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31 October 2015

आयातित दाल पर हटेगी स्टॉक सीमा
दाल आयातकों को जल्द ही बड़ी राहत मिल सकती है, जिससे उन्हें बंदरगाह से आयातित स्टॉक को मंजूर कराने और खुले बाजार में बेचने में मदद मिलेगी। इसका मकसद दालों की उबलती कीमतों को नियंत्रित करना है। केंद्र सरकार जल्द ही एक नया निर्देश जारी करेगी, जिसमें आयातित दालों पर कोई स्टॉक सीमा नहीं होगी, लेकिन आयातकों को एक निर्धारित समयावधि में स्टॉक की बिक्री करनी होगी। इसके अलावा आयातकों को आयातित दालों की आवक और बिक्री का ब्योरा रखना होगा।
राज्य सरकार के साथ विचार-विमर्श में केंद्र ने कहा है कि दालों के आयात को मंजूरी होगी और इस पर कोई स्टॉक सीमा नहीं होगी। हालांकि आयातकों को एक विशेष रजिस्टर बनाना होगा और निर्धारित समय सीमा में आयातित स्टॉक बेचना होगा।' कई दालों विशेष रूप से अरहर और उड़द के भाव काफी ऊंचाई पर पहुंच गए हैं, जिसकी वजह इनकी फसलों के रकबे में भारी गिरावट आना है। दालों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के कारण केंद्र सरकार ने दालों के कारोबार पर कड़ी स्टॉक सीमा लगा दी है और इसके दायरे में आयातकों और जिंस एक्सचेंजों से मान्यता प्राप्त गोदामों को भी रखा गया है। स्टॉक सीमा तय करने का आयातकों ने विरोध करते हुए कहा कि इससे वे पहले से आयातित और बंदरगाहों पर स्टॉक को भी बेच नहीं पाएंगे। अकेले मुंबई बंदरगाह पर ही कई प्रकार की 2.5 लाख टन दालें क्लियरेंस न मिलने की वजह से पड़ी हैं।
दिसंबर तक डिलिवरी के लिए आयातकों ने 25 लाख टन दालों के अनुबंध किए हैं और स्टॉक सीमा से यह आयात प्रभावित होगा। पिछले सप्ताह आयातकों ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली से कहा था, 'अगर आयातकों को स्टॉक सीमा से राहत नहीं दी गई तो इसका उल्टा असर पड़ेगा।' फड़णवीस ने कहा कि पूरे राज्य में जमाखोरों से बड़ी मात्रा में जब्त की गई दालों को एक सप्ताह के भीतर बाजार में बेचा जाएगा। उन्होंने कहा, 'इससे विशेष रूप से अरहर की दाल की कीमतें घटाने में मदद मिलेगी। थोक विक्रेताओं ने सरकार से कहा है कि उन्होंने अरहर की दाल की कीमतें घटा दी हैं, लेकिन इसमें खुदरा विक्रेताओं की तरफ से भी पहल होनी चाहिए। इससे अरहर की दाल की कीमतें 125 से 130 रुपये प्रति किलोग्राम लाने में मदद मिलेगी।'
तिलहनों के लिए स्टॉक सीमा में रियायत
राज्य सरकार ने बुधवार को एक अधिसूचना जारी कर तिलहनों की स्टॉक सीमा में रियायत दे दी। इस रियायत के बाद कारोबारी करीब 10 गुना अधिक तिलहन का स्टॉक कर सकेंगे। महाराष्ट्र के खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है, 'बिना छिली मूंगफली सहित खाद्य तेलों की भंडारण सीमा में ढील दी गई है।'
कॉरपोरेट क्षेत्र में थोक विक्रेताओं के लिए इसे 2,000 क्विंटल से बढ़ाकर अब 20,000 क्विंटल कर दिया गया है, जबकि खुदरा विक्रेताओं के लिए 200 क्विंटल से बढ़ाकर 2,000 क्विंटल किया गया है। अन्य क्षेत्रों के थोक विक्रेताओं के लिए सीमा 800 क्विंटल से बढ़ाकर 8,000 क्विंटल जबकि खुदरा विक्रेताओं के लिए 100 क्विंटल से बढ़ाकर 2,000 क्विंटल की गई है। किसानों और तिलहन प्रसंस्करणकर्ताओं की मदद के लिए यह फैसला लिया गया है। स्टॉक सीमा की वजह से वे प्रभावित हो रहे थे। आयातित खाद्य तेलों को पहले केंद्र सरकार द्वारा छूट दी गई थी, लेकिन राज्य सरकार की अधिसूचना के तहत दी गई रियायतों में खाद्य तेल को शामिल नहीं किया गया है। (BS Hindi)

प्राकृतिक रबर के वैश्विक दाम गिरे


रबर क्षेत्र में संकट गहराने से प्राकृतिक रबर की वैश्विक कीमतें नए निचले स्तर पर आ गई हैं। प्राकृतिक रबर के कारोबार के केंद्र बैंकॉक में आरएसएस-3 ग्रेड का भाव 82 रुपये प्रति किलोग्राम बोला गया, जबकि आयातकों की सबसे पसंदीदा ग्रेड एसएमआर-29 और भी कम भाव 77 रुपये प्रति किलोग्राम पर उपलब्ध है। विशेषज्ञों के मुताबिक प्रमुख आयातक देशों विशेष रूप से चीन की खरीदारी रबर बाजार के संकट की मुख्य वजह है। इस बाजार में वर्ष 2020 तक गिरावट का रुझान बने रहने के आसार हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तुलना में घरेलू बाजारों की स्थिति बेहतर है क्योंकि हमारे यहां आरएसएस-4 की कीमत 114 रुपये प्रति किलोग्राम बनी हुई है। बाजार के सूत्रों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि यह भाव रबर बोर्ड का है और कारोबार 100 रुपये के आसपास हो रहा है। एनएमसीई पर आज नवंबर और दिसंबर अनुबंधों का भाव कम रहा। विशेषज्ञ रबर बाजार के इस संकट की दो मुख्य वजह बताते हैं।
ये वजह कम मांग एवं ज्यादा आपूर्ति और कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट हैं। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से सिंथेटिक रबर के दाम गिरते हैं। विभिन्न पूर्वानुमानों के मुताबिक वर्ष 2015 में वैश्विक उत्पादन 120 लाख टन से अधिक रहने की संभावना है। वर्ष 2014 में यह 120.7 लाख टन था और पिछले 14 वर्षों के दौरान कुल उत्पादन दोगुना हो गया है। लेकिन वर्ष 2008-09 से कमजोर आर्थिक स्थितियों के कारण इस जिंस की वैश्विक मांग में भारी गिरावट आई है। वर्ष 2015 में खपत केवल 1 करोड़ टन के आसपास रहने का अनुमान है। इसलिए ऐसा लगता है कि बाजार में सरप्लस आपूर्ति की स्थिति रहेगी, जिससे कीमतों पर नकारात्मक असर होगा।
टैपिंग रुकी
सबसे अधिक रबर का उत्पादन करने वाले राज्य केरल में उत्पादन का पीक सीजन आ गया है, लेकिन बहुत से उत्पादक केंद्रों में टैपिंग बंद है। एक डीलर एन राधाकृष्णन ने कहा कि हालांकि इस समय टैपिंग का पीक सीजन है, लेकिन शीट रबर की आपूर्ति बहुत कम है। टैपिंग केवल उन छोटे बागानों में हो रही है, जहां मालिक खुद यह काम करते हैं। ज्यादातर बड़े और मझोले बागानों ने टैपिंग बंद कर दी है क्योंकि उत्पादन की लागत मिलने वाली कीमत से अधिक है। (BS Hindi)

30 October 2015

चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में बासमती चावल का निर्यात मूल्य के हिसाब से घटा


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 की पहली छमाही अप्रैल से सितंबर के दौरान बासमती चावल का निर्यात मूल्य के हिसाब से 11.05 फीसदी कम हुआ है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार अप्रैल से सितंबर के दौरान बासमती चावल का निर्यात 12,308.89 करोड़ रुपये का ही हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 13,837.68 करोड़ रुपये का हुआ था।
एपीडा के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले पांच महीनों अप्रैल से अगस्त के दौरान मात्रा के हिसाब से बासमती चावल के निर्यात में बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल से अगस्त के दौरान 16.78 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 14.35 लाख टन का हुआ था। चालू वित्त वर्ष में देष से बासमती और गैर बासमती चावल के कुल निर्यात में वित्त वर्ष 2014-15 के मुकाबले 8 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
उत्पादक मंडियों में धान की दैनिक आवक बढ़ रही है तथा सरकारी एजेंसियों के साथ ही प्राइवेट कंपनियों की खरीद अच्छी बनी हुई है। नरेला मंडी में पूसा 1,121 बासमती धान का भाव 1,700 से 1,900 रुपये तथा पूसा 1,121 बासमती चावल सेला का भाव 4,000 रुपये और रॉ का भाव 4,400 रुपये प्रति क्विंटल रहा।
केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2015-16 के लिए कॉमन ग्रेड धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी 1,410 रुपये और ग्रेड ए धान का एमएसपी 1,450 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। भारतीय खाद्य निगम यानि एफसीआई ने चालू खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में अभी तक 82.48 लाख टन चावल की एमएसपी पर खरीद की है। अभी तक खरीद गए चावल में हरियाणा की हिस्सेदारी 24.70 लाख टन और पंजाब की 56.49 लाख टन है। केंद्र सरकार ने चालू खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में 300 लाख टन चावल की खरीद का लक्ष्य तय किया है तथा केंद्रीय पूल में पहली सितंबर को 138.92 लाख टन चावल का स्टॉक मौजूद था जोकि तय मानकों से ज्यादा है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ 2015-16 में धान की बुवाई बढ़कर 374.09 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 373.86 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू खरीफ सीजन 2015-16 में 906.1 लाख टन चावल की पैदावार होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 880.2 लाख टन का उत्पादन हुआ था।..................आर एस राणा

सोने-चांदी पर कम होगा आयात शुल्क!




















सोने-चांदी पर कम होगा आयात शुल्क!





रत्न एवं आभूषण कारोबार में गिरावट से उद्योग जगत के साथ ही सरकार भी चिंतित है। सरकार इस उद्योग के विकास के लिए कारोबारियों के साथ मिलकर योजना बनाने जा रही है, जिसके लिए 3 नवंबर को सोना-चांदी एवं हीरे की कारोबारी संस्थाओं के प्रमुखों को दिल्ली बुलाया गया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय कारोबारियों के साथ विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करेगा। इंडिया बुलियन ऐंड ज्वैलरी एसोसिएशन लिमिटेड के अध्यक्ष मोहित कंबोज कहते हैं कि हम लोग आयात शुल्क में कटौती और विशेष जोन की मांग लंबे समय से करते रहे हैं। अब सरकार के हमारे मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार होने से लगता है कि रत्न एवं आभूषण उद्योग के अच्छे दिन आएंगे।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा भेजी गई बैठक की सूचना में बातचीत का पूरा ब्योरा दिया गया है। बैठक में बातचीत का एजेंडा दो स्तरीय होगा। रत्न एवं आभूषण उद्योग के विकास के लिए एक साल के अंदर होने वाली पहल और दूसरी तीन साल में होने वाली पहल। सरकार रत्न एवं आभूषण कारोबारियों से चार मुद्दों पर बात करेगी। इनमें कच्चे हीरों की खनन कंपनियों के लिए स्पेशल नोटिफाइड जोन की स्थापना, आयात शुल्क में कटौती, जिसमें सोने पर लगने वाले आयात शुल्क को 10 फीसदी से 2 फीसदी करना, चांदी पर आयात शुल्क को 10 फीसदी से 2 फीसदी करना, कट- पॉलिश और कलर स्टोन पर आयात शुल्क को 2.5 फीसदी से शून्य करना और मोती पर 10 फीसदी आयात शुल्क को 2.5 फीसदी करना है। इसके अलावा सरकार स्वर्ण योजना बनाना चाहती है, जिसमें सोना, धातु, ऋण, रिसाइक्लिंग और खनन शामिल होगा। वहीं तीन साल वाली योजना में रत्न एवं आभूषण कारोबार के लिए बेहतर माहौल बनाने के लिए तैयार की जाने वाली योजनाओं पर चर्चा होगी।

कारोबारियों का कहना है कि इस बैठक में आगे की रणनीति तय हो जाएगी। भारतीय रत्न एवं आभूषण उद्योग के आयात और निर्यात दोनों में भारी गिरावट देखने को मिल रही है। सितंबर महीने में सिर्फ 205.74 करोड़ डॉलर के सोने का आयात हुआ, जबकि सितंबर 2014 के दौरान देश में 378.33 करोड़ डॉलर के सोने का आयात हुआ था, यानी इस साल सितंबर में सोने के आयात में लगभग 46 फीसदी की गिरावट हुई है। (BS HIndi)

29 October 2015

महाराष्ट्र में इंपोर्ट की हुई दाल स्टॉक लिमिट के कानून से हो सकती है बाहर


महाराष्ट्र में दाल इंपोर्टर और इंपोर्ट की हुई दाल स्टॉक लिमिट के कानून से बाहर हो सकती है। महाराष्ट्र सरकार दाल इंपोर्टर और इंपोर्टेड दाल को स्टॉक लिमिट के कानून से बाहर करने के लिए योजना तैयार कर रही है और जल्दी ही इसकी घोषणा हो सकती है।
पिछले हफ्ते इंडियन पल्सेज एंड ग्रेन एसोसिएशन के नुमाइंदों ने केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली से मुलाकात कर दाल इंपोर्टरों और इंपोर्टेड दाल को स्टॉक लिमिट के कानून से बाहर करने की मांग की थी। इसके एवज में एसोसिएशन ने महाराष्ट्र में रोजाना 130 रुपये प्रति किलो के भाव पर 100 टन दाल की सप्लाई सरकार को करने की पेशकश की थी।
अबतक देशभर में हुई छापेमारी में सबसे ज्यादा दाल महाराष्ट्र से ही जब्त की गई है , खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 24 अक्टूबर तक महाराष्ट्र में दाल कारोबारियों पर 498 छापे पड़ चुके हैं और 46,397 टन दाल जब्त की जा चुकी है।
गुजरात ने भी दालों पर स्टॉक लिमिट लगा रखी है लेकिन राज्य में दाल आयातकों , आयात की हुई दाल और चना व चने की दाल को स्टॉक लिमिट के कानून से बाहर रखा है।

कपास की पैदावार में 4 फीसदी कमी आने का अनुमान


आर एस राणा
नई दिल्ली। अक्टूबर से चालू हुए फसल सीजन में कपास की पैदावार में 4 फीसदी की कमी आकर कुल पैदावार 370.50 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसकी पैदावार 382.75 लाख गांठ की हुई थी। पंजाब की भटिंडा मंडी में नरमा कपास के भाव 4,600 रुपये प्रति क्विंटल रहे तथा दैनिक आवक 9,000 गांठ की हुई। महाराष्ट्र की अकोला मंडी में कपास के भाव 4,000 से 4,350 रुपये प्रति क्विंटल रहे। अहमदाबाद में कपास के भाव 32,100 रुपये प्रति गांठ रहे।
कॉटन एसोसिएषन ऑफ इंडिया (सीएआई) के अनुसार उत्तर भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में फसल में कीट लगने के कारण कपास की फसल प्रभावित हुई है, हालांकि नई फसल के समय कपास का बकाया स्टॉक ज्यादा होने से सप्लाई पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। वैसे भी चीन की कपास में आयात मांग कमजोर है, तथा सरकारी वहां घरेलू कपास की खपत को तरजीह दे रही है।
उत्तर भारत के राज्यों पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कपास की पैदावार 47 लाख गांठ, मध्य भारत के गुजरात, महाराष्ट और मध्य प्रदेष में 205 लाख गांठ तथा दक्षिण भारत के राज्यों आंध्रप्रदेष, तेलंगाना और कर्नाटका में 112 लाख गांठ कपास की पैदावार होने का अनुमान है।
उत्पादक मंडियों में नई कपास में नमी की मात्रा ज्यादा है इसलिए मिलर्स कॉटन कापोरेषन ऑफ इंडिया (सीसीआई) की कपास की खरीद ज्यादा मात्रा में कर रहे है। सीसीआई के कपास करीब 12 से 15 लाख गांठ कपास का स्टॉक बचा हुआ है। कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार कपास की पैदावार 335.07 लाख गांठ होने का अनुमान है।.........आर एस राणा

गन्ना किसानों के खातों में आएगी सब्सिडी

गन्ना किसानों के खातों में आएगी सब्सिडी
काफी विचार विमर्श के बाद गन्ना किसानों को राहत देने के लिए खाद्य मंत्रालय समाधान तलाशने के काफी करीब पहुंच गया है। इसके तहत लाखों गन्ना किसानों को सरकार की ओर से सीधे सब्सिडी मिल सकती है। इससे मिलों को भी कुछ सहूलियत होगी। मंत्रालय इस योजना पर काम कर रहा है कि कि फसल वर्ष 2015-16 से गन्ना किसानों के बैंक खाते में ही सब्सिडी हस्तांतरित की जाए।
पहली दफा आजमाया जा रहा यह कदम अगर कामयाब होता है तो सरकार कपास जैसी अन्य फसलों के लिए भी इसे लागू करेगी। इसमें सरकार मिलों या अन्य मध्यस्थों के बजाय सब्सिडी या प्रोत्साहन सीधे किसानों को ही मुहैया कराएगी। इस मामले से जुड़े सूत्रों ने बताया कि मिलों को गन्ना बेचने वाले किसानों को मंत्रालय प्रति क्विंटल गन्ने पर 47.50 रुपये का प्रत्यक्ष भुगतान करने की योजना बना रहा है, लिहाजा मिलों को इस साल के लिए तय 230 रुपये प्रति क्विंटल के उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) में केवल 182.50 रुपये प्रति क्विंटल गन्ना किसानों को अदा करना होगा। मगर ये सब्सिडी उन्हीं मिलों को गन्ना बेचने वाले किसानों को दी जाएगी, जो चीनी के अलावा एथेनॉल, बिजली और अन्य उत्पाद भी बनाती होंगी।
अधिकारियों ने बताया कि केंद्र चीनी विकास कोष (एसडीएफ) जैसे विकल्प पर विचार कर सकता है या फिर इसके लिए धन की व्यवस्था करने को चीनी पर प्रति क्विंटल 50 रुपये का उपकर लगाया जा सकता है। अधिकारी ने बताया कि यह मिलों के लिए भी राहत का काम करेगा, जिन्हें वर्ष 2015-16 सत्र में 40 लाख टन का अनिवार्य निर्यात करना है। इस प्रस्ताव पर औपचारिक रूप से एक कैबिनेट नोट भी तैयार हो रहा है, हालांकि सब्सिडी की रकम तय करने के फैसले पर वित्त मंत्रालय की सलाह के बाद ही मुहर लगेगी। मौजूदा चलन के मुताबिक अभी केंद्र द्वारा गन्ने पर तय एफआरपी की पूरी रकम मिलों को ही अदा करनी पड़ती है। चालू सत्र (अक्टूबर-सितंबर) के लिए गन्ने का एफआरपी 230 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। (BS Hindi)

पोल्ट्री उद्योग पर बढ़ा पशु आहार का बोझ

पिछले कुछ दिनों से पशु आहार की कीमतों में बढ़ोतरी से पोल्ट्री उद्योग के सामने मुसीबत खड़ी हो गई है। सोयाखली की कीमत में करीब 1,000 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी होने से बहुत से पोल्ट्री फार्म मालिक चिंतित हैं। अंडे की उत्पादन लागत 3 रुपये प्रति अंडा है, जबकि मुर्गी पालकों को अपने फार्म पर कीमत 2.65 से 2.70 रुपये मिल रही है। नामाकल स्थित राष्ट्रीय अंडा समन्वय समिति (एनईसीसी) के उपाध्यक्ष पी तमिल अरसन ने कहा कि अंडों की कीमतों में गिरावट और मुर्गी दाने की कीमतों में बढ़ोतरी से छोटे उद्यमियों को यह धंधा छोडऩा पड़ सकता है। गौरतलब है कि नामाकल भारत का सबसे बड़ा पोल्ट्री क्लस्टर है, जहां रोजाना 3.2 करोड़ अंड़ों का उत्पादन होता है।

ब्रॉइलर की फार्म गेट कीमत में भारी गिरावट आई है। इसकी कीमत अगस्त में 70 रुपये थी, जो अक्टूबर में घटकर 55 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई है। मुर्गीपालक नवरात्र के बाद मांग सुधरने और इस कारोबार में हित में बिचौलियों के अपना कुछ मुनाफा छोडऩे की उम्मीद कर रहे हैं।  मुर्गीपालकों को दोहरा झटका लगा है क्योंकि अंडों के साथ ही चिकन के दाम भी पिछले कुछ सप्ताह के दौरान तेजी से घटे हैं। अक्टूबर में अंडों और ब्रॉइलर की औसत कीमतें पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले क्रमश: 10 फीसदी और 25 फीसदी घटी हैं। कारोबारी इसकी वजह मांग और आपूर्ति में अंतर पैदा होने को बता रहे हैं।

दिल्ली के एक कारोबारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने का आग्रह करते हुए बताया कि बड़े आपूर्तिकर्ताओं की उपस्थिति बढऩे से ब्रॉइलर की कीमतों में गिरावट आई है। बड़े कारोबारी बड़े पैमाने पर उत्पादन से कम लागत का फायदा उठाते हैं और सस्ते उत्पादों से बाजार को पाट देते हैं। इस क्षेत्र की बड़ी कंपनियों में वेंकीज, सुगना फूड्स, सीपी फूड्स और शालीमार ब्रीडिंग्स आदि शामिल हैं। हालांकि जीन संवर्धित बीजों से बनी सोयाखली और कृषि पर इसके असर को लेकर चिंताएं हैं। लेकिन केंद्र के आमंत्रण पर पिछले सप्ताह देश का दौरा करने वाले एक जैव-तकनीक विशेषज्ञ और ग्रीनहाउस कम्यूनिकेसंस के अध्यक्ष डेविड ग्रीन ने सोयाबीन की कीमतों को कम रखने का एक समाधान दिया था।

उनके मुताबिक बड़ी आबादी वाले देश उन जीन संवर्धित फंसलों का आयात कर रहे हैं, जिनका कोई नुकसानदेह असर नहीं होता है। जीएम बीजों के इस्तेमाल का फैसला किसानों पर छोड़ा जाना चाहिए और यूरोप एïवं विश्व के अन्य हिस्सों से जीन संवर्धित सोया पशु आहार का आयात फायदेमंद साबित हुआ है। छोटे पोल्ट्री फार्मों की तादाद बढऩे से पिछले साल के मुकाबले इस साल अंडों की कीमतों में गिरावट का रुझान रहा है। पेपे फाम्र्स के निदेशक अरसन पशु आहार की कीमतों में बढ़ोतरी से चिंतित हैं और वह सोया खली की जगह ग्वार खली, बिनौला या सरसों खली का इस्तेमाल करने के बारे में विचार कर रहे हैं। इससे उनकी प्रति किलोग्राम लागत 1 रुपये कम हो सकती है। उन्होंने कहा कि इस उद्योग में घटते मुनाफे के कारण बैंक ऋण देने के अनिच्छुक हैं। (BS hindi)

26 October 2015

आंध्रप्रदेष और महाराष्ट्र में हल्दी की पैदावार में कमी की आषंका


निर्यातकों की मांग से भाव में तेजी आने का अनुमान
आर एस राणा
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक राज्यों आंध्रप्रदेष और महाराष्ट्र में बारिष की कमी से हल्दी की फसल को नुकसान हो रहा है, इससे नए सीजन में हल्दी की पैदावार पहले अनुमान से करीब 10 लाख बोरी (एक बोरी-70 किलो) कम होने की आषंका है। त्यौहारी सीजन के कारण हल्दी में घरेलू मसाला कंपनियों की मांग तो अच्छी बनी हुई है, साथ ही इस समय निर्यात मांग भी अच्छी है जिससे मौजूदा कीमतों में तेजी आने का अनुमान है।
आंध्रप्रदेष की निजामाबाद मंडी में हल्दी के भाव 8,400 रुपये प्रति क्विंटल तथा दैनिक आवक 500 बोरी की हुई। तमिलनाडु की इरोड मंडी में हल्दी के भाव 8,500 रुपये प्रति क्विंटल तथा दैनिक आवक 3,500 बोरी की हुई। सेलम मंडी में हल्दी के भाव 9,200 रुपये और नांनदेड़ मंडी में 9,000 से 9,700 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
हल्दी का उत्पादन मुख्यतः आंध्रप्रदेष, तमिलनाडु, तेलंगाना और महाराष्ट्र में होता है। तेलंगाना और तमिलनाडु में तो सितंबर में बारिष हुई थी लेकिन आंध्रप्रदेष और महाराष्ट्र के हल्दी उत्पादक क्षेत्रों में बारिष नहीं हो रही है, जबकि इस समय फसल को पानी की जरुरत है, ऐसे में हल्दी की फसल को नुकसान हो रहा है, तथा इसका असर प्रति हैक्टेयर उत्पादकता पर पड़ेगा।
जानकारों के अनुसार नए सीजन में हल्दी की पैदावार 60 लाख बोरी होने का अनुमान था लेकिन अब लगता है कि पैदावार करीब 50 लाख बोरी की ही होगी। इस समय उत्पादक राज्यों में करीब 30 से 35 लाख बोरी हल्दी का स्टॉक बचा हुआ है जबकि नई फसल तक करीब 12 से 15 लाख बोरी की खपत हो जायेगी। ऐसे में करीब 20 से 22 लाख बोरी का ही बकाया स्टॉक बचेगा, जबकि पैदावार कम होने का अनुमान है। देष में हल्दी की सालाना खपत करीब 64 से 68 लाख बोरी की होती है। ऐसे में आगामी दिनों में हल्दी की कीमतों में तेजी की ही संभावना है। वैसे भी त्यौहारी सीजन के कारण इस समय हल्दी में घरेलू मसाला कंपनियों के साथ निर्यातकों की अच्छी मांग बनी हुई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में हल्दी का भाव 3.31 डॉलर प्रति किलो है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसका भाव 3.52 डॉलर प्रति किलो था।भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 की पहली तिमाही अप्रैल से जून के दौरान हल्दी के निर्यात में 8 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 24,500 टन का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 22,699 टन का ही हुआ था। वित वर्ष 2014-15 के दौरान हल्दी का निर्यात बढ़कर 86,000 टन का हुआ है जबकि वित वर्ष 2013-14 में इसका निर्यात 77,500 टन का हुआ था।.........आर एस राणा

चाय उद्योग को किसकी लगी हाय

चाय उद्योग के लिए यह साल उत्साहजनक नहीं रहा है। कमजोर फसल, लचर निर्यात और कीमतों में उतार-चढ़ाव आदि से यह उद्योग प्रभावित हुआ है। हालांकि चाय उत्पादक यह मानकार राहत महसूस कर रहे हैं कि दिसंबर एवं मार्च तिमाहियों की समाप्ति पर चाय की मांग बढ़ेगी, जिससे कीमतें भी ऊपर जाएंगी। अगस्त तक असम में उत्पादन 33.97 करोड़ किलोग्राम था, जो पिछले साल 35.66 करोड़ किलोग्राम रहा था। पश्चिम बंगाल की हालत भी कमोबेश ऐसी ही रही जहां इस साल उत्पादन 19.11 करोड़ किलोग्राम रहा। यानी कुल मिलाकर उत्तर भारत में चाय उत्पादन में 1.27 करोड़ किलोग्राम की कमी दर्ज की गई।

हालांकि चाय उद्योग इस बात से हैरान है कि उत्पादन कम होने के बाद भी इसकी कीमतों पर असर नहीं पड़ा है। उत्तर भारत में औसत नीलामी मूल्य जनवरी-अगस्त में 136.29 किलोग्राम था, जो पिछले साल 145.17 किलोग्राम रहा था। इस क्षेत्र में कोलकाता और गुवाहाटी दो केंद्र कीमतों का रुझान दर्शाते हैं। कोलकाता में औसत कीमत 152.16 रुपये प्रति किलोग्राम था (पिछले साल 161.30 रुपये प्रति किलोग्राम) जबकि गुवाहाटी में कीमतें पिछले साल के 144.80 रुपये के मुकाबले 136.84 रुपये प्रति किलोग्राम है। सिलीगुड़ी में कीमतें कम होकर 118 रुपये किलोग्राम रह गई हैं, पिछले साल 127 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। देश में चाय की कीमतें पिछले साल के 125.74 रुपये प्रति किलोग्राम के मुकाबले 118.52 रुपये किलोग्राम है।

दार्जिलिंग चाय एक मात्र अपवाद रही है। अगस्त में इसकी औसत नीलामी कीमत 310 रुपये प्रति किलोग्राम थी। पिछले साल इसकी कीमत 301 रुपये प्रति किलोग्राम थी। भारतीय चाय संघ के सचिव अरिजित राहा ने हालांकि कहा कि नीलामी में चाय की गुणवत्ता कमोबेश बरकरार है। कोलकाता नीलामी केंद्र में कुल 7.45 किलोग्राम चाय की नीलामी की पेशकश की गई थी। पिछले साल यह आंकड़ा 7.4 करोड़ टन था। गुवाहाटी में यह मात्रा 6.9 किलोग्राम थी, जो पिछले साल 6.47 करोड़ किलोग्राम थी।

कुल मात्रा में 50 प्रतिशत चाय की आपूर्ति नीलामी के जरिये जबकि शेष की आपूर्ति निजी बिक्री के तहत होती है। दक्षिण भारत में भी हालत ठीक नहीं है। हालांकि यहां उत्पादन पिछले साल के बराबर ही रहा है, लेकिन औसत मूल्य 85 रुपये से कम होकर 79 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है। अगस्त तक चाय निर्यात के आंकड़े भी बहुत उत्साहवद्र्धक नहीं रहे हैं। अगस्त से जनवरी के बीच भारत से चाय का निर्यात 12.59 करोड़ टन रहा, जो पिछले साल की समान अवधि में 12.9 करोड़ टन रहा था। हालांकि उत्पादकों का मानना है कि चाय उत्पादन में इस साल आई कमी का असर कीमतों में अक्टूबर से मार्च के बीच देखने को मिलेगा। मैकलॉयड रसेल इंडिया के प्रबंध निदेशक आदित्य खेतान कहते हैं, 'चाय की मांग बढ़ रही है। पिछले साल के मुकाबले निर्यात भी अधिक रहेगा जिसका मतलब है कि पिछला भंडार भी कम ही रहेगा। BS Hindi

निजी इकाइयां खरीदेंगी 10 लाख टन चावल


सरकारी उपक्रम भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने निजी कंपनियों को खरीफ फसलों के चालू विपणन सत्र में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों से 10 लाख टन चावल खरीद की छूट देने का फैसला किया है। खरीफ के चावल (धान) की खरीद इस माह से शुरू हो गई है। सरकार ने इस सत्र में 300 लाख टन चावल खरीद का लक्ष्य रखा है, जिसमें से 69 लाख टन की खरीद पूर्वोत्तर के पांच राज्यों से की जाएगी। एफसीआई खाद्यान्नों की खरीद और वितरण करने वाली प्रमुख एजेंसी है। पूर्व खाद्य मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार की अगुवाई वाली एफसीआई पुनर्गठन समिति द्वारा दी गई सिफारिशों के बाद सरकार की खरीद नीति में निजी क्षेत्र को भी साथ लिया जा रहा है।

इस रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि सरकार को केंद्र की मूल्य समर्थन प्रणाली का लाभ पूर्वोत्तर राज्यों के किसानों को सुनिश्चित करने के लिए वहां के राज्यों पर ध्यान देना चाहिए खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'एफसीआई ने खरीफ सत्र 2015-16 में पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 69 लाख टन का चावल खरीद लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें से निजी कंपनियों को 9.95 लाख टन की खरीद करने की अनुमति दी जाएगी।  (BS Hindi)

दालों के दाम में बढ़ोतरी कई लिहाज से अप्रत्याशित


ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि दालों के उत्पादन में इससे पिछले साल के मुकाबले कमी आई हो। लेकिन चकित करने वाली बात इसकी कीमतों का सातवें आसमान पर पहुंचना है, खासकर इस साल जून के बाद से दालों की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। संभव है कि लगातार दो वर्षों में आपूर्ति कम रहने की वजह से ऐसा हुआ हो, क्योंकि निकट भविष्य में लगातार दो वर्षों तक आपूर्ति कमजोर रही हो, इसका उदाहरण नहीं दिखता है। इसके साथ ही दो मुख्य दलहन फसल अरहर और चने का उत्पादन 2014-15 में पिछले साल के मुकाबले कम रहा है। इसका असर भी कीमतों पर पड़ा है।

2014-15 से पहले 2011-12 में दालों के कुल उत्पादन में गिरावट आई थी, उस समय दलहन की पैदावार 1.709 करोड़ टन रही थी, जबकि इससे पिछले वर्ष 1.824 करोड़ टन का उत्पादन हुआ था। हालांकि 2014-15 में 9.5 फीसदी कम उत्पादन के अनुमान से पैदावार कहीं ज्यादा कम रही और मांग बढऩे से भी इसकी कीमतों में तेजी को बढ़ावा मिला है। 2011-12 में उत्पादन घटने पर आयात के जरिये उसकी भरपाई की गई थी, जिससे कीमतों में इतनी तेजी नहीं आई है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जून से सितंबर 2010 में अरहर की देश भर में औसत खुदरा कीमत 67 रुपये से घटकर 61 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई थी, वहीं 2011 में इस दौरान कीमतें 62 रुपये से घटकर 61 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई थी। 2012 में देश भर में अरहर की औसत खुदरा कीमत 13 फीसदी और 2014 में 6 फीसदी बढ़ी थी।

लेकिन 2015 में जून से सितंबर के दौरान अरहर की औसत खुदरा कीमत 26 फीसदी तक बढ़ गई। हालांकि शहर के आधार पर कीमतों में थोड़ा अंतर हो सकता है। 2011-12 से तीन-चार वर्षों में दालों की मांग इसके उत्पादन से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी है, जिसका पता राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों से भी पता चलता है। हालांकि इस साल दालों की कीमतों में जिस तरह से तेजी आई है, उसके पीछे वजह समझ नहीं आती।

2011-12 में अरहर के उत्पादन में 7.34 फीसदी की गिरावट थी, जबकि 2014-15 में 10 फीसदी कमी का अनुमान है। लेकिन क्या यह कीमतों में इतनी तेजी की वजह हो सकती है?2011-12 में चने के उत्पादन में 6.32 फीसदी की गिरावट आई थी। 2014-15 में भी चने के उत्पादन में 20 फीसदी की कमी आई है लेकिन कीमतों में करीब 32 फीसदी का इजाफा हुआ है। केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'यह कहना कठिन है कि 2011-12 में उत्पादन घटने के बाद भी 2014-15 के मुकाबले कीमतों में उतनी तेजी क्यों नहीं आई, क्योंकि स्थितियां एक सत्र से दूसरे सत्र में अगल होती हैं। BS Hindi

पश्चिम बंगाल में आलू की खेती पर बढ़ता जोखिम

पिछले दिसंबर में पश्चिम बंगाल में आलू की खेती के लिए मौसम बेहद अनुकूल था यानी तापमान में थोड़ी ठंडक थी। लेकिन इसके बावजूद राज्य में करीब 20 किसानों ने आत्महत्या कर ली। दिसंबर 2010 में पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड स्तर पर आलू का उत्पादन हुआ। मार्च 2011 से ही बाजार में गिरावट शुरू हो गई थी। नवंबर 2011 तक 32 किसानों ने आत्महत्या कर ली थी। दिसंबर 2011 में नई फसल के आने से पुरानी फसल की बिक्री बेहद दबाव या हताशा में की गई और कीमतें स्थिर हो गईं।

नवंबर तक 2013 में पश्चिम बंगाल को फिर से संकट का सामना करना पड़ा। इस बार आलू की कीमत दो साल पहले के 5 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 50 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गईं थी। इसकी वजह यह थी कि इससे पहले के साल में उत्पादन का स्तर कम रहा। राज्य सरकार ने पश्चिम बंगाल से दूसरे राज्यों में आलू का निर्यात सीमित कर दिया और इसकी बिक्री की कीमत पर एक सीमा तय कर दी और मालिकों को आदेश दिया कि वे अपने कोल्ड स्टोरेज को खाली कर दें। यह तस्वीर पश्चिम बंगाल में आलू के अनियमित और अस्थिर अर्थव्यवस्था की है जो खेती का सबसे जोखिमपूर्ण विकल्प है।

उत्तर प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल, सब्जियों का दूसरा सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाला राज्य है और भारत के आलू उत्पादन में इस राज्य का योगदान 25 फीसदी तक है। सब्जियों की मार्केटिंग के अपर्याप्त विकल्पों, बिचौलियों की तिकड़म और न्यूनतम समर्थन मूल्य के अभाव में राज्य में आलू की खेती काफी जोखिम का कारण बन रही है। इस साल पश्चिम बंगाल में करीब 1.1 करोड़ टन आलू का उत्पादन हुआ है। स्थानीय स्तर पर उपभोग 55 लाख टन से ज्यादा नहीं है। राज्य आमतौर पर पड़ोसी राज्यों में करीब 45 लाख टन जिंस भेजता है। राज्य में 10 लाख टन अतिरिक्त उत्पादन हुआ जिसकी वजह से कीमतों में गिरावट आई।

आत्मघाती अर्थव्यवस्था

दिसंबर में नई फसल के आने से पहले किसान बिक्री करने पर जोर दे रहे हैं क्योंकि इसमें असफल रहने पर उनकी मुश्किलें और भी बढ़ सकती हैं। वे प्रति क्विंटल 100 रुपये के घाटे पर फसल की बिक्री कर रहे हैं। भंडारण की लागत के साथ करीब 550-590 रुपये प्रति क्विंटल उत्पादन की लागत के मुकाबले किसान अपने आलू को 350 रुपये प्रति क्विंटल रुपये से ज्यादा बेचने में सफल नहीं हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब में उत्पादन के बढ़ते अनुमानों के साथ दूसरे राज्यों में सब्जियों का बाजार प्रतिस्पद्र्धी बन चुका है। पश्चिम मेदिनीपुर, वर्धमान और हुगली जिले में चुनिंदा अमीर किसान परिवहन, कोल्ड स्टोरेज के लिए किराये आदि का भुगतान कर सकते हैं जबकि पश्चिम बंगाल में छोटे किसान अपनी फसलों को बिचौलियों को बेचने के लिए मजबूर होते हैं। पहले इसकी बिक्री होती थी और अब इसका कारोबार पेपर स्लिप के जरिये होता है जिसे अनौपचारिक तौर पर आलू बॉन्ड कहते हैं। कम फसलों के दौरान ये बॉन्ड प्रीमियम पर बेचे जाते हैं जबकि बेहतर फसलों के दौरान इनकी बिक्री खुले तौर पर होती है।

राज्य में किसानों को तब भी अच्छी कीमत नहीं मिल पाती जब फसल की कमी होती है क्योंकि जब तक कीमतों में तेजी आती है तब तक वे अपनी फसल बेच चुके होते हैं। वर्ष 2013 में जब आलू की बिक्री 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिक्री हुई तब भी किसानों ने 5 रुपये प्रति किलोग्राम से ज्यादा की कमाई नहीं की और उनका मुनाफा 1 रुपये प्रति किलोग्राम से ज्यादा नहीं था। विधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर प्रणव चटर्जी का कहना है, 'पश्चिम बंगाल में किसान अपनी फसलों की बिक्री करने के लिए बिचौलिये पर निर्भर हैं। इसी वजह से वे फसलों की कमी के वक्त भी बेहतर कीमतें पाने में असफल होते हैं और मुश्किल की बात यह है कि वे ज्यादा उत्पादन के वक्त भी कम कीमतें पाते हैं।'पश्चिम बंगाल में आलू की खेती के लिए दूसरी समस्या बुनियादी ढांचे की कमी थी। पश्चिम बंगाल में कोल्ड स्टोरेज की क्षमता 60-62 लाख टन है जबकि बाकी 10-15 लाख टन आलू खुले में ही पड़ा रहता है। इसके अलावा पिछले साल के मुकाबले कोल्ड स्टोरेज का किराया 14 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 135 रुपये हो गया है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल आलू के बीजों के लिए पंजाब पर निर्भर है। करीब 800,000 टन बीजों की जरूरत पश्चिम बंगाल में उत्पादित 300,000 टन बीज से पूरी की जाती है। (BS Hindi)

24 October 2015

MSP for rabi to be decided soon

MSP for rabi to be decided soon

New Delhi
The cabinet may decide the minimum support prices for rabi crop soon as sowing of wheat, gram and mustard has begun.
The agriculture ministry has sent the price recommendations of the commission for agricultural costs and prices (CACP) that suggested raising MSP of winter-sown crops between 5 per cent and 8 per cent. The decision may not be anno­unced immediately as it would need approval of the poll panel, sources said.
Agriculture minister Radha Mohan Singh, who was away in Bihar for electioneering, has retuned to Delhi to attend the meeting so that a decision is taken at the earliest, sources said.
CACP had suggested that MSP for wheat be increased to Rs 1,525 per quintal from Rs 1,450 and that of mustard to Rs 3,350 per quintal from Rs 3,100. MSP for gram should be raised to Rs 3,425 per quintal from Rs 3,175, barley to Rs 1,225 from Rs 1,150 and lentil to Rs 3,325 from Rs 3,075, they said.
Sowing of rabi crops begins in October and is harvested in April. The government normally announces MSPs before sowing picks up to help farmers take a decision on which crops to grow.
The 7.9 per cent increase in MSP for gram will help the government raise the output of pulses as it has set a 132.78 million tonne production target in the ensuing winter season. Last year, gram crop was damaged in many areas and the government had to import the commodity to meet the demand.

Over 50,000 MT pulse seized so far under de-hoarding operations




Prices show declining trends in wholesale markets
       
De-hoarding operations across the states have resulted in seizure of 50475.25 MT pulses so far. Total 3,149 raids have been conducted by the states after the amendment in the Central Order under Essential Commodities Act. The amendment has enabled the States to impose stock limits on all types of stock of pulses. The States were exhorted to intensify action against hoarding.
State-wise seizure of pulses so far is as follow-
S. no
State/UT
No. of raids conducted
Quantity seized
MT as on 21.10.15
Quantity Seized Further
Quantity seized
MT as on 23.10.15
1.
Andhra Pradesh
193
859.872

859.872
2.
chhattisgarh
52
4525.192

4525.192
3.
Haryana
227
1168
764.07
1932.070
4.
Karnataka
----
479.6
5487.742
5967.342
5.
Madhya Pradesh
25
2295

2295.00
6.
Maharashtra
276
23340
7033
30373.00
7.
Telangana
1820
2546

2546.00
8.
Tamil Nadu
29
4.329

4.329
9.
Rajasthan
101
100.4
2051.14
2151.54
10
Himachal
426
2.44

2.44

Total
3149
35,320.83
15,335.95
50,656.79

As a result of action taken by the States there has been a decrease of about Rs.200 per quintal in the mandi rates of pulses in Mumbai and also in future trading of Chana. Decrease in retails prices of pulses has also been seen in Maharashtra, Gujarat, Karnataka and Andhra Pradesh.

सख्ती से ठंडा पडऩे लगा उबाल

सख्ती से ठंडा पडऩे लगा उबाल
कालाबाजारी करने वालों और जमाखोरों पर सरकार  की ओर से देश भर में सख्ती किए जाने के बाद पिछले कुछ हफ्तों से दाल की कीमतों में आ रहा उबाल अब कुछ शहरों में ठंडा होता दिख रहा है। सरकार द्वारा की जा रही छापेमारी में अब तक 50,000 टन दालें जब्त की जा चुकी हैं, जिनमें से 15,000 टन पिछले कुछ दिनों में ही बरामद हुई हैं। मामले से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि लंबी अवधि की योजना के तहत सरकार दालों के लिए 5 लाख टन का बफर स्टॉक तैयार करने की योजना बना रही है। इसके लिए सीधे किसानों से नियमित आधार पर खरीद की जाएगी। इस साल नवंबर से नेफेड के जरिये 40,000 टन दालों की खरीद से इसकी शुरुआत होगी और बाद में धीरे-धीरे खरीद बढ़ाई जाएगी। कुछ अधिकारियों ने कहा कि इस बारे में कैबिनेट प्रस्ताव लाने पर विचार हो रहा है। इस माह की शुरुआत में कृषि राज्यमंत्री संजीव बालियान ने किसानों से सीधे 40,000 टन दालों की खरीद की योजना की रूपरेखा तैयार की थी। सरकार के एक वरिष्ठï अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, 'हम खरीद को 40,000 टन तक सीमित नहीं रखेंगे और घरेलू बाजार से नियमित तौर पर इसकी खरीद जारी रह सकती है।'

इस बीच, दाल आयातकों की आज वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ उच्च स्तरीय बैठक हुई, जिसमें उन्होंने भंडारण सीमा हटाने की मांग की। साथ ही आयातकों ने सरकार को रोजाना आधार पर खुदरा आउटलेटों के जरिये बिक्री के लिए 100 टन अरहर दाल देने की पेशकश की। इन दालों की बिक्री मदर डेयरी के सफल और अन्य स्टोरों के जरिये 135 रुपये प्रति किलोग्राम के दर से की जाएगी। सरकार ने हाल ही में दालों की जमाखोरी रोकने के लिए आयातकों, निर्यातकों, डिपार्टमेंटल स्टोरों और लाइसेंसशुदा खाद्य प्रसंस्करणकर्ताओं पर भी भंडारण सीमा लगा दी थी।

बैठक के बाद इंडियन पल्सेस ऐंड ग्रेन्स एसोसिएशन के चेयरमैन प्रवीण डोंगरे ने कहा, 'कीमतें तभी कम हो सकती हैं जब आयातित दालों की उपलब्धता सुगम हो। ऐसे में आयातकों को भंडारण सीमा से छूट दी जानी चाहिए।' करीब 2.4 लाख टन आयातित अरहर और मसूर दाल बंबई बंदरगाह पर पड़ी है लेकिन महाराष्ट्र में भंडारण सीमा लागू होने से उसे उठाया नहीं जा रहा है। व्यापारियों का तर्क है कि अगर महाराष्ट्र में आयातकों को भंडारण सीमा से छूट दी जाती है तो बाजार में तत्काल 2.5 लाख टन दालों की आपूर्ति होगी, जिससे कीमतें कम हो सकती हैं। डोंगरे ने कहा कि आयातकों पर किसी तरह की बंदिश से आपूर्ति पर असर पड़ेगा, जिससे कीमतें उच्च स्तर पर बनी रह सकती हैं। इस बीच, गुजरात ने आयातकों को भंडारण सीमा से रियायत दी है। गुजरात सरकार ने स्टॉकिस्टों, प्रसंस्करणकर्ताओं और थोक विक्रेताओं के लिए सीमा 100 टन, वहीं रिटेलरों के लिए 5 टन तय की है। गुजरात का यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर दूसरे राज्य ऐसा नहीं करते हैं तो आयातक अपने दालों की खेप गुजरात के बंदरगाहों पर मंगा सकते हैं।

भारत मांग की पूर्ति के लिए सालाना 50 लाख टन दालों का आयात करता है। देश में 2014-15 में दालों की खपत 2.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है जबकि उत्पादन 1.723 करोड़ टन रहने का अनुमान है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम की मार के चलते करीब 18 लाख टन दालों का उत्पादन कम रहने का अनुमान है, जिसकी वजह से इसकी कीमतों में तेजी आई है। पिछले तीन माह के दौरान अरहर की खुदरा कीमतें 180 से 220 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच रही है। हालांकि सरकार की सख्ती के बाद हाजिर और वायदा बाजार में दालों की कीमतों में 10 से 15 फीसदी की कमी आई है। (BS Hindi)

Maize prices up in India, arrivals slow

Maize prices up in India, arrivals slow; DDGS is good buy; Ingredient prices to go up if EU bans GM product imports

Harvest in India continues and the reports are not very encouraging. The market yard prices range between Rs.13000/MT is Telangana; Rs.13640/MT in Rajasthan; Rs.13520/MT in Andhra Pradesh; Rs.13830/Mt in Uttar Pradesh (low 12800 – high Rs.15000/MT) . Tamil Nadu is not a producer state in Khariff and hence the prices were much higher at  Rs.147300/MT. The grains size is small, especially in drought hit areas.
This was also short week, with Dussehra in mid week and Muhram on the weekend, which possibly made supplies slow and lead to higher prices. Overall  the Future prices on NCDEX were up. Oct contract expired on 20th and was up 2.42% top Rs.13960/Mt; Nov up 3.11% to Rs.14240/MT; Dec up 3.32% to Rs.14330/MT; Jan up 3.69% to Rs.14600/MT and Feb up 4.06% to Rs.14870/MT. Spot prices were mixed, Nizambad up 1.20% to Rs.13865/MT; Davangere down 2.37% to Rs.14562/MT; Karimnagar up 0.12% to Rs.13750/MT; Sangli up 1.03% to Rs.14750/MT and Gulabbagh up 0.65% to Rs.14220/MT.
There has been an improvement un poultry prices across the country, which is good sign, but still price in some areas are below cost of production, which had shot up considerable due to increased ingredient prices especially corn and SBM. The end users are still wanting to buy non-conventional protein sources and prices have gone up for these as well. International prices of the protein meals, including SBM and DDGS  have been low. SBM on CBOT was trading at $302-305/MT and DDGS, a co product of the ethanol industry in the US containing 26-28% protein and 6% fat was quoted at $185MT (FOB US Gulf) and $195/MT (PNW). CNF price to Vietnam was indicated at $234/MT. Bangladesh traders/end users have received quotes for DDGS @ $236/MT (CNF Chittagong). CGM price in the US has been stable and it indicated at $615/MT (FOB).
A most recent report from European Union cites that if EU bans import of low priced, processed GM products, which includes SBM and also the products, its ingredient prices count increase by over 10 percent and this would eventually increase the prices of meat, milk and eggs in EU. Many of the EU countries import Gm products as feed ingredients and also some countries allow its planting as well.
Corn prices in US remain stable as the harvest progresses. As per an estimate almost 60 percent of the crop has been harvested. Dec corn was up 0.80% to $149.44/MT; Mar up 0.26% to $152.98/MT and May up 0.15% to $155.35/MT. FOB prices were indicated at $177-180/MT (US Gulf); 184-187/Mt (PNW).
Indian barley prices continue to move up as the crop is still to be planted. Spot price at Jaipur moved by 2.55% to Rs.14500/MT. Feed barley in US is priced at $225/MT..................Amit Sachdev, USGC Representative for India

23 October 2015

चना का एमएसपी 300 रुपये बढ़ाने की सिफारिष


आर एस राणा
नई दिल्ली। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने रबी विपणन सीजन 2016-17 के लिए चने का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 300 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाकर 3,475 रुपये प्रति क्विंटल करने की सिफारिष की है।
चना की पैदावार बढ़ाने के लिए सीएसपी ने एमएसपी में ज्यादा बढ़ोतरी की सिफारिष की है जबकि रबी विपणन सीजन 2015-16 के लिए चना का एमएसपी 3,175 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। हालांकि पिछले रबी में प्रतिकूल मौसम से चना की फसल प्रभावित हुई थी जिससे पैदावार में काफी कमी आई थी, इसी वजह से उत्पादक मंडियों में चना के भाव एमएसपी से उपर ही बने हुए हैं।
केंद्र सरकार द्वारा दालों पर स्टॉक लिमिट लगाने के साथ ही स्टॉकिस्टों और स्टोरियों पर षिंकजा कसने से चना की कीमतों में गिरावट आई है। दिल्ली के लारेंस रोड़ पर चना के भाव घटकर 5,000 रुपये प्रति क्विंटल रहे तथा दैनिक आवक 50 ट्रकों की हुई। मध्य प्रदेष की इंदौर मंडी में चना के भाव 4,700 रुपये, महाराष्ट्र की नागपुर मंडी में 5,000 रुपये, अकोला मंडी में 5,000 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 के पहले तीन महीनों अप्रैल से जून के दौरान 1.52 लाख टन चने का आयात हो चुका है जबकि वित्त वर्ष 2014-15 में 4.18 लाख टन चने का आयात हुआ था।
चना की बुवाई का सीजन षुरु हो चुका है लेकिन उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र, मध्य प्रदेष राजस्थान और उत्तर प्रदेष में सितंबर महीने में हुई सामान्य से कम बारिष के कारण खेतों में नमी की मात्रा कम है जिससे इसकी बुवाई में भी कमी आने की आषंका है। आगामी दिनों में चना की तेजी-मंदी केंद्र सरकार के रुख के साथ ही कुछ हद तक उत्पादक राज्यों में मौसम की स्थिति पर भी निर्भर करेगी।
रबी में चना की पैदावार में भारी कमी आई थी, साथ ही फसल की कटाई के समय बेमौसम बारिष से प्रति हैक्टेयर उत्पादकता के साथ ही क्वालिटी भी प्रभावित हुई थी। हालांकि आस्ट्रेलिया में चना की नई फसल आनी षुरु हो गई है तथा अनुकूल मौसम से आस्ट्रेलिया में चना की पैदावार भी पिछले साल से ज्यादा होने का अनुमान है लेकिन भारत की आयात मांग ज्यादा होने से आस्ट्रेलियाई चना के भाव भी तेज बने हुए है। उद्योग के अनुसार नवंबर महीने में आस्ट्रेलिया से एक लाख टन चना भारतीय बंदरगाह पर पहुंचेगा।
कृषि मंत्रालय के चौथे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल वर्ष 2014-15 में चना की पैदावार घटकर 71.7 लाख टन होने का अनुमान है। पिछले साल इसकी रिकार्ड पैदावार 95.3 लाख टन की हुई थी।.......आर एस राणा

कॉफी निर्यात में मामूली गिरावट

कॉफी बोर्ड के अनुसार कई कारणों से भारत का कॉफी निर्यात विपणन वर्ष 2014-15 में मामूली गिरावट के साथ 3,00,522 टन रह गया। इन कारणों में कॉफी की वैश्विक कीमतों में गिरावट आना भी शामिल है। पिछले वर्ष 3,03,250 टन का निर्यात हुआ था। कॉफी विपणन वर्ष अक्टूबर से लेकर सितंबर महीने तक का होता है। कॉफी बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'वर्ष 2014-15 के दौरान कॉफी के निर्यात में मामूली कमी आई थी।

भारतीय कॉफी किस्मों की वैश्विक मांग होने के बावजूद कई वैश्विक कारकों ने व्यापार फैसलों को प्रभावित किया।' बोर्ड के आंकड़ों में दर्शाया गया है कि मात्रा के स्तर पर हालांकि निर्यात में मामूली गिरावट आई है लेकिन विपणन वर्ष 2014-15 में मूल्य के संदर्भ में निर्यात बढ़कर 5,142 करोड़ रुपये का हो गया है जो पिछले वर्ष 4,920 करोड़ रुपये का था। प्रति इकाई मूल्य प्राप्ति वर्ष 2014-15 में बढ़कर  1,71,105 रुपये प्रति टन हो गया जो पूर्व वर्ष में 1,62,255 रुपये प्रति टन था। अधिकारी ने कहा कि कॉफी की वैश्विक कीमतों में काफी उतार चढ़ाव और ब्राजील, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे कई देशों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इन देशों की मुद्राओं में गिरावट के कारण व्यापार प्रभावित हुए।