Total Pageviews

31 July 2015

खरीफ फसलों की बुवाई में 9 फीसदी की बढ़ोतरी

खरीफ फसलों की बुवाई में 9 फीसदी की बढ़ोतरी
तिलहन के साथ ही दलहन की बुवाई में अच्छी बढ़ोतरी
आर एस राणा
नई दिल्ली। खरीफ फसलों की बुवाई चालू सीजन में 9 फीसदी बढ़कर 764.28 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 703.04 लाख हैक्टेयर में हुई थी। उत्पादक राज्यों में हुई अच्छी बारिष से दलहन के साथ ही तिलहनों की बुवाई में अच्छी बढ़ोतरी हुई है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में प्रमुख फसल धान की रोपाई बढ़कर 227.8 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 214.82 लाख हैक्टेयर में ही धान की रोपाई हुई थी।
दलहन की बुवाई चालू रबी में बढ़कर 82.44 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 48.15 लाख हैक्टेयर में ही दालों की बुवाई हुई थी। खरीफ दलहन की प्रमुख फसल अरहर की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 27.6 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 26.25 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। उड़द की बुवाई चालू खरीफ में 21.15 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 16.64 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।
तिलहनों की बुवाई चालू खरीफ में 148.50 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 135.60 लाख हैक्टेयर में तिलहनी फसलों की बुवाई हुई थी। खरीफ तिलहन की प्रमुख फसल सोयाबीन की बुवाई 106.35 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 95.66 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। मूंगफली की बुवाई चालू खरीफ में 29.05 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 26.29 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
मोटे अनाजों की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 148.49 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 125.50 लाख हैक्टेयर में हुई थी। मक्का की बुवाई खरीफ सीजन में 66.74 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 60.70 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।
गन्ने बुवाई चालू सीजन में 47.33 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 46.42 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। कपास की बुवाई भी चालू खरीफ में 101.91 लाख हैक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इसकी बुवाई 104.84 लाख हैक्टेयर में हुई थी।................आर एस राणा

उत्पादक राज्यों में अच्छी बारिष से कपास की कीमतों में और गिरावट की आषंका


सीसीआई के पास करीब 45 लाख गांठ कपास का बचा हुआ है स्टॉक
आर एस राणा
नई दिल्ली। कपास के प्रमुख उत्पादक राज्यों गुजरात, मध्य प्रदेष, आंध्रप्रदेष और उत्तर भारत के राज्यों में हुई अच्छी बारिष से पैदावार बढ़ने का अनुमान है। इसीलिए कपास की कीमतों में सप्ताहभर में करीब 500 से 800 रुपये की गिरावट आकर अहमदबाद में षंकर-6 किस्म की कपास के भाव 34,000 से 34,500 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) रह गए। कमजोर मांग को देखते हुए मौजूदा कीमतों में और भी गिरावट आने की आषंका है वैसे भी कॉटन कार्पोरेषन ऑफ इंडिया (सीसीआई) के पास अभी भी करीब 45 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास का स्टॉक बचा हुआ है।
नार्थ इंडिया कॉटन एसोसिएषन के अध्यक्ष राकेष राठी ने बताया कि प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों गुजरात, मध्य प्रदेष, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तेलंगाना और आंध्रप्रदेष में चालू महीने में अच्छी बारिष हुई है जोकि फसल के लिए अच्छी है। हालांकि महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में अभी भी स्थिति चिंताजनक है, मराठवाड़ा में सामान्य से करीब 50 फीसदी कम बारिष हुई है जबकि आंध्रप्रदेष के भी कुछ क्षेत्रों में बारिष कम हुई है। उन्होंने बताया कि ज्यादातर उत्पादक क्षेत्रों में बारिष अच्छी होने के कारण ही कपास में मिलों की मांग घटी है जबकि सीसीआई ई-निलामी के द्वारा लगातार भाव घटाकर बिकवाली कर रही है। इसीलिए उत्पादक मंडियों में भाव कम हुए हैं तथा मौजूदा कीमतों में और भी गिरावट आने की आषंका है।
सीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि निगम चालू सीजन में अभी तक 39 लाख गांठ कपास की बिक्री ई-निलामी के माध्यम से घरेलू बाजार में कर चुकी है जबकि 3 लाख गांठ कपास का निर्यात किया है। निगम के पास अभी भी करीब 45 लाख गांठ कपास का स्टॉक बचा हुआ है तथा आगामी दिनों में निगम बिक्री और भी बढ़ा सकता है। सीसीआई ने चालू सीजन में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 87 लाख गांठ कपास की खरीद की थी।
कपास कारोबारी हरी भाई ने बताया कि चालू सीजन में करीब 45 लाख गांठ कपास का निर्यात ही हुआ है तथा विष्व बाजार में इस समय कपास के भाव 63.50 डॉलर प्रति औंस हैं। इन भावो में निर्यात सौदे सीमित मात्रा में ही हो रहे है तथा विष्व बाजार में अभी कीमतो में भारी तेजी की उम्मीद भी नहीं है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में कपास की बुवाई 101.91 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 104.84 लाख हैक्टेयर में हुई थी।......आर एस राणा

30 July 2015

खरीफ में 300 लाख टन चावल की खरीद का लक्ष्य

आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 300 लाख टन चावल की खरीद का लक्ष्य तय किया है। भारत सरकार के खाद्य सचिव की अध्यक्षता में राज्यों के खाद्य सचिवों के साथ हुई बैठक में यह लक्ष्य तय किया गया है।
खाद्य मंत्रालय के अनुसार भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) एमएसपी पर धान की खरीद के सभी राज्यों में पुख्ता इंतजाम किए करेगी, साथ ही पैकेजिंग के साथ ही भंडारण की भी उचित व्यवस्था की जायेगी। खरीफ सीजन में आंध्रप्रदेष से 20 लाख टन, असम से 50 हजार टन, बिहार से 20 लाख टन, छत्तीसगढ़ से 36 लाख टन, हरियाणा से 23.45 लाख टन, झारखंड से 3 लाख टन, कर्नाटका से 95 हजार टन और केरल से एक लाख टन की खरीद का लक्ष्य तय किया गया है।.......आर एस राणा

मूंगफली दाने का निर्यात मूल्य में बढ़ा, मात्रा में घटा


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में मूंगफली दाने के निर्यात में जहां मूल्य के हिसाब से बढ़ोतरी हुई है, वहीं मात्रा में इसके निर्यात में कमी आई है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार अप्रैल-मई में मूल्य के हिसाब से मूंगफली दाने के निर्यात में 10.51 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल 675.09 करोड़ रुपये मूल्य का निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 610.86 करोड़ रुपये का हुआ था।
एपीडा के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में मूंगफली दाने का निर्यात मात्रा के हिसाब से घटकर 89,023 टन का ही हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 1,03,728 टन का हुआ था।......आर एस राणा

पोल्ट्र फीड कंपनियों के साथ स्टार्च मिलों की मांग से मक्का में और तेजी संभव


विष्व बाजार में मक्का की कीमतें कम होने से भारत से निर्यात पड़ते नहीं
आर एस राणा
नई दिल्ली। पोल्ट्र फीड निर्माता कंपनियों के साथ ही स्टार्च मिलों की मांग से मक्का की कीमतों में तेजी बनी हुई है। दिल्ली में मक्का के भाव बढ़कर 1,340 से 1,350 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। खरीफ में मक्का की नई फसल की आवक सितंबर महीने में बनेगी, इसलिए मौजूदा कीमतों और भी तेजी आने की संभावना है।
मक्का कारोबारी राजेष गुप्ता ने बताया कि मक्का में पोल्ट्री फीड निर्माताओं के साथ ही स्टार्च मिलों की मांग बराबर बनी हुई है जबकि बिहार और आंध्रप्रदेष की मंडियों में आवक कम हुई है। पिछले पंद्रह दिनों में मक्का की कीमतो में करीब 125 से 150 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। उत्तर प्रदेष की मंडियों में मक्का के भाव बढ़कर 1,260 रुपये और बिहार की मंडियों में 1,270 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। पंजाब और हरियाणा डिलीवरी मक्का के भाव बढ़कर 1,400 से 1,450 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।
यूएस ग्रेन काउंसिल के भारतीय प्रतिनिधि अमित सचदेव ने बताया कि विष्व बाजार में मक्का के दाम नीचे होने के कारण भारत से निर्यात पड़ते नहीं लग रहे हैं। ब्राजील की मक्का के भाव 166 डॉलर प्रति टन और अर्जेंटीना की मक्का के भाव 167 डॉलर प्रति टन है। अमेरिका में मौसम मक्का की फसल के लिए अनुकूल है जिससे पैदावार ज्यादा ही होने का अनुमान है ऐसे में विष्व बाजार में मक्का की कीमतांें में अभी तेजी की संभावना भी नहीं है। इसलिए भारत से निर्यात पड़ते नई फसल आने के बाद भी लगने की उम्मीद नहीं है। उन्होंने बताया कि मक्का के एफओबी भाव खाड़ी देषों में 222 से 224 डॉलर प्रति टन हैं तथा सप्ताहभर में इसमें करीब 10 डॉलर प्रति टन की गिरावट आई है।
मक्का कारोबारी पी सी गुप्ता ने बताया कि आवक कम होने से उत्पादक राज्यों की मंडियों में मक्का की कीमतों में तेजी आई है। खरीफ मक्का की आवक सितंबर महीने में षुरु होगी तथा आवकों का दबाव अक्टूबर में बनेगा। ऐसे में अगस्त महीने में मक्का के दाम तेज ही बने रहने की संभावना है।  आंध्रप्रदेष की निजामाबाद मंडी में मक्का के भाव बढ़कर 1,370 रुपये, करीमनगर मंडी में 1,445 रुपये और सांगली मंडी में 1,595 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। बिहार से दक्षिण भारत के राज्यों में पहुंच मक्का के  सौदे 1,525 से 1,550 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हो रहे हैं।.....आर एस राणा

29 July 2015

चालू फसल सीजन में 200 लाख टन से ज्यादा दलहन पैदावार का अनुमान

चालू फसल सीजन में 200 लाख टन से ज्यादा दलहन पैदावार का अनुमान
आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने चालू फसल सीजन 2015-16 में 200.5 लाख टन दलहन पैदावार का अनुमान लगाया है जोकि पिछले सीजन के मुकाबले 15.53 फीसदी ज्यादा है। खरीफ में 70.5 लाख टन और रबी में 130 लाख टन दलहन पैदावार का लक्ष्य तय किया गया है।
कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू फसल सीजन 2015-16 में केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर दलहन की खेती को बढ़ावा दिया है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिषन (एनएफएसएम) के तहत किसानों को उन्नत किस्म के बीज के साथ ही अन्य सहायता भी दी जा रही है। उन्होनें बताया कि एनएफएसएम के तहत आवंटित कुल राषि का 50 फीसदी से ज्यादा खर्च दलहन पैदावार को बढ़ाने के लिए किया जायेगा। ऐसे में मंत्रालय ने चालू फसल सीजन 2015-16 में दलहन उत्पादन बढ़ाकर 200.5 लाख टन करने का लक्ष्य तया किया है। पिछले साल देष के कुछ भागों में बारिष कम होने से दलहन की पैदावार में कमी आई थी। फसल सीजन 2014-15 में देष में 173.8 लाख टन ही दालों की पैदावार हुई थी जबकि फसल सीजन 2013-14 में रिकार्ड 192.5 लाख टन दालों की पैदावार हुई थी।
उन्होंने बताया कि चालू खरीफ में मराठवाडा को छोड़ देष के अन्य भागों में अभी तक अच्छी वर्षा हुई है हालांकि पैदावार के अनुमान का आंकलन अगस्त माह में होने वाली बारिष की स्थिति पर निर्भर करेगा। चालू खरीफ में मराठवाडा में सामान्य से 53 फीसदी, कर्नाटका के कुछ हिस्सों में 44 फीसदी, रायलसीमा में 33 फीसदी और बिहार में 28 फीसदी कम बारिष हुई है।
उन्होंने बताया कि फसल सीजन 2014-15 में दलहन की पैदावार में आई कमी के कारण ही घरेलू मार्किट में दालों के भाव में तेजी बनी हुई है। दलहन पैदावार में आई कमी के कारण ही वित्त वर्ष 2014-15 में देष में रिकार्ड 45 लाख टन दालों का आयात हुआ था तथा देष की आयात मांग ज्यादा होने के कारण विदेषी बाजार में भी दालों की कीमतों में तेजी बनी हुई है।
व्यापारिक सूत्रों के अनुसार महाराष्ट्र की अकोला मंडियों में चना के भाव 4,500 रुपये, अरहर के भाव 7,550 रुपये, उड़द के भाव 7,200 रुपये और मूंग के भाव 6,000 से 6,500 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। दिल्ली में मूंग के भाव 6,500 रुपये, चना के भाव 4,600 रुपये, उड़द एफएक्यू 7,400 रुपये, एसक्यू 7,800 रुपये और मसूर के भाव 7,000 प्रति क्विंटल चल रहे हैं।................आर एस राणा

27 July 2015

गुजरात में बारिष से केस्टर सीड की बुवाई बढ़ने की संभावना, भाव में गिरावट


केस्टर तेल में अच्छी निर्यात मांग से भाव में फिर सुधार आने का अनुमान
आर एस राणा
नई दिल्ली। गुजरात के प्रमुख केस्टर सीड उत्पादक क्षेत्रों में पिछले तीन दिनों से हुई अच्छी बारिष से बुवाई बढ़ने की संभावना है। ऐसे में मिलों की मांग घटने से केस्टर सीड की कीमतों में 75 से 100 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आकर भाव 3,800 से 3,900 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। हालांकि इस समय केस्टर तेल में निर्यात मांग अच्छी बनी हुई है जिससे भाव में फिर से सुधार आने का अनुमान है।
केस्टर सीड के थोक कारोबारी कुषल राज पारिख ने बताया कि उत्पादक क्षेत्रों में पिछले तीन दिनों से हुई बारिष से केस्टर सीड की बुवाई हो चुकी फसल को तो फायदा होगा ही, साथ ही जिन क्षेत्रो में बुवाई नहीं हुई है, वहां भी बुवाई बढ़ने का अनुमान है। इसीलिए कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। उन्होंने बताया मंडियो में केस्टर सीड के भाव घटकर 3,800 रुपये और प्लांट डिलीवरी 3,900 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। केस्टर तेल का भाव 790 से 795 रुपये प्रति 10 किलो रहा।
केस्टर व्यापारी वामन भाई ने बताया कि केस्टर तेल के निर्यात सौदे 1,270 डॉलर प्रति टन की दर से हो रहे हैं तथा इस समय चीन की आयात मांग अच्छी है। चालू वित्त वर्ष 2015-16 में केस्टर तेल का निर्यात पिछले साल से ज्यादा ही होने का अनुमान है। वैसे भी इस समय उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की दैनिक आवक घटकर 20 से 25 हजार बोरियों (एक बोरी-75 किलो) की रह गई।  ऐसे में आगामी दिनों में फिर से केस्टर सीड की कीमतों में सुधार आने का अनुमान है।
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोएिषन आफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल से मई के दौरान 90,396 टन केस्टर तेल का निर्यात हो चुका है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 85,837 टन तेल का निर्यात हुआ है। वित वर्ष 2014-15 में देष से 4.59 लाख टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था तथा चालू वित वर्ष 2015-16 में भी निर्यात अच्छा होने का अनुमान है।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में केस्टर सीड की पैदावार बढ़कर 18.24 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 17.27 लाख टन की हुई थी।.....आर एस राणा

एमएमटीसी 1,000 टन अरहर का आयात करेंगी

आर एस राणा
नई दिल्ली। घरेलू बाजार में सप्लाई सुनिष्चित करने के लिए सार्वजनिक कंपनी एमएमटीसी ने 1,000 टन अरहर के आयात हेतु निविदा आमंत्रित की है। कंपनी के अनुसार म्यांमार, मालावी और मौजाम्बिक से अरहर आयात के निविदा मांगी गई है तथा निविदा भरने की अंतिम तिथि 12 अगस्त है।
कंपनी के अनुसार 5,00 टन अरहर आयात का आयात कांडला बंदरगाह पर किया जायेगा तथा 500 टन का आयात कृष्णापत्तटनम बंदरगाह पर किया जायेगा। निविदा के अनुसार दलहन का आयात 30 सितंबर 2015 तक किया जाना है। इससे पहले कंपनी ने 5,000 टन उड़द दाल के आयात हेतु निविदा आमंत्रित की थी।
घरेलू बाजार में दलहन की कीमतों में आई तेजी को देखते हुए केंद्र सरकार ने सार्वजनिक कंपनियों के माध्यम से दलहन आयात की योजना बनाई थी उसी के तहत एमएमटीसी दलहन आयात के लिए निविदा आमंत्रित कर रही है।......आर एस राणा

22 July 2015

उत्पादक राज्यों में बारिष की कमी से बढ़ने लगी हैं मक्का की कीमतें


विष्व बाजार में कीमतें कम होने से कारण निर्यात पड़ते नहीं
आर एस राणा
नई दिल्ली। खरीफ उत्पादक राज्यों आंध्रप्रदेष, तेलंगाना और महाराष्ट्र में बारिष कम होने के कारण मक्का की कीमतों में तेजी बनी हुई। सप्ताहभर में मक्का की कीमतों में 75 से 100 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। हालांकि विष्व बाजार में मक्का की कीमतें नीचे होने के कारण देष से निर्यात पड़ते नहीं लग रहे हैं।
मक्का व्यापारी पूनमचंद गुप्ता ने बताया कि जून महीने में हुई अच्छी बारिष से खरीफ में मक्का की बुवाई तो बढ़ी है लेकिन चालू महीने में बारिष की कमी के कारण फसल सूखने के कगार पर है। यहीं कारण है कि उत्पादक मंडियों में मक्का की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। निजामाबाद मंडी में मक्का के भाव बढ़कर 1,350 रुपये, दावणगिरी मंडी में 1,480 रुपये, करीमनगर में 1,375 रुपये और सांगली मंडी में 1,550 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। बिहार की गुलाबबाग मंडी में मक्का के भाव बढ़कर 1,250 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।
यूएस ग्रेन काउंसिल के भारतीय प्रतिनिधि अमित सचदेव ने बताया कि विष्व बाजार में मक्का की कीमतें नीचे होने के कारण भारत से निर्यात पड़ते नहीं लग रहे हैं। उन्होंने बताया कि अर्जेटीना की मक्का के भाव 172 से 175 डॉलर और ब्राजील की मक्का के भाव 165 से 170 डॉलर प्रति टन है। ऐसे में भारतीय मक्का के मुकाबले इन देषों की मक्का के भाव कम होने के कारण भारत से निर्यात पड़ते नहीं लग रहे हैं।
मक्का व्यापारी राजेष गुप्ता ने बताया कि मक्का की खरीफ फसल की आवक सितंबर-अक्टूबर में बनेगी जबकि इस समय मुर्गी दाना कंपनियों के साथ ही स्टार्च मिलों की मांग अच्छी है। ऐसे में अगस्त महीने तक मक्का की कीमतों में तेजी बनी रहने की संभावना है। दिल्ली में मक्का के भाव 1,300 से 1,325 रुपये और पंजाब-हरियाणा डिलवरी मक्का के भाव बढ़कर 1,400 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। उन्होंने बताया कि अच्छी मांग को देखते हुए मक्का की कीमतों में और भी 25 से 50 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने का अनुमान है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में मक्का की बुवाई बढ़कर 51.38 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 27.64 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।.....आर एस राणा

चालू वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में गैर बासमती चावल का निर्यात बढ़ा


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल से मई के दौरान गैर-बासमती चावल का निर्यात बढ़कर 10.48 लाख टन का हो गया। मूल्य के हिसाब से इस दौरान 6.08 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 2,484.55 करोड़ रुपये का हुआ है।
एपीडा के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान देष से गैर-बासमती चावल का निर्यात बढ़कर 10.48 लाख टन का हो गया जबकि वित्त वर्ष 2014-15 के पहले दो महीनो में 9.29 लाख टन गैर-बासमती चावल का निर्यात हुआ था। एपीडा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि खाड़ी देषों की आयात मांग बढ़ने से गैर-बासमती चावल के निर्यात में बढ़ोतरी देखी जा रही है। उन्होंने बताया वित्त वर्ष 2014-15 में देष से 82.74 लाख टन गैर बासमती चावल का निर्यात हुआ था जोकि वित्त वर्ष 2013-14 के 71.33 लाख टन से ज्यादा था। उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष में इसमें करीब 8 से 10 फीसदी की और बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 में गैर बासमती चावल का निर्यात मूल्य के हिसाब से बढ़कर 2,484.55 करोड़ रुपये का हो गया जबकि पिछले वित्त वर्ष 2014-15 के पहले दो महीनों में 2,342.20 करोड़ रुपये मूल्य का निर्यात हुआ था।
उत्पादक मंडियों में परमल चावल सेला का भाव 1,700 से 1,900 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि षरबती चावल का भाव 2,600 से 2,750 रुपये प्रति क्विंटल है।....आर एस राणा

राइस ब्रान तेल के बल्क निर्यात से उद्योग और किसानों को होगा फायदा

आर एस राणा
नई दिल्ली। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) द्वारा बल्क में राइसब्रान तेल के निर्यात की मंजूरी से उद्योग के साथ ही किसानों को भी फायदा होगा। केंद्र सरकार ने कंजूमर पैक में राइसब्रान तेल की अनुमति पहले ही दे रखी थी लेकिन बल्क में निर्यात करने पर इस पर रोक लगाई हुई थी।
साल्वेंट एक्ट्रेक्टर्स एसोसिएषन आफ इंडिया (एसईए) के अध्यक्ष प्रवीन लुखंड के अनुसार उद्योग काफी समय से इसकी मांग करता आ रहा था। केंद्र सरकार ने कंजूमर पैक के साथ ही बल्क में भी राइसब्रान तेल के निर्यात की मंजूरी दे दी है इससे राइसब्रान कंपनियों के साथ ही चावल उत्पादक किसानों का भी फायदा होगा। राइसब्रान तेल की मांग जापान, थाइलैंड और आस्ट्रेलिया के साथ अमेरिका की भी रहती है।....आर एस राणा

कम आपूर्ति से प्याज में तेजी

महाराष्ट्र की बेंचमार्क पिंपलगांव मंडी में आज प्याज के दाम बढ़कर 2,800 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गए। कीमतों में बढ़ोतरी की वजह आवक में भारी गिरावट आना है। आवक इसलिए कम हुई है क्योंंकि स्टॉकिस्ट आगे कीमतें और बढऩे की उम्मीद में अपना स्टॉक रोके हुए हैं। प्याज की कीमत का यह स्तर इस महीने में इस जिंस की कीमत में 123.82 फीसदी बढ़ोतरी दर्शाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नए सीजन की फसल बाजार में नहीं आने तक प्याज में तेजी जारी रहेगी और नई फसल आने में अभी तीन महीने बाकी हैं। सरकार ने प्याज की कीमतों में तेजी रोकने के लिए कई उपायों की घोषणा की है, लेकिन कीमतें हालात के कारण बढ़ी हैं जो उसके काबू में नहीं हैं। जैसे इस साल मार्च-अप्रैल में बेमौसम बारिश से रबी की फसल को नुकसान हो गया और लगातार तीन सप्ताह से बारिश न आने से रकबा घटने की आशंका बढ़ी है। साथ ही, इस सीजन में खरीफ की फसल की आवक में देरी की आशंका शामिल हैं। कृषि उपज विपणन समिति पिंपलगांव के निदेशक अतुल शाह ने कहा, 'कम आपूर्ति के चलते पिंपलगांव मंडी में देर शाम की नीलामी में प्याज की कीमत 2,800 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर को छू गई। बड़े स्टॉकिस्ट बाजार में सीमित मात्रा में प्याज निकाल रहे हैं क्योंकि उन्हें कीमतें और बढऩे की उम्मीद है। कम आपूर्ति का मुख्य कारण पिछले सीजन में मार्च-अप्रैल में बेमौसम बारिश से रबी की फसल खराब हो जाना था। जुलाई में बारिश की कमी के कारण खरीफ फसल की फिर से बुआई में देरी के आसार हैं।'

प्याज की बढ़ती कीमत ने सरकार की तैयारियों को निष्प्रभावी कर दिया है। वर्ष 2013 में खुदरा बाजार में प्याज के दाम 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए थे और इसका दोहराव रोकने के लिए सरकार ने कई उपायों की घोषणा की थी, लेकिन ये सब नाकाफी साबित हुए हैं। इन उपायों के तहत जमाखोरी पर रोक वर्ष 2016 तक बढ़ा दी गई। वहीं निर्यात को हतोत्साहित करने के लिए इसका न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) 250 डॉलर प्रति टन से बढ़ाकर 425 डॉलर प्रति टन किया गया। इसके नतीजतन भारत के प्याज निर्यात ऑर्डर थम गए। ये ऑर्डर पाकिस्तान, ईरान और चीन को मिलने लगे, जहां कीमतें भारतीय कीमतों से 100 डॉलर प्रति टन कम हैं। मुंबई के एक कारोबारी ने कहा, 'अप्रतिस्पर्धी कीमतों के कारण भारत निर्यात बाजार से बाहर हो गया है।'

पिछले केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कीमत स्थिरता कोष (पीएसएफ) के लिए पहली बार 500 करोड़ रुपये का आवंटन किया था। स्मॉल फार्मर्स एग्रीबिज़नेस कंसोर्टियम और नैशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (नेफेड) को क्रमश: 10,000 टन और 2,500 टन का बफर स्टॉक बनाने का जिम्मा सौंपा गया था।
नासिक के एक कारोबारी ने कहा, 'भारत का उत्पादन और खपत करीब 1.9 करोड़ टन है, इसलिए इन दोनों एजेंसियों की 12,500 टन की खरीद नगण्य है। अगर सरकार एक बार में ही इस स्टॉक को बाजार में निकाल दे तो भी कीमतों में बढ़ोतरी को रोकना संभव नहीं होगा।' एनएचआरडीएफ के निदेशक आर पी गुप्ता का मानना है कि कीमतों में वर्तमान तेजी भंडारण क्षेत्रों में पिछले दो दिनों में लगातार बारिश की वजह से आई है, जिसकी वजह से स्टॉकिस्ट मंडियों में पर्याप्त मात्रा में बिक्री नहीं कर सके। (BS Hindi)

सोने के दाम हुए और कम

सोने की कीमतों में सोमवार को अचानक गिरावट के बाद आज बाजार शांत रहा और कीमतें एक सीमित दायरे में रहीं। मुंबई के हाजिर जवेरी बाजार में सोने का भाव 150 रुपये गिरकर 25,400 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना कल के स्तर 1,106 डॉलर प्रति औंस के आसपास रहा। रुपये के लिहाज से सोने की कीमत आने वाले महीनों में गिरकर 24,000 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आने की संभावना है। हालांकि चांदी ने कुछ दम दिखाया है और यह ज्यादा नहीं गिर रही है।

कारोबारी सूत्रों ने कहा कि एक ऐल्गो कारोबारी की वजह से कल चीन के बाजार में सुबह के शुरुआती कारोबार में भारी गिरावट दर्ज की गई। हालांकि सोना कई वर्षों के मजबूत तकनीकी समर्थन स्तर 1,128 से 1,132 डॉलर को तोड़कर नीचे आ गया। इस तकनीकी समर्थन स्तर तक लुढ़कने के बाद सोना पिछले दो वर्षों में तीन बार पलटकर ऊपर आया था। इसके नतीजतन बिकवाली से संबंधित कई स्टॉप लॉस ने अनुसरण करते हुए बिकवाली की और ऐल्गो कारोबारियों ने अपने कारोबार को बदला, जिससे लगातार गिरावट बनी रही।

फंडामेंटल के लिहाज से सोना पहले ही कमजोर नजर आ रहा था क्योंकि डॉलर सूचकांक मजबूत हो रहा है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के निकट भविष्य में ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना है, जिसे सोने के लिए कमजोर कारक के रूप में देखा जा रहा है। ग्रीस और ईरान के समझौतों के बाद निवेशक सुरक्षित निवेश की जरूरत महसूस नहीं कर रहे हैं। अब कमजोर टेक्निकल से सोना और नीचे आएगा। आनंदराठी कमोडिटीज के प्रमुख (जिंस अनुसंधान) रवींद्र राव ने कहा, 'कमजोर फंडामेंटल के साथ ही टेक्निकल भी इस धातु में कमजोरी का संकेत दे रहे हैं। सोना 1,128 डॉलर प्रति औंस के मजबूत समर्थन स्तर को तोड़कर नीचे आ चुका है। अब लक्ष्य 990 डॉलर प्रति औंस पर आ गया है। घरेलू स्तर पर रुपया-डॉलर विनिमय दर को देखते हुए सोने की कीमतें 24,000 से 23,500 रुपये प्रति 10 ग्राम के दायरे में रहेंगी।'

एमसीएक्स पर आज सोने के अगस्त अनुबंध का भाव 24,957 रुपये प्रति 10 ग्राम रहा। सोने के विपरीत चांदी स्थिर बनी हुई है। कल सोने और चांदी का अनुपात 76 से नीचे था, वह आज गिरकर 75 से नीचे आ गया। यह सोने की तुलना में चांदी की मजबूती का संकेत है। आज एमसीएक्स पर चांदी का भाव 0.18 फीसदी गिरकर 34,080 रुपये प्रति किलोग्राम रहा, जबकि मुंबई के हाजिर बाजार में यह 50 रुपये चढ़कर 34,600 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई। (BS Hindi)

21 July 2015

गेहूं का आयात महंगा होने से ओएमएसएस के तहत केंद्रीय पूल से उठाव संभव


डेडीकेट मूंवमेंट में एमपी से दक्षिण भारत की फलोर मिलें बढ़ा सकती हैं खरीद
आर एस राणा
नई दिल्ली। आस्ट्रेलिया से आयातित गेहूं की कीमतों में महीने भर में करीब 30 डॉलर प्रति
टन की तेजी आ चुकी है। जून महीने के षुरु में आस्ट्रेलियाई गेहूं के भाव 262 डॉलर प्रति टन थे जबकि इस समय भाव 292 डॉलर प्रति टन भारत पहुंच हो गए हैं। ऐसे में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत मध्य प्रदेष से बेचे जाने वाले डेटीकेट मूवमेंट के आधार पर गेहूं के उठाव की उम्मीद बनी है।
गेहूं आयातक फर्म के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि आस्ट्रेलिया से आयातित गेहूं की कीमतों में महीने भर में करीब 30 डॉलर प्रति टन की तेजी आ चुकी है। रुपये के हिसाब से आस्ट्रेलियाई गेहूं का भाव दक्षिण भारत की मिलों में पहुंच 1,990 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है हालांकि इन भाव में मिलें खरीद नहीं कर रही है जबकि महीना भर पहले इसका भाव मिल पहुंच 1,770 से 1,780 रुपये प्रति क्विंटल था। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत की मिलें इस समय राजस्थान की कोटा मंडी में 1,800 रुपये और उत्तर प्रदेष से 1,790-1,800 रुपये ओर मध्य प्रदेष से 1,770-1,780 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच की दर से गेहूं के खरीद सौदे कर रही है।
गेहूं कारोबारी कमलेष कुमार ने बताया कि आयातित गेहूं के भाव तेज हो गए हैं जबकि उत्पादक राज्यों की मंडियों में गेहूं की आवक कम हो गई है। ऐसे में आगामी दिनों में दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें मध्य प्रदेष से ओएमएसएस के तहत डेडीकेट मूवमेंट स्कीम के गेहूं की खरीद को तरजीह देंगी। एफसीआई ने मध्य प्रदेष, पंजाब और हरियाणा से ओएमएसएस के तहत गेहूं का बिक्री भाव 1,550 रुपये प्रति क्विंटल तय कर रखा है इसमें परिवहन लागत एवं अन्य खर्च मिलों को स्वयं वहन करनें होंगे। उन्होंने बताया कि पंजाब और हरियाणा में केंद्रीय पूल में खरीदे गए गेहूं का क्वालिटी हल्की है जबकि मध्य प्रदेष के गेहूं की अच्छी है इसलिए फ्लोर मिलें पंजाब व हरियाणा के बजाए मध्य प्रदेष से सरकारी गेहूं की खरीद को प्राथमिकता देंगी।
दक्षिण भारत के एक फ्लोर मिलर्स ने बताया कि इस समय मिलें आयातित गेहूं के बजाए मध्य प्रदेष, राजस्थान और यूपी से गेहूं की खरीद ज्यादा कर रही हैं। हालांकि इन राज्यों की मंडियों मेें गेहूं की आवक पहले की तुलना में कम हुई है इसलिए मिलें मध्य प्रदेष से डेडीकेट मूंवमेंट के तहत गेहूं खरीद की संभावना तलाष रही हैं। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में आस्ट्रेलिया से करीब 3.5 लाख टन गेहूं के आयात सौदे हुए हैं जिसमें से करीब 1.50 लाख टन गेहूं भारत पहुंच भी चुका है। आस्ट्रेलिया में गेहूं के भाव बढ़कर 254 डॉलर, रुस में 202 डॉलर और यूक्रेन मे 200 डॉलर प्रति टन हो गए हैं। रुस की सरकार ने गेहूं के निर्यात पर षुल्क लगा दिया है जिसकी वजह से भाव में तेजी आई है।.......आर एस राणा

सोना बेचने का अच्छा मौका!

सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को भी गिरावट जारी रही और ये पांच वर्षों के निचले स्तर पर आ गईं। एशियाई बाजारों में कारोबार के दौरान पीली धातु 4 फीसदी लुढ़ककर 1,089.80 डॉलर प्रति औंस पर आ गई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने का अगस्त डिलिवरी अनुबंध 2 फीसदी से ज्यादा गिरकर 24,904 रुपये पर आ गया। दिन के कारोबार के दौरान चांदी का सितंबर डिलिवरी अनुबंध 2.2 फीसदी गिरकर 33,430 रुपये पर आ गया। 

इन कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट अमेरिकी फेडरल रिजïर्व की चेयरमैन जेनेट येलेन की टिप्पणियों के बाद आई है। येलेन ने गत सप्ताह के प्रारंभ में संकेत दिया था कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में संतोषजनक वृद्धि को देखते हुए वर्ष 2015 में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना है। सोमवार की गिरावट की एक वजह चीन में सोने की बिकवाली को भी माना जा रहा है। चीन के शांघाई गोल्ड एक्सचेंज में महज कुछ मिनटों में ही 5 टन सोने की बिक्री हो गई। वर्ष 2009 के बाद पहली बार चीन ने अपने स्वर्ण भंडार की घोषणा की है। चीन ने अपना स्वर्ण भंडार 1,658 टन बताया है, जो बाजार के अनुमानों से काफी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन आक्रामक तरीके से सोना जमा करेगा। अप्रैल 2009 में चीन का स्वर्ण कोष 1,054 टन था।

परिदृश्य

इस गिरावट को देखते हुए आपको क्या करना चाहिए? क्या यह बिकवाली के लिए अच्छा समय है? विश्लेषकों का अनुमान है कि सोने की कीमतें आगे और गिरेंगी और इनकी चाल अमेरिकी फेडरल रिजïर्व के ब्याज दरें बढ़ाने के फैसले से तय होगी। विश्लेषकों का कहना है कि सोने को आर्थिक अनिश्चितता से बचाव का जरिया माना जाता है। वैश्विक वृद्धि के माहौल से संबंधित अनिश्चितता का पता दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों के सोने की शुद्ध खरीदारी से चलता है। रिपोर्टों में यह बताया गया है कि अगले 12 से 18 महीनों के दौरान सोने की कुल वैश्विक मांग की वृद्धि दर एक अंक में रहेगी। सोने की मांग इसलिए कम रहेगी क्योंकि आभूषणों की खपत सुस्त है और यह धारणा भी बनी हुई है कि अमेरिका में ब्याज दरों की संभावित बढ़ोतरी से सोने में निवेश का आकर्षण घटेगा। 

उदाहरण के लिए इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च ने वित्त वर्ष 2016 में घरेलू सोने की कीमतों के लिए नकारात्मक आउटलुक रखा है। एजेंसी का मानना है कि सोने की कीमतों की चाल काफी हद तक अमेरिका में ब्याज दरों के फैसले पर निर्भर करेगी। इंडिया रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक (कॉरपोरेट्स) दीप एन मुखर्जी ने कहा, 'अमेरिका में ब्याज दरें बढऩे की स्थिति में सोने की वैश्विक कीमतें गिर सकती हैं और ये 900 से 1,050 डॉलर प्रति औंस के दायरे में रहेंगी। इसी तरह सोने की घरेलू कीमतें भी लुढ़क सकती हैं और ये 20,500 से 24,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच रहेंगी।' उन्होंने कहा, 'हालांकि अमेरिका ब्याज दरें बढ़ाने के फैसले को टाल रहा है, जबकि जापान और यूरो जोन अपनी अपरंपरागत मौद्रिक नीति जारी रखे हुए हैं। इस वजह से सोने की कीमतें बढ़कर वित्त वर्ष 2016 में 1,300 से 1,350 डॉलर प्रति औंस के दायरे में आ सकती हैं।' (BS Hindi)

20 July 2015

अप्रैल-मई में दलहन आयात में 16 फीसदी की हुई बढ़ोतरी


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में दालों के आयात में 16 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल आयात 5.9 लाख टन का हो चुका है। चालू खरीफ में मानसूनी बारिष कम होने की आषंका के कारण आयातक ज्यादा आयात सौदे कर रहे हैं हालांकि आयात बढ़ने के बावजूद भी घरेलू बाजार में दालों की कीमतें उंची ही बनी हुई हैं।
कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल से मई के दौरान 5.9 लाख टन दालों का आयात हो चुका है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 5.1 लाख टन दालों का आयात हुआ था। वित्त वर्ष 2014-15 में देष में दालों का रिकार्ड आयात 45.8 लाख टन का हुआ था जबकि वित्त वर्ष 2013-14 में 31.7 लाख टन दालों का आयात ही हुआ था। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने चालू खरीफ में मानसनी बारिष कम होने की आषंका जताई है जिसका दलहन की पैदावार पर पड़ सकता है।
आस्ट्रेलिया से आयातित चने के भाव मुंबई में सोमवार को 4,625 रुपये प्रति क्विंटल रहे जबकि आयातित उड़द के भाव 7,650 रुपये, लेमन अरहर के भाव 7,350 रुपये, मसूर के भाव 6,600 से 6,850 रुपये कनाडा की पीली मटर के भाव 2,521 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
कृषि मंत्रालय के अनुसार जून महीने में हुई बारिष से खरीफ में दलहन की बुवाई बढ़कर 55.99 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल 23.92 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जून महीने में तो बारिष अच्छी हुई थी लेकिन जुलाई महीने में मध्य प्रदेष, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात और कर्नाटका के कुछ हिस्सों में बारिष कम हुई है जबकि खरीफ में इन राज्यों में दालों की पैदावार सबसे ज्यादा होती है।
मानसून कमजोर रहने के कारण ही फसल सीजन 2014-15 में देष में दालों की पैदावार घटकर 173.8 लाख टन होने का अनुमान है जबकि इसके पिछले सीजन 2013-14 में रिकार्ड पैदावार 192.5 लाख टन की हुई थी। दालों का सबसे ज्यादा उत्पादन तो भारत में होता ही है साथ ही इसकी सबसे ज्यादा खपत भी हमारे यहां ही होती है इसलिए हमें हर साल म्यांमार, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, तंजानिया और टर्की से बड़े पैमाने पर दालों का आयात करना पड़ता है। दलहन में सबसे ज्यादा आयात मटर, अरहर, उड़द और चना तथा मूंग और राजमा का होता है।........आर एस राणा

निर्यात मांग से लालमिर्च की कीमतों में तेजी की संभावना

मध्य प्रदेष की लालमिर्च की नई फसल में देरी की आषंका
आर एस राणा
नई दिल्ली। निर्यातकों के साथ ही घरेलू मसाला कंपनियों की मांग से लालमिर्च की कीमतों में तेजी आने की संभावना है। आंध्रप्रदेष की उत्पादक मंडियों में लालमिर्च की दैनिक आवक पहले की तुलना में काफी कम हो गई है जबकि मध्य प्रदेष की आने वाली लालमिर्च की नई फसल में देरी की होने आषंका है।
लालमिर्च की निर्यातक फर्म के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि रमजान का महीना समाप्त हो गया है इसलिए आगामी दिनों में लालमिर्च में खाड़ी देषों की आयात में बढ़ोतरी होगी, साथ ही घरेलू मसाला कंपनियों की मांग भी बढ़ेगी। इसलिए लालमिर्च की कीमतों में तेजी आने की संभावना है। उन्होंने बताया कि कुल मसाला निर्यात में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी लालमिर्च की है। विष्व बाजार इस समय लालमिर्च के भाव 2.91 डॉलर प्रति किलो है जबकि पिछले साल इस समय भाव 2.56 डॉलर प्रति किलो थे।
लालमिर्च कारोबारी एम मुंदड़ा ने बताया कि प्रमुख उत्पादक मंडियों गुंटूर और खम्मम में लालमिर्च की दैनिक आवक काफी कम हो गई है जबकि सौदे ज्यादा हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि गुंटूर में लालमिर्च की दैनिक आवक 25,000 से 30,000 बोरी (एक बोरी-45 किलो) की रह गई है जबकि खम्मम में दैनिक आवक 2,500 से 3,000 बोरियों की रह गई। गुंटूर मंडी में 334 क्वालिटी की लालमिर्च के भाव सोमवार को 8,800 से 9,300 रुपये, तेजा क्वालिटी के 9,200 से 9,900 रुपये, 341 क्वालिटी के भाव 9,000 से 9,800 रुपये और ब्याडगी क्वालिटी के 8,500 से 9,100 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे है। खम्मम मंडी में तेजा क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 9,800 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
लालमिर्च व्यापारी हरीष जैन ने बताया कि चालू सीजन में आंध्रप्रदेष में लालमिर्च का 55 से 60 लाख बोरी का ही स्टॉक हुआ है जबकि मध्य प्रदेष में लालमिर्च की नई फसल की आवक करीब एक महीरो की देरी से अक्टूबर-नवंबर में बनेगी। हालांकि लालमिर्च के भाव मंडियों में पिछले साल की तुलना में 1,000 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल पहले ही उंचे बने हुए हैं लेकिन अगस्त में मांग बढ़ने की संभावना है जिससे और भी तेजी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 में देष से 347,000 टन लालमिर्च का निर्यात हुआ था जोकि वित्त वर्ष 2013-14 के 312,500 टन से 11 फीसदी ज्यादा था।.......आर एस राणा

भारतीय सफेद चीनी की बिक्री में तेजी से रिफाइनिंग मार्जिन घटा

भारत की सफेद चीनी की अफ्रीकी बाजारों में बिक्री बढ़ गई है। इस कारण कच्ची चीनी के मुकाबले रिफाइंड चीनी पर प्रीमियम घट गया। भारत की सफेद चीनी बड़ी मात्रा में आईसीई के अगस्त वायदा में भारी छूट पर मिल रही है। व्यापारियों का कहना है कि इस वजह से सूडान, सोमालिया जैसे अफ्रीकी बाजारों और अफगानिस्तान जैसे देशों का भारतीय चीनी के प्रति रुझान बढ़ा है। लंदन के एक कारोबारी ने कहा, 'भारतीय क्रिस्टल चीनी की भारी मात्रा में पेशकश से सफेद चीनी पर प्रीमियम घट सकता है क्योंकि भारतीय चीनी उच्च गुणवत्ता की सफेद चीनी से ज्यादा सस्ती है।'

कारोबारियों ने भारतीय क्रिस्टल चीनी के कारोबार के लिए 320-350 डॉलर प्रति टन की बोली लगाई है जो अगस्त की सफेद चीनी वायदा के मुकाबले काफी कम है। अगस्त सफेद चीनी वायदा बुधवार को 373.80 डॉलर प्रति टन के स्तर पर था। इस हफ्ते सफेद चीनी का अक्टूबर वायदा का प्रीमियम कच्चे चीनी की अक्टूबर वायदा के मुकाबले 90 डॉलर प्रति टन रहा जो दुबई में अल खलीज जैसी बड़ी रिफाइनरियों के लिए मुनाफा कमाने के लिहाज से पर्याप्त है। लंदन के कारोबारियों का कहना है, 'भारतीय चीनी एक अलग गुणवत्ता है और इसलिए इसे सभी बाजारों में नहीं भेजा जा सकता है।' भारत के पास बिक न सकी चीनी का पर्याप्त स्टॉक है और उम्मीद है कि वर्ष 2015-16 में भी फसल अच्छी ही रहेगी। चालू वर्ष में पिछली बार की ही तरह 2.8-2.85 करोड़ टन चीनी का उत्पादन होने की उम्मीद है जो घरेलू वार्षिक उपभोग से कहीं ज्यादा है। भारत में चीनी की सालाना खपत 2.45 करोड़ टन है।

भारत में कारोबारी सूत्रों का कहना है कि भारतीय चीनी मिलों ने पड़ोसी देशों और मध्य पूर्व के देशों को 2,00,000 टन चीनी का निर्यात करने के लिए करार किया है। ये सौदे पिछले कुछ हफ्तों के दौरान किए गए हैं और इन्हें जुलाई और अगस्त में पूरा किया जाना है। ईडीऐंडएफ मैन कमोडिटीज इंडिया के प्रबंध निदेशक राहिल शेख का कहना है, 'मिलें और भी निर्यात सौदे कर सकती हैं अगर मांग बची रहती हैं।' (BS Hindi)

India Gets Coffee Exports Revenue Higher By 20.03% in June 2015- DGCIS

As per DGCIS latest report, India received total coffee exports revenue around Rs. 503.98 crore which is in USD 78.92 million inJune 2015 higher by 20.03% in Rs. and 12.26% in USD respectively against Rs. 419.88 crore and USD 70.30 million respectively in previous year during the same month. It stood at Rs. 1558.55 crore and the value in USD at 245.48 million since April-2014 to June 2015 up by 11.41% in Rs. and 4.95% when the value is counting in USD against  the last year revenue i.e. Rs.1398.87 crore and in USD 233.91 million in corresponding period of time.

Basmati Rice Export from India May Boon After Iran Nuclear Deal

Lifting of global economic sanctions on Iran by the US and EU could facilitate a new record for basmati rice export to that country from here in 2015-16.Iran is also expected to cut import duty on Indian basmati from 40 per cent now to 20 per cent from the new season, starting October. However other commodity like soymeal, sugar and corn are likely to be affected Iran will be able be able to buy soymeal, sugar and corn at much cheaper rates from South American countries like Brazil, Argentina and the U.S. Iran may import around one million tons of Indian basmati rice. India exported around 900,000 tons of basmati rice to Iran in FY 2014-15 (April - March) compared to around 1.44 million tons in FY 2013-14 due to a temporary ban imposed by the Middle East nation citing surplus stocks.

17 July 2015

Guar Exports Declined Sharply In June Month M-o-M basis



India has exported 27585 tons of Guar Products (Gum, Splits & Meal) in the month of June 2015 which is lower export figures compared to last year. Out of the total guar exports, 18330 tons of Guar gum, 4160 tons of Splits and 5095 tons of Guar splits exported in June 2015.
Notably, recent month guar exports fell by 55% compared to exports of last year same period. Weak demand of guar gum overseas mainly due to falling crude oil prices, led the gum exports down in the last couple of months. Falling rig count and new shale gas explorations are also the major influencing factors for recent decline in guar gum exports.

Basmati Rice Export from India May Boon After Iran Nuclear Deal

Lifting of global economic sanctions on Iran by the US and EU could facilitate a new record for basmati rice export to that country from here in 2015-16.Iran is also expected to cut import duty on Indian basmati from 40 per cent now to 20 per cent from the new season, starting October. However other commodity like soymeal, sugar and corn are likely to be affected Iran will be able be able to buy soymeal, sugar and corn at much cheaper rates from South American countries like Brazil, Argentina and the U.S. Iran may import around one million tons of Indian basmati rice. India exported around 900,000 tons of basmati rice to Iran in FY 2014-15 (April - March) compared to around 1.44 million tons in FY 2013-14 due to a temporary ban imposed by the Middle East nation citing surplus stocks.

सरकार ने 5,000 टन उड़द आयात के लिए निविदा जारी की

दलहनों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने सितंबर से घरेलू आपूर्ति बढ़ाने के इरादे से म्यांमार और अन्य देशों से 5,000 टन उड़द आयात के लिए निविदा जारी की है। सरकारी उपक्रम एमएमटीसी ने 5,000 टन उड़द के आयात के लिए बोली आमंत्रित की है लेकिन बोली मूल्य के आधार पर आयात खेप की मात्रा बढ़ाई जाएगी। दलहनों के आयात के लिए एमएमटीसी द्वारा जारी की गई यह दूसरी निविदा है। इसने पहले ही 5,000 टन तुअर के आयात के लिए बोली आमंत्रित कर रखी है। दलहनों विशेषकर तुअर और उड़द की खुदरा कीमतें देश के अधिकतर भागों में 100 रुपये प्रति किलो से अधिक हो गई है जिसका कारण फसल वर्ष 2014-15 (जुलाई से जून) के दौरान घरेलू उत्पादन में 20 लाख टन की गिरावट के बाद बाजार में इसकी कम आपूर्ति का होना है।

रमजान के बाद इलायची की निर्यात मांग में तेजी आने की संभावना


चालू वित्त वर्ष में इलायची के निर्यात में बढ़ोतरी होने का अनुमान
आर एस राणा
नई दिल्ली। रमजान का पवित्र महीना समाप्त होने के बाद इलायची में खाड़ी देषों की आयात मांग आगामी दिनों में बढ़ेगी, साथ ही त्यौहारी सीजन को देखते हुए घरेलू मांग में भी तेजी आयेगी। हालांकि चालू वित्त वर्ष 2015-16 में इलायची के निर्यात में बढ़ोतरी होने का अनुमान है लेकिन पैदावार ज्यादा होने से इलायची की कीमतों में अभी तेजी की संभावना नहीं है।
इलायची की निर्यातक फर्म के एक अधिकारी ने बताया कि रमजान का महीने समाप्त होने के बाद खाड़ी देषों की आयात मांग बढ़ेगी, साथ ही घरेलू मांग भी इलायची में आगामी दिनों ज्यादा आयेगी। ऐसे में इलायची की कीमतों में गिरावट की संभावना नहीं है। उन्होंने बताया कि विष्व बाजार में भारतीय इलायची का भाव 10 से 15.50 डॉलर प्रति किलो है जबकि ग्वाटेमाला की इलायची का भाव 6 से 12 डॉलर प्रति किलो है। उन्होंने बताया कि ग्वाटेमाला में इलायची की नई फसल दिसंबर महीने में आयेगी। ऐसे में आगामी महीनों में भारतीय से इलायची का निर्यात बढ़ने की संभावना है। उन्होंने बताया वित्त वर्ष 2014-15 में देष से 4,000 टन इलायची का निर्यात हुआ था जबकि चालू वित्त वर्ष 2015-16 में निर्यात बढ़कर 5,000 टन होने का अनुमान है।
इलायची व्यापारी अरुण अग्रवाल ने बताया नीलामी केंद्रों पर इलायची की साप्ताहिक आवक बढ़कर 4.5 लाख किलो की हो गई है तथा अगले सप्ताह से दूसरी तुड़ाई षुरु हो जायेगी, जिससे बोल्ड क्वालिटी की इलायची की आवक बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में इलायची की पैदावार बढ़कर 24,000 से 25,000 टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 23,000 टन की पैदावार हुई थी। कुमली मंडी में 8 एमएम इलायची के भाव 930 से 950 रुपये 7 एमएम की इलायची के भाव 800 से 810 रुपये और 6 एमएम इलायची के भाव 590 से 600 रुपये प्रति किलो चल रहे हैं।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार गुरूवार को दो नीलामी केंद्रों पर क्रमषः 41,277 और 27,265 किलो इलायची की आवक हुई तथा इसमें से क्रमषः 40,841 और 26,662 किलो इलायची की नीलामी हो पाई। नीलामी केंद्रों पर इलायची के भाव 640 से 946 रुपये प्रति किलो क्वालिटीनुसार रहे।......आर एस राणा

दलहन, तिलहन के साथ मोटे अनाज की बुवाई बढ़ी, गन्ने की घटी


जुलाई में कम बारिष का असर सोयाबीन, मूंगफली और कपास की फसल पर पड़ने की आषंका
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ सीजन में जून महीने में हुई अच्छी बारिष से खरीफ फसलों खासकर के दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की बुवाई में बढ़ोतरी हुई है, हालांकि गन्ने की बुवाई पिछले साल से पिछड़ रही है। खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्रफल में तो बढ़ोतरी हुई है लेकिन चालू महीने में हुई कम बारिष से कपास, मूंगफली, सोयाबीन और दलहनी फसलों को नुकसान होने की आषंका हैं। खरीफ की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू खरीफ में बढ़कर 132.11 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 126.55 लाख हैक्टेयर में ही रोपाई हुई थी।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में दलहन की बुवाई बढ़कर 55.99 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 23.92 लाख हैक्टेयर में दलहन की बुवाई हुई थी। खरीफ दलहन की प्रमुख फसल अरहर की बुवाई 20.30 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 10.85 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। उड़द की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 13.46 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 3.66 लाख हैक्टेयर में इसकी बुवाई हुई थी। इसी तरह से मूंग की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 15.06 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 5.04 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी।
तिलहनों की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 127.12 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 38.07 लाख हैक्टेयर में हुई थी। खरीफ तिलहन की प्रमुख फसल सोयाबीन की बुवाई बढ़कर 95.65 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई केवल 19.50 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। इसी तरह से मूंगफली की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 24.33 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 15.21 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी।
मोटे अनाजों की बुवाई बढ़कर चालू खरीफ सीजन में 102.35 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले इस समय तक 47.65 लाख हैक्टेयर मेें बुवाई हुई थी। मोटे अनाजों में ज्वार की बुवाई बढ़कर 11.32 लाख हैक्टेयर में और बाजारा की बुवाई 35.63 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है।
चालू सीजन में गन्ने की बुवाई में कमी देखी जा रही है। गन्ने की बुवाई अभी तक देषभर में केवल 44.80 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 46.09 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। कपास की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 93.22 लाख हैक्टेयर में हुई थी जबकि पिछले साल इस समय तक 55.99 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी।......आर एस राणा

16 July 2015

मिलों की मांग बढ़ने से सीसीआई ने बढ़ाई कपास की बिक्री


आर एस राणा
नई दिल्ली। मिलों की अच्छी मांग को देखते हुए काटन कार्पोरेषन आफ इंडिया (सीसीआई) ने कपास की बिक्री बढ़ा दी है। सीसीआई चालू सीजन में ई-निलामी के माध्यम से अभी तक 34 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास की बिक्री कर चुकी है।
सीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मिलों की अच्छी मांग को देखते हुए हमने कपास की बिक्री बढ़ा दी है। घरेलू बाजार में कपास की कीमतों में आई तेजी के कारण हम भी ई-निलामी के माध्यम से भाव बढ़ाकर बिकवाली कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 14 जुलाई को हमनें 88,000 गांठ कपास बेची थी जबकि 15 जुलाई को 93,600 गांठ कपास की बिक्री 32,000 से 35,400 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) की दर से की। निगम ने गुरूवार को एक लाख गांठ कपास की बिक्री के लिए ई-निलामी मांगी हैं।
उन्होंने बताया कि अभी तक हम 34 लाख गांठ कपास की बिक्री कर चुके हैं तथा निर्यात के मुकाबले घरेलू मार्किट में कपास बेचने पर निगम का ज्यादा जोर है। चालू सीजन में सीसीआई ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर देषभर की मंडियों से 87 लाख गांठ कपास की खरीद की थी। उन्होंने बताया कि विष्व बाजार में कपास का भाव 72.5 सेंट प्रति पाउंड चल रहे है तथा चालू कपास सीजन में अभी तक देष से करीब 50 लाख गांठ कपास के निर्यात सौदे हो चुके हैं।
काटन एडवाईजरी बोर्ड (सीएबी) के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में 390 लाख गांठ कपास की पैदावार होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 398 लाख गांठ की पैदावार हुई थी। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में कपास की पैदावार 353.28 लाख गांठ होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 359.02 लाख गांठ की हुई थी।
मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में कपास की बुवाई बढ़कर 87.83 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई 45.10 लाख हैक्टेयर में हुई थी। जानकारों के अनुसार जून महीने में उत्पादक राज्यों में हुई अच्छी बारिष से कपास की बुवाई तो बढ़ी है लेकिन जुलाई महीने में महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्रप्रदेष में कम बारिष होने से फसल को नुकसान होने की आषंका बन गई है।.......
आर एस राणा

15 July 2015

सोयाबीन की दोबारा बुआई की बढ़ी आशंका

स्थानीय मौसम वैज्ञानिकों ने भले ही लंबे समय तक सूखा पडऩे के लिए अलनीनो के प्रभाव से इनकार किया है लेकिन देश में सोयाबीन फसलों की दोबारा बुआई की स्थिति आ रही है। मध्यप्रदेश का मालवा सोया उत्पादन का एक प्रमुख केंद्र है जहां इस साल सामान्य से कम बारिश हुई है। सोपा के पूर्व अध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'अगर कुछ दिनों तक और बारिश नहीं होती है तो दोबारा बुआई करनी पड़ सकती है जो जुलाई के अंत तक जारी रहेगी।'

इंदौर की सोपा (सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया) एक स्वतंत्र एजेंसी है और यह सोयाबीन का सर्वेक्षण करती है। अग्रवाल के मुताबिक अनुमानत: 110 लाख हेक्टेयर रकबा बुआई के मुकाबले 90 फीसदी बुआई पूरी हो गई है। मध्य प्रदेश ने 56.50 लाख हेक्टेयर बुआई का लक्ष्य रखा है। राज्य कृषि विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने बताया, 'राज्य ने 52 लाख हेक्टेयर बुआई पूरी की है।' फिलहाल सोयाबीन पौधे का अंकुरण नजर आ रहा है और फसल की स्थिति अच्छी है। अग्रवाल बताते हैं, 'अगर सूखा पड़ता रहा तो इसका असर फसल पर होगा। हालांकि उम्मीद के मुताबिक ही बुआई के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारत के रकबे में 10 फीसदी की तेजी है।' मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मॉनसून अब हिमालयी तराई क्षेत्रों की ओर बढ़ गया है इसलिए अब मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र में कोई बारिश नहीं होगी। एक स्थानीय मौसम वैज्ञानिक का कहना है, 'इस वक्त कोई अलनीनो प्रभाव नहीं है लेकिन अगस्त के पहले हफ्ते के बाद इसका असर देखा जा सकता है। फिलहाल ऐसा कोई तंत्र नहीं है जो आने वाले दिनों में बारिश का पूर्वानुमान लगा सके। हालांकि मध्य प्रदेश के पूर्वी हिस्से में छिटपुट बारिश हो सकती है।'

उज्जैन, रतलाम, इंदौर और खंडवा जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई है लेकिन बुरहानपुर जिले में काफी कम बारिश हुई है। रीवा, शाजापुर, मंदसौर, बैतूल, अलीराजपुर को छोड़कर सभी जिले में सामान्य से कम बारिश हुई है। पहले राज्य सरकार ने इस साल बुआई में गिरावट का अनुमान लगाया था क्योंकि जिंस की कीमतों में स्थिरता बनी हुई थी लेकिन बुआई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि किसानों ने शायद ही दूसरे फसलों की ओर अपना ज्यादा रुझान दिखाया है। किसानों ने इस साल जून के दूसरे हफ्ते से ही फसल की बुआई शुरू कर दी थी। (BS Hindi)

बिन बारिश सूखने लगी कपास

कपास उत्पादक प्रमुख राज्य महाराष्ट्र और गुजरात के किसानों ने कपास की जमकर बुआई की लेकिन इस महीने अभी तक बारिश न होने से फसल सूखने लगी है। महाराष्ट्र में 90 फीसदी और गुजरात में 85 फीसदी से ज्यादा कपास की बुआई हो चुकी है। इन दोनों राज्यों में एक दो-दिन में नहीं हुई तो दोबारा कपास की बुआई करनी पड़ेगी, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान के साथ ही इसके रकबे में कमी आ सकती है।

इस साल देश में कपास की बुआई सबसे बेहतर नजर आ रही है। कपास उत्पादक सबसे बड़े राज्य महाराष्ट्र में शुरुआती अच्छी बारिश का सबसे ज्यादा फायदा कपास किसानों ने उठाया है। महाराष्ट्र कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार अभी तक राज्य में कपास की बुआई 30 लाख हेक्टेयर के पार पहुंच चुकी है। 11 जुलाई तक के आंकड़ों में महाराष्ट्र में कपास का रकबा 30.37 लाख हेक्टेयर दिखाया जा रहा है, जो खरीफ सीजन में कपास के कुल सामान्य रकबे का 90.4 फीसदी है, जबकि पिछले साल इस समय तक राज्य में महज 12.50 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई थी। राज्य में जुलाई में बारिश न के बराबर होने के कारण फसल सूखने लगी है। सबसे बुरा हाल मराठवाड़ा और विदर्भ का है। विदर्भ के किशोर तिवारी कहते हैं कि यह सही है कि किसानों ने कपास की जमकर बुआई की थी, लेकिन 24 जून के बाद बारिश न होने से बोई गई फसल झुलस गई है, इसलिए अब किसानों को दोबारा बुआई करनी होगी।

देश के दूसरे बड़े कपास उत्पादक राज्य गुजरात में भी जून में हुई अच्छी बारिश से कपास का रकबा बढ़ा है। गुजरात में इस साल अभी तक पिछले साल की अपेक्षा कपास की दोगुनी बुआई हो चुकी है। गुजरात कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 13 जुलाई तक राज्य में करीब 23.20 लाख हेक्टेयर में कपास बोई गई है, जबकि पिछले साल 13 जुलाई तक राज्य में महज 10.20 लाख हेक्टेयर में कपास बोई गई थी। चालू सीजन में गुजरात में कपास का सामान्य रकबा 28 लाख हेक्टेयर के करीब है, लेकिन पिछले साल राज्य में कपास की बुआई 30 लाख हेक्टेयर के पार पहुंच गई थी। गुजरात में सबसे ज्यादा कपास का उत्पादन सौराष्ट्र इलाके में होता है। सौराष्ट्र के कल्पेश भाई कहते हैं कि जो फसल बोई गई थी, उसमें से ज्यादातर झुलस गई है। अब दोबारा फसल की बुआई करनी होगी, जिससे किसानों पर लागत का भार बढ़ेगा और फसल मेंं देरी भी होगी। इससे उत्पादन प्रभावित होगा और किसान मजबूरी में कपास की फसल उजाड़कर दूसरी फसल लगाएंगे। इससे इस साल कपास का रकबा पिछले साल से कम रहने की आशंका है।

कपास की फसल पर संकट का असर बाजार पर भी पडऩा तय माना जा रहा है। कारोबारियों ने कहा कि विदेशी मांग कमजोर होने के साथ देश में कपास का रकबा बढऩे की खबरों से कीमतों पर दबाव था, लेकिन अगर गुजरात और महाराष्ट्र में कपास की फसल सूखी तो कीमतों में मजबूती आने लगेगी। कपास का बाजार इसी सप्ताह तय हो जाएगा। अगर पूरे सप्ताह बारिश नहीं हुई तो कपास में तेजी आने लगेगी। हालांकि बारिश होने पर कीमतें स्थिर रहेंगी। देश भर में कपास की बुआई अच्छी हुई है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों केअनुसार देशभर में 10 जुलाई तक 87.83 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक देश में कपास की बुआई महज 45.10 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई थी। (BS Hindi)

बारिश के मौसम में रुला सकता है प्याज

बीते कुछ दिनों से प्याज के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। मुख्य उत्पादक क्षेत्रों में अब तक हुई कम बारिश से प्याज की बुआई घटने का अंदेशा है। आगे दाम और बढऩे की उम्मीद में स्टॉकिस्ट प्याज की आवक रोक रहे हैं। हालांकि बीते तीन में बड़ी तेजी का फायदा उठाने के लिए उन्होंने आवक बढ़ाई है। जानकारों के मुताबिक प्याज के दाम और बढ़ सकते हैं। हालांकि कीमतों में तेजी बारिश से नई फसल में देरी और फसल को नुकसान पर निर्भर करेगी। केंद्र सरकार ने प्याज कीमतों में तेजी रोकने के लिए पिछले माह प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य 250 डॉलर से बढ़ाकर 425 डॉलर प्रति टन किया था। जिससे निर्यात पर अंकुश के जरिये घरेलू बाजार में आपूर्ति पर्याप्त रखी जा सके।

राष्टï्रीय बागवानी अनुसंधान व विकास प्रतिष्ठïान(एनएचआरडीएफ)से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस सप्ताह महाराष्ट्र की लासलगांव मंडी में प्याज की मॉडल कीमत 1,680 रुपये से बढ़कर 2,025 रुपये, दिल्ली में कीमत 1,545 रुपये से बढ़कर 1,629 रुपये और इंदौर में कीमत 1,375 रुपये से बढ़कर 1,625 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। पिंपलगांव कृषि उपज विपणन समिति के निदेशक अतुल शाह ने बताया मुख्य उत्पादक क्षेत्रों में कम बारिश से खरीफ सत्र में प्याज की बुआई कम हो सकती है। जिससे आने वाले दिनों में प्याज के दाम 3,000 रुपये प्रति क्विंटल तक जा सकते हैं। पहले सरकारी सख्ती से स्टॉकिस्टों को प्याज के दाम गिरने का डर था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। दिल्ली आजादपुर मंडी के प्याज कारोबारी पीएम शर्मा ने बताया कि इस बार किसानों की प्याज की कीमत कम ही मिली है। इसलिए किसान अब मंडियों में कम प्याज ला रहे हैं और आगे हर साल की तरह बारिश से फसल खराब होने का खतरा भी है। इन हालात में आगे प्याज के दाम बढ़ सकते हैं।

उद्योग संगठन एसोचैम ने बरसात के मौसम में प्याज 10-15 फीसदी महंगा होने की संभावना जताई है। एसोचैम ने कहा कि मौजूदा स्तर से प्याज कीमतों में बढ़ोतरी होने का उपभोक्ता कीमत सूचकांक महंगाई पर दबाव पड़ेगा। इससे बचने के लिए एसोचैम ने समय रहते और वास्तविकता के आधार पर फसल और राज्यवार इसकी खपत की पूर्ति का आकलन करने का सुझाव दिया है। सरकार ने स्मॉल फामर्स एग्रीकल्चर बिजनेस कंसोर्टियम,नेफेड के माध्यम से 30,000 टन प्याज का बफर स्टॉक करने का निर्णय लिया है। हालांकि यह मात्रा बहुत कम है। (BS Hindi)

चना की कीमतों में 8 से 10 फीसदी की तेजी आने की संभावना


आस्ट्रेलिया से आयातित चना के भाव बने हुए हैं तेज
आर एस राणा
नई दिल्ली। उत्पादक मंडियों में चना का स्टॉक कम है जबकि आयातित चना की कीमतें उंची बनी हुई है। त्यौहारी सीजन षुरु हो रहा हैं ऐसे में आगामी दिनों मंें चना की कीमतों में 8 से 10 फीसदी की तेजी आने की संभावना है। बुधवार को दिल्ली की लारेंस रोड़ मंडी में चना के भाव 4,500 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे तथा दैनिक आवक 35 ट्रक की हुई।
चना कारोबारी दुर्गा प्रसाद ने बताया कि मिलों के पास चना का स्टॉक कम है जबकि स्टॉकिस्ट नीचे भाव में बिकवाल नहीं है। त्यौहारी सीजन को देखते हुए बेसन के साथ दालों में मांग बढ़ रही है जिससे चना की कीमतों में तेजी बनी हुई है। हालांकि राजस्थान में राज्य सरकार ने दलहन पर स्टॉक लिमिट लगा रखी है लेकिन इसके बावजूद भी चना की कीमतों में तेजी ही आई है। उन्होंने बताया कि चालू फसल सीजन में चना का उत्पादन सरकारी अनुमान से काफी कम हुआ है जिसकी वजह से कुल उपलब्धता मांग के मुकाबले कम है।
चना के थोक व्यापारी संतोष उपाध्याय ने बताया कि आस्ट्रेलिया से आयातित चना के भाव मुंबई पहुंच 4,550 से 4,600 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं तथा सप्ताहभर में इनकी कीमतों में करीब 150 से 200 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। उन्होंने बताया कि चना का आयात सीतिम मात्रा में ही हो सकता है तथा आयात पड़ता महंगा होने से घरेलू बाजार में चने की कीमतों में आगामी दिनों में तेजी की संभावना है। वित्त वर्ष 2014-15 में देष में 4.18 लाख टन चना का आयात हुआ था।
चना व्यापारी राधाकिषन गुप्ता ने बताया कि इंदौर मंडी में चना के भाव 4,200 रुपये तथा कांटेवाला चना के भाव 4,450 रुपये प्रति क्विंटल रहे। महाराष्ट्र की अकोला मंडी में चना के भाव 4,450 से 4,520 रुपये तथा राजस्थान की जयपुर मंडी में 4,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल वर्ष 2014-15 में चना की पैदावार घटकर 75.9 लाख टन होने का अनुमान है। पिछले साल इसकी रिकार्ड पैदावार 95.3 लाख टन की हुई थी। जानकारों के अनुसार बेमौसम बारिष और ओलावृष्टि से चना की फसल को काफी नुकसान हुआ था इसलिए उत्पादन सरकारी अनुमान से कम रहने की संभावना है।......आर एस राणा

जून महीने में खाद्य एवं अखाद्य तेलों के आयात में 15 फीसदी की बढ़ोतरी

आर एस राणा
नई दिल्ली। जून महीने में देष में खाद्य एवं अखाद्य तेलोें के आयात में 15 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल आयात 1,016,297 टन का हुआ है जबकि चालू तेल वर्ष 2014-15 (नवंबर से अक्टूबर) में नवंबर से जून के दौरान 8,849,821 टन खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात हो चुका है जोकि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 25 फीसदी ज्यादा है।
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएषन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार जून महीने में देष में 1,013,998 टन खाद्य तेलों का आयात हुआ है जबकि 2,299 टन अखाद्य तेलों का आयात हुआ है। पिछले साल जून महीने में 860,736 टन खाद्य तेलों का आयात हुआ था जबकि 22,943 टन अखाद्य तेलों का आयात हुआ था।
एसईए के अनुसार चालू तेल वर्ष 2014-15 के पहले नो महीनों नवंबर-14 से जून-15 के दौरान 8,722,274 टन खाद्य तेलों का आयात हुआ है जबकि 127,547 टन अखाद्य तेलों का आयात हुआ है। पिछले साल की समान अवधि में 6,955,832 टन खाद्य तेलों का आयात हुआ था तथा 126,388 टन अखाद्य तेलों का आयात हुआ था।
एसईए के मुताबिक आरबीडी पॉमोलीन का भाव भारतीय बंदरगाह पर 674 डॉलर प्रति टन है जबकि मई महीने में इसका भाव 667 डॉलर प्रति टन था। इसी तरह से क्रूड पॉम तेल का भाव इस दौरान 647 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 653 डॉलर प्रति टन हो गया। क्रूड सोयाबीन तेल का भाव मई में 788 डॉलर प्रति टन था जोकि जून में 785 डॉलर प्रति टन रह गया।

14 July 2015

Cotton Output Likely To Be Around 377 Lakh Bales: USDA

Cotton output in India is likely to be around 6.423 million tones (377.8 lakh bales of 170 kg each.) in the season 2015-16, same as the output of season 2014-15, according to USDA. The country is likely to export 1.023 million tones (60.17 lakh bales of 170 kg each.) of cotton in 2015-16, around 17.45% higher when compared to export in season 2014-15 which was 0.871 million tones (51.23 lakh bales of 170 kg each), said USDA.

85% Cotton Planting Completed In Gujarat

Around 85.08% of the cotton sowing has been completed in Gujarat, according to State Agriculture Department. Area sown under cotton as on 13 July 2015 stood 23.19 lakh hectares in Gujarat against the total normal area of 27.26 lakh hectares and previous year as on date area of 10.19 lakh hectares.

दार्जिलिंग पर भारी नेपाली चाय

धूप, बारिश, ऊंचाई और बर्फ से ढके हिमालय की धुंध की सही खुराक  और तालमेल के बाद ही विश्व प्रसिद्घ दार्जिलिंग चाय तैयार होती है। लेकिन क्या हो अगर आपका प्रतिद्वंद्वी भी इन्हीं सब खूबियों का फायदा उठाना शुरू कर दे? दार्जिलिंंग से सटा नेपाल पहले ही मुश्किलों से जूझ रहे यहां के दिग्गज चाय उत्पादकों को अब कड़ी चुनौती दे रहा है। गुडरिक के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी ए एन सिंह कहते हैं, 'दार्जिलिंग चाय की स्थिति बहुत ही खराब है। निर्यात में गिरावट आई है और देसी बाजार में भी टाटा व एचयूएल अब दार्जिलिंग चाय पर बहुत निर्भर नहीं रह गए हैं क्योंकि नेपाल से चाय भारत में आ रही है। इस स्थिति में अब दार्जिलिंग चाय की मांग बहुत घट गई है।'

चाय की मांग बाजार में कैसी है, इसका अंदाजा काफी हद तक नीलामी के भाव से भी मिल जाता है। जून के अंत तक दार्जिलिंग चाय के दाम घटकर 350.86 रुपये प्रति किलोग्राम हो गए, जो पिछले साल की समान अवधि में 373.66 रुपये प्रति किलोग्राम थे। डंकन के एक वरिष्ठï अधिकारी ने बताया, 'टाटा ग्लोबल बेवरिजेस ने दार्जिलिंग चाय का उपयोग घटाकर एक-चौथाई कर दिया है। एचयूएल कभी भी दार्जिलिंग चाय की बहुत बड़ी खरीदार नहीं रही है, लेकिन उसने भी इस चाय की खरीद घटाकर आधी कर दी है।'

हालांकि टाटा ग्लोबल बेवरिजेस के प्रवक्ता कहते हैं कि वह दार्जिलिंग चाय की सबसे बड़ी खरीदार है। कंपनी दार्जिलिंग चाय की खरीद अपने टाटा टी गोल्ड ब्लेंड के लिए करती है। प्रवक्ता ने बताया, 'हम उद्योग की मदद कर रहे हैं और पिछले पांच साल के दौरान दार्जिलिंग से की गई हमारी चाय खरीद लगभग बराबर रही है।' चाय नीलाम करने वाली सबसे बड़ी और पुरानी कंपनी जे थॉमस ऐंड कंपनी के अनुसार कंपनियों की जरूरत के अनुसार ही उनकी ओर से मांग बढ़ती और घटती रहती है। जे थॉमस ऐंड कंपनी के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक कृष्ण कत्याल कहते हैं, 'यह सिर्फ चाय के मूल तक ही सीमित नहीं होता है।' इसके अतिरिक्त खरीदार भी नीलामी से दूर रहकर निजी स्तर पर चाय खरीद सकते हैं। आखिरकार ऐसी क्या बात है कि बेहद उत्कृष्टï मानी जाने वाली दार्जिलिंग चाय की जगह अब नेपाल से आने वाली सस्ती चाय ले रही है?
.
नेपाल इस क्षेत्र में कदम रखने वाला नया देश है। वहां की मिट्टïी का बहुत अधिक दोहन नहीं हुआ है और पौधे भी युवा हैं। कत्याल बताते हैं, 'नेपाल और यहां के मौसम में बहुत अंतर नहीं है और युवा पौधों का अपना फायदा होता है। पहली बात, उनके पत्तों में चमक होती है। लेकिन दार्जिलिंग चाय एक नस्ल है और जब चाय की पत्तियां तोड़ी जाती हैं, तो इसकी गुणवत्ता बेजोड़ होती है।'  (BS Hindi)

जीएम फसलों के परीक्षण पर रोक

विभिन्न संगठनों, खासकर आरएसएस परिवार से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) और भारतीय किसान संघ (बीकेएस) की ओर से हो रहे विरोध को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने धान,चना, मक्का, बैंगन और कपास की जीन संवर्धित (जीएम) फसलों के परीक्षण पर रोक लगा दी है। सरकार ने इन फसलों को लेकर विभिन्न हिस्सेदारों की ओर से हो रही आपत्तियों और प्रतिक्रियाओं को परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोडकर की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति को सौंप दिया है। समिति की बैठक 15 जुलाई को होगी और उसके बाद अपनी सिफारिशें देगी। सरकार इस समय राज्य के कुछ जिलों में सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए जूझ रही है, ऐसे में वह किसी भी हाल में काकोदकर समिति की रिपोर्ट आने के पहले परीक्षण की अनुमति देने की जल्दबाजी में नहीं है।

पिछले साल 31 अक्टूबर में सत्ता संभालने के बाद नई सरकार ने इस संबंध में कांग्रेस- राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) सरकार की नीति को जारी रखा। यह परीक्षण एक हेक्टेयर या उससे भी छोटे रकबे में होते हैं, जिससे प्राथमिक रूप से जीएम फसलों के जैव सुरक्षा प्रभाव की क्षमता के आंकड़े जुटाए जाते हैं। दिलचस्प है कि भाजपा के सहयोगी संगठन स्वाभिमानी शेतकरी संघटना के प्रमुख और सांसद राजू शेट्टी और राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने जीएम फसलों के परीक्षण का पूर्ण समर्थन किया है।

काकोडकर ने जीएम फसलों के परीक्षण पर रोक लगाए जाने की पुष्टि की है। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'महाराष्ट्र सरकार को विभिन्न हिस्सेदारों की ओर से प्रतिक्रिया मिली है। सरकार ने यह सूचना समिति को सौंपी है, जो आगे इस मामले को देखेगी। समिति की बैठक जल्द होगी।' एक सरकारी अधिकारी ने भी इस बात की पुष्टि की कि 18 विभिन्न जीएम फसलों के खेत में परीक्षण पर रोक लगा दी गई है और समिति के फैसले के बाद ही परीक्षण के बारे में फैसला होगा।

एसजेएम के सदस्य अनिल गाचके ने कहा कि जीएम बीजों का दोबारा इस्तेमाल नहीं हो सकता, ऐसी स्थिति में किसानों को उसे हर साल खरीदना होगा, जिस पर ज्यादा धन खर्च होगा। उन्होंने कहा, 'जीएम फसलों के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है। साथ ही बीटी बीजों की कीट प्रतिरोधक क्षमता 3-4 साल में नष्ट हो जाती है, जिससे ज्यादा उर्वरक और कीटनाशकों की जरूरत पड़ती है।' बीकेएस के संगठन सचिव दिनेश कुलकर्णी ने कहा, 'बीकेएस नई तकनीक का विरोध नहीं करता। लेकिन संगठन का मानना है कि ऐसे परीक्षण पहले प्रयोगशालाओं में पारदर्शी तरीके से होने चाहिए। इसका मानव, पर्यावरण व पशुओं पर प्रभाव को लेकर भी परीक्षण होना चाहिए।' (BS Hindi)

रुठे बादलों से निपटने की तैयारी में सरकार

राज्य में खरीफ फसल बुआई के आंकड़े पिछले साल से भले ही लाख बेहतर नजर आ रहे हैं लेकिन मॉनसून का बदला मिजाज किसान और सरकार दोनों की नींद हराम कर दी है। पिछले साल इस समय तक 18 फीसदी फसलों की बुआई हुई थी जबकि इस बार अभी तक 61 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र में फसलों की बुआई हो चुकी है लेकिन बारिश नहीं होने के कारण फसल सूखने का संकट मंडराने लगा है।

ऐसी स्थिति से निपटने के लिए सरकार जमीन और आसमान दोनों तरफ से मदद करने की तैयारी शुरु कर दी है। महाराष्ट्र कृषि विभाग के अनुसार 11 जुलाई तक 89.25 लाख हेक्टेयर में फसलों की बुआई हो चुकी है जो खरीफ सीजन के कुल सामान्य रकबा 145.35 लाख हेक्टेयर का 61.4 फीसदी है। मोटे अनाज की बुआई 28.9 फीसदी, दलहन की बुआई 55.2 फीसदी, गन्ना 37.8 फीसदी, तिलहन 88.7 फीसदी और कपास फसलों की बुआई 90.4 फीसदी हो चुकी है। जबकि पिछले साल सामान्य अवधि में मोटे अनाजों की बुआई 8.8 फीसदी, दलहन की बुआई 10 फीसदी, गन्ना 25.8 फीसदी, तिलहन की बुआई 14.5 फीसदी और कपास फसलों की बुआई 24.3 फीसदी हुई थी।

पिछले साल इस समय तक राज्य में कुल 26.14 लाख हेक्टेयर में फसलों की बुआई हुई थी जो कुल खरीफ सीजन की फसल रकबे का महज 18 फीसदी था। बुआई के बेहतर आंकड़ों के बावजूद किसान और सरकार दोनों की नींद उड़ गई है क्योंकि शुरुआती दौर में अच्छी बारिश के बाद मॉनसून नादरत हैं। राज्य में बारिश हुए करीब एक महीना बीत गया है। अच्छी बारिश की वजह से किसानों ने फसलों की बुआई तो कर दी लेकिन अब डर सताने लगा है कि कुछ दिन बारिश और नहीं हुई तो पूरी फसल सूख जाएंगी, ऐसे में जो बीज और खाद किसानों ने खेतों में डाला है वह सब खराब हो जाएगा। इसके बाद बारिश होती भी है तो किसानों को दोबारा बुआई करनी पड़ेगी। फसल सूखने के डर से किसान भयभीत है। किसानों के भय को विपक्ष राजनीतिक रंग देने की कोशिश में लगे हैं। इसकी झलक सोमवार से शुरू हुए विधानसभा सत्र में देखने को मिलेगी। विपक्ष सरकार के ऊपर आक्रमक हमला बोलने की तैयारी में है जिसमें किसानों की आत्महत्या, कर्ज माफी और राज्य में सूखे की स्थिति शामिल है।

 विपक्ष के आक्रामक तेवरों का जवाब देने के लिए सरकार भी कमर कस चुकी है। इसीलिए बारिश कम होने या राज्य में सूखे की स्थिति में सरकार आपात योजना बनाने की तैयारी में जुट गई है। बतौर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अगर दो-चार दिनों में बारिश नहीं होने पर राज्य भर में 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दोबारा बुआई के लिए किसानों को बीज और खाद उपलब्ध कराने की आपात योजना बनाई है। लेकिन किसानों का पूरा कर्ज माफ नहीं किया जाएगा क्योंकि इसका फायदा किसानों को नहीं बैंकों को होगा। किसानों के कर्ज की 25 फीसदी रकम भी आगर कृषि निवेश के रूप में लगा दी जाए तो इसका फायदा किसानों को होगा। किसानों को कर्ज उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने नाबार्ड के साथ करार किया है इसके तहत सरकार नाबार्ड को 500 करोड़ रुपये की गारंटी देगी। सूखे की स्थिति से निपटने के लिए सरकार कृत्रिम बारिश की भी योजना तैयार कर चुकी है। मुख्यमंत्री के अनुसार अगर मॉनसून इस सप्ताह सक्रिय नहीं होता है तो अगस्त के पहले सप्ताह में सरकार कृत्रिम बारिश का प्रयोग करेगी। (BS Hindi)

गेहूं की सरकारी खरीद 280 लाख टन के पार


भारतीय खाद्य निगम ने गेहूं की खरीद बंद की
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू रबी विपणन सीजन 2015-16 में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 280.87 लाख टन गेहूं की खरीद की है जोकि पिछले साल की तुलना में ज्यादा है। सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं की आवक नहीं हो रही है जिसकी वजह से एफसीआई ने चालू रबी विपणन सीजन में खरीद बंद कर दी है।
एफसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू रबी विपणन सीजन में एमएसपी पर 280.87 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है जबकि पिछले रबी विपणन सीजन में निगम ने 280.23 लाख टन गेहूं की खरीद की थी। अभी तक हुई कुल खरीद में पंजाब की हिस्सेदारी 103.43 लाख टन, हरियाणा की 67.77 लाख टन, उत्तर प्रदेष की 22.67 लाख टन और मध्य प्रदेष की 73.09 लाख टन है। राजस्थान से चालू रबी विपणन सीजन में 13 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है।
उन्होंने बताया कि सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं की आवक समाप्त हो गई है इसलिए निगम ने खरीद बंद कर दी है।.......आर एस राणा

उत्पादक राज्यों में बारिष की कमी से हल्दी में तेजी की संभावना


निर्यातकों के साथ घरेलू मसाला कंपनियों की आगामी दिनों में बढ़ेगी मांग
आर एस राणा
नई दिल्ली। जून महीने में हल्दी के प्रमुख उत्पादक राज्यों में हुई अच्छी बारिष से बुवाई तो पिछले साल की तुलना में बढ़ी है लेकिन पिछले पंद्रह-बीस दिनों से बारिष नहीं होने के कारण स्टॉकिस्टों की खरीद हल्दी में बढ़ गई है। इसीलिए सप्ताहभर में उत्पादक मंडियो में हल्दी की कीमतों में 300 से 400 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। रमजान का महीना समाप्त होने के बाद खाड़ी देषों की आयात मांग तो बढ़ेगी ही, साथ में घरेलू मसाला कंपनियों की मांग भी तेजी आयेगी।
हल्दी कारोबारी पूनम चंद गुप्ता ने बताया कि हल्दी में घरेलू मसाला कंपनियों की मांग बढ़ी हुई है जिससे कीमतों में तेजी देखी जा रही है। निजामाबाद मंडी में मंगलवार को हल्दी के भाव बढ़कर 7,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए जबकि इरोड़ मंडी में भाव बढ़कर 7,800 से 7,900 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। इरोड़ में हल्दी की दैनिक आवक 4,000 बोरी (एक बोरी-70 किलो) की हो रही है जबकि दैनिक सौदे 4,500 से 5,000 बोरियों के हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि रमजान के बाद खाड़ी देषों की आयात मांग बढ़ने की संभावना है, जिससे भाव में तेजी बनी रह सकती है।
हल्दी व्यापारी एस सी गुप्ता ने बताया कि जून महीने में हल्दी के उत्पादक राज्यों में अच्छी बारिष हुई थी जिसकी वजह से हल्दी की बुवाई पिछले साल की तुलना में ज्यादा हुई है लेकिन उत्पादक राज्यों में पिछले पंद्रह-बीस दिनों से बारिष नहीं हुई है जबकि इस समय फसल को एक पानी की सख्त जरुरत है। ऐसे में हल्दी की कीमतों में तेजी-मंदी काफी हद तक बारिष पर निर्भर करेगी। अगर सप्ताहभर में उत्पादक क्षे़त्रों में अच्छी बारिष नहीं हुई तो फिर कीमतों में 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी और भी आ सकती है, हॉ अगर इस दौरान एक-दो अच्छी बारिष हो गई तो फिर कीमतों में गिरावट भी आ सकती है। उन्होंने बताया कि हल्दी की उपलब्धता है तथा आगामी दिनों में निर्यात मांग जरुर बढ़ेगी जिससे अच्छी गुणवत्ता की हल्दी में मांग अच्छी रहेगी।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित वर्ष 2014-15 के दौरान हल्दी का निर्यात बढ़कर 86,000 टन का हुआ है जबकि वित वर्ष 2013-14 में इसका निर्यात 77,500 टन का हुआ था। मसाला बोर्ड ने वित वर्ष 2014-15 में हल्दी के निर्यात का लक्ष्य 80,000 टन का रखा था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हल्दी का भाव 3.53 डॉलर प्रति किलो है जबकि पिछले साल की समान अवधि में भी विष्व बाजार यही भाव थे।.......आर एस राणा

13 July 2015

स्टॉक कम होने के बावजूद भी गुड़ की कीमतों में तेजी की संभावना नहीं


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू सीजन में प्रमुख उत्पादक मंडी मुज्जफरगनर में गुड़ का स्टॉक 8.73 लाख कट्टो (एक कट्टा-40 किलो) का ही हुआ है जोकि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 2 लाख कट्टे कम है। इसके बावजूद भी चीनी के दाम कम होने के कारण गुड़ की कीमतों में तेजी की संभावना नहीं है।
फैडरेशन आफ गुड़ ट्रेडर्स के अध्यक्ष अरुण खंडेलवाल ने बताया कि चालू सीजन में प्रमुख उत्पादक मंडी में मुज्जफरनगर में केवल 8.73 लाख कट्टों का ही गुड़ का स्टॉक हो पाया है जोकि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 2 लाख कट्टे कम है। स्टॉक कम होने के बावजूद भी खपत राज्यों की मांग कमजोर होने से गुड़ की कीमतों में गिरावट बनी हुई है। पिछले सप्ताह मंडियों में गुड़ की कीमतों में करीब 50 से 60 रुपये प्रति 40 किलो की गिरावट दर्ज की गई। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में चीनी के भाव काफी नीचे बने हुए हैं तथा चीनी की कीमतों में अभी तेजी की संभावना भी नहीं है। ऐसे में गुड़ की कीमतों में भी तेजी की उम्मीद नहीं है। सोमवार को मुज्जफरनगर मंडी में गुड़ चाकू के भाव 980 से 1,040 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
गुड़ कारोबारी देशराज ने बताया कि महाराष्ट्र के पूना लाईन में नए गुड़ की आवक शुरु हो गई है साथ ही, मध्य प्रदेश में भी नए गुड़ की आवक हो रही है। यही कारण है कि गुड़ में मांग कमजोर बनी हुई है। मुज्जफरनगर मंडी में गुड़ के भाव 2,400 से 2,600 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे है जबकि उत्तर प्रदेश में चीनी के एक्स फैक्ट्री भाव 2,200 से 2,300 रुपये प्रति क्विंटल है।......आर एस राणा

बासमती चावल के निर्यात में 25 फीसदी की बढ़ोतरी


चालू वित्त वर्ष में बासमती चावल का निर्यात 10 फीसदी बढ़ने का अनुमान
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल से मई के दौरान देश से बासमती चावल के निर्यात में 25 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 7.8 लाख टन का हो चुका है। हालांकि मूल्य के हिसाब से बासमती चावल के निर्यात में इस दौरान 13 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। चालू वित्त वर्ष में देश से बासमती चावल के निर्यात में कुल 10 फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
एपीडा के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई के दौरान बासमती चावल के निर्यात में 25 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 7.8 लाख टन का हुआ है जबकि वित्त वर्ष 2014-15 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में देश से 6.22 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था। एपीडा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों में निर्यात में बढ़ोतरी का प्रमुख कारण घरेलू बाजार में बासमती चावल की कीमतें कम होना भी है। फसल सीजन 2014-15 में देश में बासमती चावल की पैदावार ज्यादा हुई थी जिसकी वजह से घरेलू बाजार में भाव कम रहे। उन्होंने बताया कि बासमती चावल की पैदावार बढ़कर इस दौरान 80 लाख टन की हुई जबकि इसके पिछले साल पैदावार 67 लाख टन की हुई थी। हालांकि निर्यातकों की मांग बढ़ने से चालू महीने में घरेलू मंडियों में बासमती चावल की कीमतों में तेजी आई है। उत्पादक मंडियों में पूसा-1,121 बासमती चावल सेला की कीमतें बढ़कर 4,400 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गई।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के अप्रैल-मई में मूल्य के हिसाब से 12.79 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 4,650.07 करोड़ रुपये का ही हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 5,331.93 करोड़ रुपये मूल्य का निर्यात हुआ था।
एपीडा के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 में देश से कुल 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था जबकि इसके पिछले वित्त वर्ष 2013-14 में देश से कुल 37.5 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था।
बासमती चावल में इस समय निर्यात मांग अच्छी अच्छी होने से मंडियों में बासमती धान की कीमतों में तेजी आई है। हरियाणा की करनाल मंडी में पूसा 1,121 बासमती धान के भाव 2,400 रुपये और नरेला मंडी में 2,300 से 2,350 रुपये प्रति क्विंटल रहे। बासमती धान की कीमतों में सप्ताहभर में करीब 100 से 150 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आई है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में धान की रोपाई 89.49 लाख हैक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इसकी बुवाई 94.73 लाख हैक्टेयर में हुई थी।.....आर एस राणा

10 July 2015

दलहन, तिलहन और कपास की बुवाई में भारी बढ़ोतरी


धान की रोपाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ी
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ में जून महीने में हुई अच्छी बारिष से दलहन, तिलहन के साथ ही कपास की बुवाई में भारी बढ़ोतरी हुई है। हालांकि धान की रोपाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ी र्है। चालू खरीफ में अभी तक देषभर में 445.11 लाख हैक्टेयर में फसलों की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 275.10 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में दलहन की बुवाई बढ़कर 32.61 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 22.71 लाख हैक्टेयर में इनकी बुवाई हुई थी। खरीफ दलहन की प्रमुख फसल अरहर की बुवाई 13.77 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 5.25 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी। इसी तरह से उड़द की बुवाई बढ़कर 8.24 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 2.26 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। मूंग की बुवाई चालू खरीफ में 7.64 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 3.44 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।
तिलहनों की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 101.26 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 22.24 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी। खरीफ तिलहन की प्रमुख फसल सोयाबीन की बुवाई बढ़कर 75.39 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 7.90 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी। इसी तरह से मूंगफली की बुवाई बढ़कर चालू खरीफ में 21.65 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक मूंगफली की बुवाई 11.69 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
मोटे अनाजों की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 81.80 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में मोटे अनाजों की बुवाई 38.36 लाख हैक्टेयर में हुई थी। धान की रोपाई चालू खरीफ में 89.49 लाख हैक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 94.73 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी।
कपास की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 87.83 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 45.10 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। गन्ने की बुवाई चालू खरीफ में 44.29 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 43.92 लाख हैक्टेयर में गन्ने की बुवाई हो चुकी थी।.......आर एस राणा

Brazil Completes Coffee Harvesting About 52%-Safras




Farmers have completed around 21.9%of  coffee harvesting in the region of  cooperative Cooxupe as of July 3,2015 which is below than 42.5% of last year record during the same period of time. In 2013, it was harvested around 31.5% during the corresponding period of time. As whole harvesting of Brazil have been completed around 52% of the estimated 50.4 million bags crop as on 7th July 2015 which less than 55% of previous year harvesting pace as southeast coffee belt of Brazil has been wet in early July 2015. On the other hand, total sales is recorded at 27% of harvested crop of this season.

Malaysia's Palm Oil Ending Stocks Lower By 4.33 Percent In June: MPOB




Malaysia's Palm oil ending stocks for June 2015 was at 2,151,287 tons (2,248,577 tons), down 4.33 percent from May 2015. Trade estimates estimated Malaysia’s Palm Oil ending stocks at 2.12 million tons. Production for June was at 1,763,928 tons (1,810,709 tons), down by 2.58 percent from May 2015. Exports were higher by 5.19 percent at 1,697,256 tons (1,613,566 tons). Imports were higher by 8.40 percent at 79,396 tons (73,241 tons). Values in brackets are figures of May 2015.

GASC Buys 1.8 Lakh Tonne Russian Wheat At $212.26 Per T




Egypt's state grain buyer-GASC has bought 1.8  lakh tonne of Russian and Ukrainian wheat in a tender for Aug. 11-20  shipment.It bought 60,000 tonnes of Russian wheat from Cargill, another 60,000 tonnes of Russian wheat from Olam and 60,000 tonnes of Ukrainian wheat from Olam.
 
It has bought wheat at an average price of $212.26 a tonne cost and freight,  60,000 tonnes of Russian wheat from Cargill at $202 a tonne on a free-on-board (fob) basis and $10 a tonne freight from  National Navigation 60,000 tonnes of Russian wheat from Olam at $202.40 a tonne fob and $10 a tonne freight from National Navigation 60,000 tonnes of Ukrainian wheat from Olam at $200.50 a tonne fob and $11.88 a tonne freight from National  Navigation-Reuters

खाद्य तेल पर आयात शुल्क बढ़ाने की मांग

सोयाबीन प्रसंस्करण इकाइयों के एक प्रमुख मंच ने सरकार से मांग की है कि वह खाद्य तेल के आयात शुल्क को बढ़ाकर घरेलू किसानों और तेल प्रसंस्करण इकाइयों के हितों की रक्षा करे। इंदौर स्थित सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के चेयरमैन डेविश जैन ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को हाल में इस संबंध में पत्र भेजा है। संगठन ने मांग की है कि कच्चे खाद्य तेल पर आयात शुल्क 7.5 फीसदी से बढ़ाकर 25 प्रतिशत और रिफाइंड खाद्य तेल पर आयात शुल्क को 15 फीसद से बढ़ाकर 30 प्रतिशत किया जाए। उन्होंने कहा, 'भारत हर साल करीब 1.10 करोड़ टन खाद्य तेल आयात कर रहा है। इससे न केवल देश का कारोबारी संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि प्रसंस्करणकर्ताओं और किसानों के हित भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।' (BS Hindi)

मूंगफली दाने के निर्यात में कमी के बावजूद भी कीमतों में तेजी का रुख


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में मूंगफली दाने का निर्यात घटकर 89,023 टन का ही हुआ है, इसके बावजूद भी उत्पादक मंडियों में भाव तेज बने हुए हैं। षुक्रवार को राजकोट मंडी में मूंगफली के भाव बढ़कर 4,800 से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।
मूंगफली के थोक कारोबारी समीर भाई षाह ने बताया कि उत्पादक मंडियों में मूंगफली की दैनिक आवक काफी कम हो गई है जबकि उत्पादक राज्यों गुजरात और राजस्थान में चालू महीने में अच्छी बारिष नहीं हुई है। चालू महीने में होने वाली मानसूनी बारिष खरीफ में मूंगफली की पैदावार तय करेगी। वैसे भी पिछले साल खरीफ में सीजन में मूंगफली की पैदावार में भारी गिरावट आई थी। यहीं कारण है कि इस समय मूंगफली में मिलों की मांग अच्छी बनी हुई है जिससे भाव तेज चल रहे है।
एपीडा के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में मूंगफली दाने का निर्यात घटकर 89,023 टन का ही हुआ है जबकि वित्त वर्ष 2014-15 के पहले दो महीनों में 1,03,827 टन का निर्यात हुआ था। मूंगफली व्यापारी दया लाल ने बताया कि पिछले साल खरीफ के साथ रबी सीजन में भी मूंगफली की पैदावार में कमी आई थी जिसकी वजह से इस समय उत्पादक मंडियों में आवक कम है जबकि इस समय मूंगफली तेल में मांग अच्छी बनी हुई। मूंगफली तेल के भाव बढ़कर राजकोट में 1,100 रुपये प्रति 10 किलो हो गए।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में मूंगफली की पैदावार घटकर 66.48 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 97.14 लाख टन की हुई थी। खरीफ 2014-15 में मूंगफली की पैदावार 50.57 लाख टन की हुई थी जबकि इसके पिछले साल खरीफ में 80.58 लाख टन की पैदावार हुई थी। रबी में भी पैदावार 15.91 लाख टन की ही हुई थी जबकि पिछले साल रबी सीजन में 16.56 लाख टन मूंगफली का उत्पादन हुआ था।......आर एस राणा

09 July 2015

चालू महीने में बारिष नहीं होने से सोयाबीन की फसल को नुकसान की आषंका


जून महीन में हुई अच्छी बारिष से 90 फीसदी क्षेत्रफल में हो चुकी है बुवाई
आर एस राणा
नई दिल्ली। सोयाबीन के प्रमुख उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेष, महाराष्ट्र और गुजरात में जून महीने में हुई अच्छी बारिष से 90 फीसदी क्षेत्रफल में बुवाई पूरी हो चुकी है लेकिन पिछले आठ-दस दिनों से उत्पादक राज्यों में बारिष नहीं होने से फसल को नुकसान होने की आषंका बनी हुई है। हालांकि मध्य प्रदेष के ग्वालियर जिले में गुरुवार को बारिष हुई लेकिन अन्य जिलों में अभी भी बारिष नहीं हुई है।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएषन आफ इंडिया (सोपा) के अध्यक्ष डेविष जैन ने बताया कि प्रमुख उत्पादक राज्यों में जून महीने में अच्छी बारिष हुई थी जिससे सोयाबीन की बुवाई करीब 90 फीसदी क्षेत्रफल में पूरी हो चुकी है। चालू महीने में अभी तक उत्पादक राज्यों में बारिष नहीं हुई है तथा आगामी पांच-सात दिनों में बारिष नहीं हुई तो फिर फसल को नुकसान होने की आषंका है। चालू महीने के मध्य पखवाड़े तक बारिष नहीं हुई तो फिर पांच से सात फीसदी क्षेत्रफल में सोयाबीन की बुवाई दोबारा करनी पड़ सकती है। उन्होंने बताया कि चालू महीने में अगर अच्छी बारिष हुई तो फिर सोयाबीन की बुवाई पिछले साल के 110 लाख हैक्टेयर से बढ़कर 118 लाख हैक्टेयर में होने का अनुमान है।
सोयाबीन के व्यापारी राजेष अग्रवाल ने बताया कि विष्व बाजार में दाम कम होने के कारण भारत से सोया खली की मांग काफी कमजोर बनी हुई है। विष्व बाजार में ब्राजील, अर्जेटीना और अमेरिका की सोया खली की उपलब्धता ज्यादा है जिससे विष्व बाजार में दाम नीचे बने हुए हैं। उन्होंने बताया कि घरेलू बाजार में सोया खली के भाव 30,500 से 31,000 रुपये प्रति टन चल रहे हैं। उत्पादक मंडियों में सोयाबीन के भाव 3,250 रुपये तथा प्लांट डिलीवरी भाव 3,350 से 3,400 रुपये प्रति क्विंटल हैं। सोया रिफाइंड तेल का भाव इंदौर में 590 रुपये प्रति 10 किलो है।
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएषन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान देष से केवल 34,161 टन सोया खली का ही निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 1,00,746 टन सोया खली का निर्यात हुआ था। भारतीय बंदरगाह पर सोया खली के भाव जून में घटकर 553 डॉलर प्रति टन रह गए, जबकि मई महीने में इसके भाव 592 डॉलर प्रति टन थे।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में देष में सोयाबीन की पैदावार घटकर 107.05 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 118.61 लाख टन की हुई थी।....आर एस राणा

केस्टर तेल का निर्यात बढ़ने के बावजूद कीमतों में आई गिरावट


जुलाई मध्य के बाद केस्टर सीड की नई फसल की बुवाई होगी षुरु
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में केस्टर तेल का निर्यात बढ़कर 90,396 टन का हुआ है। हालांकि ग्रीस संकट के कारण चीन के आयात सौदे चालू सप्ताह में कम हुए हैं जिससे उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की कीमतें घट हैं। गुरूवार को उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड के भाव 3,875 से 3,900 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
केस्टर तेल के निर्यातक कुषल राज पारिख ने बताया कि ग्रीस संकट का असर केस्टर तेल के आयात सौदों पर पड़ा है। उन्होंने बताया कि केस्टर तेल का सबसे बड़ा आयातक देष चीन है तथा चालू सप्ताह में इसके सौदे कम हुए है लेकिन उम्मीद है कि चालू महीने में केस्टर तेल का कुल निर्यात पिछले साल के जुलाई महीने के बराबर ही होगा। उन्होंने बताया कि ग्रीस संकट का असर देष से केस्टर तेल के कुल निर्यात पर नहीं पड़ेगा तथा पिछले साल देष से कुल 4.59 लाख टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था जबकि चालू वित्त वर्ष में इसमें पांच से सात फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। केस्टर तेल के निर्यात सौदे इस समय 1,280 डॉलर प्रति टन की दर से हो रहे हैं।
केस्टर कारोबारी प्रकाष भाई ने बताया कि उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की दैनिक आवक घटकर 30 से 35 हजार बोरी (एक बोरी-75 किलो) की रह गई है लेकिन मिलों की मांग कम होने से भाव में गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि जून महीने में उत्पादक राज्यों में अच्छी बारिष हुई थी लेकिन केस्टर सीड की बुवाई 15 जुलाई के बाद षुरु होगी, ऐसे में चालू महीने में होने वाली बारिष केस्टर सीड की फसल के लिए अहम है। पिछले आठ-दस दिनों से उत्पादक राज्यों में बारिष नहीं हुई है ऐसे में उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की मौजूदा कीमतों में और गिरावट की संभावना नहीं है।
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएषन आफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले दो महीनों अप्रैल-मई में केस्टर तेल का निर्यात बढ़कर 90,396 टन का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2014-15 के पहले महीनों में 85,837 टन तेल का ही निर्यात हुआ था। एसईए के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 में देष से कुल 4.59 लाख टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था।.....आर एस राणा

07 July 2015

Monsoon Effects In Karnataka Coffee Growing Areas




Late monsoon in the biggest coffee growing area in Karnataka,Coorg coffee growers have experienced droppings of  Robusta  coffee bean prematurely due to heavy rains in the last two weeks of June,wherein the record crop estimation  by Coffee board for the 2015-16 crop of 355.600 lakh tons  may be affected

Egypt Restricts Cotton Import To Protect Local Growers


Agriculture Ministry of Egypt said it would stop cotton imports from all origins to protect local production. The country aims to protect the local growers and resolve marketing issues of cotton by restricting the fiber imports.

आयातित दलहन की कीमतों में तेजी, घरेलू मंडियों में भी बढ़े भाव


दलहन की कीमतों पर अंकुष के लिए राज्यों को दिए अधिकार
आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्री रामविलास पासवान नई दिल्ली में राज्यों के खाद्य मंत्रियों से दलहन की कीमतों पर नकेल लगाने की मांग कर रहे थे लेकिन दूसरी और आयात के साथ ही घरेलू दालों की कीमतों में मंगलवार को तेजी देखी गई। घरेलू बाजार में जहां दालों की कीमतों में 100 से 200 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आई वहीं आयातित दालों की कीमतों में भी 5 से 20 डॉलर प्रति टन का इजाफा हुआ।
दलहन आयातक कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत की आयात मांग बढ़ने से आयातित दलहन की कीमतों में तेजी आई है। म्यंमार से आयातित लेमन अरहर के भाव में 20 डॉलर की तेजी आकर मुंबई पहुंच भाव 1,175 डॉलर प्रति हो गए। एफएक्यू उड़द के भाव 1,160 डॉलर, एसक्यू उड़द के 1,200 डॉलर प्रति हो गए। उड़द की कीमतों में 5 डॉलर प्रति टन की तेजी दर्ज की गई। अन्य दालों में मूंग पेड़ीसेवा के भाव 1,240 डॉलर, मूंग अन्नासेवा के भाव 1,230 डॉलर तथा राजमा पॉलिस के भाव 780 डॉलर प्रति टन रहे। उन्होंने बताया कि आस्ट्रेलिया से आयातित चना के भाव बढ़कर मुंबई में 4,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।
दलहन कारोबारी दुर्गा प्रसाद ने बताया कि मंगलवार को उत्पादक राज्यों में भी दालों की कीमतों में 100 से 200 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी दर्ज की गई। इंदौर मंडी में उड़द की कीमतों में 100 रुपये की तेजी आकर भाव 7,600 रुपये, मूंग की कीमतों में 200 रुपये की तेजी आकर भाव 6,500 रुपये, मसूर की कीमतों में 100 रुपये की तेजी आकर भाव 6,675 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। गुलबर्गा मंडी में चना के भाव 4,525 रुपये, अरहर के भाव 7,400 रुपये प्रति क्विंटल हो गए जबकि अकोला मंडी में अरहर के भाव 7,400 रुपये, उड़द 7,200 से 7,400 रुपये, मूंग के 6,000 से 6,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।
दलहन व्यापारी रजनीष मित्तल ने बताया कि इस समय बेसन में मांग अच्छी बनी हुई है जबकि चालू महीने के आखिर तक दालों की मांग में भी बढ़ोतरी होगी। चालू सीजन में घरेलू दलहन की पैदावार में कमी आई है जबकि आयातित दालों के भाव उंचे बने हुए हैं। इसलिए आगामी दिनों में दालों की कीमतों में तेजी की ही संभावना है। हालांकि राजस्थान में राज्य सरकार ने दलहन पर स्टॉक लिमिट लगा रखी है, तथा केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्री रामविलास पासवान ने मंगलवार को नई दिल्ली में राज्यों के खाद्य मंत्रियों से दलहन की कीमतों पर अंकुष लगाने के लिए जरुरी कदम उठाने को कहां। उन्होंने पत्रकारों से कहां कि राज्यों को दालों की कीमतों को काबू में रखने के लिए राज्यों को अधिकार दे दिए। मिततल ने बताया आयात पड़ता ही महंगा हो तो फिर भाव में गिरावट कैसे आ पायेगी।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आंरभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2014-15 में दलहन की पैदावार घटकर 173.8 लाख टन होने का अनुमान है जबकि फसल सीजन 2013-14 में देष में रिकार्ड 192.5 लाख टन दालों की पैदावार हुई थी।...............आर एस राणा

imported pulses prices

BURMA CNF IN DOLR
TUR
LEM:1175+20
URAD
FAQ1160+5
SQ1200+5
MUNG
ANN1230
PKAKU1170
PDISVA1240
CHAULA
SQ900
RAJMA
POLISH780

06 July 2015

एफसीआई को ओएमएसएस के तहत गेहूं की बिक्री के लिए नहीं मिले खरीददार


रोलर फ्लोर मिलों को उत्पादक राज्यों की मंडियों से मिल रहा है सस्ता गेहूं
आर एस राणा
नई दिल्ली। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत गेहूं के खरीददार नहीं मिल रहे हैैं। एफसीआई ने पंजाब और हरियाणा से 32 लाख टन से ज्यादा गेहूं बेचने के लिए निविदा आमंत्रित की थी लेकिन रोलर फ्लोर मिलों ने निविदा भरी ही नहीं।
एफसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि निगम ने पंजाब और हरियाणा से ओएमएसएस के तहत गेहूं बेचने के लिए निविदा मांगी थी। पंजाब से 27.13 लाख टन और हरियाणा से 5.83 लाख टन गेहूं बेचने के लिए निविदा आमंत्रित की थी लेकिन निगम को एक भी निविदा प्राप्त नहीं हुई। केंद्र सरकार ने ओएमएसएस के तहत गेहूं बेचने के लिए 1,550 रुपये प्रति क्विंटल का भाव तय किया हुआ है जबकि परिवहन लागत एवं अन्य खर्च मिलों को स्वयं वहन करने होंगे।
गेहूं व्यापारी संदीप गुप्ता ने बताया कि उत्पादक राज्यों की मंडियों खासकर के उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश की मंडियों में गेहूं की आवक बराबर बनी हुई है जबकि गेहूं के भाव भी सरकारी बिक्री भाव से काफी नीचे हैं। वैसे भी एफसीआई ने चालू रबी विपणन सीजन 2015-16 के गेहूं की बिक्री के लिए ओएमएसएस के तहत निविदा मांगी थी जबकि चालू रबी सीजन में फसल की कटाई के समय बोमौसम बारिश और ओलावृश्टि से गेहूं की फसल की क्वालिटी प्रभावित हुई थी। ऐसे में फ्लोर मिलर मंडियों से गेहूं की खरीद को तरजीह दे रहे है। उत्पादक राज्यों की मंडियों में गेहूं के भाव 1,350 से 1,550 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं।
गेहूं के थोक कारोबारी हेंमत जैन ने बताया कि दक्षिण भारत की कंपनियों आस्ट्रेलिया से आयातित गेहूं की अच्छी खरीद कर रही है जबकि चालू सीजन में आस्ट्रेलिया और यूक्रेन से करीब पांच लाख टन गेहूं का आयात भी हो चुका है। उन्होंने बताया कि ओएमएसएस के तहत पंजाब और हरियाणा से अभी गेहूं का उठान नहीं होगा, हॉ अगर एफसीआई मध्य प्रदेश से गेहूं बेचने के लिए निविदा आमंत्रित करती है तो फिर गेहूं की बिक्री शुरु हो सकती है।
एफसीआई चालू रबी विपणन सीजन में अभी तक एमएसपी पर 276 लाख टन से ज्यादा गेहूं की खरीद कर चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले ज्यादा है।.......आर एस राणा

जून महीने में खली के निर्यात में 34 फीसदी की गिरावट

आर एस राणा
नई दिल्ली। जून महीने में देष से खली के निर्यात में 34 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 1,37,571 टन का ही हुआ है जबकि चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान देष से खली के निर्यात में 29 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 4,41,548 टन का ही हुआ है।
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएषन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार विष्व बाजार में कीमतें कम होने के कारण भारत से खली के निर्यात में गिरावट बनी हुई है। जून महीने में देष से कुल 1,37,571 टन खली का ही निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल जून महीने में 2,07,753 टन खली का निर्यात हुआ था। चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान देष से खली का निर्यात घटकर 4,41,548 टन का ही हुआ है जबकि वित्त वर्ष 2014-15 के अप्रैल से जून के दौरान 6,25,805 टन खली का निर्यात हुआ था।
एसईके अनुसार घरेलू बाजार में सोयाबीन की उंची कीमतें होने के कारण पेराई कम हो रही है जबकि विष्व बाजार में उपलब्धता होने से दाम नीचे बने हुए है। भारतीय बंदरगाह पर सोया खली के भाव घटकर जून महीने में 553 डॉलर प्रति टन रह गए जबकि मई महीने में इसके भाव 592 डॉलर प्रति टन थे। इसी तरह से सरसों खली के भाव इस दौरान 300 डॉलर प्रति टन से घटकर 277 डॉलर प्रति टन रह गए।
चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान थाइलैंड और ईरान की निर्यात मांग में भारी कमी क्रमषः 72.49 फीसदी और 91.15 फीसदी की आई है। हालांकि इस दौरान दक्षिण कोरिया और वियतनाम को हुए निर्यात में मामूली बढ़ोतरी देखी गई।......आर एस राणा

03 July 2015

दलहन की बुवाई, तिलहन or मोटे अनाज

दलहन की बुवाई
अरहर की बुवाई 9.25 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 3.04 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
मूंग की बुवाई 6.02 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 2.79 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
उड़द की बुवाई 4.99 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 1.20 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
तिलहन
मूंगफली की बुवाई 14.73 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 8.20 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
सोयाबीन की बुवाई 56.12 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 4.67 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
मोटे अनाज
मक्का की बुवाई 29.77 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 17.85 लाख हैक्टेयर में हुई थी।

सीसीआई निर्यात के बजाए घरेलू बाजार में ज्यादा कपास बेचेगी


निगम ई-निलामी के माध्यम से घरेलू बाजार में बेच चुकी है 25 लाख गांठ
आर एस राणा
नई दिल्ली। कॉटन कापोरेषन ऑफ इंडिया लिमिटेड (सीसीआई) निर्यात के बजाए घरेलू बाजार में कपास की बिक्री ज्यादा करेगी। निगम चालू कपास सीजन में अभी तक 25 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो कपास) की बिक्री घरेलू बाजार में कर  चुकी है जबकि निर्यात केवल 25 लाख गांठ का ही किया है।
सीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समय कपास में निर्यात मांग अच्छी है लेकिन हमे घरेलू बाजार में कपास की आपूर्ति बनाए रखनी है, इसलिए हम निर्यात के बजाए घरेलू बाजार में ज्यादा कपास की बिक्री करेंगे। उन्होंने बताया कि चालू कपास सीजन में निगम ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 87 लाख गांठ कपास की खरीद की थी जिसमें से ई-निलामी के माध्यम से 25 लाख गांठ की बिक्री घरेलू मिलों को की है।
उन्होंने बताया कि निगम कपास की बिक्री बाजार भाव से उंचे पर कर रही है जिससे कि उत्पादक राज्यों की मंडियों में कपास का भाव एमएसपी से नीचे नहीं जाए। हालांकि मिलों के साथ ही व्यापारी सीसीआई से खुले बाजार में कपास बेचने की मांग कर रहे हैं।......आर एस राणा

चालू खरीफ में 306 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है फसलों की बुवाई


दलहन, तिलहन के साथ ही कपास की बुवाई में भारी बढ़ोतरी
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ सीजन में देषभर में 306.06 लाख हैक्टेयर में फसलों की बुवाई हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 194.25 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। खरीफ में दलहन के साथ ही तिलहन और कपास की बुवाई में भारी बढ़ोतरी हुई है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में दलहन की बुवाई बढ़कर 22.61 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 9.72 लाख हैक्टेयर में ही बुवाई हुई थी। तिलहन की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 74.17 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 14.73 लाख हैक्टेयर में बुवाई ही हो पाई थी।
कपास की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 60.16 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक कपास की बुवाई 35.42 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। धान की रोपाई चालू खरीफ में 54.03 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 53.56 लाख हैक्टेयर में रोपाई हुई थी। मोटे अनाजों की बुवाई चालू खरीफ में बढ़कर 43.72 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 28.92 लाख हैक्टेयर में मोटे अनाजों की बुवाई हुई थी। गन्ने की बुवाई चालू खरीफ सीजन में 43.68 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 43.92 लाख हैक्टेयर में गन्ने की बुवाई हुई थी।......आर एस राणा