजेंसी ने पिछले दो महीने के दौरान राज्य के विभिन्न केंद्रों से करीब 72,000 टन मूंगफली की खरीद की है। हालांकि गोदामों की कमी के कारण खरीद प्रक्रिया लगभग थम चुकी है। राज्य के कृषि मंत्री गोविंद पटेल का कहना है, 'फिलहाल मूंगफली की खरीद पर रोक लगाई जा चुकी है क्योंकि हमारे पास इसे रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं है।' हालांकि इस स्थिति से उबरने के लिए राज्य सरकार राज्यभर में अतिरिक्त गोदामों की व्यवस्था करने की योजना बना रही है। पटेल कहते हैं, 'हम भंडारण क्षमता में इजाफा करने की कोशिश कर रहे हैं जिसके लिए राज्य सरकार ने सैद्घांतिक सहमति दे दी है।' उन्होंने कहा कि अतिरिक्त क्षमता का अधिकतर हिस्सा एपीएमसी के गोदामों और कृषि विभाग की जमीन पर ही विकसित किया जाएगा। गुजरात सरकार की एजेंसी ने 8 नवंबर से ही मूंगफली खरीद शुरू कर दी थी। (BS Hindi)

केस्टर सीड में तेजी की संभावना

केस्टर तेल में निर्यातकों की मांग बढऩे से सीड की कीमतों में तेजी की संभावना है। चालू वर्ष में केस्टर तेल का कुल निर्यात लगभग 10 से 12% बढऩे का अनुमान है जबकि मार्च महीने में आने वाली केस्टर सीड की नई फसल की पैदावार में 20 से 25% की कमी आने की आशंका है। एस सी केमिकल के प्रबंधक कुशल राज पारिख ने बताया कि केस्टर तेल में निर्यात मांग पहले की तुलना में बढ़ी है। हालांकि स्टॉकिस्टों की सक्रियता के कारण चालू महीने में केस्टर सीड की कीमतों में गिरावट आई है लेकिन आगामी महीनों में केस्टर तेल के निर्यात सौदों में तेजी आने की उम्मीद है। ऐसे में केस्टर सीड की मौजूदा कीमतों में 10 से 15 फीसदी की तेजी आने की संभावना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढऩे से निर्यातकों को अच्छा मार्जिन मिल रहा है, केस्टर तेल के निर्यात सौदे 1,400-1,450 डॉलर प्रति टन की दर से हो रहे हैं। वित्त वर्ष 2012-13 में केस्टर तेल का कुल निर्यात 4.30 लाख टन का हुआ था जबकि चालू वित्त वर्ष में कुल निर्यात बढ़कर करीब 5 लाख टन होने का अनुमान है। जयंत एग्रो ऑर्गेनिक के कार्यकारी निदेशक वामन भाई ने बताया कि केस्टर सीड की नई फसल की आवक मार्च महीने में बनेगी तथा नई फसल की पैदावार करीब 20-25 फीसदी कम होने की आशंका है। पिछले साल केस्टर सीड की पैदावार 16 लाख टन हुई थी जबकि चालू सीजन में घटकर करीब 12 लाख टन ही होने का अनुमान है। इसीलिए स्टॉकिस्टों ने केस्टर सीड की बिकवाली भी पहले की तुलना में कम कर दी है, जिससे कीमतों में तेजी को बल मिल रहा है। उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड का दाम 4,200-4,250 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। केस्टर तेल की कीमतें 885 रुपये प्रति 10 किलो हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2013-14 के पहले आठ महीनों में केस्टर तेल के निर्यात में मूल्य के हिसाब 2.52 फीसदी की तेजी आई है। (Business Bhaskar)

गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग का प्रकोप

नगर संवाददाता - हनुमानगढ़ जिले के नोहर क्षेत्र में गेहूं की फसल में पीला रतुआ नामक बीमारी का प्रकोप पाया गया है। कृषि अधिकारियों के मुताबिक जसाना, फेफाना, पदमपुरा, परलीका, राजपुरिया, रामगढ़ व गोगामेड़ी आदि गांवों में इस बीमारी के लक्षण देखे गए हैं। पीला रतुआ रोग आद्र्र वातावरण में अधिक पनपता है। अभी यह बीमारी नोहर व भादरा इलाके में है, मगर पीलीबंगा, संगरिया व हनुमानगढ़ जैसे क्षेत्रों में भी फैलने की आशंका है। 2011-12 में भी जिले में इस बीमारी का प्रकोप पाया गया था। उस समय फरवरी माह में इस रोग के लक्षण देखने को मिले थे, लेकिन अब शुरुआती स्टेज में ही यह रोग पाया गया है। अधिकारियों के मुताबिक इस बीमारी के फैलने से उत्पादन काफी प्रभावित हो सकता है हालांकि अभी दवा का छिड़काव कर इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यह है पीला रतुआ रोग पीला रतुआ रोग फंफूदजनित बीमारी है। कम तापमान और अधिक आद्र्रता होने से यह बीमारी फैलती है। हालांकि गेहूं की कुछ किस्मों में यह बीमारी नहीं होती लेकिन कई किस्में इस बीमारी के प्रति रजिस्टेंट नहीं हैं। इस रोग में पौधे की पत्तियों पर पीली धारियां बन जाती हैं और इसके चलते प्रकाश संशलेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है और उत्पादन कम हो जाता है। यह है रोकथाम का उपाय : विभागीय अधिकारियों के मुताबिक रोग का लक्षण मिलने पर प्रोपिकॉनाजोल 25 प्रतिशत ईसी 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए। इसे जरूरत के अनुसार 10-15 दिन में दोहराया जाए। ऐसा करने पर रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। अभी किया जा सकता है नियंत्रण ॥नोहर-भादरा क्षेत्र के कई गांवों में गेहूं की फसल पीला रतुआ से प्रभावित है। जिले के अन्य क्षेत्रों में भी यह रोग हो सकता है। समय रहते दवा का छिड़काव करने से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। बलबीर सिंह, सहायक निदेशक कृषि विस्तार, नोहर अन्य क्षेत्र की नहीं मिली रिपोर्ट ॥नोहर-भादरा क्षेत्र से पीला रतुआ रोग की शिकायत मिली है। समय रहते उपाय करने से इसका रोकथाम संभव है। अभी जिले के बाकी क्षेत्र से इस तरह की रिपोर्ट नहीं मिली है। डॉ. उदयभान, उपनिदेशक, कृषि विस्तार हनुमानगढ़. रोग के कारण पीले हुए गेहूं के पत्ते। &&&&&&&&&&&&&& गेहूं में पीला रतुआ से किसानों में हड़कंप रादौर (मलिक): गेहूं की फसल में समय से पहले पीला रतुआ बीमारी लगने की जानकारी मिलते ही कृषि वैज्ञानिकों व किसानों में हड़कंप मच गया। गेहूं अनुसंधान निदेशालय करनाल की निदेशक ने कृषि वैज्ञानिकों के साथ गांव रत्नगढ़ नंदपुरा में पीला रतुआ बीमारी से प्रभावित गेहूं के खेतों का दौरा किया। गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग की रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिक लंबे समय से प्रयासरत हैं। समय-समय पर किसानों को गेहूं की ऐसी किस्मों की बिजाई करने की सलाह देते हैं जिनमें पीला रतुआ बीमारी न लगे। आमतौर पर पीला रतुआ रोग गेहूं की फसल में फरवरी मास में आती है लेकिन गांव रत्नगढ़ के किसान नाथी राम के गेहूं के खेत में जनवरी के प्रथम सप्ताह में पीला रतुआ बीमारी लगने से कृषि वैज्ञानिकों में चिंता बढ़ गई। इस बीमारी से गेहूं की पैदावार प्रति एकड़ 80 प्रतिशत तक कम हो जाती है जिससे किसानों को काफी आर्थिक नुक्सान होता है। क्या कहते हैं निदेशक इस बारे में गेहूं अनुसंधान निदेशालय करनाल की निदेशक डा. इदुंशर्मा ने कहा कि गांव रत्नगढ़ के किसान के गेहूं के खेत में पीला रतुआ नामक बीमारी पाई गई है और इतनी जल्दी पीला रतुआ रोग लग जाना चिंता की बात है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि गेहूं के जिन खेतों में पीला रतुआ रोग के लक्षण नजर आते हैं उन गेहूं के खेतों में 200 लीटर पानी में प्रोपिकोनाझोल दवाई का छिड़काव करें। आमतौर पर पीला रतुआ रोग जनवरी के अंतिम सप्ताह व फरवरी मास में गेहूं के फसल में लग जाता है लेकिन जनवरी मास के प्रथम सप्ताह में पीला रतुआ रोग गेहूं की फसल में लगना चिंता की बात है। &&&&&& गेहूं में पीला रतुआ की दस्तक यमुनानगर जिले में गेहूं की फसल में पीला रतुआ की दस्तक ने किसानों के होश फाख्ता कर दिए हैं। जनवरी की शुरूआत में इस बीमारी ने वैज्ञानिकों को भी चौका दिया है। आम तौर पर मध्य जनवरी के बाद ही पीला रतुआ की संभावना पैदा हो सकती है, लेकिन इस बार बहुत जल्द इस बीमारी के लक्षण दिखाई दिए हैं। गेहूं अनुसंधान निदेशालय करनाल की टीम ने यमुनानगर के दामला क्षेत्र के रतनगढ़ गांव में किसान नाथी राम के खेतों का निरीक्षण कर पीला रतुआ की पुष्टि की है। इस स्थिति को देखते हुए यमुनानगर जिले के किसानों को सतर्क होने की सलाह दी गई है। रतनगढ़ गांव के किसान की तरफ से संदेश मिलने के बाद एक जनवरी को निदेशालय के वैज्ञानिक मौके पर पहुंचे और गेहूं की फसल का निरीक्षण किया। गेहूं की डब्ल्यूएच-711 किस्म में एक खेत में पीला रतुआ के लक्षण पाए जाने पर वैज्ञानिक चौक गए। खेत का गहन निरीक्षण किया गया और कुछ पौधों को करनाल लाकर जांच की गई। गेहूं में पीला रतुआ की रोकथाम के लिए गेहूं अनुसंधान निदेशालय, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा व उत्तरप्रदेश के कृषि विभाग पहले से ही चौकस थे। निदेशालय में कुछ समय पूर्व हुई बैठक में पहले ही दिशा-निर्देश दिए गए थे और कृषि अधिकारियों को आवश्यक सलाह दी थी। किसानों ने इस बार गलती यह की कि वैज्ञानिकों व कृषि अधिकारियों के लाख समझाने के बावजूद ऐसी किस्मों की बिजाई कर डाली जिनमें पीला रतुआ की संभावना रहती है। जबकि रोग रोधी किस्मों की बिजाई पर जोर दिया गया था। चिंता की बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर अभियान चलाने के बावजूद किसानों ने किस्म नहीं बदली। वह पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। गंभीर बात यह है कि किसानों की सोच में किस तरह परिवर्तन लाया जा सकेगा। निदेशालय की परियोजना निदेशक वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. इंदू शर्मा ने कहा कि शीघ्र ही वह यमुनानगर जिले का निरीक्षण करने जाएंगी। रतनगढ़ गांव के खेत में कितने बड़े पैच में पीला रतुआ आया उसकी जांच करेंगे। उन्होंने किसानों को सजग होने का संदेश देते हुए कहा कि नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण करें। सभी किस्मों की जांच करें। यदि पीला रतुआ के लक्षण दिखाई दें तो कृषि विशेषज्ञों की सलाह के बाद बीमारी की रोकथाम को लेकर तुरंत प्रभावी कदम उठाएं।

16 January 2014

Sugar output down 21 pc to 85.5 LT so far in 2013-14 mkt yr

New Delhi, Jan 16. India's sugar production fell by 21 per cent to 85.5 lakh tonnes till January 15 of the current marketing year that started in October on account of delay in crushing operations, according to industry data. Sugar output stood at 108 lakh tonnes in the year-ago period. Marketing year runs from October to September. "Sugar production in the country is in full swing. Till 15th January 2014, the country has produced 85.50 lakh tonnes of sugar with 484 mills under crushing operations," Indian Sugar Mills Association (ISMA) said in a statement. ISMA noted that production is catching up, evident from the fact that drop in sugarcane production has narrowed to 21 per cent from 29 per cent a fortnight back. Sugar production is lagging behind as sugarcane crushing operation started late in Uttar Pradesh because of stand-off between industry and state government on high cane price. Production in Maharashtra has declined to 31 lakh tonnes till January 15 of 2013-14 marketing year compared with 37.7 lakh tonnes in the year-ago period. Uttar Pradesh's production has dipped by 28 per cent to 19.8 lakh tonnes. "Across UP, yields are reported on the lower side compared to last year, but this could be compensated with higher reported sugar recoveries, which is about 0.04 per cent more than last year," ISMA said. Production in Karnataka has fallen to 16 lakh tonnes from about 20 lakh tonnes, while output in Andhra Pradesh fell to 3.85 lakh tonnes from 4.6 lakh tonnes during the period under review. Tamil Nadu has produced about 2.8 lakh tonnes of sugar during October 1-January 15 period against 4.90 lakh tonnes in the year-ago period. "Till 31st December, 2013, sugar mills have produced 5.5 lakh tonnes of raw sugar. Exports of both white and raws of about 5.3 lakh tonnes has happened from October 2013 till December 2013," ISMA said. This month, the association would review initial production estimates of 250 lakh tonnes for 2013-14 marketing year. India, the world's second largest producer and biggest consumer, had produced 251 lakh tonnes of sugar in 2012-13. The annual domestic consumption stands at around 230 lakh tonnes.

GoM okays incentives for raw sugar export

New Delhi, Jan 16. An informal group of ministers (GoM), headed by Agriculture Minister Sharad Pawar, today approved incentives to the beleaguered sugar industry for exports of up to 40 lakh tonnes of raw sugar for two years. The PM-constituted panel was set up to address the financial problems being faced by the sugar industry. In line with the panel's recommendations, the Centre has already announced interest subsidy on bank loans to be availed by sugar mills for paying cane farmers. "We have decided to give incentives to promote raw sugar as a new product. Incentives will be given for export of up to 40 lakh tonnes for two seasons," Food Minister K V Thomas told reporters after the meeting. The quantum of incentives would be worked out soon, taking inputs from the Finance Ministry, he said. This proposal may come for discussion in the next Cabinet meeting, he added. Thomas said the policy of incentives is compatible with WTO norms and would be reviewed constantly. Incentives would be given per tonne raw sugar basis from the Sugar Development Fund of the Food Ministry, he added. Besides Thomas, Finance Minister P Chidambaram and Civil Aviation Minister Ajit Singh were present at the meeting. According to sources, the Food Ministry has proposed an incentive of Rs 2,390 per tonne on raw sugar with the burden to be shared by both the Centre and state governments. However, the panel is believed to have disfavoured and asked to rework the quantum of incentives, they said. Indian Sugar Mills Association has suggested an incentive of Rs 3,500 per tonne. Export of raw sugar presently would lead to a loss of Rs 4,500 per tonne because global prices are ruling lower at Rs 22,500 per tonne as against the production cost of Rs 26,500 per tonne, sources said. Traders are of the view that an incentive below Rs 3,500 per tonne is not viable for sugar mills to undertake raw sugar exports at current global prices. Sugar mills are facing cash crunch as sugar prices have come down below the cost of production in view of surplus availability. They are also saddled with huge cane arrears. Sources said an incentive of Rs 2,390 per tonne as suggested by the Food Ministry would cost the government around Rs 1,000 crore for two years. If incentive is raised to Rs 3,500 per tonne, it would cost the exhequer Rs 1,400 crore for export of 40 lakh tonnes in two years, they added.

खाद्य प्रसंस्करण

खाद्य प्रसंस्करण भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग क्षेत्र में प्रसंस्कृत खाद्य के उत्पादन और निर्यात की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। खाद्य बाजार लगभग 10.1 लाख करोड़ रुपये का है, जिसमें खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का हिस्सा 53% अर्थात 5.3 लाख करोड़ रुपये का है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से 130 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और 350 लाख लोगों को परोक्ष रूप से रोजगार मिलता है। वित्तीय वर्ष 2004-05 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का योगदान लगभग 14% रहा। भारत का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मुख्यतः असंगठित है और असंगठित क्षेत्र में इसका हिस्सा 42%, लघु उद्योग क्षेत्र में 33% और संगठित क्षेत्र में 25% है। उद्योग की संरचना भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के उत्पाद निर्मित जाते हैं। भारत में फल एवं सब्जियाँ, दुग्ध एवं दुग्ध-निर्मित उत्पाद, मीट एवं मुर्गी पालन, मत्स्य उत्पाद, अनाज प्रसंस्करण, बीयर एवं एल्कोहोलिक पेय पदार्थ, उपभोक्ता खाद्य वस्तुएँ ; अर्थात् कन्फेक्शनरी, चॉकलेट और कोको उत्पाद, सोया-निर्मित उत्पाद, मिनरल वाटर, उच्च प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ, सॉफ्ट ड्रिंक, खाने और पकाने के लिए तैयार उत्पाद, नमकीन स्नैक्स, चिप्स, पास्ता उत्पाद, बेकरी उत्पाद और बिस्कुट आदि जैसी मुख्य श्रेणियों में खाद्य प्रसंस्करण कार्य होता है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में उपलब्ध संभावनाएँ भारत में खाद्य प्रसंस्करण कम्पनियों के लिए प्रचुर संभावनाएँ हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विभिन्न उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका कारण भारत के लोगों की प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि होना है, जिसके फलस्वरूप वे उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों पर खर्च करने की स्थिति में हैं। उत्पादन की मात्रा की दृष्टि से कुछेक खाद्य उत्पादों में भारत विश्व का सबसे बड़ा देश है। निम्नलिखित तालिका भारत के खाद्य प्रसंस्करण के उन क्षेत्रों को दर्शाती है, जिनमें उत्पादन की पर्याप्त संभावनाएँ हैं- खाद्य प्रसंस्करण श्रेणी प्रतिवर्ष प्रसंस्कृत खाद्य की मात्रा ( मिलियन टन में) उत्पादन की दृष्टि से विश्व में स्थान दुग्ध एवं दुग्ध निर्मित उत्पाद 88 पहला फल एवं सब्जियाँ 150 दूसरा चावल 132 दूसरा गन्ना 289 दूसरा मत्स्य उत्पाद 6.3 तीसरा गेहूँ, मूंगफली, कॉफी, मसाले, गन्ना, अंडे और ऑयल सीडस - विश्व के शीर्षस्थ 5 उत्पादकों में इससे पता चलता है कि भारत में प्रसंस्करण के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। प्रसंस्कृत खाद्य की मात्रा का विश्लेषण उत्पादन मात्रा के प्रतिशत से करने पर संभावनाएँ और भी उभर कर आती हैं। भारत में फल और सब्जियाँ के लगभग 2%, दूध के 37%, मीट और मुर्गी पालन के 1% तथा मत्स्य उत्पाद के 12% हिस्से का प्रसंस्करण किया जाता है। इसकी तुलना हम जब विकसित देशों में प्रसंस्कृत किए जा रहे उत्पादन की 80% मात्रा से करते हैं, तो हमें भारत में खाद्य प्रसंस्करण व्यवसाय की अपार संभावनाओं की मौजूदगी का आभास होता है। भारतीय अर्थ-व्यवस्था के उदारीकरण के बाद तक भी इन अवसरों को पूरी तरह से अनुभव नहीं किया गया था। सरकार ने हाल ही में इस क्षेत्र में संयुक्त उद्यमों, विदेशी सहयोग और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति प्रदान की है। इस उद्योग के विकास के लिए सरकार ने अनेक योजनाएँ भी कार्यान्वित की हैं। वि-लाइसैंसीकरण, खाद्य पार्कों की स्थापना, पैकेजिंग केद्रों की स्थापना और एकीकृत प्रशीतल शृंखला की सुविधाएँ आदि सरकार द्वारा किए गए प्रयासों में कुछ उल्लेखनीय प्रयास हैं। इस उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए 100% तक निवेश करने की अनुमति भी प्रदान कर दी गई है। वित्तीय वर्ष 2008-09 में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 4700 करोड़ रुपये था। भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का भविष्य उत्पादन की अधिकता और प्रसंस्करण की कमी की समस्या से समूचा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग प्रभावित है और इससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में अभी भी विकास की अपार संभावनाएँ विद्यमान है, जिनको तलाश करने की आवश्यकता है। मूलभूत संरचना और अनुसंधान एवं विकास में कम निवेश की बड़ी चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई है। किन्तु, सरकार द्वारा कार्यान्वित निवेश की विभिन्न योजनाओं के फलस्वरूप यह अनुमान लगाया जा रहा है कि निवेश के बढ़ने से इस उद्योग में वृद्धि होगी। वर्ष 2015 तक लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये के निवेश के अवसर सृजित किए जाने हैं। वर्तमान में घरेलू प्रसंस्कृत-खाद्य बाजार 5.3 लाख करोड़ रुपये का है। इस क्षेत्र में भारी वृद्धि और निवेश की पर्याप्त संभावनाओं के मद्देनज़र यह अनुमानित है कि वर्ष 2015 तक इसका बाज़ार 310 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ जाएगा। विश्व के प्रमुख खाद्य उत्पादकों में भारत की गणना भी होती है, किन्तु विश्व के खाद्य प्रसंस्करण व्यापार में इसकी हिस्सेदारी मात्र 1.7% (वर्ष 2008 जिसका मूल्य 34400 करोड़ रुपये था) की है। वर्ष 2015 तक यह हिस्सेदारी 3% ( 91800 करोड़ रुपये) तक बढ़ सकती है। इसकी प्राप्ति प्रसंस्करण की मात्रा में वृद्धि करके (कुल उत्पादन की प्रतिशतता के रूप में ) और तत्पश्चात निर्यात को बढ़ाकर की जाएगी। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के विजन दस्तावेज़ से प्रसंस्कृ त खाद्य हेतु निर्धारित लक्ष्यों के अनुमानित मूल्य की जानकारी निम्नलिखित तालिका से मिलती हैः प्रसंस्कृत खाद्य के लिए निर्धारित लक्ष्य ( कुल उत्पादन के प्रतिशत के रूप में) खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र 2004 2010 (अनुमानित) 2015 (अनुमानित) फल एवं सब्जियाँ 1 4 8 दूग्ध उत्पाद 15 20 30 मत्स्य उत्पाद 11 15 20 मीट 21 28 35 मुर्गीपालन 6 10 15 आंकड़ों का स्रोत : मैककिंसे एंड कम्पनी रिपोर्ट, भारतीय खाद्य मंच की भारतीय खाद्य रिपोर्ट 2008, खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय-विजन रिपोर्ट, राष्ट्रीय विनिर्माता प्रतिस्पर्द्धात्मकता परिषद (एनएमसीसी)।

15 January 2014

Gold, silver tumble on stockists selling, global cues

New Delhi, Jan 15. Gold prices today fell by Rs 365 to Rs 30,035 per ten gram in the national capital on increased selling by stockists, triggered by a weak global trend. Silver prices also lost Rs 420 to Rs 44,700 per kg on reduced offtake by jewellers and industrial units. In Mumbai, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity traded at Rs 29,915 and Rs 29,765 per ten gram, while silver enquired at Rs 45,450 per kg. Traders said stockists selling in tandem with a weak global trend amid speculation that the US Federal Reserve will continue reducing asset purchases mainly pulled down both gold and silver prices. Gold in Singapore, which normally sets price trend on the domestic front, fell by 0.5 per cent to USD 1,239 an ounce, and silver by 0.3 per cent to USD 20.19 an ounce. Weak trend at futures market too influenced the precious metal prices, they said. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity plunged by Rs 365 each to Rs 30,035 and Rs 29,835 per ten gram, respectively. Sovereign followed suit and declined by Rs 100 to Rs 25,000 per piece of eight gram. In a similar fashion, silver ready dropped by Rs 420 to Rs 44,700 per kg and weekly-based delivery by Rs 450 to Rs 44,670 per kg. Silver coins, however, held steady at Rs 85,000 for buying and Rs 86,000 for selling of 100 pieces.

श्री शरद पवार ने प्रमुख कृषि कार्यक्रमों की सफलता में वैज्ञानिकों के योगदान की सराहना की

कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री श्री शरद पवार ने प्रमुख कृषि कार्यक्रमों की सफलता में वैज्ञानिकों के योगदान की सराहना की है। वे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) समाज की 85वीं आम सभा की बैठक में वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों ने अधिक उपज वाली और रोग प्रतिरोधक किस्में ईजाद की हैं, जिनके उपयोग से किसानों को अधिक पैदावार करने में मदद मिल रही है और उनकी उपज की गुणवत्ता में भी इजाफा हुआ है। श्री पवार ने कहा कि पिछले 10 वर्षों के दौरान देश का अनाज उत्पादन बढ़ा है, जो 2004-05 में 198 मिलियन टन से बढ़कर 2011-12 में 259 मिलियन टन हो गया है। इस तरह प्रतिवर्ष औसतन लगभग 60 लाख टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कृषि मंत्री ने कहा कि पूसा बासमती-1121 चावल की ऐसी अकेली किस्म है, जिसके निर्यात से पिछले वर्ष 18 हजार करोड़ रुपये की आय हुई। इसके अलावा भारत बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है और पूसा पंजाब बासमती-1509 किस्म के चावल के निर्यात में देश को भारी सफलता मिली है। परिषद ने प्रमुख अनाजों से संबंधित बीजों के उत्पादन में बहुत सफलता प्राप्त की है और 11,835 टन से अधिक बीजों का उत्पादन किया है। पटना स्थित पूर्वी क्षेत्र से संबंधित आईसीएआर शोध परिसर ने देश में पहली बार मखाने की ‘स्वर्ण वैदेही’ किस्म को विकसित और जारी किया। पशु अनुसंधान में भी प्रमुख उपलब्धियां अर्जित की गईं। इस संबंध में मंत्री महोदय ने संकर सुअर और दोहरे उद्देश्य वाली मुर्गी की किस्म ‘श्रीनिधि’ का विकास किया है। इसी प्रकार वैज्ञानिकों ने दुनिया के पहले मिथुन बछड़े को भ्रूण स्थानान्तरण के जरिए और टेस्ट ट्यूब के माध्यम से भैंस के क्लोन से तैयार ‘नोरग्याल’ याक बछड़े को विकसित किया। उल्लेखनीय है कि पिछड़े क्षेत्रों में कृषि शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए बुंदेलखंड क्षेत्र में एक केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के गठन के संबंध में आईसीएआर ने एक विधेयक पेश किया है। मंत्री महोदय ने बताया कि आईसीएआर ने बेहतरीन प्रबंधन प्रणाली लागू की है, जिसके लिए उसे आईएस/आईएसओ 9001:2008 प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ है। इस प्रकार वह भारत सरकार के उन विभागों में शामिल हो गया है जिन्हें सबसे पहले यह प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ है। आम सभा की बैठक को कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्रियों श्री तारिक अनवर और डॉ. चरणदास महंत तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एस. अय्यप्पन ने भी संबोधित किया। (PIB.NIC.in)

सरकार को इस साल रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की उम्मीद

कृषि मंत्री शरद पवार ने आज कहा कि इस साल देश का खाद्यान्न उत्पादन, 25.92 करोड़ टन के पिछले रिकॉर्ड स्तर को पार कर जाने की संभावना है। आईसीएआर की 85वीं वार्षिक आम सभा को संबोधित करते हुए पवार ने कहा, 'मुझे विश्वास है कि फरवरी में जब हमें दूसरा अग्रिम अनुमान मिलेगा, हम सर्वकालिक रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की ओर बढ़ रहे होंगे।' उन्होंने कहा कि गेहूं जैसी रबी की फसलों की बुवाई के संबंध में आंकड़े बहुत उत्साहवर्धक हैं। देश ने 2011-12 फसल वर्ष (जुलाई-जून) में 25.92 करोड़ टन का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन दर्ज किया था। हालांकि, देश के कुछ भागों में सूखा पडऩे से 2012-13 में उत्पादन मामूली गिरावट के साथ 25.53 करोड़ टन रह गया था। इस साल, अच्छे मानसून से खरीफ (गर्मी) और रबी (जाड़े) फसलों की बुवाई में सुधार आया है जिससे रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन की संभावना बढ़ गई है।

Govt expects all-time high foodgrain production this year

New Delhi, Jan 15. Agriculture Minister Sharad Pawar today said the country's foodgrain production this year is likely to surpass the previous record of 259.29 million tonnes achieved in the 2011-12 crop year. "I am confident that when we get second advance estimate in February, we will be approaching towards all-time record foodgrain production," Pawar said addressing the 85th annual general meeting of ICAR. He said the data regarding sowing of rabi (winter) crops like wheat is very encouraging. The country had a record foodgrain production of 259.29 million tonnes in 2011-12 crop year (July-June). However, the output fell marginally to 255.36 million tonnes in the next year due to drought in some parts. This year, good monsoon has improved sowing of both kharif (summer) and rabi (winter) crops, thereby boosting prospects of record foodgrains production. Pawar said timely arrival and uniform spread of monsoon during the kharif season of 2013 augured well for the agriculture sector. "Against the backdrop of serious criticism of stagnated growth in Indian economy, the agriculture sector has achieved near-target growth in the second quarter of this fiscal in spite of several challenges," he said. The growth rate in the agriculture and allied sector has improved to 4.6 per cent during the July-September period of the 2013-14 fiscal from 2.4 per cent in the first quarter. Expressing concern over continuous dependence on import of pulses and edible oils, the Agriculture Minister called for more research efforts to boost the productivity and production of these commodities. The country is expected to harvest a record 19 million tonnes of pulses this year, but still short of estimated demand, he added. India imports around 3.5 million tonnes of pulses and over 10 million tonnes of vegetable oils annually to meet domestic shortages. Emphasising that the real test of agriculture lies in ensuring well-being of farmers, Pawar said, "There is an urgent need to enter into partnership with farmers for successful transmission of research conducted by Indian Council of Agricultural Research (ICAR) into fields." He asked ICAR to draw its research focus on increasing feed and fodder supply in the country besides introducing farm machineries to address the growing labour shortages. Highlighting the achievements of government research body ICAR, Pawar said, "The efforts of scientists in developing high yielding, input efficient, disease tolerant varieties along with their widespread adoption by farmers are visible in increasing farm productivity, quality and quantity." Apart from foodgrain, fruits, vegetables, milk and fish production has risen over the years, boosting the country's total farm exports by 11 per cent to Rs 2,01,000 crore in 2012-13 from Rs 1,78,800 crore in 2012-13, he added. ICAR released 104 new improved varieties and hybrids of different field and horticultural crops with potential for higher yields in 2013. The premium institute also produced 11,835 tonnes of breeder seeds of major food crops. Since the climate variability is a major concern now, the ICAR is focusing both on strategic research and on-farm adaptation to climate variability, Pawar added.

14 January 2014

गेहूं उत्पादन पिछले रिकॉर्ड से भी ज्यादा रहने की उम्मीद

पिछले साल की 948 लाख टन रिकॉर्ड पैदावार से ज्यादा उपज संभव: अनवर बुवाई क्षेत्रफल में हुई बढ़ोतरी के साथ ही मौसम भी अनुकूल होने से केंद्र सरकार को चालू रबी में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार होने का अनुमान है। फसल वर्ष 2011-12 में देश में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार 948.8 लाख टन की हुई थी। चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 311.86 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। एसोचैम द्वारा सोमवार को दिल्ली में आयोजित छठी एग्री-बिजनेस समिट के मौके पर कृषि राज्य मंत्री तारिक अनवर ने पत्रकारों से कहा कि गेहूं के बुवाई क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है जबकि मौसम भी अभी तक अनुकूल बना हुआ है। ऐसे में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार होने का अनुमान है। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2011-12 में देश में गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार 948.8 लाख टन की हुई थी जबकि बीते वर्ष 2012-13 में गेहूं की पैदावार 924.6 लाख टन की हुई थी। उन्होंने बताया कि हरियाणा में एकाध जगह सफेद रतुआ बीमारी लगने की खबरें जरूर मिली हैं लेकिन सरकार ने किसानों को इससे बचाव के लिए कीटनाशक उपलब्ध कराने के साथ ही जागरूक कर दिया है। कृषि वैज्ञानिक ने इसकी रोकथाम के लिए जरूरी कदम उठाए हैं, साथ ही राज्य सरकार को भी सचेत रहने को कहा गया है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 311.86 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि 291.27 लाख हैक्टेयर में हुई थी। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में गेहूं के बुवाई क्षेत्रफल में पिछले साल की तुलना में बढ़ोतरी हुई है। उत्तर प्रदेश में गेहूं की बुवाई बढ़कर 99.40 लाख हैक्टेयर में, मध्य प्रदेश में 57.88 लाख हैक्टेयर में, राजस्थान में 30.41 लाख हैक्टेयर में और गुजरात में 14.74 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई है। हालांकि पंजाब और हरियाणा में गेहूं की बुवाई पिछले साल की तुलना में कम हुई है। उन्होंने कहा कि परिवहन, रखरखाव और भंडारण की सुविधा के अभाव में देश में हर साल करीब 4,400 करोड़ रुपये का खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है। इसके बचाव से जहां उपभोक्ताओं को सही दाम पर खाद्यान्न मिल सकेंगे, वहीं किसानों को भी अपनी फसलों के उचित दाम मिलेंगे, इसमें कोल्ड चेन और कोल्ड स्टोर की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूध के भंडारण और परिवहन में अमूल को रोल मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि खरीद और वितरण के अभाव में उपभोक्ताओं को प्याज खरीदने के लिए ज्यादा दाम चुकाने पड़ जाते हैं। देश में प्याज का उत्पादन 170-180 लाख टन होने के बावजूद जहां किसानों को 10 रुपये किलो प्याज बेचना पड़ता है वहीं उपभोक्ताओं को प्याज खरीदने के लिए 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक चुकाने पड़ते हैं। (Business Bhaskar....R S Rana)

क्यों फीकी पड़ी कमोडिटी मार्केट की चमक!

पिछले पूरे एक साल लगातार सुर्खियों में रहने के बावजूद पूरा कमोडिटी बाजार बेहद ठंडा रहा है। सिर्फ रिटर्न के लिहाज से नहीं, बल्कि बाजार में कारोबार भी काफी घट गया है। एफएमसी के ताजा आंकड़ों पर गौर करें, तो दिसंबर के अंतिम पखवाड़े में एक्सचेंजों का कारोबार घटकर आधा रह गया है। गौर करने वाली बात ये है कि पिछले एक साल लगातार कमोडिटी मार्केट के कारोबार में गिरावट दर्ज हुई। कमोडिटी एक्सचेंजों का कारोबार लगातार गिरता रहा है। चालू चित्त वर्ष में वायदा कारोबार में करीब 36 फीसदी की भारी गिरावट आई है। घटते कारोबार को संभालने के लिए एफएमसी अब अपने ही फैसलों को उलटने लगा है। सीएनबीसी आवाज़ ने सबसे पहले आयोग के सामने एक्सचेंजों पर गिरते कारोबार का मुद्दा उठाया था। एफएमसी ने गिरते कारोबार को बढ़ाने के लिए एल्गो और स्प्रेड के नियमों में भारी बदलाव किया है। खास तौर से छोटे निवेशकों को ध्यान में रखकर शुरू किए गए मिनी और माइक्रो वायदा में भी एल्गो की सहूलियत दे दी गई। एल्गो ऑर्डर की लिमिट बढ़ा दी गई और स्प्रेड ट्रेड की मार्जिन में भारी कटौती भी कर दी गई। गौर करने वाली बात ये है कि एल्गो ट्रेड से रिटेल इन्वेस्टर का कोई लेना-देना नहीं है, शायद इसी वजह से जानकारों की नजर में ये कदम काफी नहीं है। दरअसल चालू वित्त वर्ष में कमोडिटी एक्सचेंजों का वॉल्यूम 36 फीसदी तक गिर गया है। अप्रैल से दिसंबर तक सोने और चांदी के कारोबार में सबसे ज्यादा करीब 40 फीसदी की गिरावट आई है। पिछले एक साल में सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाले क्रूड और नैचुरल गैस के कारोबार में भी करीब 30 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज हुई है। बगैर सीटीटी वाले एग्री कमोडिटी का कारोबार भी इस दौरान करीब 33 फीसदी गिर गया है। दूसरी ओर कमोडिटी बाजार में सुधार के लिए फाइनेंशियल सेक्टर लेजिस्लेटिव रिफॉर्म कमीशन ने एफएमसी को कुछ सुझाव दिए हैं। जिसे लागू करने से पहले एफएमसी ने लोगों की राय मांगी है। देखना होगा इन सुझावों को लागू करने के बाद कमोडिटी बाजार की तस्वीर कैसी होती है। ट्रेड स्विफ्ट कमोडिटीज के डायरेक्टर संदीप जैन का कहना है कि कमोडिटी बाजार के कारोबारी नियमों में एफएमसी के बदलाव का स्वागत है। हालांकि सीटीटी और एनएसईएल जैसे मामलों ने कमोडिटी बाजार पर दबाव बनाने का काम जरूर किया है। डब्बा ट्रेडिंग और वेयरहाउस की कमी भी कमोडिटी बाजार का कारोबार गिराने में जिम्मेदार हैं। वहीं निर्मल बंग कमोडिटीज के कुणाल शाह का भी मानना है कि सीटीटी और एनएसईएल मामले ने कमोडिटी बाजार को गहरी चोट पहुंचाई है। हिंदू बिजनेस लाइन के कमोडिटी एडिटर जी चंद्रशेखर का कहना है कि पिछले 10 सालों में वैश्विक बाजारों की तेजी से घरेलू बाजारों को फायदा मिला है। लिहाजा तेजी के दौर में निवेशक कमोडिटी बाजार के साथ थे। हालांकि पिछले 2 सालों से जैसे ही कमोडिटी की कीमतों में नरमी दिखी है उससे निवेशक भी बाजार से दूर रहे हैं। ऐसे में निवेशकों के दूर होने से कमोडिटी मार्केट के कारोबार में गिरावट आना स्वाभाविक है। (Hindi>Moneycantorl.com)

Gold recovers on stockists buying, global cues

New Delhi, Jan 14. Gold prices recovered by Rs 200 to Rs 30,400 per ten grams in the national capital today on fresh buying by stockists for the marriage season amid a firm global trend. Silver also moved up by Rs 320 to Rs 45,120 per kg on increased offtake by industrial units and coin makers. Traders said stockists buying for the marriage season amid a firm global trend mainly led the recovery in gold prices. Gold in New York, which normally sets price trend on the domestic front, rose by 0.30 per cent, to USD 1,252.40 an ounce; and silver by 1.17 per cent to USD 20.41 an ounce. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity recovered sharply by Rs 200 to Rs 30,400 and Rs 30,200 per ten grams, respectively. It had shed Rs 15 yesterday. Sovereign held steady at Rs 25,100 per piece of eight gram. Silver ready moved up by Rs 320 to Rs 45,120 per kg and weekly-based delivery by Rs 355 to Rs 45,120 per kg respectively, while silver coins held steady at Rs 85,000 for buying and Rs 86,000 for selling of 100 pieces.

13 January 2014

एनआईएफटीईएम में बीटेक, एमटेक व पीएचडी में प्रवेश शुरू

सोनपत। हरियाणा स्थित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी, एंटरप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट (एनआईएफटीईएम) में संचालित बीटेक, एमटेक व पीएचडी कोर्स के सत्र 2013-14 में प्रवेश के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। छात्रों को प्रवेश जेईई (मेन)-2013 की मेरिट सूची के आधार पर दिया जाएगा। संस्थान में फूड टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट विषय में चार वर्षीय बीटेक कोर्स की कुल 207 सीटें हैं। इनमें 180 सीटें भारतीय व 27 सीटें विदेशी छात्रों के लिए आरक्षित हैं। विदेशी छात्रों के लिए आरक्षित 27 सीटों में से भी 9 सीटें दक्षिण पूर्वी देशों व खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों के लिए आरक्षित रहेगी। मेरिट के आधार पर 10 प्रतिशत छात्रों को स्कॉलरशिप देने का प्रावधान भी है। एमटेक कोर्स इसके अलावा संस्थान में पांच एकटेक कोर्स संचालित किए जा रहे हैं। इनमें फूड सप्लाई चैन मैनेजमेंट, फूड सेफ्टी एंड क्वालिटी मैनेजमेंट, फूड प्रोसेस इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट, फूड प्लांट ऑपरेशन्स मैनेजमेंट तथा फूड टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट शामिल हैं। प्रत्येक एमटेक कोर्स के लिए कुल 21 सीट्स हैं। इनमें 18 सीटें भारतीय व 3 सीटें विदेशी छात्रों के लिए आरक्षित रहेंगी। गेट के आधार पर प्रवेश एमटेक कोर्स में प्रवेश ग्रेजुएट एप्टिट्यूड टेस्ट फॉर इंजीनियरिंग (गेट) के अंको व व्यक्तिगत साक्षात्कार के आधार पर दिया जाएगा। एमटेक कोर्स के लिए आवेदन करने वाले छात्रों के लिए एंट्रेंस टेस्ट आयोजित किया जाएगा। लेकिन अगर एमटेक की सभी सीटें गेट क्वालीफाइड छात्रों से भर जाती हैं तो नॉन गेट के लिए अलग से न तो कोई एंट्रेंस टेस्ट नहीं लिया जाएगा और ना ही उन्हें प्रवेश की पात्रता होगी। पीएचडी कोर्स इसी तरह पीएचडी कोर्स में प्रवेश के लिए इस बार से संस्थान एंट्रेंस टेस्ट आयोजित करने जा रहा है। यह एंट्रेंस टेस्ट संस्थान परिसर में ही 30 जून 2013 को आयोजित किया जाएगा। पीएचडी की कुल 13 सीटें हैं। इनमें 10 सीटें भारतीय व 3 सीटें विदेशी छात्रों के लिए आरक्षित रहेंगी। भारतीय छात्रों के लिए आरक्षित 10 सीटों में से प्रत्येक पीएचडी कोर्स के लिए 2 सीटें आरक्षित रहेगी। संस्थान कुल पांच विषयों में पीएचडी कराता है। इनमें एग्रीकल्चर एंड एन्वायरोन्मेंट साइंसेस, बेसिक एंड एप्लाइड साइंसेस, इंजीनियरिंग, फूड बिजनेस मैनेजमेंट एंड एन्टरप्रेन्योरशिप तथा फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी शामिल हैं।

तेजी से बढ़ रहा है खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, किसानों को मिल रहा है फायदा: पवार

कुंडली :हरियाणा: (एजेंसी) केन्द्रीय कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री शरद पवार ने आज कहा कि देश में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और यह किसानों के लिये फायदेमंद साबित हो रहा है। पवार ने यहां खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमशीलता और प्रबंधन के राष्ट्रीय संस्थान :एनआईएफटीईएम: का उद्घाटन करते हुये कहा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में विनिर्माण और कृषि क्षेत्र से भी अधिक तेजी से वृद्धि हो रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन की व्यापक संभावनायें हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग किसानों को मिलने वाले दाम और उपभोक्ता द्वारा चुकाये जाने वाले दाम के बीच अंतर को भी कम कर रहा है। पवार ने कहा कि तेजी से बढते इस उद्योग से मूल्यवर्धित कृषि उत्पादों का निर्यात कर विदेशी मुद्रा भी कमाई जा रही है। उन्होंने कहा कि यह उद्योग न केवल किसानों और उद्योगपतियों के बीच सेतु का काम कर रहा है बल्कि यह किसानों को उद्यमी बनाने में भी मदद कर रहा है। इस विश्वस्तरीय संस्थान को हाल ही में डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है। हरियाणा सरकार ने संस्थान के लिये 100 एकड़ जमीन दी है जबकि केन्द्र सरकार ने 480 करोड़ रुपये का इसमें निवेश किया है। संस्थान ने इसी गर्मियों में अपना पहला अकादमिक सत्र भी शुरु कर दिया है। संस्थान खाद्य प्रौद्योगिकी और प्रबंधन में बी.टेक, और एम.टेक और पीएचडी की डिग्री देगा। पवार ने बताया कि संस्थान में बी.टेक में 115 छात्र और एम.टेक में 88 छात्र हैं।

श्री पवार विश्‍व स्‍तरीय खाद्य प्रसंस्‍करण शिक्षा और अनुसंधान संस्‍थान का उद्घाटन करेंगे

प्रौद्योगिकी उपकरण और कुशल श्रम शक्ति के द्वारा ही खाद्य प्रसंस्‍करण क्षेत्र की संभावित क्षमता को प् कृषि और खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग मंत्री श्री शरद पवार खाद्य प्रसंस्‍करण क्षेत्र में विश्‍व स्‍तरीय संस्‍थान एनआईएफटीईएम का 7 नवम्‍बर, 2012 को कुंडली हरियाणा में उद्घाटन करेंगे। हरियाणा के मुख्‍यमंत्री श्री भूपेन्‍द्र सिंह हुड्डा और कई केन्‍द्रीय और राज्‍य मंत्री उद्घाटन समारोह में शामिल होंगे। भारतीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता और प्रबंधन संस्‍थान (एनआईएफटीईएम) को मान्‍यता प्राप्‍त विश्‍वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया है। संस्‍थान ने अपना पहला शैक्षणिक सत्र इन गर्मियों से शुरू किया है। यह संस्‍थान खाद्य प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के क्षेत्र में बी. टेक, एम. टेक और पी.एचडी की डिग्री प्रदान करेगा। इस संस्‍थान के कामकाज का महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि यहां पर विभिन्‍न क्षेत्र जैसे डेरी उद्योग, अनाज आधारित उत्‍पाद, पशु प्रोटीन, पेय पदार्थ, मिष्ठान और फल तथा सब्जियों पर आधारित खाद्य पदार्थ पर ''विषय केन्‍द्र'' होंगे। इन क्षेत्रों के अलावा यहां पर प्रबंधन पैकेजिंग, खाद्य मानकों और परीक्षण जैसे विषय भी हैं। एनआईएफटीईएम खाद्य मानकों की स्‍थापना, उष्मायन उद्योग तथा सूचनाओं के आदान प्रदान के क्षेत्र में सक्रिय रूप से काम करेगा। यह खाद्य प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के क्षेत्र में शीर्ष संस्‍था होगी और अपनी विभिन्‍न गतिविधियों को अन्‍य संस्‍थानों के साथ समन्वित करेगी। एनआईएफटीईएम लीक से हटकर दुनिया भर में प्रसिद्ध खाद्य प्रौद्योगिकियों के विकास को बढ़ावा देने में विश्‍व के सर्वश्रेष्‍ठ संस्‍थानों के साथ सक्रिय रूप से सहयोग करेगा। इससे एनआईएफटीईएम को उत्‍कृष्‍टता का अंतर्राष्‍ट्रीय केन्‍द्र बनने में मदद मिलेगी। एफपीआई के विकास के लिए प्रौद्योगिकी, प्रबंधन और उद्यमियता के क्षेत्र में विश्‍व स्‍तरीय संस्‍थानों की विशेष आवश्‍यकता है। मौजूदा अनुसंधान एवं विकास संस्‍थान उन्‍नत उत्‍पाद, प्रक्रम और वैश्विक स्‍तर की मशीनरी को विकसित नहीं कर पाए हैं। इस बात की पुष्टि वैश्विक व्‍यापार में भारत की कम भागीदारी से होती है। हमारे देश में खाद्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पर्याप्‍त तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ-साथ विश्‍व स्‍तरीय प्रबंधकीय प्रतिभा और उद्यमिशीलता की कमी है। खाद्य स्‍वच्‍छता तथा सुरक्षा और अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों के विकास के बढ़ते महत्‍व को देखते हुए खाद्य मानकों को स्‍थापित करने के लिए मौजूदा तंत्र भी अपर्याप्‍त है। भारत में व्‍यापार उष्‍मायन सेवाएं और खाद्य क्षेत्र में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने का प्रयोजन लगभग न के बराबर हैं। इसके अलावा उद्योग के क्षेत्र में अपर्याप्‍त और पुरानी जानकारी जैसे कि भारतीय और विदेशी बाजारों में मांग और पूर्ति का झुकाव, नियामक आवश्यकता आदि चुनौतियों का सामना उद्योग कर रहे हैं। जानकारी की कमी, उपकरणों तथा प्रौद्योगिकी और प्रतिभा की कमी जैसे अभावों पर काबू पाए बिना भारत एफपीआई क्षेत्र में तेजी से नहीं बढ़ सकता और दुनिया के साथ प्रतिस्‍पर्धा में भाग नहीं ले सकता । एनआईएफटीईएम इन कमियों को दूर करने का प्रयास करेगा और भारतीय एफपीआई उद्योग को अपने पूरे सामर्थ्य तक विकसित होने में मदद करेगा।

Govt expects record wheat harvest this year

New Delhi, Jan 13. India's wheat production this year is likely to surpass the previous record of 94.88 million tonne on better coverage and good weather conditions, Minister of State for Agriculture Tariq Anwar said today. India, the world's second-biggest wheat grower, had produced a record 94.88 million tonne wheat in the 2011-12 crop year (July-June), buoyed by a good monsoon. Poor rains in 2012-13 lowered the output to 92.46 million tonne. "Wheat sowing so far has been very encouraging supported by good weather conditions.... We will beat all previous records in wheat production this year," Anwar told reporters on the sidelines of an agri-business summit organised by industry body Assocham. He said there were reports of white rust fungal disease in wheat crops in Haryana. The government has already taken measures to control the spread of the disease. "We have already given warning to farmers and alerted state governments to take risk management steps," he added. Wheat is the main rabi (winter) crop. Sowing begins from October, while harvesting from April. According to latest official data, wheat has been sown in a record 31.18 million hectare till last week the 2013-14 rabi season, as against 29.12 million hectare in the year-ago. So far, wheat acreage remains higher in Uttar Pradesh at 9.94 million hectares, Madhya Pradesh at 5.78 million hectares and Rajasthan at 3 million hectares. Wheat acreage remains lower so far in Punjab, Karnataka, Uttarakhand, Assam, West Bengal and Chhatisgarh. Addressing the event, Anwar said the challenge of maintaining an efficient food supply chain is not limited to controlling post-harvest loss. "It also involves creation of a system where every one in the supply chain is properly incentivised to maximise production and efficiency," he said, adding that an efficient supply chain can adversely affect both producers and consumers. Referring to the recent price rise in onion, the minister said its production remains around 17-18 million tonne but it is purely because of inefficiencies in procurement and distribution that such extreme price distortion takes place. To boost production and check prices of fruits and veggies, Anwar said milk procurement model of the cooperative Amul can be emulated in fruits and vegetables sector. "Just as in the case of milk, small farmers producing food is handicapped in terms of availability of credit, holding capacity of his produce as well as access to technical knowhow. The milk sector had all these problems but the Amul model overcame them," the minister said. Pitching for contract farming in horticulture, Anwar said Indian farmers require much higher degree of hand holding than what can be provided through the government machinery. "Contract farming can provide the close hand holding regarding seed selection, seed treatment, soil testing, fertilisers, pest management and income support through procurement which government programme cannot possible provide," he said. These are the kind of services being provided by companies engaged in contract farming in poultry sector and by cooperatives in milk sector, he added. Anwar also released a paper on 'Agri-infrastructure in India -- the value chain perspective' jointly prepared by Assocham and Yes Bank. It has recommended encouraging private wholesale markets, reclassification of priority sector guidelines for enabling largest credit flow into agri-infrastructure, viability gap funding in marketing infrastructure development projects and single window agency for implementing various projects. It also suggested higher investments under public-private -partnership mode in export oriented agri infrastructure, improved rail movement and transportation.

Gold snaps three-day rising trend on weak demand

New Delhi, Jan 13. Snapping its three-day rising streak, gold prices today fell by Rs 15 to Rs 30,200 per ten grams in the national capital on lower demand at existing higher levels. However, silver managed to close steady at Rs 44,800 per kg on scattered buying support. In Mumbai, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity traded at Rs 30,025 and Rs 29,875 per ten grams, respectively; while silver enquired at Rs 45,500 per kg. Traders said slackness in demand from retailers and jewellers at current levels mainly led to decline in gold prices. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity declined by Rs 15 each to Rs 30,200 and Rs 30,000 per ten gram, respectively. It had gained Rs 215 in the last three sessions. Sovereign held steady at Rs 25,100 per piece of eight gram. Silver ready too held steady at Rs 44,800 per kg, while weekly-based delivery by Rs 35 to Rs 44,765 per kg. Silver coins continued to trade at last level of Rs 85,000 for buying and Rs 86,000 for selling of 100 pieces.

11 January 2014

रबी में फसलों की बेहतर बुवाई से पैदावार बढऩे का अनुमान

फायदा : मौसम अनुकूल रहने से भी फसलों को मिलेगा फायदा चालू रबी में गेहूं, चना और सरसों के बुवाई क्षेत्रफल में हुई बढ़ोतरी से इनकी पैदावार बढऩे का अनुमान है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में फसलों की कुल बुवाई बढ़कर 619.04 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जो पिछले साल की समान अवधि के 587.01 लाख हैक्टेयर से ज्यादा है। कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि रबी की प्रमुख फसलों गेहूं, चना और सरसों का बुवाई रकबा पिछले साल से बढ़ा है। मौसम भी फसलों के अनुकूल ही है। ऐसे में चालू रबी में खाद्यान्न की कुल पैदावार बढऩे का अनुमान है। रबी की प्रमुख फसल गेहूं की बुवाई बढ़कर 311.86 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 291.27 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। चने की बुवाई पिछले साल के 92.68 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 101.83 लाख हैक्टेयर में और सरसों की बुवाई 66.22 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 70.35 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। दलहन की बुवाई चालू रबी में पिछले साल के 147.35 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 155.16 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। रबी दलहन में चना की बुवाई तो बढ़ी है लेकिन उड़द और मूंग की बुवाई पिछले साल से घटी है। उड़द की बुवाई चालू रबी में 7.55 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 8.98 लाख हैक्टेयर में हुई है। मूंग की बुवाई भी पिछले साल के 5 लाख हैक्टेयर से घटकर 4.67 लाख हैक्टेयर में ही हुई है। चालू रबी में देशभर में 86.22 लाख हैक्टेयर में तिलहनों की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 82.74 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। सरसों की बुवाई तो बढ़ी है लेकिन मूंगफली और सनफ्लावर की बुवाई घटी है। मूंगफली की बुवाई पिछले साल के 6.55 लाख हैक्टेयर से घटकर 5.99 लाख हैक्टेयर में और सनफ्लावर की बुवाई पिछले साल के 4.50 लाख हैक्टेयर से घटकर 3.80 लाख हैक्टेयर में हुई है। मोटे अनाजों की कुल बुवाई चालू रबी में पिछले साल के 60.08 लाख हैक्टेयर से घटकर 58.55 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है। ज्वार की बुवाई पिछले साल के 38.56 लाख हैक्टेयर से घटकर 36.04 लाख हैक्टेयर में हुई है। जौ की बुवाई 7.75 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 7.89 लाख हैक्टेयर में और मक्का की बुवाई पिछले साल के 13.03 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 13.89 लाख हैक्टेयर में हुई है। रबी धान की रोपाई चालू सीजन में पिछले साल के 5.57 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 7.25 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। (Business Bhaskar)