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30 June 2015

एसटीसी ने 2,000 टन कोकोनट तेल का आयात करेगी


नई दिल्ली। सार्वजनिक कंपनी स्टेट ट्रेडिंग कार्पोरेषन आफ इंडिया लिमिटेड (एसटीसी) ने 2,000 टन कोकोनेट तेल के आयात हेतु निविदा आमंत्रित की है। निविदा के अनुसार तेल की आपूर्ति मुंदड़ा बंदरगाह पर (सीआईएफ) के आधार पर होगी।
एसटीसी के अनुसार निविदा भरने की अंतिम तिथि 2 जुलाई 2015 है तथा 1,008 टन कोकोनट तेल की षिपमेंट की अवधि 3 जुलाई से 15 अगस्त तय की गई है जबकि 987 टन कोकोनट तेल की षिपमेंट की अवधि 3 जुलाई से 31 अगस्त 2015 तय की गई है।

चालू वित वर्ष के पहले महीने में दलहन आयात 32 फीसदी बढ़ा


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले महीने अप्रैल में दलहन आयात में भारी बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान दलहन के आयात में 32 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल आयात 2.61 लाख टन का हुआ है। आयात में बढ़ोतरी के साथ ही राजस्थान सरकार दालों पर आवष्यक वस्तु अधिनियम के तहत स्टॉक सीमा लगाने के कारण पिछले आठ-दस दिनों में दलहन की कीमतों में गिरावट आई है।
कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अप्रैल 2015 में देष में दालों का आयात बढ़कर 2.61 लाख टन का हो गया जबकि पिछले साल अप्रैल महीने में 1.97 लाख टन दालों का आयात हुआ था। उन्होंने बताया कि मानसूनी बारिष कम होने के कारण फसल सीजन 2014-15 में दलहन की घरेलू पैदावार में कमी आई थी जिसकी वजह से उत्पादक मंडियों में दालों के भाव में तेजी आई थी। यही कारण है कि अप्रैल महीने में दलहन के आयात में बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने बताया कि वित वर्ष 2014-15 में देष में रिकार्ड 45.8 लाख टन दालों का आयात हुआ था जबकि वित वर्ष 2013-14 में 31.7 लाख टन दालों का आयात हुआ था।
दलहन आयातक फर्म के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मंगलवार को आस्ट्रेलियाई चने के भाव मुंबई में 4,400 रुपये प्रति क्विंटल रह गए जबकि मयंमार से आयातित उड़द के भाव 7,600 रुपये तथा लेमन अरहर के भाव 7,050 रुपये प्रति क्विंटल रहे। केनेडियन मसूर के भाव मुंबई पहुंच 6,200 से 6,350 रुपये प्रति क्विंटल रहे। कनाडा की पीली मटर के भाव 2,521 रुपये और हरी मटर के भाव 2,750 से 2,850 रुपये प्रति क्विंटल रहे। रुस से आयातित काबुली के भाव 4,000 से 4,250 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
दलहन कारोबारी दुर्गा प्रसाद ने बताया कि दिल्ली में चना के भाव 4,325 रुपये, मूंग के भाव 6,400 रुपये, मोठ के भाव 6,600 रुपये, उड़द के 7,800 रुपये, अरहर के भाव 6,900 रुपये और मसूर के भाव 6,500 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। काबूली के भाव दिल्ली में 4,800 से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि आयात में हुई बढ़ोतरी के साथ ही राजस्थान में दलहन पर स्टॉक सीमा लगा देने से दालों की कीमतों में गिरावट आई है।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में दलहन का उत्पादन घटकर 173.8 लाख टन होने का अनुमान है जबकि फसल सीजन 2013-14 में देष में रिकार्ड 192.5 लाख टन का उत्पादन हुआ था।.....आर एस राणा

29 June 2015

निर्यातकों की मांग से बासमती चावल की कीमतों में और तेजी की संभावना


आर एस राणा
नई दिल्ली। बासमती चावल में इस समय निर्यातकों की अच्छी मांग बनी हुई है जबकि मिलरों के पास स्टॉक कम है। इसीलिए पिछले आठ-दस दिनों में पूसा 1,121 बासमती चावल सेला के भाव में 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आकर भाव 4,400 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। निर्यातकों की मांग को देखते हुए इसकी मौजूदा कीमतों में और भी 150 से 200 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने का अनुमान है।
चावल निर्यातक फर्म के एक अधिकारी ने बताया कि बासमती चावल खासकर के पूसा-1,121 सेला में इस समय निर्यात मांग अच्छी बनी हुई है जबकि मिलरों के पास स्टॉक कम है। इसीलिए बासमती चावल की कीमतों में तेजी बनी हुई है। उन्होंने बताया कि अगले आठ-दस दिनों में ईरान की आयात निविदा खुलेंगी, जिससे इसमें मांग और भी बढ़ने का अनुमान है। उत्पादक मंडियों में सोमवार को पूसा-1,121 बासमती चावल सेला का भाव बढ़कर 4,400 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए जबकि पूसा-1,121 बासमी चावल स्टीम का भाव बढ़कर 4,900 से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। पूसा 1,509 बासमती चावल सेला का भाव बढ़कर इस दौरान 3,300 से 3,400 रुपये और स्टीम का भाव 4,600 से 4,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गया।
चावल व्यापारी संजीव अग्रवाल ने बताया कि चावल की कीमतों में आई तेजी के कारण स्टॉकिस्टा धान की बिकवाली सीमित मात्रा में कर रहे हैं। जिससे मंडियों में धान की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। उत्पादक मंडियों में पूसा 1,121 बासमती धान के भाव बढ़कर 2,600 से 2,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। पूसा 1,509 धान की कीमतें मंडियों में बढ़कर 1,900 से 2,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गई।
एपीडा के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले महीने अप्रैल में बासमती चावल का निर्यात बढ़कर 3.48 लाख टन का हुआ है जबकि वित वर्ष 2014-15 के अप्रैल महीने में देश से 2.85 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था। वित वर्ष 2014-15 में देश से 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था जोकि वित वर्ष 2013-14 के 37.5 लाख टन से कुछ कम था।.....
आर एस राणा

गेहूं की सरकारी खरीद 276 लाख टन के पार


नई दिल्ली। गेहंू की सरकारी खरीद 276.21 लाख टन हो गई है जबकि पिछले साल इस समय तक देशभर की मंडियों से 270.68 लाख टन गेहूं खरीदा गया था।
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समय केवल राजस्थान से ही गेहूं की खरीद हो रही है जबकि अन्य राज्यों से खरीद बंद हो गई है। उन्होंने बताया कि अभी तक गेहूं की कुल खरीद में पंजाब की हिस्सेदारी 99.52 लाख टन, हरियाणा से 67.55 लाख टन, उत्तर प्रदेश से 22.67 लाख टन, मध्य प्रदेश से 72.61 लाख टन और राजस्थान से 12.97 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी उत्तर प्रदेश में हुई है जबकि कमी राजस्थान में आई है।

27 June 2015

मक्का की कीमतें एमएसपी से नीचे, खरीफ में बुवाई घटने की आषंका


आर एस राणा
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक मंडियों में मक्का की कीमतें न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमएसपी) से नीचे बनी हुई है जिसका असर चालू खरीफ में मक्का की बुवाई पर पड़ने की आषंका है। उत्तर प्रदेष और बिहार की उत्पादक मंडियों में मक्का के भाव 1,050 से 1,150 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं जबकि केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2015-16 के लिए मक्का का एमएसपी 1,325 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।
मक्का कारोबारी पी सी गुप्ता ने बताया कि विष्व बाजार में मक्का के दाम नीचे बने हुए हैं जिसकी वजह से देष से मक्का के निर्यात पड़ते नहीं लग रहे है। गर्मी ज्यादा होने के कारण पोल्ट्री फीड निर्माताओं की मांग भी कमजोर बनी हुई है तथा इस समय थोड़ी-बहुत मांग स्टार्च मिलों की आ रही है। उन्होंने बताया कि उत्पादक मंडियों में रबी मक्का की आवक तो हो ही रही है। उन्होंने बताया कि आगामी दिनों में पोल्ट्री उद्योग की मांग तो बढ़ने का अनुमान है जिससे भाव में थोड़ा सुधार आ सकता है, लेकिन मक्का की उपलब्धता को देखते हुए भारी तेजी की संभावना नहीं है।
मक्का व्यापारी राजेष गुप्ता ने बताया कि दिल्ली में मक्का के भाव 1,215-1,220 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। इस समय बिहार, आंध्रप्रदेष और कर्नाटका में रबी मक्का की आवक चल रही है जबकि अग्रेती फसल की आवक बिहार और पंजाब में षुरु हो गई है। खरीफ मक्का की आवक सितंबर में बन जायेगी। ऐसे में मक्का की कीमतों में तेजी की संभावना नहीं है। उन्होंने बताया कि उत्पादक मंडियों में मक्का के दाम काफी नीचे बने हुए है इसलिए चालू खरीफ में इसकी बुवाई में कमी आने की आषंका है। किसान मक्का के बजाए अन्य फसलों की बुवाई को तरजीह देंगे। उत्तर प्रदेष की मंडियों में मक्का के भाव 1,050 से 1,150 रुपये प्रति क्विंटल तथा बिहार की गुलाबबाग मंडी में भाव 1,125 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं।00
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार रबी सीजन में मक्का की पैदावार घटकर 64.8 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल रबी में इसकी पैदावार 71.1 लाख टन की हुई थी। फसल सीजन 2014-15 में मक्का की कुल पैदावार घटकर 227.4 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 242.6 लाख टन की हुई थी।.......आर एस राणा

केंद्र ने प्याज के निर्यात को हत्तोसाहित करने के लिए एमईपी में की भारी बढ़ोतरी


आर एस राणा
नई दिल्ली। निर्यातकों की अच्छी मांग से प्याज की कीमतों में घरेलू बाजार में आई तेजी से हलकान केंद्र सरकार ने न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) में 175 डॉलर की बढ़ोतरी कर एमईपी 425 डॉलर प्रति टन तय कर दिया है। इससे घरेलू बाजार में प्याज की कीमतों में गिरावट आने का अनुमान है।
देष की मंडियों में प्याज की कीमतों में तीन महीने से तेजी बनी हुई है। चालू महीने में देषभर की मंडियों में प्याज का औसत भाव बढ़कर 973 से 1,936 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। जबकि मई 2015 में प्याज का औसत भाव 866 से 1,620 रुपये प्रति क्विंटल था। इसके पहले अप्रैल 2015 में देषभर की मंडियों में प्याज का औसत भाव 800 से 1,440 रुपये प्रति क्विंटल था।
सूत्रों के अनुसार मार्च 2015 में देष से 1,15,629 टन प्याज का निर्यात हुआ है जबकि फरवरी 2015 में केवल 81,769 टन प्याज का निर्यात हुआ था। मार्च 2014 में देष से 1,00,000 टन प्याज का निर्यात हुआ था। हालांकि वित वर्ष 2014-15 में प्याज के कुल निर्यात में पिछले साल की तुलना में कमी आई है। वित वर्ष 2014-15 में देष कुल 10,86,071 टन प्याज का निर्यात हुआ है जबकि वित वर्ष 2013-14 में 13,58,193 टन प्याज का निर्यात हुआ था। अभी तक प्याज का एमईपी 250 डॉलर प्रति टन तय था।
कृषि मंत्रालय के आंरभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में 11.92 लाख हैक्टेयर में प्याज की बुवाई हुई थी तथा इसकी पैदावार घटकर 193.57 लाख टन होने का अनुमान है। फसल सीजन 2013-14 में देषा में 12.03 लाख हैक्टेयर में प्याज की बुवाई हुई थी तथा पैदावार 194.01 लाख टन की हुई थी। देष में प्याज की सबसे ज्यादा पैदावार महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटका, गुजरात, आंध्रप्रदेष, उत्तर प्रदेष, उड़ीसा और मध्य प्रदेष में होती है। जानकारों के अनुसार मार्च-अप्रैल महीने में हुई बेमौसम बारिष और ओलावृष्टि से भी प्याज की फसल का नुकसान हुआ था जिसकी वजह से उपलब्धता पिछले साल की तुलना में कम है।.....आर एस राणा

26 June 2015

सेबी अगस्त से करेगा जिंस ब्रोकरों का पंजीकरण

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) खुद में वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) के विलय के लिए दिशानिर्देश पूरे होने के साथ ही अगस्त से जिंस ब्रोकरों का पंजीकरण शुरू कर सकता है। सेबी ने मंगलवार को कहा था कि वह जिंस डेरिवेटिव्स के लिए खुद के नियम बना रहा है, जो अगस्त तक बन जाएंगे। सितंबर तक जिंस एक्सचेंजों के नियमन की तैयारी पूरी हो जाएगी। एफएमसी द्वारा प्रशासित जिंस ब्रोकर वर्तमान नियमों में किए गए बदलावों का इंतजार कर रहे हैं। एफएमसी के पास ब्रोकरों को सीधे नियंत्रित करने की शक्तियां नहीं हैं। अभी ब्रोकरों पर नियंत्रण जिंस एक्सचेंजों का होता है। सेबी ब्रोकरों का पंजीकरण करेगा और इसके लिए फीस वसूलेगा।

कमोडिटीज पार्टिसिपेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीपीएआई) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और आईएसएफ कमोडिटीज के प्रवर्तक बी के सभरवाल ने कहा, 'हम सेबी के अधिकारियों के साथ दो बार बैठक (4 और 17 जून) कर चुके हैं। हमें संकेत मिले हैं कि ब्रोकरों का पंजीकरण 1 अगस्त के आसपास शुरू होगा और यह प्रक्रिया 30 सितंबर तक पूरी हो जाएगी।' सेबी ने जिंस ब्रोकरों से पंजीकरण के एवज में ली जाने वाली फीस तय नहीं की है। इस समय ब्रोकर को कोई राशि नहीं चुकानी होती है। सभरवाल ने कहा, 'हम सेबी को इस बात के लिए मनाएंगे कि जिंस ब्रोकरों से पंजीकरण शुल्क नहीं वसूला जाए।'

सीपीएआई जिंस सदस्यों के ऑटोमैटिक पंजीकरण का आग्रह करेगा। क्लियरिंग एजेंटों और गोदाम सेवा प्रदाताओं को भी सेबी के पास पंजीकरण कराना और एकमुश्त फीस देनी पड़ सकती है। पंजीकरण का हर साल नवीनीकरण होगा। डेस्टीमनी सिक्योरिटीज के प्रबंध निदेशक सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा, 'सरकार ने प्रतिभूति एवं अनुबंध नियमन अधिनियम में प्रतिभूति की परिभाषा में जिंसों को शामिल किया है। सेबी मुद्रा ब्रोकरों से मामूली पंजीकरण फीस ले रहा है। इसी तरह नियामक जिंसों के लिए पंजीकरण शुल्क को टाल सकता है।' सेबी के साथ बातचीत से जुड़े एक ब्रोकरेज के अधिकारी ने कहा, 'एफएमसी के सेबी में विलय और इसे लागू करने की तारीख की घोषणा के लिए सरकारी अधिसूचना का इंतजार कर रहे हैं।' इस विलय की घोषणा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फरवरी के आम बजट में की थी और इसके क्रियान्वयन की मियाद एक साल तय की गई थी। इसकेकुछ सप्ताह बाद संसद ने विलय के मसौदे को मंजूरी दे दी, जिसके तहत प्रतिभूति बाजार के वर्तमान नियम जिंस बाजारों पर भी लागू होंगे। (BS Hindi)

Global Maize Production Estimate Revised Up To 963 MMT

IGC has revised global corn production estimate up from961 to 963 MMT for 2015-16.Corn consumption for 2015/16 has too been revised up to  976 MMT from the prior season's 974 million tonne.

China Is Likely To Double Its Wheat Import From 1.49 to 2.5 MMT In 2015-16

China's wheat crop in some main growing regions has affected badly by rains and issue over quality is increasing now.Wheat production in China is expected to cross last yea'sr level,damaged quality would force China to double its import-says expert.harvesting is almost over.However,quality is worse than last year due to heavy rains during harvesting  during harvesting stage in the beginning of this month.

South Korea Buys Australian Soft Wheat At $252/255 Per T On FoB Basis

Korea's private flour miller has brought31,700 tonne milling grade wheat from Australia,scheduled to be delivered in November,2015.The purchase comprised 26,500 tonnes of soft white wheat of 10.3 to 11.0 percent protein content, bought at around $252 to $255 a tonne fob, and 5,200 tonnes of hard wheat of a minimum 11.5 percent protein, bought at between $258 and $259 a tonne fob

दलहन एवं अन्य खाद्यान्न की महंगाई रोकने के लिए राज्यों के मंत्रियों संग बैठक


राज्यों सरकारों से आवष्यक वस्तुओं पर स्टॉक लिमिट लगाने की मांग
आर एस राणा
नई दिल्ली। दलहन के साथ ही अन्य खाद्य पदार्थो की कीमतों में आई तेजी से चेती केंद्र सरकार ने राज्यों के खाद्य मंत्रियों को दिल्ली तलब किया है। केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान की अध्यक्षता में 7 जुलाई को होने वाली बैठक में दलहन के साथ ही अन्य आवष्यक वस्तुओं की उपलब्धता और सप्लाई का आंकलन किया जायेगा।
खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि दलहन के साथ ही अन्य खाद्यान्नों की कीमतों में हाल ही में आई तेजी को रोकने के लिए राज्यों के खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रियों की बैठक बुलाई है। इसमें दलहन के साथ ही अन्य खाद्य पदार्थों जैसे प्याज और आलू आदि की उपलब्धता के बारे में विस्तार से जानकारी ली जायेगी, साथ ही बाजार में इनकी सप्लाई सुगम बनाने के लिए राज्य सरकारों से आवष्यक वस्तु अधिनियम के तहत स्टॉक लिमिट लगाने जैसे उपाय उठाने को कहा जायेगा।
उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार पहले ही राज्य को आवष्यक वस्तु अधिनियम के लिए स्टॉक लिमिट लगाने के लिए पत्र लिख चुकी है तथा राजस्थान सरकार ने दालों पर स्टॉक लिमिट को लागू भी कर दिया है। अन्य राज्य सरकारों से भी इसी तरह के कदम उठाने के बारे में विचार किया जायेगा।
उन्होंने बताया कि यह सही है कि चालू फसल सीजन में देष में दलहन की पैदावार में कमी आई थी जिसके चलते वित वर्ष 2014-15 में देष में रिकार्ड 45 लाख टन दालों का आयात हुआ है। घरेलू बाजार दलहन की उपलब्धता सुगम बनाने के लिए सार्वजनिक कंपनियों एमएमटीसी, पीएसी और एसटीसी के माध्यम से दलहन के आयात में भी बढ़ोतरी की जायेगी। हालांकि महीने भर में उत्पादक मंडियों में दालों की थोक कीमतों में 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट भी आई है लेकिन फुटकर में दाम अभी भी उंचे बने हुए हैं।.....आर एस राणा

स्टॉकिस्टों की सक्रियता से ग्वार की कीमतों में और तेजी की संभावना


ग्वार गम उत्पादों में निर्यात मांग कमजोर, जुलाई की बारिष काफी अहम
आर एस राणा
नई दिल्ली। स्टॉकिस्टों की सक्रियता से ग्वार की कीमतों में तेजी का रुख बना हुआ है। उत्पादक मंडियों में सप्ताहभर में ग्वार की कीमतों में करीब 500 रुपये और ग्वार गम की कीमतों में 1,000 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। हालांकि ग्वार गम उत्पादों में इस समय निर्यात मांग काफी कमजोर है, तथा ग्वार की फसल के लिए जुलाई महीने में होने वाली बारिष काफी अहम है।
ग्वार निर्यातक फर्म के एक अधिकारी ने बताया कि ग्वार गम उत्पादों में निर्यात मांग इस समय काफी कमजोर है। ग्वार गम के निर्यात सौदे 1,800 डॉलर और ग्वार गम पाउडर के निर्यात सौदे 2,300 से 2,400 डॉलर प्रति टन की दर से सीमित मात्रा में ही हो रहे है। उन्होंने बताया कि चालू महीने में प्रमुख उत्पादक राज्यों में राजस्थान और हरियाणा में ग्वार के उत्पादक क्षेत्रों में बारिष कम हुई है जबकि गुजरात के उत्पादक क्षेत्रों में ज्यादा बारिष हुई है। ऐसे में फसल को नुकसान होने का अंदेषा बन गया है इसीलिए ग्वार गम में स्टॉकिस्टों की खरीददारी बढ़ गई है। ऐसे में मौजूदा कीमतों में और भी तेजी की संभावना है।
ग्वार व्यापारी सुरेंद्र सिंघल ने बताया कि उत्पादक मंडियों में सप्ताहभर में ग्वार की कीमतों में 500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। जोधपुर मंडी में गुरुवार को ग्वार का भाव बढ़कर 4,600 से 4,650 रुपये प्रति क्विंटल तथा ग्वार गम का भाव 10,800 से 11,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। उन्होंने बताया कि अभी तक ग्वार की बिजाई अच्छी हुई है लेकिन ग्वार की फसल के लिए जुलाई महीने में होने वाली बारिष काफी अहम है। ऐसे में ग्वार की तेजी-मंदी जुलाई महीने में मानसूनी बारिष पर भी निर्भर करेगी। उत्पादक मंडियों में ग्वार की दैनिक आवक 28 से 30 हजार क्विंटल की हो रही है।
एपीडा के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले महीने अप्रैल में ग्वार गम उत्पादों के निर्यात में कमी आई है। अप्रैल 2015 में देष से केवल 32,127 टन ग्वार गम उत्पादों का ही निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित वर्ष 2014-15 के अप्रैल महीने में 57,214 टन ग्वार गम उत्पादों का निर्यात हुआ था।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले महीने अप्रैल 2015 में मूल्य के हिसाब से ग्वार गम उत्पादों केे निर्यात में 50.25 फीसदी की भारी गिरावट आकर कुल निर्यात 373.02 करोड़ रुपये का ही हुआ है पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 749.84 करोड़ रुपये मूल्य का ग्वार गम उत्पादों का निर्यात हुआ था। हालांकि वित वर्ष 2014-15 के दौरान ग्वार गम उत्पादों के कुल निर्यात में बढ़ोतरी हुई थी।.....आर एस राणा

खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्रफल में 23 फीसदी की बढ़ोतरी


जुलाई महीने में मानसूनी बारिष पर निर्भर करेगी खरीफ की पैदावार
आर एस राणा
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक राज्यों में जून महीने में हुई अच्छी बारिष से खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्रफल में 23 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल बुवाई 165.6 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है। तिलहन के साथ ही दलहन और मोटे अनाजों की फसलों के बुवाई क्षेत्रफल में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। हालांकि फसलों की पैदावार के लिए जुलाई महीने में होने वाली मानसूनी बारिष काफी महत्वपूर्ण रहेगी।
कृषि आयुक्त जे एस संधू ने बताया कि जून महीने में हुई बारिष से खरीफ फसलों की बुवाई तो बढ़ी है लेकिन पैदावार के लिए जुलाई महीने में होने वाली बारिष काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि जून महीने में हुई अच्छी बारिष से किसानों को फसलों की बुवाई के लिए फायदा हुआ है, लेकिन फसलों के उत्पादन अनुमान का आंकलन जुलाई के पहले सप्ताह में होने वाली बारिष के बाद ही लगाया जा सकेगा।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में देषभर में अभी तक 165.6 लाख हैक्टेयर में फसलों की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 134.1 लाख हैक्टेयर में हुई थी। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार देषभर में 24 जून तक सामान्य से 44 फीसदी ज्यादा बारिष हुई है।
चालू खरीफ में अभी तक 11 लाख हैक्टेयर में दलहन की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 6.14 लाख हैक्टेयर में हुई थी। इसी तरह से मोटे अनाजों की बुवाई बढ़कर 19.2 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 16.7 लाख हैक्टेयर में हुई थी। तिलहन की बुवाई चालू रबी में 27.8 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 5.29 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।
खरीफ की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में 23.2 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 25 लाख हैक्टेयर में हुई थी। गन्ने की बुवाई 41.5 लाख हैक्टेयर में और कपास की बुवाई 34.8 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है।.....आर एस राणा

25 June 2015

Coffee Production Estimates For 2015-16 By Indian Traders

In the View of Indian Traders, Brazilian Arabica crop for 2015-16 would be around 44-46 million bags and Robusta around 35 million bags ,The picking is already scheduled from May month. Vietnam  production 2015-16 would be around 12 lakh  tons and Indonesia's production would be 11 lakh tons, both countries are scheduled to pick their Robusta crop during October 2015. Vietnam has reduced exports during the first five months of 2015 (Jan-2015 to May-2015) by 39.2%  as compared to last year's exports. Indian Arabica picking starts in November continued till December and Robusta  during  January and February expecting overall crop to cross 314 lakh tons.

मूंगफली का रकबा बढ़ेगा 25 फीसदी!

इस साल किसानों को मूंगफली कपास से ज्यादा फायदेमंद नजर आ रही है। इससे वर्ष 2015-16 के चालू खरीफ सीजन में मूंगफली की बुआई वर्ष 2014-15 के पिछले खरीफ सीजन की तुलना में 25 फीसदी बढऩे की संभावना है।
केंद्रीय कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अभी तक मूंगफली की बुआई कपास से बेहतर रही है। देश में चालू खरीफ सीजन में 19 जून तक 1,36,000 हेक्टेयर में मूंगफली बोई जा चुकी है, जबकि पिछले साल अब तक 79,000 हेक्टेयर में बुआई हुई थी। इस तरह ये आंकड़े मूंगफली बुआई में 72 फीसदी बढ़ोतरी को दर्शाते हैं।
मगर देश में कपास का रकबा मामूली घटा है। बीती 19 जून तक 19.6 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई है, जो गत सीजन में 20 लाख हेक्टेयर थी। उद्योग के अनुमानों से संकेत मिलता है कि इस साल सीजन के अंत तक कपास का रकबा 107.6 लाख हेक्टेयर रह सकता है, जबकि पिछले साल इसका कुल रकबा 126.5 लाख हेक्टेयर था। गुजरात सरकार के कृषि विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में मूंगफली के इस सबसे बड़े उत्पादक राज्य में इस कृषि जिंस की शुरुआती बुआई 60,400 हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल के रकबे 64,000 हेक्टेयर से मामूली कम है। हालांकि गुजरात में कपास की बुआई अब तक 40 फीसदी घटकर 1,51,400 हेक्टेयर रही है, जो पिछले साल की इसी अवधि में 2,56,800 हेक्टेयर थी। अन्य राज्यों में आंध्र प्र्रदेश एवं तेलंगाना में 18 जून तक मूंगफली की बुआई मामूली बढ़ोतरी के साथ 28,800 हेक्टेयर रही है, जो पिछले साल 28,000 हेक्टेयर थी। इसका पता हैदराबाद के तिलहन विकास निदेशालय के आंकड़ों से चलता है। तमिलनाडु में अब तक 19,000 हेक्टेयर में बुआई हो चुकी है, जो पिछले साल इस समय तक 8,000 हेक्टेयर थी। मूंगफली के एक अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य कर्नाटक में बुआई की शुरुआत धीमी रही है। वहां अब तक 27,000 हेक्टेयर में बुआई हुई है, जो पिछले साल इस समय तक 43,000 हेक्टेयर थी।
मूंगफली अनुसंधान निदेशालय (डीजीआर) के निदेशक टी राधाकृष्णन ने कहा, 'अब तक मूंगफली की बुआई अच्छी रही है और अगर मॉनसून अनुकूल रहा तो इसका रकबा 20 से 30 फीसदी बढ़ सकता है। हालांकि तस्वीर जुलाई के मध्य तक ही साफ हो पाएगी।'
पिछले साल मूंगफली का उत्पादन तुलनात्मक रूप से कम रहा, जिससे किसानों को मुख्य रूप से अक्टूबर, 2014 के बाद बेहतर कीमत मिली। अक्टूबर 2014 से मई 2015 के बीच मूंगफली की औसत कीमतें 1,000 से 1,300 रुपये प्रति 20 किलोग्राम रहीं, जबकि इस समय कीमतें 950 से 1,120 रुपये प्रति 20 किलोग्राम हैं।
मुंबई की जीएस एक्सपोट्र्स के प्रबंध निदेशक खुशवंत जैन ने कहा, 'इस साल मूंगफली के रकबे में संभावित बढ़ोतरी की मुख्य वजह अच्छी कीमतें होना है और मुख्य रूप से कपास किसान मूंगफली का रकबा बढ़ाएंगे। बुआई की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मूंगफली के रकबे में 25 फीसदी बढ़ोतरी की संभावना है।'
सीजन की शुरुआत से कच्चे कपास की कीमतें 750 रुपये से 850 रुपये प्रति 20 किलोग्राम के दायरे में रही हैं, जबकि सीजन में ज्यादातर समय कपास के दाम 28,000 से 30,000 रुपये प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) रहे हैं। भारतीय तिलहन एवं उपज निर्यात संवर्धन परिषद (आईओपीईपीसी) के चेयरमैन किशोर तन्ना ने कहा, 'मुख्य रूप से कपास किसान इस बार मूंगफली को अपनाएंगे। सीजन के अंत में मूंगफली के रकबे में जितनी बढ़ोतरी होगी, उसमें 85 फीसदी हिस्सा कपास के रकबे में कमी का होगा।' (BS Hindi0

इस साल खाद्य तेल का आयात बढ़ेगा 16 फीसदी

इंडोनेशिया जैसे देशों से सस्ते आयात और घरेलू स्तर पर कम पेराई के चलते अक्टूबर में समाप्त होने जा रहे तेल वर्ष में खाद्य तेल का आयात 16.3 फीसदी बढ़कर 135 लाख टन पर पहुंच सकता है। इस उद्योग की संस्था एसईए ने यह बात कही है।
विपणन वर्ष (नवंबर से अक्टूबर) 2013-14 के दौरान देश में 116 लाख टन खाद्य तेल के आयात का अनुमान है। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) के निदेशक बी वी मेहता ने कहा, 'मई तक खाद्य तेल का आयात 77.7 लाख टन था। अगर अक्टूबर के अंत तक आयात 135 लाख टन का स्तर छू जाए तो मुझे कोई अचंभा नहीं होगा।'
इंडोनेशिया और मलेशिया से सस्ते आयात के कारण आयात में करीब 20 लाख टन की बढ़ोतरी होने की संभावना है। इन दोनों देशों ने सरप्लस स्टॉक की बिक्री के लिए पाम उत्पादों पर निर्यात शुल्क खत्म कर दिया है। सोयाबीन के दाम ऊंचे होने और तेल के दाम कम मिलने के कारण पेराई और खाद्य तेल की उपलब्धता में कमी आई है, जिससे सोया तेल और सूरजमुखी तेल का आयात बढ़ा है। (BS Hindi)

छह साल के बदतर हाल में पहुंची चीनी

हाजिर बाजार में मंगलवार को चीनी का भाव छह साल के निम्नतम स्तर पर पहुंच  गया। गन्ना किसानों का बकाया चुकाने के लिए मिलें खुले बाजार में चीनी बेच रही हैं, जिसकी वजह से यह गिरावट दर्ज की गई है। राज्य सरकार की ओर से लगातार मिल रहे लगातार नोटिसों ने चीनी मिलों को और परेशान कर दिया है।
नवी मुंबई में वाशी कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) में चीनी एम-30 का भाव 2,431 रुपये प्रति क्विंटल ही रह गया। इस साल इसका भाव 16 फीसदी टूट चुका है। पिछले साल अक्टूबर से अभी तक इसमें 23 फीसदी गिरावट आ चुकी है। पिछले साल अक्टूबर (पेराई सत्र की शुरुआत) से लेकर अभी तक चीनी का एक्स-फैक्टरी भाव करीब 20 फीसदी टूट चुका है। इससे पहले चीनी के भाव जून 2009 में इतने कम थे।
भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'बाजार का माहौल यही बता रहा है कि देश में चीनी का बहुत अधिशेष है और अगले सीजन में भी उत्पादन अधिक ही रहेगा। उसके अलावा अधिशेष चीनी को निकालने में वैश्विक बाजार भी भारत की मददद नहीं करेंगे। इसलिए अधिशेष चीनी यहीं रहेगी। इसी कारण भाव नीचे आ रहे हैं।' देश भर में चीनी की औसत उत्पादन लागत 3,100 रुपये प्रति क्विंटल है। उत्तर प्रदेश में चीनी की उत्पादन लागत 3,300 रुपये प्रति क्विंटल है और महाराष्टï्र में 2,900 रुपये प्रति क्विंटल। फिलहाल औसत एक्स-फैक्टरी प्राप्ति 2,250 रुपये प्रति क्विंटल चल रही है। इस तरह मिलों को हरेक क्विंटल चीनी पर 800 से 850 रुपये का घाटा हो रहा है।
चालू पेराई सत्र (अक्टूबर 2014 से सितंबर 2015) के दौरान देश में चीनी का कुल उत्पादन 2.83 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि खपत 2.25 से 2.30 करोड़ टन ही रहने के आसार हैं। इस सीजन में गन्ने का रकबा अधिक रहा है, इसलिए अगले पेराई सत्र में भी चीनी का उत्पादन बहुत ज्यादा रहने का अनुमान है। हाल में केयर रेटिंग्स की ओर से जारी रिपोर्ट में लिखा है, 'देसी एवं अंतरराष्टï्रीय बाजार में भारी मात्रा में अधिशेष होने के कारण चीनी का भाव कमजोर ही रहने की आशंका है। उद्योग को बचाने के लिए अनिवार्य बफर स्टॉक विकसित करना होगा, अधिक निर्यात सब्सिडी देकर उसे आसान बनाना होगा, चीनी उत्पादकों के ऋण का पुनर्गठन करना होगा और सबसे बड़ी बात यह है कि रंगराजन  समिति की सिफारिशों को लागू करना होगा।' यह लगातार चौथा साल है, जब देश में चीनी का उत्पादन इसकी खपत से अधिक रहा है।
महाराष्टï्र स्टेट फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज के प्रबंध निदेशक संजीव बब्बर कहते हैं, 'बैंक चीनी के भंडार का मूल्यांकन 1,990 रुपये प्रति क्विंटल कर रहे हैं। इसमें 20 फीसदी मार्जिन को भी ध्यान में रखा जाए तो चीनी भंडार का वास्तविक मूल्यांकन 1,400 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल आएगा। इसलिए देश भर की चीनी मिलें मुश्किल में हैं।' (BS Hindi)

मध्य प्रदेष में 50 फीसदी हो चुकी है सोयाबीन की बुवाई - सोपा


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ में अभी तक हुई बारिष से मध्य प्रदेष में सोयाबीन की बुवाई 50 फीसदी क्षेत्रफल में पूरी हो चुकी है। कपास की कीमतें चालू सीजन में कम रही है ऐसे में राज्य में सोयाबीन के बुवाई क्षेत्रफल मं पांच से सात फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएषन ऑफ इंडिया (सोपा) के प्रवक्ता राजेष अग्रवाल ने बताया कि राज्य के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में अभी तक चालू खरीफ में अच्छी बारिष हुई है जिससे इसकी बुवाई लगभग 50 फीसदी क्षेत्रफल में पूरी हो चुकी है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में कपास के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे आ गए थे ऐसे में किसान सोयाबीन की बुवाई को तरजीह दे रहे हैं। ऐसे में चालू खरीफ सीजन में मध्य प्रदेष में सोयाबीन के बुवाई क्षेत्रफल में पांच से सात फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
उन्होंने बताया कि मौसम अनुकूल रहा तो अगले दस-पंद्रह दिनों में राज्य में सोयाबीन की बुवाई पूरी हो जायेगी। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार मध्य प्रदेष में चालू खरीफ में अभी तक सामान्य से 52 फीसदी ज्यादा बारिष हुई है। फसल सीजन 2014-15 में राज्य में मानसूनी कमजोर रहने से सोयाबीन की बुवाई 55.4 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी जोकि इसके पिछले साल के 62.6 लाख टन से कम थी।
सोयाबीन कारोबारी हेंमत जैन ने बताया कि गुरुवार को इंदौर में प्लांट डिलीवरी सोयाबीन के भाव 3,475 से 3,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे तथा मंडियों में इसके भाव 3,400 से 3,440 रुपये प्रति क्विंटल रहे। कोटा मंडी में सोयाबीन के भाव 3,300 से 3,500 रुपये और लातूर मंडी में 3,490 रुपये प्रति क्विंटल रहे। इंदौर में सोया खली के भाव 30,300 रुपये और कोटा में 30,400 रुपये प्रति टन रहे। सोया रिफाइंड तेल का भाव इंदौर में 600-605 रुपये प्रति 10 किलो रहा। सोया खली में निर्यात मांग कम होने से सोयाबीन की कीमतों में गिरावट बनी हुई। गुरुवार को उत्पादक मंडियों में सोयाबीन की कीमतों में 25 से 50 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज की गई।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में सोयाबीन की पैदावार घटकर 107.05 लाख टन की हुई थी जबकि इसके पिछले साल इसकी पैदावार 118.61 लाख टन की हुई थी।....आर एस राणा

कमजोर निर्यात मांग से कपास की कीमतों में गिरावट का रुख


चालू खरीफ में बुवाई क्षेत्रफल में कमी आने की आषंका
आर एस राणा
नई दिल्ली। कपास में निर्यातकों की मांग कम होने से भाव में गिरावट बनी हुई है। अहमदाबाद में षंकर-6 किस्म की कपास का भाव घटकर गुरुवार को 34,200 से 34,300 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) रह गया। चालू सीजन में कई राज्यों में कपास के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे आ गए थे, इसका असर चालू खरीफ में कपास की बुवाई पर पड़ सकता है।
नार्थ इंडिया कॉटन एसोसिएषन के अध्यक्ष राकेष राठी ने बताया कि विष्व बाजार में कपास की उपलब्धता ज्यादा होने से निर्यात सीमित मात्रा में ही हो रही है जिसकी वजह से घरेलू मार्किट में भाव में गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि चालू महीने में तो उत्पादक राज्यों में अच्छी बारिष हुई है लेकिन कपास की तेजी-मंदी जुलाई की बारिष पर निर्भर करेगी। जुलाई में बारिष अच्छी हुई तो मौजूदा कीमतों में 200 से 400 रुपये प्रति कैंडी की गिरावट आ सकती है लेकिन अगर बारिष कम हुई तो फिर भाव में 1,500 से 2,000 रुपये प्रति कैंडी की तेजी भी आ सकती है।
कपास कारोबारी संजीव गुप्ता ने बताया कि कपास की मांग कम होने से पिछले दस दिनों में इसकी कीमतों में 1,200 से 1,500 रुपये प्रति कैंडी की गिरावट आ चुकी है। उन्होंने बताया कि कॉटन कारोपेरषन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ई-निलामी के माध्यम से कपास की बिकवाली कर रही है तथा निगम अभी तक करीब 15.5 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास की बिकवाली कर चुकी है। उन्होंने बताया कि निगम ने चालू सीजन में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 87 लाख गांठ कपास की खरीद की थी। ऐसे में निगम के पास स्टॉक ज्यादा हो के कारण भी घरेलू बाजार में भाव घटे हैं। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में कई राज्यों में कपास की दाम एमएसपी से नीचे आ गए थे ऐसे में चालू खरीफ में इसका असर कपास की बुवाई पर पड़ने की आषंका है तथा इसके बुवाई क्षेत्रफल में चार-पांच फीसदी की कमी आ सकती है।
कपास निर्यातक फर्म के एक अधिकारी ने बताया कि चीन अपने रिजर्व स्टॉक की बिकवाली कर रहा है, इसीलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कपास की कीमतों में गिरावट आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कपास के भाव घटकर 62-63 सेंट प्रति पाउंड रह गए जबकि चालू महीने के षुरु में इसके भाव 65-66 सेंट प्रति पाउंड थे।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में अभी तक कपास की बुवाई 19.66 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 20 लाख हैक्टेयर में हुई थी। कपास की बुवाई सामान्यतः 110 लाख हैक्टेयर में होती है।......आर एस राणा

24 June 2015

काफी बोर्ड का दावा अगले साल काफी उत्पादन पहुचेंगा रिकार्ड स्तर पर


देश में काफी के उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल आरही है| साल 2014-2015 में में अनुमानित रिकॉर्ड के बाद साल 2015-2016 में भी उत्पादन रिकॉर्ड स्तर तक पहुचने के अनुमान है| साल 2015 -16 के लिए पहला अनुमान जारी करते हुये कोफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया ने बताया की अगले साल देश में कॉफ़ी का उत्पादन 3.556 लाख टन पहुँच सकता है| इससे पहले साल 2014-15 के दौरांन 3.27 लाख टन होने का अनुमान लगाया है|
देश में अधिकतर रोबस्टा कॉफ़ी का उत्पादन होता है| कॉफ़ी बोर्ड के अनुसार 2015-16 में रोबस्टा उत्पादन 2.453 लाख टन पहुँचने का अनुमान है| हालाँकि की कर्नाटका देश का सबसे बड़ा कॉफ़ी उत्पादक राज्य है| कॉफ़ी बोर्ड के अनुसार साल 2015-16 के अनुसार इस राज्य में लगभग 2.565 लाख टन कॉफ़ी का उत्पादन रह सकता है| केरल और कर्नाटका के अलावा कॉफ़ी उत्पादन आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, और तमिलनाडु में भी होता है|

गेहूं आयात का बड़ा सौदा

भारतीय आटा मिल मालिकों और वैश्विक कारोबारी कंपनियों ने मार्च से 5 लाख टन प्रीमियम ऑस्ट्रेलियाई गेहूं आयात के लिए सौदे किए हैं, जबकि घरेलू बाजार में इस जिंस का सरप्लस स्टॉक है। यह पिछले एक दशक में गेहूं की सबसे बड़ी खरीद होगी। कारोबारी सूत्रों ने आज यह जानकारी दी। ऐसे सौदों से सीधे जुड़े तीन सूत्रों ने कहा कि इस बात की चिंताएं हैं कि फरवरी और मार्च में बेमौसम बारिश से गेहूं विशेष रूप से पिज्जा एवं पास्ता बनाने में उपयोग होने वाले उच्च प्रोटीनयुक्त गेहूं का उत्पादन घटेगा। इन चिंताओं की वजह से सबसे पहले दक्षिणी भारत के मिल मालिकों ने ऑर्डर दिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आकर्षक कीमतें होने से प्रोत्साहित होकर कारगिल, लुइ ड्रेफस और ग्लेनकोर जैसी कारोबारी कंपनियों ने भी आयात के ऑर्डर दिए हैं।

कारोबारी और मिल मालिक फ्रांस और रूस से 5 लाख टन गेहूं का आयात कर सकते हैं। इन देशों में जल्द ही गेहूं की कटाई होने वाली है। इन सौदों से गेहूं की बेंचमार्क कीमतें ऊपर जा सकती हैं, जो पहले ही अमेरिकी फसल की गुणवत्ता कमजोर होने की आशंकाओं के कारण बढ़ चुकी हैं। एक सूत्र ने कहा, 'इस बात की प्रबल संभावना है कि फ्रांस और रूस की आकर्षक कीमतों के कारण वहां से भारत में गेहूं आएगा। मेरा मानना है कि अगर यूरो में गिरावट आई तो फ्रांस से भारत को गेहूं का निर्यात और बढ़ेगा।'

सूत्रों ने नाम न प्रकाशित करने का आग्रह करते हुए बताया कि अब तक जितने गेहूं के सौदे हुए हैं, उसमें से करीब आधा भारत पहुंच गया है और शेष गेहूं की डिलिवरी जुलाई में होनी है। यह गेहूं 255 से 275 डॉलर प्रति टन की कीमत पर खरीदा गया है। हालांकि बारिश और ओले गिरने से भारत मेंं गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा है। लेकिन लगातार आठ वर्र्षों तक अच्छे उत्पादन के चलते भारत के पास गेहूं का भारी स्टॉक है।

अगर इस साल मॉनसून की बारिश कम रही और महंगाई में तेजी आई तो सरकार द्वारा अपने गोदामों से बड़ी मात्रा में गेहूं की बिक्री किए जाने की संभावना है। भारतीय मौसम विभाग ने इस साल मॉनसून के अपने अनुमान को घटाकर लंबी अवधि के औसत (एलपीए) का 88 फीसदी कर दिया है, जिससे गत छह वर्षों में पहली बार सूखा पडऩे की चिंताएं पैदा हुई हैं। उद्योग और सरकारी अधिकारियों का अनुमान है कि इस साल गेहूं का उत्पादन 9 करोड़ टन के आसपास रहेगा, जो पिछले साल के उत्पादन से करीब 5 फीसदी कम है। लेकिन फिर भी यह घरेलू मांग करीब 7.2 करोड़ टन से ज्यादा है। गेहूं की बुआई मुख्य रूप से भारत के मध्य और उत्तरी मैदानों में होती है। इसलिए हिंद महासागर से घिरे हुए दक्षिणी राज्यों की आटा मिलें कभी-कभी ऑस्ट्रेलिया से उच्च प्रोटीनयुक्त गेहूं के आयात को फायदेमंद पाती हैं। लेकिन इस साल इतनी बड़ी मात्रा में आयात ने कुछ लोगों को चौंकाया है। एक सूत्र ने कहा, 'बड़ी मात्रा में आयात के अलावा दो बड़े बदलाव हुए हैं।' उन्होंने कहा, 'संभïवतया पहली बार कुछ आयात जहाजों (वेसल) में हो रहा है और संभवतया पहली बार मिल मालिक फ्रांस और रूस से गेहूं खरीदेंगे।' एक अन्य सूत्र ने बताया कि 185 से 190 डॉलर प्रति टन कीमत पर (फ्री ऑन बोर्ड) फ्रांस और रूस का गेहूं भारत के लिए आकर्षक है। (BS Hindi)

बारिश से बेहतर खरीफ की उम्मीद

देश के करीब 80 फीसदी कृषि रकबे में अच्छी बारिश हुई है, जिससे इस खरीफ सीजन में कृषि जिंसों का उत्पादन बढऩे की संभावना है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि हालांकि अलनीनो के सक्रिय होने की स्थिति में खरीफ उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कृषि का देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 13.9 फीसदी योगदान है और यह क्षेत्र करीब 60 फीसदी आबादी को रोजगार मुहैया कराता है। मॉनसून की बारिश की अहमियत इस तथ्य से समझी जा सकती है कि देश का 64 फीसदी कृषि क्षेत्र असिंचित है। कृषि भूमि के शेष 36 फीसदी हिस्से में से भी ज्यादातर बांधों, तालाबों से यांत्रिक सिंचाई या मॉनसून की बारिश से होती है। मॉनसून की बारिश पर न केवल खरीफ की फसलें बल्कि रबी की फसलें भी निर्भर होती हैं। मॉनसून सीजन में अच्छी बारिश से मिट्टी में नमी बनी रहती है, जो रबी फसलों की बुआई में मददगार होती है।

एडलवाइस इंटीग्रेटेड कमोडिटी मैनेजमेंट के एक अध्ययन में कहा गया है, 'सामान्य बारिश होने पर दलहन, सोयाबीन, मक्का और मूंगफली का अच्छा उत्पादन हो सकता है। इन सभी कृषि जिंसों के दाम पिछले कुछ वर्षों के दौरान अच्छे रहे हैं, जिससे किसान ज्यादा रकबे में ये फसलें बोने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इसके विपरीत इस साल धान, बाजरा और अरंडी के रकबे में कमी के आसार हैं। इस सीजन में अन्य प्रतिस्पर्धी फसलों से अच्छी आमदनी के चलते बाजरे और अन्य फसलों की जगह दूसरी फसलों की बुआई होगी। पिछले साल अरंडी के दाम कम रहने से इस साल रकबे में गिरावट आ सकती है। हमें उम्मीद है कि इस साल मॉनसून सामान्य रहेगा और कृषि उपजों की कीमतें नरम पड़ेंगी।' भारतीय मौसम विभाग ने आशंका जताई है कि अलनीनो की वजह से जून से अगस्त के दौरान फसलों में अंकुरण के समय बारिश सामान्य से कम रह सकती है। इससे बुआई में बढ़ोतरी के बावजूद कुल उत्पादन घट सकता है। 

रिपोर्ट में कहा गया है, 'सामान्य से कम मॉनसून की स्थिति में कपास, गन्ने और उड़द के रकबे में बढ़ोतरी हो सकती है। कपास की बुआई की अवधि लंबी होती है, जबकि गन्ने की बारिश पर मामूली निर्भरता होती है और कम बारिश में उदड़ की उत्पादकता बढ़ेगी। हालांकि धान, मक्के, मूंगफली, ग्वार, अरंडी, तुअर, मूंग और बाजरे के रकबे में कमी आएगी।' वर्ष 2002-03, 2006-07 और 2009-10 में अलनीनो सक्रिय रहा था और इन वर्षों में कुछ को छोड़कर लगभग सभी खरीफ फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ था।

कुंवरजी कमोडिटीज के निदेशक जगदीप गे्रवाल ने कहा, 'इस सीजन की बारिश 50 फीसदी कृषि क्षेत्र कवर कर चुकी है और यह सामान्य से ऊपर रही है। इस कारण और कीमतें अच्छी होने से दालों का रकबा ज्यादा रह सकता है। हालांकि कपास और गन्ने की बुआई सिंचित क्षेत्र में होती है, लेकिन पिछले साल कम कीमतों से किसान बुआई को लेकर हतोत्साहित हुए हैं। मॉनसून सामान्य रहने की स्थिति में खरीफ सीजन के मोटे अनाज का उत्पादन 8 से 15 फीसदी और तिलहनों का उत्पादन 15 से 20 फीसदी बढ़ सकता है। इसके विपरीत अलनीनो की स्थिति में मोटे अनाज और तिलहन का उत्पादन क्रमश: 5-10 और 10 फीसदी से ज्यादा घट सकता है।' (BS Hindi)

यूपी की चीनी मिलों पर किसानों का 6,088 करोड़ बकाया


चालू पेराई सीजन में प्रदेष में 71 लाख टन चीनी का उत्पादन
आर एस राणा
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेष में भले ही चीनी का पेराई सीजन 2014-15 समाप्त हो गया हो, लकिन गन्ना किसानों की मुष्किले कम नहीं हो पा रही है। प्रदेष की चीनी मिलों पर अभी भी किसानों का 6,088.17 करोड़ रुपये का बकाया बचा हुआ है। चालू पेराई सीजन में राज्य में 71 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है।
उत्तर प्रदेष षुगर मिल्स एसोसिएषन के अनुसार चालू पेराई सीजन में राज्य की चीनी मिलों ने किसानों से 20,644.32 करोड़ रुपये के गन्ने की खरीद की है तथा इसमें से अभी तक 11,895.12 करोड़ रुपये का भुगतान मिलें किसानों को कर चुकी हैं।
उन्होने बताया कि चालू पेराई सीजन 2014-15 में राज्य में 71 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है जबकि पिछले साल 64.95 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। चालू पेराई सीजन में जहां राज्य में गन्ने की औसत रिकववरी 9.55 फीसदी की रही है वहीं पिछले पेराई सीजन में रिकवरी की दर 9.26 फीसदी थी। उन्होंने बताया कि चालू पेराई सीजन में राज्य में 118 मिलों में पेराई हुई जबकि पिछले पेराई सीजन में 119 मिलों में पेराई हुई थी।......आर एस राणा

बोल्ड क्वालिटी की इलायची की कीमतों में तेजी की संभावना


आर एस राणा
नई दिल्ली। नीलामी केंद्रों पर नई इलायची की आवक अच्छी हो रही है लेकिन बोल्ड क्वालिटी (आठ-एमएम) के मालों की आवक सीमित मात्रा में है जबकि इसमें निर्यातकों के साथ घरेलू मांग अच्छी है। इसीलिए इसकी कीमतों में तेजी बनी हुई है। नीलामी केंद्रों पर बुधवार को बोल्ड क्वालिटी की इलायची के भाव बढ़कर 940 से 950 रुपये प्रति किलो हो गए।
इलायची कारोबारी एम रुबारल ने बताया कि नीलामी केंद्रो पर इलायची की साप्ताहिक आवक बढ़कर चार लाख किलो की हो गई है लेकिन इसमें बोल्ड क्वालिटी के मालों की आवक केवल पांच से सात फीसदी ही है। जबकि इस समय बोल्ड क्वालिटी में घरेलू मांग के साथ ही निर्यातकों की मांग भी अच्छी है। इसीलिए सप्ताहभर में इसकी कीमतों में 25 से 30 रुपये प्रति किलो की तेजी आई है। उन्होंने बताया कि मध्य जुलाई के बाद बोल्ड क्वालिटी की इलायची की आवक बढ़ेगी इसलिए मौजूदा कीमतों में और भी 25 से 50 रुपये प्रति किलो की तेजी आने का अनुमान है।
इलायची के थोक कारोबारी अषोक पारिख ने बताया कि चालू सीजन में इलायची की पैदावार पिछले साल के लगभग बराबर 24,000 से 25,000 टन होने का अनुमान है। विष्व बाजार में भारतीय इलायची के भाव 11 से 15.5 डॉलर प्रति किलो हैं जबकि ग्वाटेमाला की इलायची का औसत भाव 7 से 11 डॉलर प्रति किलो है। ग्वाटेमाला के पास बोल्ड क्वालिटी की इलायची का स्टॉक सीमित मात्रा में है। ऐसे में आगामी दिनों में नीलामी केंद्रों पर आवक तो बढ़ेगी, लेकिन त्यौहारी और निर्मात मांग को देखते हुए भाव में गिरावट की उम्मीद कम है। उन्होंने बताया कि वित वर्ष 2015-16 में भी देष से इलायची के निर्यात में बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
नीलामी केंद्रों पर बुधवार को 8 एम एम की इलायची का भाव बढ़कर 940 से 950 रुपये और 7 एम एम की इलायची का भाव 790 से 810 रुपये प्रति किलो रहा। 6.5 एम एम की इलायची का भाव 620 से 940 रुपये प्रति किलो रहा। नीलामी केंद्रों पर बुधवार को 19,924 किलो इलायची की आवक हुई तथा भाव 679 से 935 रुपये प्रति किलो रहे।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित वर्ष 2014-15 में 3,795 टन इलायची का निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित वर्ष में 3,600 टन का निर्यात हुआ था। मसाला बोर्ड ने निर्यात का लक्ष्य 3,000 टन का रखा था।

22 June 2015

गेहूं की सरकारी खरीद 276 लाख टन के पार

आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू रबी विपणन सीजन 2015-16 में गेहूं की सरकारी खरीद बढ़कर 276.19 लाख टन की हो गई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 270.68 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी।
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार उत्तर प्रदेष और राजस्थान में सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं की आवक हो रही है जबकि अन्य राज्यों में खरीद बंद हो चुकी है। अभी तक हुई गेहूं की कुल खरीद में पंजाब की हिस्सेदारी 99.52 लाख टन, हरियाणा की 67.55 लाख टन, उत्तर प्रदेष की 22.67 लाख टन, मध्य प्रदेष की 72.61 लाख टन तथा राजस्थान की 12.94 लाख टन है।......आर एस राणा

निर्यात मांग कम होने से जीरा की कीमतों में और गिरावट की आषंका


आर एस राणा
नई दिल्ली। रमजान का पवित्र महीना षुरु होने के कारण जीरा में खाड़ी देषों की आयात मांग कमजोर हुई है। साथ ही घरेलू मांग भी कम आ रही है जिससे जीरा की कीमतों में गिरावट बनी हुई है। उत्पादक मंडियों में जीरा के भाव 2,800 से 3,200 रुपये प्रति 20 किलो क्वालिटीनुसार रह गए।
जीरा कारोबारी विरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि जीरा में निर्यातकों के साथ ही घरेलू मसाला कंपनियों की मांग कम आ रही है जिससे भाव में गिरावट बनी हुई है। उन्होंने बताया कि चालू महीने में उत्पादक मंडियों में जीरा की कीमतों में करीब 250 से 300 रुपये प्रति 20 किलो की गिरावट आ चुकी है। उंझा मंडी में जीरा की दैनिक आवक 4,000 बोरी (एक बोरी-55 किलो) की हो रही है जबकि सामान्य क्वालिटी के जीरा का भाव घटकर सोमवार को 2,800 से 3,000 रुपये और बेस्ट क्वालिटी के जीरा का भाव 3,000 से 3,200 रुपये प्रति प्रति 20 किलो रह गया। कमजोर मांग को देखते हुए मौजूदा कीमतों में और भी गिरावट आने की आषंका है।
जीरा निर्यातक रजनीकांत पोपट ने बताया कि रमजान का पवित्र महीना षुरु होने के कारण खाड़ी देषों की आयात मांग कम हुई है। साथ ही टर्की और सीरिया में जीरा की नई फसल की आवक होने से भी मांग कम हुई है। हालांकि टर्की और सीरिया में जारी राजनीतिक गतिरोध को देखते हुए चालू वित्त वर्ष 2015-16 में भी देष से जीरा का निर्यात बढ़ने का अनुमान है। उन्होंने बताया कि जुलाई-अगस्त में जीरा की निर्यात मांग बढ़ने का अनुमान है, साथ ही इस दौरान घरेलू मांग भी बढ़ेगी।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2015-16 में देष से 1,55,500 टन जीरा का निर्यात हुआ है। जबकि वित वर्ष 2013-14 में देष से 1,21,500 टन जीरा का ही निर्यात हुआ था। देष से जीरा का सबसे ज्यादा निर्यात खाड़ी देखों को होता है। भारतीय जीरा का भाव विष्व बाजार में इस सप्ताह 3.70 डॉलर प्रति किलो रहा जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसका भाव 2.65 डॉलर प्रति किलो था।
कृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में जीरा की बुवाई 859,000 हैक्टेयर में हुई थी तथा पैदावार 514,000 टन होने का अनुमान है। पिछले साल भी देष में जीरा की पैदावार लगभग बराबर ही हुई थी।......आर एस राणा

उत्पादक राज्यों में बारिष से सोयाबीन की कीमतों में और गिरावट की संभावना


सोया खल में निर्यात मांग में भारी कमी, तेल में उठाव सीमित मात्रा में
आर एस राणा
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेष, महाराष्ट्र और रास्थान में हुई बारिष से सोयाबीन की बुवाई षुरु हो गई है, साथ ही सोया खली में निर्यात मांग कमजोर है जबकि उपलब्धता ज्यादा होने से सोया रिफाइंड तेल में मांग भी सीमित मात्रा में बनी हुई। ऐसे में घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतों में और भी गिरावट आने की संभावना है।
सोयाबीन कारोबारी नरेष गोयनका ने बताया कि मध्य प्रदेष, महाराष्ट्र और राजस्थान में चालू महीने में हुई अच्छी बारिष से सोयाबीन की बुवाई षुरु हो गई है। उन्होंने बताया कि अभी तक की बारिष को देखते हुए बुवाई बढ़ने का अनुमान है। यही कारण है कि स्टॉकिस्टों ने सोयाबीन की बिकवाली बढ़ा दी है। महाराष्ट्र की मंडियों में सोमवार को सोयाबीन के भाव घटकर 3,450 रुपये तथा प्लांट डिलीवरी भाव 3,550 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। उन्होंने बताया कि कमजोर मांग को देखते हुए मौजूदा कीमतों में और भी 100 से 150 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आने की आषंका है।
सोयाबीन व्यापारी हेंमत जैन ने बताया कि उत्पादक राज्यों में सोयाबीन का करीब 35 से 40 लाख टन का स्टॉक बचा हुआ है जबकि इस समय सोया खली में निर्यात मांग में भारी कमी बनी हुई है। मौजूदा मांग को देखते हुए नई फसल तक केवल 15 से 17 लाख टन सोयाबीन की ही और क्रेसिंग होने का अनुमान है। ऐसे में नई फसल के समय उत्पादक राज्यों में सोयाबीन का अच्छा स्टॉक बचने का अनुमान है। मांग कम होने के कारण ही सोयाबीन के क्रेसिंग प्लांट अपनी कुल क्षमता का केवल 25 से 30 फीसदी ही उपयोग कर पा रहे हैं। सोया खली के भाव उत्पादक राज्यों में 32,500 से 33,000 रुपये प्रति टन चल रहे हैं जबकि सोया रिफाइंड तेल का भाव 598 से 600 रुपये प्रति 10 किलो है।
उद्योग के अनुमान के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में देष से 32,063 टन सोया खली का ही निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि में सोया खली का निर्यात 98,109 टन का हुआ था। भारतीय बंदरगाह पर सोया खली के भाव मई में बढ़कर 592 डॉलर प्रति टन हो गए, जबकि अप्रैल महीने में इसके भाव 515 डॉलर प्रति टन थे। विष्व बाजार में सोया खली के दाम नीचे बने हुए है जिसका असर भारत से सोया खली के निर्यात पर पड़ रहा है। मुर्गी दाना कंपनियों की मांग भी सोया खली में कमजोर बनी हुई है।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में सोयाबीन की पैदावार घटकर 107.05 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 118.61 लाख टन की हुई थी।.....आर एस राणा

20 June 2015

Russian Wheat Export Sales Get Slow Due To Uncertainty Over New Export Tax

Russia wheat export business is getting slow due to unclear export tax for new wheat.The floating tax formula, to be launched from July 1, is intended to stop exports surging if the rouble drops steeply.Local currency fluctuation since mid -2014 discourages wheat exporters.The tax formula was prepared by Russia's Economy Ministry and approved by the government in May. The tax is set at 50 percent of the customs price per tonne, minus 5,500 roubles ($103), but not less than 50 roubles per tonne.But there is no time frame for when custom would apply this and at what level

दलहन पर नहीं पड़ सकता असर

अगर बीते कुछ सालों के रुझानों पर गौर किया जाए तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में जबरदस्त बढ़ोतरी का दलहन के उत्पादन पर  बमुश्किल ही असर पड़ता है। इसलिए हालिया बढ़ोतरी भी कोई अपवाद साबित नहीं हो सकती है। दरअसल दलहन की एमएसपी पिछले पांच सालों के दौरान 50 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ गई है जबकि उत्पादन लगभग स्थिर है। बुधवार को सरकार ने दलहन फसलों की एमएसपी में बढ़ोतरी के साथ अधिक बुआई के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से बोनस बढ़ाने की भी घोषणा की है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के चेयरमैन अशोक के विशानदास ने कहा, 'यह कोई बिजली का स्विच नहीं है जिसे चालू करते ही पंखा चालू हो जाएगा। लेकिन इस खरीफ सीजन में इसका थोड़ा असर होगा और रबी सीजन और इससे आगे इसका असर देखने को मिलेगा। इस साल दलहन का रकबा बढऩा निश्चित है। बोनस में जबरदस्त बढ़ोतरी के साथ एमएसपी में इजाफा कर सरकार पहली बार दलहनों की खरीदारी करने के बारे में विचार कर रही है जिससे किसान दलहन फसलों की बुआई करने के लिए प्रेरित होंगे। याद रखिए कि दलहन की उत्पादन लागत कम होती है और उत्पादन की अधिक संभावनाओं के साथ उर्वरक और कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग होता है।' सीएसीपी ही हर साल एमएसपी में बढ़ोतरी की मात्रा तय करने के बारे में सिफारिश करता है। बुधवार को कृषि मंत्रालय ने 200 रुपये प्रति क्विंटल बोनस के साथ एमएसपी में 6 फीसदी की बढ़ोतरी करने की घोषणा की थी ताकि किसान दलहन की बुआई बढ़ाने के लिए प्रेरित हों। 275 रुपये की बढ़ोतरी के साथ उड़द की एमएसपी फसल वर्ष 2015-16 में बढ़ाकर 4,625 रुपये प्रति क्विंटल कर दी गई है जबकि पिछले साल के लिए एमएसपी 4,350 रुपये प्रति क्विंटल थी। अन्य दलहन फसलों की एमएसपी में भी ऐसी ही बढ़ोतरी की गई है।

इससे पहले वर्ष 2011-12 में सरकार ने दलहन की एमएसपी में 33 फीसदी की बढ़ोतरी की थी। लेकिन कीमतों में गिरावट के रुझान को देखते हुए किसान अभी दलहन की अतिरिक्त बुआई करने को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप दलहन का रकबा वर्ष 2011-12 में घटकर 244.6 लाख हेक्टेयर रहा जबकि एक साल पहले दलहन का रकबा 264.0 लाख हेक्टेयर रहा। ठीक इसी तर्ज पर दलहन का उत्पादन वर्ष 2011-12 के दौरान घटकर 170.9 लाख टन रहा जबकि वर्ष 2010-11 में यह आंकड़ा 182.4 लाख टन था।

हालांकि पिछले सालों के दौरान कीमतों में हुए सुधार की वजह से किसान काफी उत्साहित हुए हैं। इसलिए अगले दो सालों में न सिर्फ रकबा बढ़ा है बल्कि दलहन फसलों के उत्पादन में भी 2012-13 के दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह बढ़कर 183.4 लाख टन हो गया। वर्ष 2013-14 में दलहन उत्पादन 192.5 लाख टन था। वर्ष 2014-15 में उत्पादन 173.8 लाख टन होने के बावजूद कुछ मौकों को छोड़कर थोक बाजार में दलहन की कीमतों में 35-40 रुपये प्रति किग्रा की बढ़ोतरी नहीं हुई। बेमौसम बारिश की वजह से फसल बरबाद होने का भी असर देखने को मिला। लेकिन इस बार सरकार बड़ा दांव लगा रही है। दलहनों की कीमत थोक और खुदरा बाजार में तेज होनी शुरू गई है। आसनसोल में अरहर की कीमत फिलहाल 100 रुपये प्रति किग्रा है जबकि जनवरी में यह 75 रुपये प्रति किलो थी। (BS Hindi)

19 June 2015

निर्यातकों की मांग से केस्टर सीड की कीमतों में तेजी की संभावना

निर्यातकों की मांग से केस्टर सीड की कीमतों में तेजी की संभावना
आर एस राणा
नई दिल्ली। केस्टर तेल में इस समय निर्यातकों की अच्छी मांग बनी हुई है जबकि उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की दैनिक आवक पहले की तुलना में कमी हुई है। इसलिए केस्टर सीड की कीमतों में तेजी आने का अनुमान है। उत्पादक मंडियों में शुक्रवार को केस्टर सीड के भाव 4,000 से 4,050 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
केस्टर सीड के थोक कारोबारी कुशल राज पारिख ने बताया कि केस्टर तेल के निर्यात सौदे 1,280 से 1,290 डॉलर प्रति टन की दर से हो रहे हैं। केस्टर तेल में चीन की आयात मांग अच्छी बनी हुई है तथा मई महीने में केस्टर तेल का निर्यात बढ़कर 48,000 टन का हुआ है जबकि अप्रैल महीने में इसका निर्यात 40,000 टन का हुआ था। अप्रैल 2014 में 38,661 टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था। वित वर्ष 2014-15 में देश से 4.59 लाख टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था। उन्होंने बताया कि उत्पादक राज्यों में केस्टर तेल का भाव 790 रुपये प्रति 10 किलो चल रहा है।
केस्टर सीड व्यापारी अतुल शाह ने बताया कि केस्टर सीड का उत्पादन मुख्यतः गुजरात और राजस्थान में ज्यादा होता है तथा इसकी फसल की बुवाई मानसून बारिश पर काफी हद तक निर्भर करती है। केस्टर सीड की बुवाई जुलाई महीने में शुरु होगी, ऐसे में आगामी दिनों में उत्पादक राज्यों में मानसूनी बारिश कैसी होती है, इस पर भी केस्टर सीड की तेजी-मंदी निर्भर करेगी। उन्होंने बताया कि उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की दैनिक आवक घटकर 60,000 बोरी (एक बोरी-75 किलो) की रह गई है जबकि चालू महीने के शुरु में दैनिक आवक एक लाख बोरी से ज्यादा की हो रही थी।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में केस्टर सीड की पैदावार बढ़कर 18.24 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 17.27 लाख टन की हुई थी।....आर एस राणा

18 June 2015

कमजोर मॉनसून की आशंका से सोने की मांग कम

इस सप्ताह भारत में सोने की मांग कम रही। इसकी वजह यह है कि कमजोर मॉनसून की आशंका से किसानों ने सोने की खरीद पर खर्च घटाया है, जिनका सराफे की मांग में अहम योगदान होता है। कारोबारियों ने कहा कि भारत में कीमतें वैश्विक बेंचमार्क की तुलना में करीब 1 डॉलर प्रति औंस कम हैं। भारत में सोने की करीब दो-तिहाई मांग ग्रामीण इलाकों से आती है, जहां करोड़ों लोगों के लिए यह संपत्ति जमा करने का परंपरागत तरीका है। इसकी वजह यह है कि ग्रामीण इलाकों में लोगों की औपचारिक बैंकिंग प्रणाली तक पहुंच नहीं है। देश के पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र की एक ज्वैलर मंगेश देवी ने कहा, 'पिछले महीने की तुलना में मांग काफी कम है।' उनके ज्यादातर ग्राहक गन्ना किसान और सब्जी उत्पादक हैं।

देवी ने कहा, 'किसान बीज एवं उर्वरकों की खरीद को तरजीह दे रहे हैं। किसानों के पास सोना खरीदने के लिए अतिरिक्त पैसा नहीं है, क्योंकि पिछले साल सूखे से उनकी आमदनी प्रभावित हुई है।' आमतौर पर भारतीय किसान गर्मियों में उगाई जाने वाली फसलों की बुआई जून में मॉनसून की बारिश आने के साथ शुरू करते हैं। भारतीय मौसम विभाग ने इस बार औसत से कम बारिश का पूर्वानुमान जताया है। इससे सरकार लगातार दूसरे साल सूखे की आशंका को लेकर चिंतित हैं। अगर सूखा पड़ा तो करीब तीन दशकों में ऐसा पहली बार होगा, जब लगातार दूसरे साल सूखा पड़ेगा। देश में कृषि के लिए जून से सितंबर तक होने वाली मॉनसून की बारिश अहम है, क्योंकि सिंचाई की सुविधा कम है। मुंबई के एक बैंक डीलर ने कहा, 'अगर कीमतें 26,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से नीचे नहीं आईं तो अगले कुछ सप्ताहों के दौरान मांग कम रहेगी।'

भारत में मांग घटने से सोने की वैश्विक कीमतों पर भी दबाव आ सकता है। वर्ष 2014 में भारत में सोने की खपत सबसे ज्यादा रही और इस साल की पहली तिमाही में चीन के बाद दूसरी सबसे ज्यादा खपत भारत में हुई है। सोने की कीमतों में आगे गिरावट आने की संभावना और चीन में शेयर बाजार के अच्छे प्रदर्शन से एशिया के अन्य देशों में भी सोने की मांग कमजोर बनी हुई है। (BS Hindi)

गेेहंू की सरकारी खरीद 274 लाख टन के पार


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू रबी विपणन सीजन 2015-16 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 274.66 लाख टन गेूंह की सरकारी खरीद हो चुकी है। इस समय केवल थोेड़ी-बहुत खरीद राजस्थान से हो रही है, अन्य राज्यों से खरीद लगभग बंद हो चुकी है।
एफसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एमएसपी पर देषभर की मंडियों से 274.66 लाख टन गेहूं की खरीद होे चकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 269.31 लाख टन से ज्यादा है। उन्होंने बताया  कि राजस्थान कोे छोड़ अन्य राज्यों से खरीद लगभग बंद हो चुकी है। अभी तक हुई खरीद में पंजाब की हिस्सेदारी  99.52 लाख टन, हरियाणा की 67.55 लाख टन, उत्तर प्रदेष की 21.18 लाख टन, मध्य प्रदेष की 72.61 लाख टन और राजस्थान की 12.93 लाख टन है।.......आर एस राणा

चार लाख टन से ज्यादा के हो चुके हैं गेहूं के आयात सौदे


एफसीआई के मुकाबले आयातित गेहूं की खरीद कर रही हैं फ्लोर मिलें
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू सीजन में आस्ट्रेलिया और युक्रेन से करीब 4.25 लाख टन गेहूं के आयात सौदे हो चुके हैं। इसमें से 14 जून तक करीब एक लाख टन गेहूं भारतीय बंदरगाह पर पहुंच भी चुका है। आस्ट्रेलियाई्र गेहूं प्रीमियम क्वालिटी होने के कारण दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गेहूं के बजाए आयातित गेहूं की खरीद कर रही है।
सूत्रों के अनुसार चालू सीजन में अभी तक करीब 4.25 लाख टन गेहूं के आयात सौदे हो चुके हैं जिसमें से एक लाख टन गेहूं का आयात भी हो चुका है। गत सप्ताह करीब 61,000 टन गेहूं भारतीय बंदरगाह पर पहुंचा है। तुतीकोरन बंदरगाह पर पहुंचे इस गेहूं का भाव 258.13 डॉलर प्रति टन था जबकि इस समय आस्ट्रेलियन गेहूं के आयात सौदे 280 से 285 डॉलर प्रति टन की दर से हो रहे हैं। चालू सीजन में कुल आठ से दस लाख टन गेहूं का आयात होने का अनुमान है। अभी तक हुए आयात सौदों में आस्ट्रेलिया से पांच लाख टन और यूक्रेन से 25,000 टन के सौदे हुए हैं।
उन्होंने बताया कि देष से पड़ौसी देषों को गेहूं का निर्यात तो रहा है लेकिन सीमित मात्रा में। अप्रैल महीने में देष से 40,495 टन और मई में 26,358 टन गेहूं का निर्यात हुआ है। अप्रैल में गेहूं के निर्यात सौदे 269 डॉलर प्रति टन और मई में 277.11 डॉलर प्रति टन (एफओबी) की दर से हुए है।
बंगलुरु स्थित एक फ्लोर मिलर ने बताया कि आस्ट्रेलियन गेहूं प्रीमियम क्वालिटी का होने के कारण मिलर्स एफसीआई से खरीद नहीं कर रहे है। उन्होंने बताया कि आस्ट्रेलियाई गेहूं का भाव तुतीकोरन बंदरगाह पर 1,830 रुपये प्र्रति क्विंटल है। तमिलनाडु की फ्लोर मिलों में पहुंच इसका भाव 1,900 रुपये और कर्नाटका की फ्लोर मिलाों में पहुंच 1,950 रुपये प्रति क्विंटल है। एफसीआई के गेहूं का भाव पंजाब या हरियाणा से इन राज्यों को पहुंच 1,750 से 1,800 रुपये प्रति क्विंटल है। एफसीआई ओएमएसएस में चालू रबी विपणन सीजन 2015-16 का गेहूं दे रही है जोकि बारिष से भीगा हुआ है। इसलिए मिलर्स आयातित गेहूं की खरीद कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेष के एक फ्लोर मिलर्स ने बताया कि उत्तर प्रदेष से बंगलुरु पहुंच गेहूं  के सौदे 1,800  से 1,810 रुपये और मध्य प्रदेष और राजस्थान से 1,730 से 1,750 रुपये प्रति क्विंटल की दर से सौदे हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें 50 से 60 फीसदी गेहूं की खरीद उत्तर प्रदेष, मध्य प्र्रदेष और राजस्थान से कर रही हैं तथा 40 से 50 फीसदी आयातित गेहंू खरीद रही है।.......आर एस राणा

17 June 2015

मूंगफली दाने के निर्यात में बढ़ोतरी से कीमतों में तेजी की संभावना


आर एस राणा
नई दिल्ली। मूंगफली दाने में निर्यात मांग अच्छी बनी हुई है जबकि उत्पादक मंडियों में दैनिक आवक कम हो गई है। चालू वित वर्ष के पहले महीने अप्रैल में मूंगफली दने का निर्यात बढ़कर 50,577 टन का हो गया। ऐसे में आगामी दिनों में मूंगफली की कीमतों में तेजी ही आने का अनुमान है।
एपीडा के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले महीने अप्रैल में देष से मूंगफली दाने का निर्यात बढ़कर 50,577 टन का हुआ है जबकि पिछले साल अप्रैल महीने में 48,545 टन का निर्यात हुआ था। वाणिज्य एवं उद्योग मत्रालय के अनुसार मूल्य के हिसाब से अप्रैल 2015 में मूंगफली दाने के निर्यात में 30.37 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 371.20 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि में 284.73 लाख टन  मूल्य का मूंगफली दाने का निर्यात हुआ था।
मूंगफली कारोबारी समीर भाई षाह    ने बताया कि उत्पादक मंडियों में हल्दी की दैनिक आवक घटकर 20 से 25 हजार बोरी (एक बोरी-35 किलो) रह गई है जबकि नई फसल आने में चार-पांच माह का समय बचा हुआ है। मूंगफली दाने के साथ ही तेल में मांग अच्छी है जिससे भाव में तेजी आने का अनुमान है। उत्पादक मंडियों में खरीफ सीजनकी  मूंगफली के भाव 4,500 रुपये और रबी सीजन की मूंगफली के भाव 6,000 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। मूंगफली तेल का भाव मंडियों में 1,000 रुपये प्रति 10 किलो है।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 के रबी और खरीफ सीजन को मिलाकर मूंगफली की कुल पैदावार घटकर 66.48 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि फसल सीजन 2013-14 में देष में 97.14 लाख टन की पैदावार हुई थी। रबी सीजन में मूंगफली की पैदावार 15.91 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल रबी में इसकी पैदावार 16.56 लाख टन की हुई थी। देष में मूंगफली की प्रमुख पैदावार खरीफ सीजन में होती है तथा फसल सीजन 2014-15 में प्रतिकूल मौसम खरीफ में मूंगफली की पैदावार घटकर 50.57 लाख टन की ही हुई थी जबकि खरीफ 2013-14 में पैदावार 80.58 लाख टन की हुई थी।......आर एस राणा

खरीफ दलहन के एमएसपी के साथ ही किसानों को मिलेगा बोनस


धान के एमएसपी में 50 रुपये की बढ़ोतरी, मक्का का एमएसपी केवल 15 रुपये बढ़ा
आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2015-16 के लिए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में 15 रुपये से 100 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में खरीफ विपणन सीजन 2015-16 के लिए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की गई। इससे किसनों को बुवाई के लिए फसलों का चुनाव करने में आसानी होगी। केंद्र सरकार ने जहां खरीफ की प्रमुख की फसल धान के एमएसपी में 50 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है, वहीं दालों के एमएसपी में 50 रुपये की बढ़ोतरी के अलावा 200 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बोनस देने की घोषणा भी की है इससे किसानों का रुझान दलहन की खेती की और बढ़ेगा, जिससे आयात में कमी लाई जा सकेगी।
केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2015-16 के लिए प्रमुख फसल धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर भाव कोमन धान का एमएसपी 1,410 रुपये और ग्रेड-ए धान का एमएसपी 1,450 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।
खरीफ दलहन की प्रमुुख फसल अरहर के एमएसपी में 275 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी बोनस सहित करके भाव 4,625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। इसके अलावा मूंग के एमएसपी में 250 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी, 200 रुपये बोनस को मिलाकर की है तथा इसका भाव 4,600 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। उड़द के एमएसपी में 200 रुपये बोनस तथा 50 रुपये की बढ़ोतरी को मिलाकर कुल बढ़ोतरी 275 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर भाव 4,625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।
खरीफ तिलहन की फसलों में मूंगफली के एमएसपी में 30 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर भाव 4,030 रुपये, सोयाबीन पीला के एमएसपी में 40 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 2,600 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है जबकि सोयाबीन काला के एमएसपी को पूर्वस्तर 2,500 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर रखा है। सनफ्लावर सीड के एमएसपी में 50 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 3,800 रुपये, सीषम के एमएसपी में 100 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 4,700 रुपये और नाइजरसीड के एमएसपी में 50 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 3,650 रुपये प्रति क्विंटल तय किए है।
लौंग स्टेपल कपास के एमएसपी में 50 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 4,100 रुपये तथा मीडियम स्टेपल कपास के एमएसपी में 50 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 3,800 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।
रागी के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीफ विपणन सीजन 2015-16 के लिए 100 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर भाव 1,650 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। केंद्र सरकार ने ज्वार के एमएसपी में 40 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर हाईब्रिड ज्वार का एमएसपी 1,570 रुपये और मालडानी ज्वार के एमएसपी को 1,590 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हैं। बाजरा के एमएसपी में सरकार ने 50 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 1,275 रुपये और मक्का के एमएसपी में 15 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 1,325 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।.....आर एस राणा

15 June 2015

बढ़ सकती है प्याज की एमईपीः सूत्र

बाजार में कीमतों पर काबू में रखने के लिए सरकार प्याज का एमईपी यानि मैक्सिमम एक्सपोर्ट प्राइस बढ़ाने का फैसला कर सकती है। बता दें प्याज का एमईपी बढ़ाने को लेकर हाल में अंतर मंत्रालय बैठक भी हुई थी।

सूत्रों की मानें तो प्याज का एमईपी 250 डॉलर प्रति मीट्रिक टन से बढ़ाकर 400 डॉलर प्रति मीट्रिक टन किया जा सकता है। सरकार की प्याज की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के लिए एमईपी बढ़ाने की योजना है।

हाल के दिनों में देश भर में प्याज के औसतन दाम 16-17 रुपये प्रति किलो पर थे, लेकिन जून में कीमतों में तेजी देखने को मिली है। देश भर में प्याज की मौजूदा रिटेल कीमत 25 रुपये प्रति किलो से ज्यादा पर पहुंच गई है।...स्रोत : CNBC-Awaaz

वैश्विक बाजारों में कपास का ज्यादा स्टॉक

भारत और अमेरिका जैसे दुनिया में सबसे अधिक कपास का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों से आपूर्ति बढऩे और चीन से घटती मांग वजह से कपास कारोबारियों को जरूरत से ज्यादा स्टॉक की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। चीन कपास का आयात करने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है। चीनी मांग में जबरदस्त गिरावट की वजह से वित्त वर्ष 2016 में बुआई भी घट रही है। हालांकि बाजार में अभी भी जरूरत से ज्यादा आपूर्ति की स्थिति बनी रहेगी। वर्ष 2011-12 चीनी आयात पिछले सीजन में 53 लाख टन के मुकाबले दोगुना रहा। वर्ष 2014-15 में इसके 16 लाख टन हो जाने की उम्मीद है। इंटरनैशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (आईसीएसी) रिपोर्ट के मुताबिक कपास की बुआई वर्ष 2015-16 काफी कम होगी और वैश्विक उत्पादन 8.5 फीसदी घटकर 239 लाख टन रह सकता है। हालांकि वैश्विक उपभोग में 2.33 फीसदी का इजाफा होने की उम्मीद है और यह बढ़कर 249.3 लाख टन होगा।

हालिया विश्लेषण में राबो बैंक ने कहा कि वैश्विक उत्पादन के मुकाबले उपभोग 60 लाख गांठ ज्यादा हो सकता है। उनेंने कहा, 'कीमतें सितंबर 2015 तिमाही में 72 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड के स्तर पर रहने की उम्मीद है और नई फसल की कीमत दिसंबर तिमाही 72 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड के करीब होने की उम्मीद है।' भारत में हालात बहुत अधिक नहीं हैं। हालांकि कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कपास सीजन 2014-15 के लिए उत्पादन का अनुमान घटाकर 65 लाख टन कर दिया जबकि पिछले साल 69 लाख टन उत्पादन का अनुमान था।

आईसीएसी का अनुमान है कि वर्ष 2015-16 के दौरान भारत में फसल घटकर 64 लाख टन रह जाएगी। आईसीएसी के मुताबिक दुनिया में कपास का रकबा वर्ष 2015-16 में 7 फीसदी घटकर 313 लाख हेक्टेयर रह जाएगी। दुनिया भर में कपास के उत्पादन में नौ फीसदी की गिरावट के साथ 239 लाख टन रहने का अनुमान है। चीन में रकबा 12 फीसदी घटकर 38 लाख हेक्टेयर रह जाने की आशंका जताई जा रही है। चीन में उत्पादन वर्ष 2015-16 में घटकर 54 लाख टन के स्तर तक जा सकता है। अप्रैल, 2014 के दौरान चीन सरकार ने स्थानीय उत्पादकों की मदद करने के लिए कच्चे कपास को इकटï्ठा करने के तीन साल के कार्यक्रम को बंद कर दिया और इसके बजाय सरकार अपने रिजर्व स्टॉक को सीधे स्थानीय बाजारों में बेच रही है। (BS Hindi)

भारत से रूस को डेयरी उत्पादों का निर्यात रुका

रूस ने डेयरी उत्पादों के आयात के लिए कड़े मानदंड तय किए हैं, जिससे भारत उसे डेयरी उत्पादों का निर्यात नहीं कर पाएगा। दूध और इससे बने उत्पादों के आयात के लिए रूस ने यह शर्त रखी है कि दूध उत्पादों का निर्यात करने के इच्छुक भारतीय संयंत्रों के पास कम से कम 1,000 दुधारू पशु होने चाहिए। इसका मतलब है कि दूध उत्पादों के कारोबारी और प्रसंस्करणकर्ता रूसी बाजार को बिक्री नहीं कर पाएंगे, जबकि इस साल की शुरुआत तक ऐसे उत्पादों के निर्यात को मंजूरी मिली हुई थी। भारत में ज्यादातर डेयरी उत्पादक कृषक सहकारिता मॉडल के तहत अपना परिचालन करते हैं। इसमें किसान पशु रखते हैं और सहकारी फैक्टरियां किसानों के फायदे के लिए केवल दूध का प्रसंस्करण करती हैं। इसलिए रूस की वर्तमान शर्तों पर सहकारी डेयरियां खरी नहीं उतर पाएंगी। हालांकि सहकारी डेयरियों ने रूस के नियमों में अनुकूल संशोधन कराने के लिए सरकार से संपर्क किया है।

अमूल ब्रांड के दूध और इससे बने उत्पादों की बिक्री करने वाली गुजरात सहकारी दूध विपणन संघ के प्रबंध निदेशक आर एस सोढी ने कहा, 'रूसी प्रशासन ने कड़ी शर्तें लगाई हैं, जिसकी वजह से इस समय रूस को निर्यात नहीं हो रहा है। इसके अलावा इच्छुक निर्यातकों के पास कम से कम 1,000 दुधारू पशु होने जरूरी हैं।' रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन की भारत यात्रा और दोनों देशों के संबंधों में प्रगाढ़ता के बाद इस साल जनवरी में रूस ने भारतीय डेयरी निर्यातकों के लिए अपना बाजार खोला था। पुतिन ने भारत और रूस के बीच कारोबारी संबंधों में मजबूती की घोषणा की थी। इसके बाद अमूल ने करीब आधा दर्जन रूसी आयातकों के साथ बातचीत शुरू की। ऐसे अन्य निर्यातकों ने भी रूसी बाजार को निर्यात में रुचि दिखाई थी। भारत में दूध का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है और चीज, बटर और दूध पाउडर का बड़ी मात्रा में निर्यात होता है। डायनामिक्स ब्रांड के तहत डेयरी उत्पादों की बिक्री करने वाली डायनामिक्स डेयरीज के एक अधिकारी ने कहा, 'जहां तक मुझे पता है, रूस को डेयरी उत्पादों का निर्यात नहीं हो रहा है।' इससे पहले कहा गया था कि इस कंपनी को रूस में कृषि उत्पादों पर नजर रखने वाली एजेंसी रोस्सेलखोजनाडजोर से रूस को डेयरी उत्पादों की मंजूरी मिल गई है। (BS Hindi)

बीज कंपनियों ने बीटी कपास के दाम घटाने के फैसले को दी चुनौती

जीन संवर्धित बीटी कपास बीज की कीमत घटाने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए बीज कंपनियों ने बंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। राज्य सरकार ने 8 जून को कीमत 10.5 फीसदी या 100 रुपये घटाकर 850 रुपये प्रति पैकेट (450 ग्राम) करने की घोषणा की थी। चार साल पहले बीटी कपास की कीमत 950 रुपये प्रति पैकेट तय की गई थी। यह याचिका भारतीय राष्ट्रीय बीज संघ (एनएसएआई) द्वारा बीज क्षेत्र के पक्ष में दायर की गई थी। इस याचिका को न्यायालय ने स्वीकार किया था और शुक्रवार को इस पर सुनवाई हुई।

एनएसएआई के संस्थापक -अध्यक्ष और नाथ बायोजीन्स (आई) के प्रबंध निदेशक सतीश कागलीवाल ने कहा, 'हम इस आदेश से खुश नहीं थे, क्योंकि बीज के दामों में कटौती का बीज कंपनियों पर असर पड़ता है। कीमतों में कटौती से बीज उत्पादन लाभकारी नहीं रह जाता, जिससे किसानों को सेवा मुहैया कराने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए हमने राहत देने का आग्रह किया है। हालांकि न्यायालय ने मंगलवार को अगली सुनवाई से पहले हमसे कुछ विस्तृत जानकारियां मांगी हैं। हम ये ब्योरे सोमवार तक जमा कराने की तैयारी कर रहे हैं।'

सीजन की शुरुआत में बीज उत्पादकों ने सरकार से आग्रह किया था कि इनपुट लागत में बढ़़ोतरी के अनुपात में कपास के बीज की कीमतों में बढ़ोतरी की जाए। ये आग्रह तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार से किए गए थे। इन सभी सरकारों ने कहा कि देश में किसानों की स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए कीमतें नहीं बढ़ाई जा सकतीं। बीज कंपनियों ने सरकार के इस मत से सहमति जताई थी। हालांकि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सरकारों ने और कोई कदम नहीं उठाया, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने कीमत में कटौती कर दी। कागलीवाल ने कहा, 'हम सरकार से टकराव नहीं चाहते, लेकिन इसके अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। बीज कंपनियां कह रही हैं कि पिछले चार साल के दौरान उत्पादन लागत 10 से 15 फीसदी बढ़ी है, क्योंकि श्रम, उर्वरक और अन्य इनपुट लागत में इसी अनुपात में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन कीमतों में कोई बदलाव नहीं आया है।

कागलीवाल ने कहा, 'अगर बीज कंपनियों को सही कीमत नहीं मिलेगी तो वे अनुसंधान एवं विकास पर निवेश नहीं करेंगी। इसलिए बीज उत्पादन कारोबार को फायदेमंद बनाए रखना जरूरी है। कटौती का हमारे कारोबार पर असर पड़ रहा है, क्योंकि कीमतों में कटौती से बहुत सी बीज कंपनियों को अपना कारोबार बंद करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।' उद्योग के एक सूत्र ने कहा, 'अब पैकेट पर अधिकतम खुदरा मूल्य छपा होता है। बड़ी मात्रा में बीज भेजा भी जा रहा है। किसानों के पास कुछ मात्रा में बीज पहले से ही है, इसलिए इस मौके पर कीमतों में कटौती करना तर्कसंगत नहीं है।' देश में 250 कंपनियां बीज उत्पादन में संलग्न हैं, जिनमें 104 महाराष्ट्र में स्थित हैं। (BS Hindi)

बासमती चावल का निर्यात अप्रैल में 22 फीसदी बढ़ा


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले महीने अप्रैल में बासमती चावल के निर्यात में 22 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 3.48 लाख टन का हुआ है। हालांकि मूल्य के हिसाब से अप्रैल में बासमती चावल के निर्यात में 12.1 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 2,136.72 करोड़ रुपये का हुआ है।
एपीडा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अप्रैल महीने में देष से बासमती चावल का निर्यात बढ़कर 3.48 लाख टन का हुआ है जबकि पिछले साल अप्रैल महीने में 2.85 लाख टन का हुआ था। उन्होंने बताया कि यूएई के साथ ही अन्य खाड़ी देषों से बासमती चावल के आयात सौदे ज्यादा हो रहे हैं। हालांकि ईरान की आयात मांग नए वित वर्ष में भी कम रहेगी, लेकिन यूरोपीय यूनियन के देषों के अलावा कुछ खाड़ी देषों की आयात मांग ज्यादा रहेगी जिससे बासमती चावल के कुल निर्यात में 2015-16 में बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार वित वर्ष 2015-16 के पहले महीने अप्रैल में मूल्य के हिसाब से बासमती चावल का निर्यात 12.1 फीसदी घटकर 2,135.72 करोड़ रुपये का ही हुआ है जबकि पिछले साल अप्रैल महीने में 2,428.28 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल का निर्यात हुआ था। घरेलू मार्किट में बासमती चावल की कीमतों में आई भारी गिरावट के कारण मूल्य के हिसाब से निर्यात में गिरावट आई है।
बासमती चावल के कारोबारी हरीष गुप्ता ने बताया कि उत्पादक मंडियों में पूसा-1,121 बासमती चावल सेला का भाव घटकर 3,900 से 4,000 रुपये प्रति क्विंटल रह गए जबकि पूसा-1,509 बासमती चावल के सेला का भाव घटकर 3,200 से 3,300 रुपये प्रति क्विंटल रह गया।
एपीडा के अनुसार वित वर्ष 2014-15 में देष से 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात ही हुआ है जबकि इसके पिछले वित वर्ष 2013-14 में 37.5 लाख टन बासममी चावल का निर्यात हुआ था। भारत से बासमती चावल का सबसे ज्यादा निर्यात साउदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और यूरोपीय यूनयिन के देषों को होता है।........आर एस राणा

निर्यात मांग कमजोर होने से हल्दी में और गिरावट की आषंका


आर एस राणा
नई दिल्ली। हल्दी में इस समय निर्यातकों के साथ ही घरेलू मसाला कंपनियां की मांग कमजोर बनी हुई है जिससे भाव में गिरावट आई है। सप्ताहभर में उत्पादक मंडियों में इसके भाव में 300 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आकर सोमवार को निजामाबाद मंडी में भाव 7,600 से 7,700 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।
हल्दी कारोबारी पूनम चंद गुप्ता ने बताया कि रमजान का पवित्र महीना ष्षुरु होने के कारण खाड़ी देषों की आयात मांग कमजोर बनी हुई है, साथ ही घरेलू मसाला निर्माताओं की मांग भी कम है। इसीलिए हल्दी की कीमतों में गिरावट बनी हुई है। उन्होंने बताया कि रमजान का त्यौहार समाप्त होने के बाद जुलाई-अगस्त में निर्यात मांग बढ़ेगी, साथ ही इस दौरान त्यौहारी सीजन होने के कारण घरेलू मांग भी बढ़ जायेगी, जिससे हल्दी की कीमतों में सुधार आ सकता है।
हल्दी व्यापारी सुभाष चंद गुप्ता ने बताया कि मानसून के आगमन का असर भी हल्दी की कीमतों पर पड़ा है। उन्होंने बताया कि निजामाबाद मंडी में हल्दी की दैनिक आवक 1,500 से 2,000 बोरी (एक बोरी-70 किलो) की हो रही है जबकि भाव 7,600 से 7,700 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे है। उधर इरोड़ मंडी में दैनिक आवक 3,000 से 3,500 बोरी की हो रही है जबकि भाव 7,700 रुपये प्रति क्विंटल है। नांनदेड मंडी में बढ़िया क्वालिटी की हल्दी के भाव     7,200 से 8,000 रुपये प्रति क्विंटल हैं। उन्होंने बताया कि कमजोर मांग को देखते हुए चालू महीने में मौजूदा कीमतों में और भी गिरावट आने की आषंका है।
टरमीरक मर्चेट एसोसिएषन के सचिव के वी रवि ने बताया कि उत्पादक मंडियों में करीब 40 लाख बोरी से ज्यादा का स्टॉक हो चुका है। मंडियों में हल्दी का आवक पिछले साल की तुलना में 15 से 16 फीसदी ज्यादा हुई है। हालांकि चालू सीजन में हल्दी की पैदावार कम हुई थी लेकिन पिछले साल का बकाया स्टॉक ज्यादा था। अतः हल्दी की कुल उपलब्धता सालाना खपत से ज्यादा ही है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित वर्ष 2014-15 के पहले नो महीनों अप्रैल से दिसंबर के दौरान हल्दी के निर्यात में 8 फीसदी की बढ़़ोरती होकर कुल निर्यात 65,000 टन का हुआ है जबकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 60,442 टन का हुआ था। मसाला बोर्ड ने इस दौरान निर्यात का लक्ष्य 80,000 टन का रखा था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हल्दी का भाव 3.53 डॉलर प्रति किलो है जबकि पिछले साल की समान अवधि में भी विष्व बाजार यही भाव थे।......आर एस राणा

13 June 2015

चालू खरीफ में कपास की बुवाई में कमी आने की आषंका से घटेगी पैदावार


कमजोर मानसून के साथ ही कपास के नीचे भाव का पड़ेगा असर
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ में मानसूनी बारिष सामान्य से कम होने का अनुमान है, साथ ही कपास की नई फसल की आवक के समय उत्पादक मंडियों में भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे बने हुए थे। इससे चालू खरीफ में कपास की बुवाई में कमी आने की आषंका है जिसका असर पैदावार पर पड़ेगा। अहमदाबाद मंडी में षनिवार को षंकर-6 किस्म की कपास के भाव 34,500 से 35,000 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) रहे।
कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू खरीफ में अभी तक 14.70 लाख हैक्टेयर में कपास की बुवाई हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 17.34 लाख हैक्टेयर में हुई थी। उन्होंने बताया कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के अलावा महाराष्ट्र में ही कपास की बुवाई षुरु हुई है। हालांकि अभी बुवाई षुरुआती चरण में है तथा मानसूनी बारिष होने के बाद बुवाई में तेजी तो आयेगी लेकिन कुल बुवाई पिछले साल से भी घटने का अनुमान है। उन्होंने बताया कि पिछले साल भी मानसूनी बारिष कम होने से कपास की बुवाई कम हुई थी।
नार्थ इंडिया कॉटन एसोसिएषन के अध्यक्ष राकेष राठी ने बताया कि चालू कपास सीजन में उत्पादक मंडियों में कपास के भाव एमएसपी से नीचे बने हुए थे जिसकी वजह से किसानों को कपास की बिकवाली कम भाव पर करनी पड़ी। भाव एमएसपी से नीचे होने के कारण ही काटन कारर्पोरेषन आफ इंडिया (सीसीआई) ने एमएसपी पर रिकार्ड 87 लाख गांठ कपास की खरीद करनी पड़ी। उन्होंने बताया कि चालू खरीफ में मानसून बारिष भी सामान्य से कम होने का अनुमान है। ऐसे में कपास की बुवाई चालू खरीफ में कम रह सकती है जिससे पैदावार लगातार दूसरे साल घटने का अनुमान है।
केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2014-15 में कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की थी। विपणन सीजन 2014-15 के लिए मीडियम स्टेपल कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,750 रुपये और लौंग स्टेपल कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,050 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू फसल सीजन 2014-15 में देष में कपास की पैदावार 353.28 लााख गांठ होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 359.02 लाख गांठ की हुई थी।
उद्योग का अनुमान है कि चालू सीजन में कपास की पैदावार 382.75 लाख गांठ होने का अनुमान है। चालू सीजन में अभी तक उत्पादक मंडियों में 365.50 लाख गांठ कपास की दैनिक आवक हो चुकी है। सीसीआई के पास कपास का भारी स्टॉक मौजूद है इसलिए कीमतों में भारी तेजी की संभावना भी नहीं है।.....आर एस राणा

फीकी पड़ेगी सोने की चमक!

मॉनसूनी फुहारों के बाद अब आभूषण कारोबार की चमक फीकी पड़ गई है। इस साल शादी-विवाह का मौसम अब समाप्त हो चुका है और अगले डेढ़ साल तक अच्छा मुहूर्त न होने के कारण हिंदुओं के शुभ कार्य लगभग न के बराबर होंगे। इसका सबसे ज्यादा असर आभूषण विक्रेताओं के ऊपर पडऩे वाला है। आभूषण कारोबारियों को अगले एक साल तक कारोबार मंदा रहने की चिंता सताने लगी है। इस वजह से अगले एक साल तक सोने की मांग कमजोर रह सकती है, जिससे इसकी चमक फीकी पड़ेगी।

वैश्विक बाजारों में सोने की कीमतों मेंं जारी उठापटक का प्रभाव घरेलू बाजार में भी दिखने लगा है। डॉलर मजबूत होने के कारण वैश्विक बाजार में सोने का भाव फिलहाल 1181 डॉलर प्रति औंस चल रहा है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के अच्छे आंकड़ों के कारण निवेशक डॉलर में पैसा लगा रहे हैं जिससे लगातार तीन महीने से सोने पर दबाव बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर गिरावट से घरेलू बाजार में भी सोना 27000 रुपये प्रति 10 ग्राम के नीचे कारोबार कर रहा है। सर्राफा कारोबारी और वायदा बाजार के लोगों का कहना है कि  सोने की कीमतें औसतन 26,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से नीचे ही रहने वाली हैं।  हरेक साल जून से आभूषण कारोबारियों का कारोबार मंदा पड़ जाता है। इसके बाद सितंबर से पुन: इसमें सुधार होता है, लेकिन बाजार और ज्योतिष की समझ रखने वालों का कहना है कि इस साल दीर्घ अवधि तक शादी-विवाह का समय नहीं होने से मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

आचार्य प्रदीप द्विवेदी कहते हैं कि दरअसल गुरु के सिंह राशि में जाते ही सारे अच्छे काम वर्जित हो जाते हैं। ऐसा हर 12वें साल में होता है। शादी-विवाह के शुभ मूहूर्त आज से खत्म हो गए और अब अगला मुहूर्त 16 नवंबर 2016 के बाद ही बनेगा, जब सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा। हालांकि साल के बीच में कुछ योग भी हैं, जिनमें शादियां हो सकती हैं। मुंबई ज्वैलर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष कुमार जैन कहते हैं कि मुहूर्त खत्म होने का असर कारोबार पर हर साल पड़ता है। बरसात में सोने-चांदी का कारोबार ठंडा रहता है और फिर धीरे-धीरे बढ़ता है।'

पंजाब में प्रवेश शुल्क से चीनी हुई महंगी

पंजाब सरकार द्वारा राज्य में खरीदी जाने वाली चीनी पर प्रवेश शुल्क लगाए जाने के बाद खुदरा बाजार में चीनी की कीमतें 2-3 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ गई हैं। जालंधर के एक निवासी सुबोध भाटिया ने कहा कि पेट्रोल, डीजल, अनाज और अन्य जरूरी जिंसों की कीमतों में वृद्घि के बाद अब चीनी की कीमत में बढ़ोतरी निवासियों के लिए एक अन्य झटके की तरह है। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से जुड़े परिवार इससे अधिक प्रभावित हुए हैं, क्योंकि चीनी की खपत में अच्छी तेजी आई है।

इसके अलावा चिकित्सा विशेषज्ञ भी खासकर शारीरिक श्रम से जुड़े लोगों को गर्मी के मौसम में पानी में चीनी और नमक मिला कर पीने की सलाह देते हैं। प्रकाश सिंह बादल सरकार के पिछले कार्यकाल में पूर्व मंत्री लक्ष्मी कांता चावला ने इस कदम पर नाराजगी प्रकट की है। राज्य में चीनी की अनुमानित खपत लगभग 75 लाख क्विंटल प्रति वर्ष है जिसमें 25 लाख क्विंटल अन्य राज्यों से आती है।

मॉनसून की रफ्तार का असर खरीफ की बुआई पर

मॉनसून के देरी से आने और मध्य और उत्तर भारत में अनिश्चित गति की वजह से खरीफ की फसलों की बुआई पर बुरा असर पड़ता दिखाई दे रहा है और इससे प्रमुख अनाजों और कपास की फसल पर असर पड़ सकता है। हालांकि शुरुआती दिनों में पूरे देश में खरीफ की बुआई 12 जून तक पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 8.71 फीसदी कम रही। पिछले साल कुल 75.1 लाख हेक्टेयर में खरीफ की बुआई हुई थी। इसकी वजह से महाराष्ट्र, गुजरात और बिहार के साथ ही पूर्वी भारत में पैदा होने वाली अनाज और कपास की फसल पर असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर खरीफ की फसल सीजन के दौरान 1,050 लाख हेक्टेयर में बोई जाती है।

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अब तक धान की बुआई 4.7 लाख हेक्टेयर में की गई है जो पिछले साल के मुकाबले थोड़ा अधिक है। जून तक दलहनों की बुआई 2.4 लाख हेक्टेयर में की जा चुकी है। कुल मिलाकर 108.1 लाख हेक्टेयर जमीन पर फसलों की बुआई का काम पूरा हो चुका है। अधिकारियों का कहना है कि एक बार मॉनसून के देश के मध्य और उत्तरी हिस्से में पहुंच जाने के बाद खरीफ की बुआई में तेजी आ सकती है। उम्मीद है कि जून के आखिर तक देश के इस हिस्से में मॉनसून पहुंच जाएगा। गुरुवार को मौसम विभाग द्वारा जारी किए गए बयान में कहा गया कि देश में 1 जून से 10 जून के बीच 36.4 बारिश हुई जो लगभग सामान्य है। (BS Hindi)

प्याज में तेजी रहने की संभावना

आमतौर पर हर साल बरसात के दौरान प्याज के दाम तेजी से बढ़ते हैं। इस उम्मीद में किसानों और स्टॉकिस्टों ने मंडियों में प्याज की आवक घटा दी है। जिससे प्याज महंगा होने लगा है। इस भंडारण वाले प्याज की गुणवत्ता खराब होने से इसे लंबे समय तक भंडारगृहों में रखा नहीं जा सकता है। मॉनसून भी कमजोर रहने का अनुमान है। ऐसे में अगस्त-सितंबर के दौरान भी प्याज महंगा बिक सकता है। साल 2013 में खुदरा बाजार में प्याज 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिका था।

हालांकि जानकारों के मुताबिक इस साल ऐसा होने की संभावना नहीं है। इस माह महाराष्ट्र की पिंपलगांव मंडी में प्याज की मॉडल कीमत करीब 1,200 रुपये से बढ़ कर 1,600 रुपये, दिल्ली में 1,400 रुपये से बढ़कर 1,650 रुपये, पटना में 1,650 रुपये से बढ़कर 2,100 रुपये और इंदौर में कीमत 1,250 रुपये से बढ़कर 1,375 रुपये प्रति क्विंटल हो गई। राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठïान (एनएचआरडीएफ) के निदेशक आर पी गुप्ता ने बताया कि जून महीने से सामान्य तौर पर प्याज के दाम बढ़ते हैं। क्योंकि इस समय भंडारण वाला प्याज बाजार में आता है। जिसकी लागत ज्यादा होती है।  गुप्ता ने कहा कि बीते कुछ दिनों से बारिश की शुरुआत हो चुकी है। जिससे प्याज की नर्सरी के लिए बुआई आरंभ हो चुकी है। आगे कीमतों के बारे मे गुप्ता ने कहा फिलहाल चिंता की बात नहीं है। लेकिन इस बार फरवरी में बेमौसम बारिश से खराब गुणवत्ता वाला प्याज ज्यादा है जिसे लंबे समय तक भंडारगृहों में नहीं रखा जा सकता। ऐसे में अगर बरसात में नुकसान ज्यादा हुआ तो नई फसल आने से पहले समस्या हो सकती है।

दिल्ली के प्याज कारोबारी पी एम शर्मा ने कहा कि महाराष्ट्र में दाम बढऩे से दिल्ली में भी प्याज महंगा हो रहा है। आगे भी कीमतों में तेजी जारी रह सकती है। महाराष्ट्र की पिंपलगांव कृषि उपज विपणन समिति के निदेशक अतुल शाह कहते हैं कि किसानों को लग रहा है कि बेमौसम बारिश से फसल खराब होने के कारण आगे दाम बढ़ सकते हैं। इसलिए वे नियंत्रित मात्रा में प्याज बेच रहे हैं। बीते कुछ दिनों के दौरान लासलगांव मंडी में आवक 1,600 टन से घटकर 1,400 टन रह गई है। निर्यात बढऩे से भी प्याज महंगा होने को सहारा मिल रहा है। इस वित्त अप्रैल-मई में बीती समान अवधि से 25 फीसदी ज्यादा निर्यात हुआ है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड ने वर्ष 2014-15 में 1.94 करोड़ टन प्याज पैदा होने का अनुमान लगाया है। लेकिन कारोबारी बेमौसम बारिश से 15-20 फीसदी उत्पादन घटना बता रहे हैं।

प्याज महंगा होने की एक वजह यह भी हो सकती है कि पहली बार वित्त मंत्रालय ने स्मॉल फार्मर्स एग्रीकल्चर कंसोर्टियम (एसएफएसी) और नेफेड को प्याज का बफर स्टॉक करने का आदेश दिया है। एसएफएसी के प्रबंध निदेशक प्रवेश शर्मा ने कहा कि इस 10,000 टन के लक्ष्य में से नासिक और इंदौर जिलों की मंडियों से 2,200 टन प्याज खरीदा जा चुका है। नेफेड महा प्रबंधक एस के वर्मा ने कहा कि 1,700 टन प्याज खरीद लिया गया है,जबकि लक्ष्य 2,500 टन था। दिल्ली सरकार के निर्देश पर इसे राजधानी के बाजार में उतार जाएगा। BS Hindi

वनस्पति तेल आयात मई में 33 फीसदी बढ़ा

मई में वनस्पति तेलों का आयात अब तक के सर्वोच्च मासिक स्तर पर पहुंच गया और इसमें पिछले साल के समान महीने के मुकाबले 33 फीसदी बढ़ोतरी देखने को मिली। देश का खाद्य तेल आयात मई में 13.71 लाख टन रहा। किसी एक महीने में यह आयात का सर्वाधिक मात्रा है। मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख उत्पादक देशों से आपूर्ति बढ़ाने की वजह से आयात के आंकड़ों में इजाफा हुआ है। उद्योग के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल 2014 में 10.33 लाख टन था। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए)द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, 'खाद्य तेल का आयात मई 2015 के दौरान रिकॉर्ड 13.7 लाख टन रहा। यह 1994 में शुरू आयात के बाद सर्वाधिक है। पिछले साल मई में आयात 10.3 लाख टन था।'

नवंबर-मई के दौरान खाद्य तेल का आयात 26 प्रतिशत बढ़कर 78.33 लाख टन रहा जो एक वर्ष पूर्व इसी अवधि में 61.9 लाख टन था। तेल वर्ष नवंबर से अक्टूबर होता है। नवंबर-मई के दौरान कुल आयात में खाद्य तेल की हिस्सेदारी 77.08 लाख टन तथा गैर-खाद्य तेल की हिस्सेदारी 1.25 लाख टन रही। एसईए के कार्यकारी निदेशक बी वी मेहता का कहना है, 'अक्टूबर 2014 से इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम उत्पादकों पर कोई निर्यात शुल्क नहीं वसूला जाता है और कच्चे पाम तेल की मांग कम हुई है जिसकी वजह से उन्होंने पाम उत्पादों का निर्यात भारत की तरफ बढ़ा दिया है।' दिलचस्प बात है कि रिफाइंड तेल का आयात भी 20 फीसदी बढ़ गया है। मेहता ने कहा, 'रिफाइंड, ब्लीच, डायोडाइज्ड पामोलीन का बढ़ता आयात देसी रिफाइनरों को प्रभावित कर रहा है। इसके अलावा सोयाबीन की अधिक कीमत और तेल के बदले कम कमाई होने की वजह से पेराई कम हो गई और देसी बाजार में इसकी उपलब्धता कम हो जाएगी। इसके परिणामस्वरूप सोयाबीन तेल और सूरजमुखी के तेल का आयात बढ़ गया।' (BS Hindi)

केस्टर तेल के निर्यात में हुई बढ़ोतरी

आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित वर्ष 2015-16 में चीन की मांग बढ़ने से केस्टर तेल का निर्यात बढ़ने का अनुमान है। मार्च महीने में देष से 40,533 टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल अप्रैल महीने में 38,661 टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था।
केस्टर तेल की निर्यातक फर्म के एक वरिश्ठ अधिकारी ने बताया कि केस्टर तेल में इस समय चीन की आयात मांग अच्छी बनी हुई है तथा केस्टर तेल के निर्यात सौदे 1,260 से 1,265 डॉलर प्रति टन की दर से हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि मार्च में केस्टर तेल का निर्यात तो बढ़ा ही है, साथ ही मई-जून में भी बढ़ोतरी की संभावना है।
साल्वेंट एक्सट्रेक्शन आफ इंडिया (एसईए) के अनुसार वित वर्ष 2014-15 में देश से 4.59 लाख टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था तथा चालू वित वर्ष में अच्छी निर्यात मांग को देखते निर्यात बढ़ने की संभावना है।.......आर एस राणा

रमजान के बाद लालमिर्च की निर्यात मांग बढ़ने से भाव में तेजी की उम्मीद


आर एस राणा
नई दिल्ली। रमजान का त्यौहारी सीजन समाप्त होने के बाद खाड़ी देशों की लालमिर्च में आयात मांग बढ़ने की संभावना है जिससे भाव बढ़ने की उम्मीद है। प्रमुख उत्पादक मंडी गुंटूर में लालमिर्च की दैनिक आवक घटकर 12,000 से 15,000 बोरी (एक बोरी-45 किलो) की रह गई।
लालमिर्च के निर्यातक अशोक दत्तानी ने बताया कि चालू महीने में रमजान का त्यौहार शुरु हो जायेगा, जिसकी वजह से खाड़ी देशों की आयात मांग लालमिर्च में कम हो गई है। उत्पादक मंडियों में लालमिर्च की आवक पहले की तुलना में कम हो गई है इसीलिए इस समय प्रमुख उत्पादक मंडियों में लालमिर्च के भाव स्थिर बने हुए हैं। खाड़ी देशों की आयात मांग लालमिर्च में जूलाई-अगस्त में बढ़ जायेगी, जिससे मौजूदा कीमतों में तेजी आने का अनुमान है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में आंध्रप्रदेश में तो लालमिर्च की पैदावार ज्यादा हुई है लेकिन मध्य प्रदेश में पैदावार कम थी, जिसकी वजह से मांग अच्छी रही है।
लालमिर्च के थोक कारोबारी एम एल मुंदड़ा ने बताया कि गुंटूर मंडी खुलने के बाद लालमिर्च की आवक 40,000 से 45,000 बोरी की हो रही थी जबकि शुक्रवार को दैनिक आवक घटकर 12,000 से 15,000 बोरी की रह गई। उन्होंने बताया कि अभी तक मंडी में लालमिर्च का केवल 32 से 35 लाख बोरी का ही स्टॉक हुआ है तथा दैनिक आवक कम हो गई है। जुलाई के बाद लालमिर्च में घरेलू मसाला निर्माताओं की मांग भी निकलेगी, ऐसे में कीमतों में तेजी की ही संभावना है। हालांकि तेजी निर्यात मांग पर ज्यादा निर्भर करेगी।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित वर्ष 2014-15 के पहले नो महीनों अप्रैल से दिसंबर के दौरान लालमिर्च के निर्यात में 4 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 247,000 टन का हुआ है जबकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 236,681 टन का हुआ था। विदेषी बाजार में भारतीय लालमिर्च के भाव 2.82 डॉलर प्रति किलो हैं जबकि पिछले साल इस समय भाव 2.54 डॉलर प्रति किलो थे।
गुंटूर मंडी में शुक्रवार को 334 क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 8,800 से 9,100 रुपये और तेजा क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 9,100 से 9,800 रुपये, नं 341 क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 8,500 से 9,200 रुपये और फटकी क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 6,000 से 6,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे तथा मंडी में दैनिक आवक 12,000 से 15,000 बोरी की हुई। उधर खमम मंडी में तेजा क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 9,500 से 10,000 रुपये प्रति क्विंटल रहे तथा दैनिक आवक 6,000 बोरी की हुई।......आर एस राणा

11 June 2015

Cotton Acreage Expected To Fall 13 yrs. Low

Cotton acreage is expected to fall by around 7% this year, said Cotton association of India (CAI) following the drastic fall in the prices in the current season and expectation of better return from other crops including soybean and Pulses. It should be noted that it is steepest fall in acreage since 2002/03.

Brazil Is Likely To Produce Coffee Crop Lower At 44.28 Mln Bgs For 2015/16-Conab

As per latest crop forecast of Conab, one of government crop supply agency, Brazil may harvest total coffee at 44.28 million 60 kg bags in 2015/16 season which is lower than 45.34 million bags in 2014/15 followed by 32.91 million bags of Arabica crop i.e. higher than 32.31 million bags  of 2014 and 11.34 million bags of Robusta crops which is marginally lower than 13 million bags of 2014 harvesting crop size.

India Soybean Oil Imports Projection Raised for 2014/15: USDA

Soybean Oil imports projection of India is raised by 250,000 tonnes to 2.25 million tonnes from 2.00 million tonnes due to lower domestic crush. Lower domestic crush is primarily due to lower international Soybean Oil prices and higher domestic soybean prices leading to lower domestic production of Soybean Oil.

Guar Gum Exports Increased W-o-W Basis

India has exported 4505 tons of guar gum in the first week of June which is 6% higher compared to prior week.
Notably, Guar products export in May decline sharply by 40% compared to last year same period due to weak demand from overseas.
According to recent Baker's and Hughes report on US crude oil rig count, it decline to 894 rigs compared to 1536 oil rigs running last year at same period.

30-35 लाख टन सोयाबीन बचने की उम्मीद

खरीफ 2015 सत्र में बुआई से पहले तक 30-35 लाख टन सोयाबीन शेष रहने की उम्मीद है। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के चेयरमैन दवीश जैन कहते हैं, 'पूरे सत्र में सोयाबीन आपूर्ति कमजोर रही है। आगे अच्छी कीमतें मिलने की उम्मीद के बीच किसानों ने अपने उत्पाद बचाए रखे। हमें लगता है कि इस साल 30-35 लाख टन सोयाबीन शेष रह सकता है।'

जैन ने कहा कि बुआई की बाद करीब 10-15 लाख टन सोयाबीन शेष रह सकता है। बाजार के जानकारों का कहना है कि बुआई के बाद अगर किसानों ने अपने भंडार खाली करने चाहे तो बाजार में पिछले साल का सोयाबीन उपलब्ध हो सकता है। सोयाबीन की बुआई मध्य जून से शुरू होती है। इसे अधिक पानी की जरूरत होती है इसलिए मॉनसून आने के बाद ही इसकी बुआई शुरू होती है। प्रदेश में मॉनसून आम तौर पर 14-15 जून के बाद पहुंचता है। मौसम विभाग के अनुसार चक्रवाती तूफान 'अशोबा' के कारण मॉनसून आने में कुछ दिनों की देरी हो सकती है। (BS Hindi)

निर्यात में कमी से उधड़े धागे

चीन को किए जाने वाले सूती धागे का निर्यात घटने और कमजोर मांग की वजह से इनकी कीमतें घटने से पिछले वित्त वर्ष के दौरान भारतीय कताई मिलों के प्रदर्शन पर बहुत बुरा असर पड़ा है। पूरे भारत की कताई मिलों के मुनाफे पर इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। कच्चे माल की कीमतों में आई गिरावट के बावजूद मिलें वित्त वर्ष 2015 में बेहतर मुनाफा कमाने में नाकाम रहीं क्योंकि उन पर पहले का बकाया काफी अधिक है और उन्हें जरूरत से ज्यादा आपूर्ति की स्थिति का सामना भी करना पड़ रहा है। बिज़नेस स्टैंडर्ड रिसर्च ब्यूरो द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक 46 सूचीबद्घ कताई कंपनियों की कमाई वित्त वर्ष 2015 में स्थिर रही। वित्त वर्ष 2014 में इन कंपनियों की कमाई 32,813 करोड़ रुपये थी जो वित्त वर्ष 2015 में घटकर 32,483 करोड़ रुपये रह गई। दूसरी तरफ उनका मुनाफा 1,041 करोड़ रुपये से घटकर महज 76 करोड़ रुपये रह गया। मार्च तिमाही में इन कंपनियों को तगड़ा झटका लगा और ज्यादातर कंपनियां घाटे में रहीं।

भारत के कपड़ा क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक ओसवाल समूह के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक भी इस बात की पुष्टिï करते हुए कहते हैं कि चीन से कम होती मांग, भारत सरकार द्वारा बाजार केंद्रित योजनाओं को वापस लिए जाने और उधार लेने की उच्च लागत की वजह से पिछले एक साल के दौरान कताई क्षेत्र के प्रदर्शन पर बहुत  बुरा असर पड़ा है। दो साल पहले सूती धागे की मांग में चीन की ओर से बढ़ोतरी और अब अचानक आई गिरावट ने धागा निर्यातकों को अन्य विकल्पों की ओर गौर करने का मौका ही नहीं दिया और इस वजह से देसी बाजार में जरूरत से अधिक आपूर्ति की स्थिति उत्पन्न हो गई और कीमतें 10-12 फीसदी तक गिर गईं। मुनाफे में गिरावट आने की यह एक प्रमुख वजह है। उन्होंने कहा कि चूंकि वियतनाम अपनी कताई क्षमता का विस्तार कर रहा है और खबरें यह भी हैं कि चीन वियतनाम में कताई क्षेत्र में निवेश कर रहा है। इससे भारतीय कपास निर्यातकों के लिए एक और मुसीबत खड़ी हो सकती है।

सूत्रों का कहना है कि छोटी मिलों ने भी अपनी क्षमता में करीब 20 फीसदी की कटौती कर दी है। अब कताई उद्योग का जोर पूरी तरह देसी उद्योग की मांग पर है। अप्रैल, 2014 के दौरान चीन सरकार ने स्थानीय उत्पादकों की मदद करने के लिए कच्चे कपास को इकटï्ठा करने के तीन साल के कार्यक्रम को बंद कर दिया और इसके बजाय सरकार सीधे किसानों को सब्सिडी देने की पेशकश कर रही है। कपास के स्टॉक को निपटाने की चीनी सरकार की नीतियों के परिणामस्वरूप चीनी कताई मिलों को स्थानीय बाजार से ही सस्ती दरों पर कपास मिलने लगा है और इसकी वजह से आयात पर उनकी निर्भरता कम हो गई है। इसकी वजह से वित्त वर्ष 2015 में चीन को किए जाने वाले कपास और सूती धागे का निर्यात तेजी से कम हुआ। चीन अभी भारत से कपास का आयात करने वाले देशों की सूची में सबसे आगे है। भारत से होने वाले सूती धागे के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी करीब 46 फीसदी है। इसमें काफी गिरावट देखने को मिलेगी जिससे भारतीय कताई मिलों की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा है। कनफेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (सीआईटीआई) के महासचिव डी के नायर ने कहा कि बांग्लादेश, वियतनाम और मिस्र जैसे वैकल्पिक बाजार निर्यातकों को कुछ राहत दे सकते हैं लेकिन उनका आधार बहुत ही छोटा है।

चीन बहुत बड़ा बाजार है। छोटे देशों को अधिक निर्यात करने से नुकसान को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है लेकिन मिल मालिकों की चिंता अभी भी बरकरार है। देश के प्रमुख मिल मालिकों का मानना है कि भारतीय कपास निगम के पास कपास की 85 लाख गांठें उपलब्ध हैं जो कुल सालाना फसल का करीब 20 फीसदी हिस्सा है। कारोबारियों का कहना है कि निगम को कीमतें कम करने के लिए स्टॉक की बिकवाली शुरू करनी चाहिए। इस स्तर पर कपास की कीमतों में सुधार होने से किसानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन इससे कताई क्षेत्र को बचाने में मदद मिल सकती है। नायर ने बताया कि भारत के कताई क्षेत्र और कपड़ा क्षेत्र के बीच बढ़ते अंतर की वजह से देसी बाजार में जरूरत से ज्यादा आपूर्ति हो जाएगी जिससे भारतीय मिलों की निर्भरता निर्यात मांग पर बढ़ गई है। कॉटन टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन आर के डालमिया ने कहा, 'कपास की फसल अच्छी होने और कपास निगम के पास भरपूर स्टॉक होने के बावजूद मिलमालिक कपास के लिए भारी रकम चुका रहे हैं। कमजोर मांग की वजह से मार्जिन कम होता है और सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है।'

त्यागराज मिल्स, मदुरै के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक टी कन्नन का मानना है कि फिलहाल हालात भले ही मुश्किल नजर आ रहे हों लेकिन इसके आखिर में बहुत ही उजाला है। यूरोप और अमेरिका से मांग में तेजी आने की वजह से इस साल कपड़ा क्षेत्र के अच्छा करने की उम्मीद है। इससे देसी क्षेत्र में कपास धागे की मांग में तेजी आ सकती है।  केयर रेटिंग्स में कॉरपोरेट रेटिंग्स के प्रबंधक कुणाल मोदी ने कहा, 'आने वाले महीनों में मांग की स्थिति में बदलाव हो सकता है क्योंकि यूएई जैसे ठिकाने मंदी के दौर को कपड़ा क्षेत्र के लिए एक अवसर के तौर पर परिवर्तित कर सकते हैं, इसके अलावा यूरोपीय संघ और अमेरिका में बढ़ती मांग भी निर्यात को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। आने वाले 3-6 महीने भारतीय कताई क्षेत्र के लिए काफी मुश्किल होंगे।' उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2014 कई कपास कताई मिलों के लिए बेहतरीन साल रहा, इसकी वजह निर्यात और उपभोग में तेजी रही। (BS Hindi)

चीनी उद्योग सस्ते कर्ज के ऐलान से नहीं खुश

चीनी उद्योग के प्रमुख संगठन इस्मा ने आज कहा कि सरकार का 6,000 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त ऋण देने का निर्णय सार्थक नहीं होगा क्योंकि इससे अधिशेष भंडार की समस्या तथा चीनी की कम कीमत के मुद्दे का समाधान नहीं होगा। इस्मा के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'सरकार ने चीनी उद्योग के लिए एक साल की छूट के साथ 6,000 करोड़ रुपये के ऋण की घोषणा की है। यह सार्थक नहीं होगा। इससे अधिशेष भंडार की समस्या तथा चीनी की कम कीमत के मुद्दे का समाधान नहीं होगा।' उन्होंने कहा कि गन्ना किसानों का मौजूदा 21,000 करोड़ रुपये बकाया है जिसमें 6,000 करोड़ रुपये की कमी अएगी लेकिन इस बाद भी बड़ी राशि बकाया रह जाएगी।

 वर्मा ने कहा कि इसकी जगह केंद्र को सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों को 25 से 30 लाख टन चीनी खरीदने के लिए सरकारी एजेंसियों को रिण देना चाहिए। उन्होंने कहा, 'सरकार ने केवल एक साल के लिए ब्याज मुक्त ऋण देने की निर्णय किया है जबकि इससे पहले फरवरी 2014 में घोषित योजना में पांच साल की छूट थी।' वर्मा का मानना है कि उद्योग के लिए एक साल में 6,000 करोड़ रुपये लौटाने के लिए इतनी कमाई करना असंभव है। महाराष्ट्र की चीनी मिलें भी केंद्र के फैसले से नहीं हुईं खुश महाराष्टï्र का सहकारी चीनी उद्योग भी चीनी मिलों को 6,000 करोड़ रुपये ब्याजमुक्त ऋण मुहैया कराने के केंद्र सरकार के फैसले से बहुत खुश नहीं है। इसके बजाय उद्योग ने केंद्र से प्रति टन 850 रुपये की वित्तीय मदद, 50 लाख टन का बफर स्टॉक बनाने और कच्ची चीनी प्रोत्साहन (हाल में 4,000 रुपये प्रति टन की राशि घोषित की गई) को 2019-20 तक विस्तारित करने की मांग की है।

कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांगे्रस पार्टी से संबंध रखने वाले सहकारी चीनी उद्योग के नेताओं ने तर्क दिया कि 6,000 करोड़ रुपये ब्याजमुक्त ऋण देने से गन्ना किसानों को भुगतान, ब्याज का पुनर्भुगतान करने का मसला नहीं सुलझेगा। महाराष्टï्र की सहकारी और निजी चीनी मिलों को गन्ना किसानों का 3,400 करोड़ रुपये का भुगतान करना है। इसमें से सहकारी मिलों पर कुल 1,900 करोड़ रुपये बकाया है। उनका कहना है कि उनकी खराब वित्तीय स्थिति की सबसे प्रमुख वजह उत्पादन की लागत और चीनी की गिरती कीमतों के बीच बढ़ता अंतर है। चीनी की मौजूदा कीमतें 2,100-2,300 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि उत्पादन लागत 3,200-3,400 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हैं। वर्ष 2014-15 के पेराई सीजन में सभी 178 चीनी मिलों ने हिस्सा लिया और 105 लाख टन से भी अधिक चीनी का उत्पादन किया।  

महाराष्ट्र में सहकारी चीनी मिलों के संघ के प्रबंध निदेशक संजीव बाबर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'केंद्र सरकार के इस फैसले से वित्तीय संकट से जूझ रही सहकारी चीनी मिलों को जरूरी राहत नहीं मिलेगी। इन मिलों का नुकसान से उबर पाना मुश्किल होगा। सरकार को 850 रुपये प्रति टन की वित्तीय मदद मुहैया कराने की जरूरत है और ऋण पुनर्गठन के लिए कदम उठाने की जरूरत है।' उन्होंने बताया कि ज्यादातर सहकारी चीनी मिलों को डर है कि बैंक उन्हें ऋण नहीं देंगे। इस बीच सहकारी चीनी मिलों को बेसब्री से 2,000 करोड़ रुपये के ब्याजमुक्त ऋण का इंतजार है जिसकी घोषणा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मॉनसून सत्र के दौरान की थी। राज्य सरकार पहले ही यह संकेत दे चुकी है कि चीनी उद्योग को आगे सरकार से किसी तरह की सब्सिडी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। (BS Hindi)

चावल जमा नहीं करने वाली मिलों पर होगी कार्रवाई

छत्तीसगढ़ सरकार ने कस्टम मिलिंग का चावल जमा नहीं करने वाली चावल-मिलों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। आधिकारिक सूत्रों ने आज यहां बताया कि राज्य के खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री पुन्नूलाल मोहले ने अनुबंध के अनुसार कस्टम मिलिंग का चावल जमा नहीं करने वाली मिलों पर नियमों के तहत कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।

मोहले ने अधिकारियों को ऐसी मिलों की सूची तैयार करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। राज्य सहकारी विपणन संघ के प्रबंध संचालक एस भारती दासन ने बताया कि खरीफ विपणन वर्ष 2014-15 में राज्य में समर्थन मूल्य पर किसानों से 63 लाख टन धान की खरीद की गई है। इसमें से 52 लाख टन धान का उठाव हो चुका है। दासन ने बताया कि राज्य में पंजीकृत मिलों की संख्या 1,544 है। चावल मिलों के पास दी गई कुल धान की मात्रा 52 लाख 8 हजार टन है। जिलों में कुल जमा चावल की मात्रा 32 लाख 42 हजार 581 टन है। (BS Hindi)

मेंथा तेल की नई आवक षुरु, पैदावार कम होने का अनुमान


आर एस राणा
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल की नई आवक षुरु हो गई है। चालू फसल सीजन में मेंथा तेल का उत्पादन पिछले साल की तुलना में करीब 14,000-15,000 हजार टन कम होने का अनुमान है। ऐसे में आगामी दिनों में मेंथा तेल की कीमतों में तेजी आने की संभावना है। गुरुवार को उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल के भाव 1,070 से 1,075 रुपये प्रति किलो रहे।
मेंथा कारोबारी अनुराग रस्तोगी ने बताया कि चालू सीजन में मेंथा तेल का उत्पादन घटकर 35,000 से 37,000 टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल पैदावार 50,000 टन से ज्यादा की हुई थी। उन्होंने बताया कि पिछले साल मेंथा तेल के भाव नीचे रहे थे जिसकी वजह से किसानों ने इस बार बुवाई कम की, साथ ही प्रतिकूल मौसम का असर भी फसल पर देखा गया। उन्होंने बताया कि उत्पादक मंडियों में 25 से 50 ड्रम (एक ड्रम-180 किलो) नए मेंथा तेल की आवक षुरु हो गई है तथा चालू महीने के आखिर तक आवक बढ़ जायेगी। हालांकि पैदावार कम होने का अनुमान है ऐसे में मौजूदा कीमतों में अभी ज्यादा गिरावट की संभावना नहीें हैं।
मेंथा निर्यातक जुगल किषोर ने बताया कि मेंथा उत्पादों में इस समय निर्यातकों की मांग कमजोर है। आयातक नई फसल को देखते हुए नए सौदों से परहेज कर रहे हैं तथा फसल के सही आकंलन के बाद जुलाई-अगस्त में निर्यात मांग निकलने की संभावना है। हालांकि कुछ बड़ी कंपनियां विदेषों में स्थिेंटिक मेंथा तेल का उपयोग कर रही है जिसका असर मेंथा तेल की निर्यात मांग पर पड़ सकता है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित वर्ष 2014-15 के पहले 9 महीनों में देष से मेंथा तेल का निर्यात बढ़कर 21,700 टन का हो चुका है जोकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 11 फीसदी ज्यादा है। वित वर्ष 2013-14 में अप्रैल से दिसंबर के दौरान 19,546 टन मेंथा उत्पादों का निर्यात हुआ था। मसाला बोर्ड ने निर्यात का लक्ष्य 21,000 टन का रखा था।
मेंथा व्यापारी सुरेष जैन ने बताया कि उत्पादक मंडियों में 400 से 450 ड्रम मेंथा तेल की दैनिक आवक हो रही है, इसमें 25 से 50 ड्रम नया मेंथा तेल है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में पैदावार कम हुई है तथा जुलाई-अगस्त में निर्यात मांग बढ़ सकती है, जिससे जुलाई-अगस्त में भाव तेज रह सकती है। गुरुवार को संभल मंडी में मेंथा तेल के भाव 1,070 रुपये और चंदौसी में 1,075 रुपये प्रति क्विंटल रहे।.....आर एस राणा

केंद्र सरकार की सख्ती से दलहन की कीमतों में नरमी


आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा दलहन की बढ़ती कीमतों पर अंकुष लगाने के उपायों का असर कीमतों पर देखा गया। उत्पादक मंडियों में दलहन की कीमतों में गुरुवार को 100 से 200 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज की गई।
दलहन कारोबारी एस उपाध्याय ने बताया कि केंद्र सरकार ने दलहन की कीमतों पर अंकुष लगाने के लिए राज्य सरकारों को पत्र लिखकर जरुरी कदम उठाने की मांग की है, साथ ही आयात बढ़ाने की संभावना भी तलाषी जा रही है। इसका असर गुरुवार को उत्पादक मंडियों में दलहन की कीमतों पर देखा गया। दिल्ली में चना के भाव घटकर 4,600 रुपये, मूंग के भाव 7,000 से 7,100 रुपये, मोठ के भाव 6,800 से 7,000 रुपये, उड़द के भाव 8,250 रुपये और मसूर के भाव 6,700 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।
दलहन आयातक फर्म के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि म्यांमार से आयातित दालों के भाव में हल्की नरमी दर्ज की गई। लेमन अरहर के भाव मुंबई में 1,160 डॉलर प्रति टन रहे तथा इसमें 10 डॉलर की गिरावट आई। मूंग पेड़ी सेवा के भाव 1,220 डॉलर, अन्ना मूंग के भाव 1,200 डॉलर प्रति टन रहे। उड़द एफएक्यू के भाव 1,190 डॉलर प्रति टन रहे तथा इसमें 20 डॉलर की गिरावट दर्ज की गई। उड़द एसक्यू के भाव 1,230 डॉलर प्रति टन रहे। उन्होंने बताया कि मौजूदा कीमतों में थोड़ी और गिरावट तो आ सकती है लेकिन भारी गिरावट की संभावना नहीं है।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय की माने तो महीने भर में दालों की फूटकर कीमतों में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। मंत्रालय के अनुसार दिल्ली में महीने भर में जहां मूंग की कीमतों में 4 रुपये प्रति किलो की गिरावट आकर भाव 103 रुपये प्रति किलो रह गए, वहीं मसूर दाल के भाव 94 रुपये प्रति किलो पर स्थिर बने हुए है। चना दाल की कीमतों में इस दौरान 2 रुपये की तेजी आकर गुरुवार को भाव 70 रुपये प्रति किलो हो गए। अरहर दाल के भाव महीने भर में 108 रुपये से बढ़कर 115 रुपये और उड़द दाल के 110 रुपये से बढ़कर 114 रुपये प्रति किलो हो गए।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में दालों की पैदावार घटकर 173.8 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी रिकार्ड पैदावार 192.5 लाख टन की हुई थी। पैदावार में आई कमी के कारण ही वित वर्ष 2014-15 में देष में रिकार्ड 45 लाख टन दालों का आयात हो चुका है।....आर एस राणा

10 June 2015

फिर बढ़ गए रबर के दाम

मॉनसून में देरी और तापमान में हो रही तेज बढ़ोतरी ने केरल में प्राकृतिक रबर की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया है। उत्पादन में बाधा आ रही है। पूरी दुनिया में हालात कुछ ऐसे ही हैं और पिछले कुछ हफ्तों के दौरान आपूर्ति में कमी आई है। स्थानीय बाजार में मानक ग्रेड आरएसएस-4 की कीमतें एक बार फिर तीन महीनों के बाद 130 रुपये प्रति किलोग्राम पर लौट आई हैं। अप्रैल के आखिरी हफ्ते तक कीमतें 119 रुपये के स्तर तक गिर गई थीं। वैश्विक कीमतों में भी पिछले महीने के मुकाबले तेजी का रुख देखने को मिला क्योंकि बैंकॉक के बाजार में कीमतें 119 रुपये प्रति किग्रा रहीं। बाजार में पिछले हफ्ते कीमत 121 रुपये प्रति किग्रा रहीं। पिछले महीने के मुकाबले वैश्विक बाजार की हालत बेहतर है।

जानकारों का कहना है कि पहाड़ी इलाकों में मॉनसून की कमी और गर्मी के कारण रबर की भारी कमी हो सकती है। इस तरह की जलवायु परिस्थिति पांच साल के अंतर के बाद उत्पन्न हुई है। उन्होंने कहा कि आने वाले महीनों में कहीं न कहीं बाजार में तेजी देखने को मिलेगी। इस बीच टोक्यो कमोडिटी एक्सचेंज में रबर वायदा में आज गिरावट का रुख देखने को मिला। टोकॉम की दरें 14 फीसदी बढ़कर 16 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हंै जबकि जापानी मुद्रा गिरकर 12 साल के निम्रतम स्तर पर है। दुनिया में रबर के सबसे बड़े उत्पादक और निर्यातक थाईलैंड से आपूर्ति पिछले कुछ हफ्तों से साल के सबसे निचले स्तर पर है क्योंकि इस सीजन में उत्पादन कम रहा। थाईलैंड में फरवरी से मई के बीच सर्दी रहती है जब रबर के पेड़ पत्तियां गिरा देते हैं और किसान उत्पादन बंद कर देते हैं। थाईलैंड के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पिछले चार महीनों के दौरान देश से होने वाला निर्यात 26 फीसदी की गिरावट के साथ 11.7 करोड़ टन रहा।

अधिक तापमान से प्रभावित उत्पादन

भारतीय रबर शोध संस्थान (आरआरआईआई) द्वारा कराए गए अध्ययन में पाया गया कि केरल में सबसे अधिक रबर का उत्पादन करने वाले क्षेत्र कोट्टïायम में पिछले कुछ सालों के दौरान तापमान बढऩे की घटनाएं सामने आती हैं। वर्ष 1970 से 2010 के बीच दैनिक अधिकतम और न्यूनतम तापमानों के आंकड़ों का विश्लेषण आरआरआईआई के क्लाईमेट चेंज ऐंड इकोसिस्टम स्टडीज डिवीजन ने किया जिससे पता चला कि गर्मी का रुझान बढ़ रहा है और इसका असर इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन पर भी पड़ सकता है। रबर के पेड़ों पर लेटेक्स का उत्पादन वातावरण के तापमान से संबंधित है।

एक तय सीमा से अधिक तापमान बढऩे पर फसल की उत्पादकता घटने लगती है। शुरुआत में किए गए अध्ययनों से साफ पता चलता है कि तापमान में इजाफों से भारत में पारंपरिक तौर पर रबर पैदा करने वाले क्षेत्रों में रबर उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए बदलते जलवायु का असर इस क्षेत्र में रबर की बुआई पर गंभीर रूप से पड़ सकता है। आरआरआईआई ने सावधान करते हुए कहा कि चूंकि इस क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक स्थायित्व बड़े पैमाने पर रबर की बुआई पर निर्भर है इसलिए इस क्षेत्र में रबर की बुआई के वक्त उचित कदम उठाने की जरूरत है। BS Hindi