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30 November 2015

दालों की स्टॉक सीमा का देशव्यापी विरोध


कारोबारियों ने दालों पर स्टॉक सीमा और उनके गोदामों पर छापेमारी के विरोध में कारोबार बंद करने की धमकी दी है। सैकड़ों मिल मालिक, खुदरा विक्रेता और स्टॉकिस्ट शनिवार को मुंबई के पास वाशी में इक्ट्ठा हुए और उन्होंने देश के तीन सबसे बड़े दलहन उत्पादक राज्यों- महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में वर्तमान छिपपुट विरोध को तेज करने का फैसला किया। उन्होंने इससे पहले चेतावनी दी थी कि अगर सरकार ने दालों पर स्टॉक सीमा खत्म नहीं की और हाल की खापेमारी में जब्त स्टॉक नहीं छोड़ा तो वे बेमियादी हड़ताल पर जाएंगे। वाशी स्थित स्टॉकिस्ट और दलहन कारोबारियों के प्रवक्ता देवेंद्र वोरा ने कहा, 'हम कई बार महाराष्ट्र सरकार के पास अपने प्रतिनिधिमंडल भेज चुके हैं, लेकिन  ऐसा लगता है कि अधिकारी हमारी चिंताओं को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। हमारे पास हड़ताल पर जाने के अलावा और कोई चारा नहीं है।'
महाराष्ट्र ने 18 अक्टूबर को अधिसूचना जारी की थी कि खुदरा विक्रेता सभी दालों का अधिकतम स्टॉक 300 टन रख सकते हैं। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और मध्य प्रदेश ने भी दालों पर स्टॉक सीमा लगा दी है। महाराष्ट्र ने अधिसूचना जारी होने के तीन घंटे बाद छापेमारी शुरू कर दी थी और दालों का बड़ा स्टॉक जब्त किया था। इसके बारे में सरकार का दावा था कि यह जमाखोरी है, जबकि स्टॉकिस्टों ने जरूरत के मुतााबिक किया गया आयात बताया था। देशभर में छापामारी से सभी तरह की करीब 80,000 टन दालें जब्त की गई थीं।
इंडिया पल्सेज ऐंड ग्रेन्स एसोसिएशन ( आईपीजीए) के वाइस-चेयरमैन बिमल कोठारी ने कहा, 'आमतौर पर कानून में कोई बदलाव करते समय स्टॉकिस्टों को अपना अतिरिक्त स्टॉक बेचने के लिए समय दिया जाता है। 18 अक्टूबर तक सभी सौदे उस समय के कानून के मुताबिक किए गए, इसलिए नया कानून लागू करने से पहले कारोबारियों को स्टॉक बेचने दिया जाए।'
कारोबारियों ने तीन दिन में अपना स्टॉक बेचने और सरकार के जब्त स्टॉक छोडऩे और स्टॉक सीमा वापस लेने तक नए सौदों से दूर रहने की चेतावनी दी है। कोठारी ने कहा, 'प्रमुख उत्पादक राज्यों में सूखे की वजह से इस साल उड़द का उत्पादन कम हुआ। हालांकि चने और मसूर का उत्पादन ठीक हुआ, लेकिन अरहर और उड़द की कीमतों में उछाल से चने की कीमतें भी बढ़ गईं। अरहर की नई फसल दिसंबर के तीसरे सप्ताह तक बाजार में आने और इसकी कीमत सामान्य स्तर पर आने के आसार हैं।' 
अरहर की दाल की कीमत खुदरा बाजारों में अक्टूबर में 200 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई थी और उड़द, चना और मसूर की कीमतें भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं। मध्य प्रदेश पल्सेज ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोतीराम वाधवानी ने कहा, 'जब तक स्थिति सामान्य नहीं होती तब तक हम तीन महीनों के लिए मिलों को बंद करना शुरू कर देंगे। चालू सीजन में हम नई दालें नहीं खरीदेंगे।' सरकार के पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक खरीफ सीजन में दालों का उत्पादन 55.6 लाख टन हुआ, जो 70 लाख टन के लक्ष्य और पिछले सीजन के उत्पादन 56.3 लाख टन से कम है। सरकार इस साल रबी सीजन में बुआई में तेजी से बढ़ोतरी की उम्मीद कर रही थी, लेकिन कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई से किसान आमदनी को लेकर चिंतित हैं। इस सीजन में अब तक रबी दलहनों के रकबे में 11 फीसदी बढ़ोतरी हुई है।  मध्य प्रदेश के होशंगाबाद स्थित नर्मदा दाल मिल ऐंड वेयरहाउस के मालिक योगेश प्रसाद पांडेय ने कहा, 'समस्या तब पैदा होगी जब आने वाले महीनों में नए सीजन की अरहर की फसल मिलों में प्रसंस्करण के लिए आनी शुरू होगी। सरकार को उससे पहले समस्याओं को सुझलाना चाहिए।'

27 November 2015

प्याज का बढ़ेगा उत्पादन


इस साल प्याज महंगा होने का असर अगले साल इसके उत्पादन पर दिख सकता है। दरअसल प्याज की अच्छी कीमत मिलने से किसान इसकी खेती ज्यादा करने पर जोर दे सकते हैं। जिससे आगामी रबी सीजन में प्याज का उत्पादन बढ़ सकता है। इस माह खरीफ प्याज की आवक बढऩे से मंडियों में प्याज के दाम गिर रहे हैं। अगले महीने से प्याज के दाम और गिर सकते हैं। हालांकि थोक के मुकाबले खुदरा बाजार में प्याज ज्यादा सस्ता नहीं हुआ है।
राष्टï्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठïान (एनएचआरडीएफ) के निदेशक आर पी गुप्ता ने बताया कि इस साल लंबे समय तक प्याज के दाम अधिक रहे हैं। जिससे किसान प्याज की खेती अधिक करने पर जोर दे सकते हैं। इस समय प्याज की नर्सरी लगाई जा रही है। पिछले साल के मुकाबले नर्सरी 10 फीसदी से ज्यादा लगने का अनुमान है। दिसंबर-जनवरी अवधि में प्याज की बुआई होगी जो पिछले साल के मुकाबले अधिक रह सकती है। लिहाजा अगले रबी सीजन में प्याज की पैदावार बढऩे की उम्मीद है।
महाराष्ट्र के प्याज किसान प्रदीप धगे ने कहा कि इस साल प्याज की अच्छी कीमत मिली है। इसलिए किसान रबी में ज्यादा प्याज लगाएंगे। कुल प्याज उत्पादन में रबी सीजन की हिस्सेदारी 60 फीसदी है। खरीफ सीजन के प्याज की आपूर्ति बढऩे से प्याज के दाम गिर रहे हैं। इस माह दिल्ली की आजादपुर मंडी में प्याज की मॉडल कीमत 2,590 रुपये से घटकर करीब 1,780 रुपये, महाराष्ट्र की लासलगांव मंडी में 2,200 रुपये से गिरकर 1,875 रुपये, इंदौर में 1,500 रुपये से घटकर 1,250 रुपये और अलवर में 2,275 रुपये से घटकर 1,595 रुपये प्रति क्विंटल रह गई है।
दिल्ली के खुदरा बाजार में प्याज 40 रुपये किलोग्राम बिक रहा है। आजादपुर मंडी के प्याज कारोबारी पी एम शर्मा ने कहा कि महाराष्ट्र गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में खरीफ प्याज की आवक बढऩे से प्याज की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। गुप्ता ने आगे कीमतों के बारे में बताया कि अगले माह खासकर दिल्ली में अलवर का प्याज बड़े पैमाने पर आने से दाम और गिरेंगे। देश के अन्य हिस्सों में प्याज सस्ता होने की संभावना है।

बेमौसम बारिश ने डुबोई रबी फसल

किसानों को इस साल फरवरी-अप्रैल के दौरान बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टि के चलते 20,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की 100 लाख टन रबी फसलों का नुकसान हुआ। सीएसई ने एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड ऐनवायरनमेंट (सीएसई) ने अपनी रिपोर्ट 'लिव्ड एनोमली' में कहा कि इसके परिणामस्वरूप भारत को चालू वर्ष में 10 लाख टन गेहूं का आयात करना पड़ सकता है क्योंकि पिछले रबी सीजन में बेमौसम बारिश के चलते करीब 68.2 लाख टन अनाज क्षतिग्रस्त हो गया। इस साल फरवरी-अप्रैल में 182.38 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फसल या संपूर्ण रबी बुआई रकबे का 29.61 प्रतिशत प्रभावित हुआ। इसका छह-सात प्रतिशत गेहूं की फसल थी।
रिपोर्ट में कहा गया है, 'प्रमुख खाद्यान्न फसलों के उत्पादन में गिरावट करीब 86.3 लाख टन थी जिससे 15,777 करोड़ रुपये मूल्य के खाद्यान्न का नुकसान हुआ। वहीं तिलहन के उत्पादन में 14.1 लाख टन गिरावट से 4,676 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ। कुल आर्थिक नुकसान करीब 20,453 करोड़ रुपये रहा।' सीएसई के अनुमानों के मुताबिक गेहूं के बुआई रकबे का 40 प्रतिशत, दलहन और तिलहन के बुआई रकबे का 14 प्रतिशत और मोटे अनाजों के बुआई रकबे का चार प्रतिशत बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से प्रभावित हुआ। सीएसई के उप महाप्रबंधक चंद्र भूषण ने कहा, 'हमने न्यूनतम समर्थन मूल्य को ध्यान में रखते हुए फसल नुकसान को मौद्रिक आंकड़ों में परिवर्तित करने में कुछ समय खर्च किया। अगर आप बागवानी क्षेत्र के नुकसान को छोड़कर बाकी आंकड़ों पर नजर डालें तो महज खाद्यान्न और तिलहन के लिए यह नुकसान 20,000 करोड़ रुपये बैठता है।'
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भारतीय किसान मौसम में तेज बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं और उनके लिए संरक्षण के उपाय किए जाने की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र में और गिरावट न आए। सीएसई के विशेषज्ञों की एक टीम ने मौसम में बदलाव से प्रभावित किसानों के लिए किए गए उपायों के असर, मौजूदा राहत और मुआवजे की व्यवस्था की भी पड़ताल की। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा, 'हमें मौसम में तेज बदलाव देखने को मिल रहा है। भारत में किसानों को कृषि क्षेत्र में परेशानी और मौसम में बदलाव की दोहरी मार का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए उनकी सहायता के लिए बेहतर संरक्षण व्यवस्था सहित कई उपाय किए जाने की जरूरत है।' (BS Hindi)

Rabi Crops Sowing Crosess 317 Lakh Hactare

As per preliminary reports received from the States. The total area sown under Rabi crops as on 27th November, 2015 stands to 317.96 lakh hectares.
             Wheat has been sown/transplanted in 117.32 lakh hectares, pulses in 90.91 lakh hectare coarse cereals in 44.40 lakh hectares, oilseeds in 57.08 lakh hectares and Rice in 8.26 lakh hectares.
 The details of the area covered so far and that covered during last year this time is as follows:
                                                                                                                              Lakh hectare 
Crop
Area sown in 2015-16
Area sown in 2014-15
Wheat
117.32
161.57
Pulses
90.91
97.80
Coarse Cereals
44.40
37.48
Oilseeds
57.08
65.73
Rice
8.26
10.04
Total
317.96
372.61

उत्तर प्रदेश के चीनी क्षेत्र के लिए कड़वा पेराई सीजन!


देश के सालाना चीनी उत्पादन में एक चौथाई योगदान वाला राज्य उत्तर प्रदेश गन्ने की कीमत और बकाये को लेकर एक और 'कड़वे' पेराई सीजन की तरफ बढ़ता लग रहा है। करीब एक दर्जन चीनी मिलों के चालू होने के साथ पेराई सीजन 2015-16 प्रारंभ हो गया है। इन मिलों में निजी और सहकारी दोनों क्षेत्रों की मिलें शामिल हैं, लेकिन निजी मिलों पर अब भी पिछले पेराई सीजन की गन्ने की बकाया राशि करीब 3,000 करोड़ रुपये है। 
चालू पेराई सीजन के लिए किसानों ने गन्ने की सामान्य किस्म की कीमत 350 रुपये प्रति क्विंटल मांगी है, जबकि कुछ ने तो 400 रुपये प्रति क्विंटल तक की कीमत मांगी है। उत्तर प्रदेश में 90 से अधिक निजी मिलों ने कहा है कि चीनी की घरेलू कीमतों में गिरावट से उनकी भुगतान क्षमता प्रभावित हुई है। चीनी उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम न प्रकाशित करने का आग्रह करते हुए बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि किसानों द्वारा मांगी गई कीमत और मिलों की तथाकथित भुगतान क्षमता के बीच भारी अंतर है। किसान 350 रुपये प्रति क्विंटल कीमत मांग रहे हैं, जबकि निजी मिलें केवल 190 से 192 रुपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान कर सकती हैं। चीनी क्षेत्र राजनीतिक हस्तक्षेप वाला क्षेत्र है क्योंकि 50 लाख किसान परिवार सीधे गन्ने की खेती से जुड़े हुए हैं। चीनी क्षेत्र खुद 30,000 करोड़ रुपये का होने का अनुमान है। इसके अलावा गन्ने का इस्तेमाल असंगठित बाजार में गुड़ एवं खांडसारी के उत्पादन में होता है। 
चालू सीजन के लिए केंद्र ने गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) करीब 230 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। यह आधार कीमत है, जो देश की चीनी मिलों को किसानों को चुकानी होगी। उत्तर प्रदेश हर साल राज्य परामर्शी कीमत (एसएपी) की घोषणा करता है। यह आमतौर पर एफआरपी से ज्यादा होती है, ताकि राजनीतिक वजहों से किसानों को खुश रखा जा सके। राज्य परामर्शी कीमत की व्यवस्था को निजी मिलों ने चुनौती देते हुए इसे स्वैच्छिक एवं कानून के खिलाफ बताया है।
उत्तर प्रदेश में पिछले बार राज्य परामर्शी कीमत वर्ष 2012-13 में 17 फीसदी बढ़ाकर 280 रुपये प्रति क्विंटल (सामान्य किस्म) की गई थी। उत्तर प्रदेश में इस नकदी फसल में ज्यादार हिस्सा सामान्य किस्म का ही होता है। इसके बाद के पेराई सीजनों वर्ष 2013-14 और 2014-15 में एसएपी को 280 रुपये प्रति क्विंटल पर ही बरकरार रखा गया है। पिछली बार एसएपी की घोषणा 12 नवंबर को की गई थी। मिलों से कहा गया था कि वे 240 रुपये का अगाऊ भुगतान करें और शेष हिस्सा पेराई सीजन के अंत में दें, ताकि किसानों और मिलों दोनों के ही हितों का संरक्षण हो सके। कई मौकों पर उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार कह चुकी है कि चीनी बाजार की प्रतिकूल स्थितियों के कारण किसानों और मिलों दोनों को ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। 
घरेलू कीमतों में गिरावट की वजह घरेलू चीनी बाजार में सरप्लस और निर्यात प्रतिबंधों को बताया जा रहा है। केंद्र ने घरेलू चीनी कंपनियों की मदद के लिए चीनी निर्यात के नियमों को उदार बना दिया है और 6,000 करोड़ रुपये के सॉफ्ट लोन के प्रावधान की घोषणा की है। इस बीच पेराई सीजन चालू महीने के अंत तक अपने चरम पर होने के आसार हैं और तब तक 115 से अधिक मिलें चालू हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 नवंबर को निजी मिलों से 20 नवंबर तक पेराई चालू करने को कहा था। 

चावल की सरकारी खरीद 134 लाख टन के पार


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में चावल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद बढ़कर 134.79 लाख टन की हो चुकी है। चालू सीजन में मंडियों में अभी तक 226.21 लाख टन धान की आवक हो चुकी है।
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार चालू खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में एमएसपी पर चावल की बढ़कर 134.79 लाख टन की हो चुकी है जबकि पिछले विपणन सीजन की समान अवधि में 104.75 लाख टन चावल की ही खरीद हुई थी। उत्पादक राज्यों की मंडियों में अभी तक 226.21 लाख टन धान की आवक हो चुकी है जबकि पिछले विपणन सीजन की समान अवधि में 184.27 लाख टन धान की आवक हुई थी।
चवल की अभी तक हुई खरीद में पंजाब की हिस्सेदारी 92.83 लाख टन, हरियाणा की 28.51 लाख टन चंडीगढ़ की 16,338 टन, गुजरात की 283 टन, जम्मू-कष्मीर की 3,284 टन, केरल की 92,167 टन, मध्य प्रदेष की 35,440 टन, तमिलनाडु की 39,918 टन, उत्तर प्रदेष की 3.47 लाख टन तथा उत्तराखंड की 39,392 टन है। चालू खरीफ में केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 300 लाख टन चावल की खरीद का लक्ष्य किया है जबकि 321.61 लाख टन चावल की खरीद हुई थी।
उत्पादक मंडियों में अब धान की दैनिक आवक पहले की तुलना में कम हुई है जबकि स्टॉकिस्टों के साथ ही मिलों की मांग बढ़ने से धान के साथ ही चावल की कीमतों में तेजी आई है। चालू सीजन में चावल का निर्यात 8 से 10 फीसदी बढ़ने का अनुमान है इसलिए धान के साथ ही चावल की कीमतों में और भी तेजी आने का अनुमान है।
करनाल में पूसा-1,121 बासमती धान की कीमतों बढ़कर गुरुवार को 2,900 से 2,950 रुपये, पूसा-1,509 की 2,050 से 2,100 रुपये, डुप्लीकेट बासमती की 2,300 से 2,400 रुपये, सुंगधा की 1,700 से 1,800 रुपये तथा सरबती की 1,600 से 1,700 रुपये प्रति क्विंटल हो गई। पूसा-1,121 बासमती चावल के सेले का भाव 4,600 रुपये, स्टीम का 5,700 रुपये और रॉ का भाव 5,200 रुपये प्रति क्विंटल हो गया।
कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू खरीफ सीजन 2015-16 में चावल की पैदावार 9.06 करोड़ टन होने का अनुमान है जबकि फसल सीजन 2014-15 खरीफ में इसकी 9.08 करोड़ टन की हुई थी।-------
आर एस राणा

गेहूं की बुवाई 300 लाख हैक्टेयर से ज्यादा होने का अनुमान -डीडब्ल्यूआर


पछेती बुवाई से प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में कमी आने की आषंका
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू रबी सीजन में गेहूं की बुवाई 300 लाख हैक्टेयर से ज्यादा होने का अनुमान है लेकिन पछेती बुवाई होने से प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में कमी आने की आषंका है। इस बार अभी तक गेहूं की बुवाई पिछले साल की तुलना में 28 फीसदी से ज्यादा पिछड़ रही है।
गेहूं अनुसंधान निदेषालय (डीडब्लूआर) की प्रोजेक्ट डायरेक्टर इंदु षर्मा ने बताया कि गेहूं की बुवाई में देरी जरुर हुई है लेकिन प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेष और उत्तर प्रदेष में किसान गेहूं की बुवाई को ही तरजीह दे रहे हैं हां इन राज्यों में गेहूं की पछेती बुवाई ज्यादा हो रही है। उन्होंने बताया कि चालू रबी में बुवाई तो 300 लाख हैक्टेयर से भी ज्यादा क्षेत्रफल होने का अनुमान है लेकिन बुवाई में देरी के कारण गेहूं की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में जरुर कमी आने की आषंका है। इससे कुल पैदावार पिछले साल की तुलन में कम होने का अनुमान है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई अभी तक केवल 78.83 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई 107.35 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी।
मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार गेहूं का उत्पादन 2015-16 में 906.1 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 2014-15 में 889.4 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ था।.......आर एस राणा

24 November 2015

लालमिर्च की कीमतों में दिसंबर में तेजी की संभावना


प्रमुख उत्पादक राज्य आंध्रप्रदेष में स्टॉक कम, नई फसल की आवक जनवरी के आखिर में
आर एस राणा
नई दिल्ली। लालमिर्च में दिसंबर में निर्यातकों के साथ ही घरेलू मसाला कंपनियों की मांग निकलने से कीमतों में तेजी आने का अनुमान है। मध्य प्रदेष में तो लालमिर्च की पैदावार में कमी आई ही है, साथ ही आंध्रप्रदेष में लालमिर्च का बकाया स्टॉक पिछले साल की तुलना में कम है जबकि मौजूदा हालात में लालमिर्च की नई पैदावार भी पिछले साल की तुलना में कम होने का अनुमान है।
गुंटूर मंडी मंे मंगलवार को 334 किस्म की लालमिर्च के भाव 10,500 से 12,100 रुपये, तेजा क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 10,500 से 11,500 रुपये प्रति क्विंटल, 341 क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 11,000 से 12,300 रुपये, ब्याडगी क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 10,400 से 11,000 रुपये प्रति क्विंटल तथा फटकी क्वालिटी की लालमिर्च के भाव 8,500 से 9,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
चीन में लालमिर्च की नई फसल आने से नवंबर महीने में देष से लालमिर्च के निर्यात में कमी देखी गई, इस समय केवल श्रीलंका और बंगलादेष की आयात मांग निकल रही है लेकिन अब चीन में दैनिक आवक घट रही है जिससे उम्मीद है दिसंबर में भारत से लालमिर्च के निर्यात में बढ़ोतरी आयेगी। आंध्रप्रदेष में इस समय लालमिर्च का केवल 10 से 11 लाख बोरी का स्टॉक ही बचा हुआ है जबकि नई फसल की दैनिक आवक जनवरी के आखिर में ष्षुरु होगी। वैसे भी आंध्रप्रदेष में साइक्लोन से लालमिर्च की फसल को नुकसान भी हुआ है। कुछ क्षेत्रों में बारिष की कमी भी है। ऐसे में लालमिर्च की पैदावार आंध्रप्रदेष में पिछले साल की तुलना में घटने की आषंका है। हालांकि उत्पादक राज्यों में अभी बारिष हो जाती है तो फसल के लिए अच्छी होगी। इससे प्रति हैक्टेयर उत्पादकता में बढ़ोतरी हो सकती है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 की पहली तिमाही अप्रैल से जून के दौरान लालमिर्च के निर्यात में 4 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 81,000 टन का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 77,720 टन का ही हुआ था। चालू वित्त वर्ष में निर्यात का कुल लक्ष्य 3.15 लाख टन का है। विष्व बाजार में भारतीय लालमिर्च के भाव 3.42 डॉलर प्रति किलो है जबकि पिछले साल इस समय भाव 2.57 डॉलर प्रति किलो थे।.......आर एस राणा

Press Statement from Mr. A. Vellayan, President, ISMA

On behalf of the Indian sugar industry, we welcome the following steps taken by the Government to help the sugar industry and sugarcane farmers to come out of the current financial crisis:- 

(i)            Adoption of a fixed pricing policy linked to sugarcane price for ethanol procurement which has ensured quicker finalization of offers.

(ii)          Removal of Central Excise duty on ethanol which has given higher returns to mills/suppliers of around Rs. 5 per litre.

(iii)         Decision to move to 10% ethanol blending with petrol which has increased the demand for fuel ethanol to 266 crore litres.

(iv)         Announcement of interest free loan of around Rs. 6000 crore to the sugarcane farmers, which has resulted in reduction of cane price arrears of Rs. 4000 crore.

(v)          Timely decision in September 2015 to export 4 million tons of sugar, duly fixing an export quota for each sugar mill for exporting the same in 2015-16 SS.

The Government has recently decided to assist the sugar mills with a production subsidy of Rs. 4.50 per quintal of sugarcane crushed during 2015-16 SS, amounting to a total of Rs. 1147 crore.  We acknowledge that this is the first time ever that the Central Government will be paying a part of the cane price, fixed as FRP, directly to the cane farmers.  This shows Government’s commitments towards both the sugar industry and the farmers at large.  We welcome this decision of the Government to directly participate in payment of cane price, especially when the revenue realization of sugar mills is not good.

While thanking the Government for the above positive steps taken to help the industry revive from a major financial crisis, ISMA has requested that the State Governments, who are not permitting production of fuel ethanol or delaying excise permissions or creating impediments on inter-state movements by imposing taxes and duties on such an important fuel, should be convinced to remove these impediments.  It will not only replace some of the imported petroleum and reduce foreign exchange outgo but will directly benefit the sugarcane farmers in the country.

ISMA also acknowledges the fact that the Central Government is taking steps to rationalize sugarcane pricing policy.  We would continue to request acceptance of the recommendations of the Commission on Agricultural Costs and Prices (CACP) for a revenue sharing or a cane price-sugar price linkage formula along with the Price Stabilization Fund to bridge the gap between FRP and what the industry can pay.

The industry is responding in the best possible manner by trying to export sugar, even though exports are unviable and the mills are losing money.  The industry body Indian Sugar Exim Corporation (ISEC) was accordingly asked by us to take the lead, who have responded well by contracting for one lac tons of export contracts in October 2015.

The industry has responded well by contracting for 104 crore litres of ethanol supplies (against 78 crore litres in 2014-15), which will straightaway save the Government almost Rs.5000 crore of foreign exchange.  We expect to contract for more ethanol supplies, in the next couple of months for the upcoming season, as and when EoIs are invited by oil marketing companies.

On behalf of the sugar industry, ISMA would assure the Government that the industry will do its best to achieve the targets set by it for the industry on sugar exports and ethanol blending with petrol.

23 November 2015

मार्च तक देशभर में लागू होगा खाद्य सुरक्षा कानून : पासवान


तमिलनाडु को छोड़कर देश के सभी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश मार्च, 2016 तक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे में आ जाएंगे। यह बात आज खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने कही। उन्होंने बताया कि अभी तक 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस कानून को लागू किया है, जबकि 14 राज्य ऐसा करने की प्रक्रिया में हैं। खाद्य सुरक्षा कानून संसद में 2013 में पारित किया गया था और राज्य सरकारों को इसे लागू करने के लिए एक साल का समय दिया गया था। तब तक समय सीमा तीन बार बढ़ाई जा चुकी है और पिछले बार की समय सीमा बीते सितंबर में समाप्त हो गई। खाद्य कानून के तहत देश की दो तिहाई आबादी को प्रतिमाह 1 से 3 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर प्रति व्यक्ति पांच किलोग्राम तक खाद्यान्न सब्सिडी पाने का कानूनी हक मिला हुआ है।
राज्यों के खाद्य सचिवों के साथ नई दिल्ली में एक समीक्षा बैठक के बाद पासवान ने संवाददाताओं को बताया, 'तमिलनाडु को छोड़कर अन्य सभी राज्यों ने कहा है कि वे मार्च, 2016 के अंत तक खाद्य सुरक्षा कानून लागू करेंगे।' मंत्री ने कहा कि जिन 14 राज्यों ने खाद्य कानून लागू नहीं किया है, उनमें आंध्र प्रदेश और सिक्किम ने कहा है कि वे इसे दिसंबर में लागू करेंगे। वहीं, उत्तर प्रदेश, मेघालय, जम्मू-कश्मीर और अंडमान व निकोबार इसे जनवरी, 2016 में लागू करेंगे, जबकि अन्य राज्य- गुजरात, केरल, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड इसे अगले साल मार्च तक लागू करेंगे। बैठक में तमिलनाडु सरकार के अधिकारियों ने कहा कि चूंकि राज्य सरकार युनिवर्सल पीडीएस लागू कर रही है, इसलिए इस कानून को जुलाई, 2016 में लागू किया जा सकता है।

कम उत्पादन नहीं बल्कि आपूर्ति में अड़चनों से बढ़े टमाटर के दाम

खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि टमाटर के उत्पादन में कोई गिरावट नहीं आई है और वर्षा प्रभावित दक्षिण भारत से आपूर्ति बाधाओं के कारण कीमतें बढ़कर लगभग 60 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई हैं। पासवान ने संवाददाताओं से कहा, 'देश में टमाटर के उत्पादन में कोई कमी नहीं है। दक्षिण भारत में बारिश और परिवहन की समस्याओं के कारण कीमतें बढ़ी हैं।'
उन्होंने कहा कि टमाटर की कीमतों में तेजी मौसमी मामला भी है और कीमत की स्थिति, आपूर्ति में सुधार के साथ सामान्य हो जाएगी। अधिकांश खुदरा बाजारों में टमाटर की कीमतों में पिछले कुछ दिनों के दौरान भारी तेजी आई है और यह 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया है। बारिश से प्रभावित चेन्नई में पिछले सप्ताह प्याज की कीमत 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक हो गई थी। कैबिनेट सचिव पी के सिन्हा ने पिछले सप्ताह टमाटर कीमत की स्थिति की समीक्षा की थी और संबंधित मंत्रालय को निर्देश दिया कि कीमतों पर करीबी निगाह रखें। दालों की महंगाई के बारे में पासवान ने कहा कि कीमतों में वृद्धि मुख्यत: दलहनों की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर के कारण है। कुछ दालों के भाव अब भी 180 रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने दलहनों की कीमतों में तेजी को नियंत्रित करने के लिए इसके स्टॉक रखने की सीमा को लागू करने और जमाखोरों, आयातकों के खिलाफ कार्रवाई सहित कई अन्य उपाय किए हैं। पासवान ने कहा कि दलहनों का उत्पादन करीब 1.75 करोड़ टन है जबकि इसकी मांग करीब 2.5 करोड़ टन है। इसके अंतर को आयात के जरिए पूरा किया जाता है। (BS Hindi)

पांच साल के निचले स्तर पर ग्वार


ग्वार की कीमतों में गिरावट का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाजिर और वायदा बाजार में ग्वार की कीमतें गिरकर करीब पांच साल के निचले स्तर पर पहुंच गईं। ग्वार गम 7,000 रुपये और ग्वार सीड 3,400 रुपये प्रति क्विंटल के नीचे फिसल गया। लगातार कमजोर विदेशी मांग और मंडियों में आ रही बेहतर आपूर्ति की वजह से कीमतों में आगे भी गिरावट फिलहाल थमने की संभावना नहीं है।
कमजोर निर्यात के कारण ग्वार का गम लगातार बढ़ता जा रहा है। वायदा में ग्वार गम की कीमतें गिर कर 7,000 रुपये प्रति क्ंिवटल के नीचे पहुंच गईं। एनसीडीईएक्स पर ग्वार गम करीब 4 फीसदी की गिरावट के साथ 6,910 रुपये प्रति क्ंिवटल हो गया। ग्वार सीड के दाम भी गिरकर 3,400 रुपये प्रति क्ंिवटल के करीब पहुंच गए। एनसीडीएक्स पर ग्वार सीड के सभी अनुबंधों पर चार फीसदी का लोअर सर्किट लग गया। दिसबंर अनुबंध गिरकर 3,408 रुपये प्रति क्ंिवटल पर पहुंच गया। वायदा की गिरावट का असर हाजिर बाजार में भी देखने को मिला। हाजिर बाजार में ग्वार गम के दाम गिरकर 6,800 रुपये और ग्वार सीड का भाव लुढ़कर 3,400 रुपये प्रति क्ंिवटल हो गया। सात हजार रुपये प्रति क्ंिवटल के नीचे ग्वार गम की कीमत 20 जनवरी 2011 को थी। इस दिन ग्वार गम के भाव 6,985 रुपये पर बंद हुए थे जबकि ग्वार सीड 3,365 रुपये प्रति क्विंटल हो गई थी।
बीकानेर उद्योग मंडल के प्रवक्ता पुखराज चोपड़ा कहते हैं कि इस समय औसतन हर दिन एक लाख बोरी ग्वार की आपूर्ति हो रही है जिसमें से क्रॉसिंग मिलें करीब 30 हजार बोरी खरीद कर रही है जबकि 70 हजार बोरी का हर दिन स्टॉक बाजार में जमा हो रहा है। जिसके कारण कीमतें गिर रही हैं। कीमतों में भारी गिरावट से किसान, कारोबारी और मिलर्स सभी की परेशानियां बढ़ गई हैं। विदेशी मांग न होने के कारण ग्वार मिलें बंद हो रही हैं और जो आंशिक रूप से चल रही हैं उनके पास ग्वार गम का स्टॉक बढ़ रहा है जिससे मिलर घाटे में जा रहे हैं। किसान अपना माल मंडियों में लेकर आ रहे हैं लेकिन उनको सही दाम नहीं मिल रहा है जिससे ग्वार घाटे का सौदा हो रहा है।
चोपड़ा कहते हैं कि ग्वार सीड और गम की कीमतों में औसत तीन का रेश्यो  चलता है क्योंकि एक क्ंिवटल सीड से करीब 30 किलो गम निकलता है जबकि इस समय ग्वार सीड और ग्वार के भाव का रेश्यो घटकर 2.1 रह गया है जो घाटे की वजह बन रही है। वह कहते हैं कि स्थिति भयानक हो चुकी है इस पर ध्यान देना होगा क्योंकि किसान और कारोबारी सब परेशान हैं।
ग्वार गम और दूसरे ग्वार उत्पादों के निर्यात में भारी गिरावट की वजह कमजोर मांग बताई जा रही है। कारोबारियों का कहना है भारत से सबसे ज्यादा ग्वार का निर्यात अमेरिका को होता था लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के कारण अमेरिका और दूसरे तेल उत्पादक देशों ने अपने यहां तेल उत्पादन कम कर दिया। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में ग्वार उत्पादों के निर्यात में 52 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। ग्वार और उसके उत्पादों के निर्यात संबंधित प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक इस साल अप्रैल से सितंबर के दौरान सिर्फ 1.62 लाख टन ग्वार और उसके उत्पादों का निर्यात हुआ है जबकि वित्त वर्ष 2014-15 की पहली छमाही के दौरान 3.39 लाख टन ग्वार उत्पादों का निर्यात हुआ था।  (BS Hindi)

सरसों की बुवाई में 10 से 15 फीसदी की कमी आने की आषंका-उद्योग


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू रबी में सरसों की बुवाई में 10 से 15 फीसदी की कमी आने की आषंका है। फसल सीजन 2014-15 में देष में 65 लाख हैक्टेयर में सरसों की बुवाई हुई थी।
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएषन आफ इंडिया (एसईए) के अध्यक्ष प्रवीन एस लूखंड के अनुसार उत्तर भारत में मानसूनी बारिष की कमी से खेतों में नमी की मात्रा कम है जिसका असर इसकी बुवाई पर पड़ा है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में किसानों के सरसों के बजाए चना या फिर अन्य दलहनी फसलों की बुवाई ज्यादा की है जिससे इसकी बुवाई में 10 से 15 फीसदी की कमी आने की आषंका है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में अभी तक देषभर में 42.51 लाख हैक्टेयर में सरसों की बुवाई हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 54.07 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।
उन्होंने कहां कि किसानों का तिलहनी फसलों से मोहभंग हो रहा है तथा पिछले दो साल से इसकी पैदावार में भारी कमी देखी जा रही है जिसका सीधा असर उद्योग पर पड़ रहा है। उद्योग के सामने कच्चे माल की उपलब्धता कम रहती है साथ ही आयात पर निर्भरता बढ़ रही है। इसको देखते हुए केंद्र सरकार को पाम आयल की खेती को बढ़ावा देना चाहिए जिससे देष में खाद्य तेलों के आयात में कमी लाई जा सके। सरकार ने तिलहनों की पैदावार बढ़ाने के लिए पॉम आयल की स्कीम तो बना रखी है लेकिन उसमें काम काफी धीमी गति से हो रहा है।
उन्होंने बताया कि देष में तिलहनों की पैदावार कम होने के परिणामस्वरुप तेल वर्ष 2014-15 (नवंबर-14 से अक्टूबर-15) के दौरान रिकार्ड 146.1 लाख टन वनस्पति तेलों (खाद्य और अखाद्य तेल मिलाकर) का आयात हो चुका है जोकि पिछले साल 118.2 लाख टन तेलों का आयात हुआ था।.......आर एस राणा

आंध्रप्रदेष और महाराष्ट्र में बारिष से हल्दी की पैदावार घटने की आषंका


मध्य दिसंबर तक भाव में तेजी रहने की संभावना
आर एस राणा
नई दिल्ली। हल्दी के प्रमुख उत्पादक राज्यों आंध्रप्रदेष और महाराष्ट्र में बारिष की कमी से हल्दी की पैदावार में कमी आने की आषंका है इसलिए हल्दी की कीमतों में तेजी बनी हुई है। उत्पादक मंडियों में महीने भर में हल्दी की कीमतों में करीब 2,500 से 3,000 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आ चुकी है। आंध्रप्रदेष की निजामाबाद मंडी में हल्दी के भाव 9,500 से 10,000 रुपये और तमिलनाडु की इरोड़ मंडी में 9,800 से 10,200 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
चालू सीजन में हल्दी की बुवाई तो अच्छी हुई है लेकिन आंध्रप्रदेष के निजामाबाद और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में बारिष की कमी से प्रति हैक्टेयर पैदावार में कमी आने की आषंका है। हालांकि तमिलनाडु में अभी तक मौसम फसल के अनुकूल रहा है जिससे कुल पैदावार पिछले साल की तुलना में ज्यादा होगी, लेकिन देष में हल्दी की कुल पैदावार पिछले साल से कम होने की आषंका है। माना जा रहा है कि नई फसल की पैदावार 55 से 60 लाख बोरी (एक बोरी-70 किलो) ही होगी जबकि इस समय उत्पादक मंडियों में हल्दी का बकाया स्टॉक 25 से 30 लाख बोरी का बचा हुआ है। नई फसल तक इसमें से करीब 15 से 18 लाख बोरी की खपत हो जायेगी।
आंध्रप्रदेष और महाराष्ट्र में बारिष हो जाती है तो फिर हल्दी की फसल को फायदा होगा जिसका असर इसकी कीमतों पर भी पड़ेगा। घरेलू मार्किट में भाव उंचे होने के कारण हल्दी की निर्यात सौदों में भी पहले की तुलना में कमी कमी आई है। वैसे भी हल्दी की कीमतों में आई भारी तेजी का प्रमुख स्टॉकिस्टों की पकड़ मजबूत होना है। ऐसे में माना जा रहा है कि हल्दी की कीमतों में तेजी मध्य दिसंबर तक जारी रह सकती है उसके बाद भाव में गिरावट आ सकती है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 में हल्दी की पैदावार 24,500 टन होने का अनुमान है जबकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 22,699 टन का हुआ था। मसाला बोर्ड ने चालू वित वर्ष में निर्यात का लक्ष्य 80,000 टन का रखा है।..........आर एस राणा

20 November 2015

खरीफ में बारिष की कमी से रबी फसलों की बुवाई पिछड़ी


गेहूं के साथ ही सरसों की बुवाई कम, चना की बुवाई में हुई बढ़ोतरी
आर एस राणा
नई दिल्ली। सितंबर महीने में मानसूनी बारिष की कमी का असर रबी फसलों की बुवाई पर पड़ रहा है। रबी की प्रमुख फसल गेहूं और सरसों की बुवाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ी है। हालांकि रबी दलहन की प्रमुख फसल चना की बुवाई में बढ़ोतरी हुई है। रबी सीजन में देषभर में अभी तक 242.16 लाख हैक्टेयर में ही रबी फसलों की बुवाई हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 276.94 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी।
कृषि मंत्रालय के अनुसार रबी की प्रमुख फसल गेहूं की बुवाई अभी तक 78.83 लाख हैक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 107.35 लाख हैक्टेयर में इसकी बुवाई हो चुुकी थी। रबी दलहन की प्रमुख फसल चना की बुवाई बढ़कर 52.43 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई 50.22 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। दलहन की कुल बुवाई चालू रबी में अभी तक 74 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 77.42 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी।
मोटे अनाजों की बुवाई में चालू रबी में बढ़ोतरी हुई है। मंत्रालय के अनुसार मोटे अनाजों की बुवाई बढ़कर 38.48 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुवाई 30.87 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई थी। मोटे अनाजों में ज्वार के साथ ही मक्का की बुवाई चालू रबी में बढ़ी है। मक्का की बुवाई बढ़कर 4.28 लाख हैक्टेयर में और ज्वार की 31.48 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है।
तिलहनों की बुवाई भी चालू रबी में अभी तक केवल 50.56 लाख हैक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 60.51 लाख हैक्टेयर में इनकी बुवाई हो चुकी थी। रबी तिलहन की प्रमुख फसल सरसों की बुवाई 42.51 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 54.07 लाख हैक्टेयर में सरसों की बुवाई हो चुकी थी। मूंगफली की बुवाई भी पिछले साल के 1.97 लाख हैक्टेयर से घटकर 1.78 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है।----------------आर एस राणा

चावल की सरकारी खरीद 128 लाख टन के पार


धान की कीमतों में आगामी दिनों में और तेजी की संभावना
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में चावल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद बढ़कर 128.72 लाख टन की हो चुकी है। चालू सीजन में मंडियों में अभी तक 213.05 लाख टन धान की आवक हो चुकी है।
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार चालू खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में एमएसपी पर चावल की बढ़कर 128.72 लाख टन की हो चुकी है जबकि पिछले विपणन सीजन की समान अवधि में 100.98 लाख टन चावल की ही खरीद हुई थी। उत्पादक राज्यों की मंडियों में अभी तक 2013.05 लाख टन धान की आवक हो चुकी है जबकि पिछले विपणन सीजन की समान अवधि में 175.26 लाख टन धान की आवक हुई थी।
चवल की अभी तक हुई खरीद में पंजाब की हिस्सेदारी 91.06 लाख टन, हरियाणा की 28.44 लाख टन चंडीगढ़ की 16,338 टन, गुजरात की 283 टन, जम्मू-कष्मीर की 2,470 टन, केरल की 76,933 टन, मध्य प्रदेष की 9,815 टन, तमिलनाडु की 39,357 टन, उत्तर प्रदेष की 2.61 लाख टन तथा उत्तराखंड की 39,392 टन है। चालू खरीफ में केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 300 लाख टन चावल की खरीद का लक्ष्य किया है जबकि 321.61 लाख टन चावल की खरीद हुई थी।
उत्पादक मंडियों में अब धान की दैनिक आवक पहले की तुलना में कम हुई है जबकि स्टॉकिस्टों के साथ ही मिलों की मांग बढ़ने से धान के साथ ही चावल की कीमतों में तेजी आई है। चालू सीजन में चावल का निर्यात 8 से 10 फीसदी बढ़ने का अनुमान है इसलिए धान के साथ ही चावल की कीमतों में और भी तेजी आने का अनुमान है।
करनाल में पूसा-1,121 बासमती धान की कीमतों बढ़कर गुरुवार को 2,400 से 2,470 रुपये, पूसा-1,509 की 1,650 से 1,700 रुपये, डुप्लीकेट बासमती की 2,250 रुपये, सुंगधा की 1,400 रुपये तथा सरबती की 1,350 रुपये प्रति क्विंटल हो गई। पूसा-1,121 बासमती और पूसा-1,509 बासमती धान की कीमतों में पिछले चार-पांच दिनों में करीब 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आई है। पूसा-1,121 बासमती चावल के सेले का भाव 4,200 रुपये, स्टीम का 4,800 रुपये और रॉ का भाव 4,500 रुपये प्रति क्विंटल हो गया।
कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू खरीफ सीजन 2015-16 में चावल की पैदावार 9.06 करोड़ टन होने का अनुमान है जबकि फसल सीजन 2014-15 खरीफ में इसकी 9.08 करोड़ टन की हुई थी।...........आर एस राणा

आपूर्ति में कटौती कम, जिंसों में आएगी गिरावट : गोल्डमैन


जिंसों की कीमतों में एक बड़ी गिरावट और आ सकती है क्योंकि चीन जैसे खपत वाले प्रमुख देशों में कम मांग को देखते हुए ऊर्जा, धातु एवं कृषि उत्पादकों द्वारा आपूर्ति में की गई कटौती मांग-आपूर्ति का संतुलन स्थापित करने के लिए नाकाफी है। अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने एक नोट में यह बात कही है। धीमी वैश्विक आर्थिक वृद्धि और चीन के विनिर्माण की तुलना में खपत की तरफ झुकाव से कच्चे माल की कीमतों में लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है। 19 जिंसों की कीमतों वाला थॉमसन रॉयटर्स जैफरीज सीआरबी सूचकांक इस साल 20 फीसदी गिरा है, जो वर्ष 2008 के बाद सबसे बड़ी सालाना गिरावट है।
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने एक नोट में लिखा, 'इस कमजोरी का स्तर हमारे शुरुआती अनुमानों से काफी आगे निकल गया है।' इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका और ओपेक के तेल उत्पादक आपूर्ति में कटौती कर सकते हैं, जिससे वर्ष 2016 के आखिर तक बाजार में संतुलन कायम होने में मदद मिल सकती है। धातु एवं थोक बाजारों में आपूर्ति कम करने को लेकर प्रतिक्रियाएं और कमजोर हैं। विश्लेषकों ने कहा, 'जिंसों की कीमतों के वर्तमान स्तरों से भी कम पर कारोबार करने की स्थिति में ही आपूर्ति में कटौती एवं संतुलन कायम हो सकता है। कच्चे तेल के भंडारण अब तक के सर्वोच्च स्तर के आसपास पहुंच गया है और यह बैंक चेतावनी दे रहा है कि अगर अति आपूर्ति भंडारण क्षमता से आगे निकल गई तो कीमतें गिरकर उत्पादन लागत के बराबर आ सकती हैं।' बैंक ने अगले तीन महीने के पूर्वानुमान में कहा है कि यूएस क्रूड 38 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट 43 डॉलर प्रति बैरल रहेगा। इस समय ये क्रमश: 40.76 डॉलर और 44.43 डॉलर प्रति बैरल पर हैं।
गोल्डमैन सैक्स ने कहा कि आपूर्ति में कटौती संतुलन कायम करने के लिए नाकाफी है और उभरते बाजारों में कमजोरी से जिंसों की मांग ने भी निराश किया है। उभरते बाजारों में कमजोरी से विशेष रूप से तांबे और लौह अयस्क की खपत में भारी कमी आई है।  बैंक का मानना है कि वर्ष 2016 के अंत तक लंदन में तांबे की कीमतें गिरकर 4,500 डॉलर प्रति टन पर आ जाएंगी। उसने कहा कि चीन में सुस्त मांग से कीमतों में गिरावट का जोखिम बढ़ा है। बैंक का मानना है कि लौह अयस्क के दाम अगले साल गिरकर 44 डॉलर प्रति टन और वर्ष 2017 में 40 डॉलर प्रति टन पर आ जाएंगे। इस समय तांबा 4,600 डॉलर और हाजिर लौह अयस्क 45.80 डॉलर पर कारोबार कर रहा है।  (BS Hindi)

गन्ना किसानों को रास नहीं आ रही सब्सिडी


केंद्र सरकार की ओर से गन्ना किसानों को दी गई सब्सिडी का जहां उत्तर प्रदेश के चीनी मिल मालिकों ने स्वागत किया है, वहीं किसानों ने इसे नाकाफी बताते हुए राहत के नाम पर मजाक करार दिया है। हालांकि प्रदेश सरकार का मानना है कि इससे वर्तमान पेराई सत्र के लिए गन्ना मूल्य निर्धारण में आंशिक ही सही पर सहूलियत रहेगी। प्रदेश के गन्ना किसानों का कहना है कि एक तरफ तो सरकार चीनी मिल मालिकों पर उनका बकाया 1,306 करोड़ रुपये का ब्याज माफ कर देती है लेकिन दूसरी ओर उन्हें सब्सिडी के नाम पर महज चंद रुपये दिए जा रहे हैं। प्रदेश के गन्ना किसानों के नेता और मिल मालिकों के खिलाफ बकाया भुगतान की लड़ाई लडऩे वाले वीएम सिंह का कहना है कि केंद्र सरकार की सब्सिडी मजाक के सिवा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि गन्ना किसानों की जो हालत है उसमें कम से कम 40 से 50 रुपये की सब्सिडी का ऐलान किया जाना चाहिए था।
गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की कल की बैठक में गन्ना किसानों को प्रति क्विंटल 4.5 रुपये सब्सिडी दिए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी है। इस फैसले से जहां सरकारी खजाने पर 1,147 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा, वहीं  नकदी संकट से जूझ रही चीनी मिलों को भी राहत मिलेगी। चीनी मिलों पर पिछले पेराई सत्रों का 6,599 करोड़ रुपये का गन्ना मूल्य बकाया है। किसान नेता वीएम सिंह के मुताबिक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान पहले से ही भुगतान संकट और चीनी मिलों के अडिय़ल रवैये से परेशान हैं, ऐसे में केंद्र सरकार का यह फैसला जले पर नमक छिड़कने जैसा है।
दूसरी ओर चीनी मिल मालिकों की प्रतिनिधि संस्था उत्तर प्रदेश शुगर मिलर्स एसोसिएशन (यूपीइस्मा) का कहना है कि केंद्र सरकार ने सकारात्मक कदम उठाया है। एसोसिएशन के प्रवक्ता दीपक गुप्तारा के मुताबिक हालांकि अभी भी कीमतों को देखने पर अंतर लगता है पर आने वाले दिनों में चीनी निर्यात होने और खुले बाजार में दाम बढऩे पर इसमें कमी आएगी। उनका कहना है कि अच्छी बात यह है कि सरकार की ओर से चाहे केंद्र हो या राज्य जो भी सब्सिडी दी जा रही है वह सीधे किसानों के खाते में जा रही है। इससे चीनी मिलों की देनदारी भी घट रही है और किसानों को सीधे लाभ मिल रहा है। गुप्तारा का कहना है कि वर्तमान में खुले बाजार में चीनी के 2,800 रुपये प्रति क्विंटल के दाम को देखते हुए मिलें 200 रुपये से ज्यादा गन्ना मूल्य देने की हालत में नहीं हैं। केंद्र सरकार के 230 रुपये की एफआरपी को देखते हुए अभी भी 30 रुपये का अंतर है पर फिर भी यह एक स्वागत योग्य कदम है। (BS Hindi)

पहली छमाही में दलहन आयात में 14 फीसदी की बढ़ोतरी


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित वर्ष 2015-16 की पहली छमाही (अप्रैल से सितंबर) के दौरान दलहन आयात में 14.2 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल आयात 22.54 लाख टन का हो चुका है। विदेषी बाजार में भाव तेज होने के कारण इस दौरान मूल्य के हिसाब दलहन आयात में 37.1 फीसदी की भारी बढ़ोतरी होकर 10,448 करोड़ रुपये मूल्य का हुआ है।
कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू वित वर्ष की पहली छमाही में 22.54 लाख टन दालों का आयात हो चुका है जबकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि में 19.74 लाख टन दालों का आयात हुआ था। उन्होंने बताया कि मूल्य के हिसाब से इस दौरान 10,448 करोड़ रुपये का आयात हुआ है जबकि पिछले वित वर्ष की समान अवधि में 7,619 करोड़ रुपये मूल्य की दालों का आयात हुआ था।
वित वर्ष 2014-15 में देष में रिकार्ड 45.84 लाख टन दालों का आयात हुआ था जबकि वित वर्ष 2013-14 में 36.54 लाख टन का ही आयात हुआ था। जानकारों के अनुुसार चालू वित वर्ष में दलहन आयात में 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है।
उत्पादक मंडियों में मूंग, उड़द के साथ ही अरहर की नई फसल की दैनिक आवक षुरु हो गई है जिससे इनकी कीमतों में और भी गिरावट आने का अनुमान है। रबी में चना की बुवाई कम होने की आषंका है तथा ब्याह-षादियों की मांग से बेसन और दाल की मांग बनी रह सकती है जिससे चना के भाव तेज ही रहने का अनुमान है।
दिल्ली में चना के भाव 5,450 रुपये, मूंग के भाव 7,700 रुपये, मसूर 5,200 रुपये तथा अरहर के भाव 10,200 रुपये प्रति क्विंटल रहे। महाराष्ट्र की लातूर मंडी में चना के भाव 5,175 रुपये, मूंग के भाव 7,900 रुपये, उड़द 11,400 रुपये प्रति क्विंटल रहे। इंदौर मंडी में चना के भाव 4,800 रुपये, उड़द के 10,500 रुपये, मूंग के 8,000 रुपये, मसूर 6,075 रुपये और अरहर के भाव 10,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे।
कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार खरीफ 2015-16 में दलहन की पैदावार 55.6 लाख टन होने का अनुमान है तथा सरकार ने खरीफ और रबी में दलहन की पैदावार का लक्ष्य 200.5 लाख टन का तय किया है। फसल सीजन 2014-15 में दलहन की पैदावार 172 लाख टन की हुई थी जोकि फसल सीजन 2013-14 के 192.5 लाख टन से कम थी।........आर एस राणा

19 November 2015

पहली छमाही में ग्वार गम उत्पादों का निर्यात 62 फीसदी घटा


भाव में और हल्की गिरावट आने की आषंका
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित वर्ष 2015-16 की पहली छमाही अप्रैल से सितंबर के दौरान मूल्य के हिसाब से ग्वार गम के निर्यात में 62.07 फीसदी की गिरावट आई है। इस दौरान देष से केवल 1,861.18 करोड़ रुपये मूल्य का ही ग्वार गम उत्पादों का निर्यात रह गया।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार चालू वित वर्ष 2015-16 की पहली छमाही में देष से मूल्य के हिसाब से केवल 1,861.18 करोड़ रुपये का ही ग्वार गम उत्पादों का निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 4,906.97 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ था।
एपीडा के अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में मात्रा के हिसाब से केवल 1.62 लाख टन ग्वार गम उत्पादों का निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2014-15 की समान अवधि में 3.39 लाख टन का निर्यात हुआ था।
ग्वार गम उत्पादों में कमजोर मांग के कारण ही इस समय ग्वार सीड की कीमतों में गिरावट बनी हुई है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि आगामी दिनों में ग्वार गम उत्पादों की निर्यात मांग में सुधार आयेगा, साथ ही भाव कम होने के कारण घरेलू खपत भी ज्यादा रहेगी। ऐसे में इसकी कीमतों में हल्की गिरावट और आ सकती है लेकिन भविष्य में दाम तेज रह सकते हैं।
राजस्थान की प्रमुख उत्पादक मंडी जोधपुर में ग्वार सीड के भाव गुरुवार को 3,600 रुपये और गंगानगर मंडी में 3,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे। जोधपुर में ग्वार गम के भाव 7,525 रुपये प्रति क्विंटल रहे। उत्पादक राज्यों की मंडियों में इस समय ग्वार सीड की दैनिक आवक 75 से 80 हजार क्विंटल की हो रही है। दिसंबर में दैनिक आवक कम हो जायेगी, जिससे मौजूदा कीमतों में तेजी आने का अनुमान है।...........आर एस राणा

नवंबर में 3 लाख टन चीनी निर्यात के सौदे होने का अनुमान


चालू पेराई सीजन में 7.61 लाख टन चीनी का हो चुका है उत्पादन
आर एस राणा
नई दिल्ली। विष्व बाजार में चीनी की कीमतों में आई तेजी से चीनी उद्योग को राहत मिली है। चालू महीने में करीब 3 लाख टन चीनी के निर्यात सौदे हो अनुमान है जबकि अक्टूबर में केवल 80 हजार टन चीनी के निर्यात सौदे हुए थे। महाराष्ट्र के साथ ही कर्नाटका में चीनी मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी है तथा अक्टूबर से षुरु हुए चालू पेराई सीजन 2015-16 में 15 नवंबर तक 7.61 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में 5.74 लाख टन चीनी का उत्पादन ही हुआ था।
इंडियन षुगर मिल्स एसोसिएषन (इस्मा) के अनुसार चालू पेराई सीजन में अभी तक देषभर में 175 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में केवल 155 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हुई थी। सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में 114 चीनी मिलों ने पेराई आरंभ कर दी है तथा राज्य में 15 नवंबर तक 4.31 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में राज्य में केवल 97 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हुई थी तथा केवल 3.10 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था।
कर्नाटक में 30 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी है तथा राज्य में 1.60 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जोकि पिछले साल के लगभग बराबर ही है। गुजरात में 16 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी है तथा राज्य की मिलों ने अभी तक 1.10 लाख चीनी का उत्पादन किया है जबकि पिछले साल की समान अवधि में केवल 78,000 टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था। तमिलनाडु में चालू पेराई सीजन में 6 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी है तथा राज्य की मिलों में 40,000 टन चीनी का उत्पदन उत्पादन हुआ है। आंध्रप्रदेष और तेलंगाना में 5,000 टन चीनी का उत्पादन चालू पेराई सीजन में 15 नवंबर तक हो चुका है।
दिल्ली में चीनी के भाव 2,850 से 2,900 रुपये प्रति क्विंटल रहे तथा उत्तर प्रदेष में चीनी के एक्स फैक्ट्री भाव 2,625 से 2,725 रुपये, महाराष्ट्र में 2,450 से 2,550 रुपये और कर्नाटक में 2,400 से 2,500 रुपये प्रति क्विंटल रहे।.........आर एस राणा

गन्ना किसानों को सीधे सब्सिडी


सरकार ने गन्ना किसानों को 2015-16 सीजन में 4.50 रुपये प्रति क्विंटल उत्पादन संबद्घ सब्सिडी सीधे देने का फैसला किया। सरकार ने नकदी संकट से जूझ रही चीनी मिलों को  बकाया भुगतान में मदद के लिए उठाए गए इस कदम से सरकारी खजाने पर लगभग 1,147 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) की बैठक  में इस आशय का फैसला किया गया। उल्लेखनीय है कि खुदरा  बाजारों में चीनी की गिरती कीमतों के कारण चीनी मिलें नकदी संकट से जूझ रही हैं। मिलों पर गन्ना किसानों का लगभग 6,500 करोड़ रुपये बकाया है। बिजली एवं कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने सीसीईए की बैठक के बाद यह जानकारी दी।
उन्होंने कहा, 'बकाये में और कमी लाने और गन्ना किसानों की मदद के लिए सरकार ने डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुरुप वाली एक योजना तैयार की है। गन्ने की कीमत की भरपाई तथा किसानों को गन्ने का समय पर भुगतान सुगम बनाने के लिए उत्पादन सब्सिडी दी जाएगी।' उन्होंने कहा, 'इस प्रस्ताव के तहत चीनी उत्पादन के लिए पेराई किए गए गन्ने के लिए 4.50 रुपये प्रति क्विंटल उत्पादन सब्सिडी गन्ना किसानों को सीधा दिए जाना प्रस्तावित है।' गोयल ने कहा कि इससे कुछ चीनी भंडार का भी इस्तेमाल होगा और कम से कम 80 प्रतिशत निर्यात लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा।
उन्होंने कहा कि उत्पादन सब्सिडी से गन्ना किसानों को सीधे तौर पर लगभग 1,147 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। खाद्य मंत्रालय ने 2015-16 सीजन (अक्टूबर-सितंबर) के लिए गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) 230 रुपये प्रति क्विंटल में से 4.75 रुपये की उत्पादन सब्सिडी देने का प्रस्ताव किया था। मंत्रालय ने प्रस्ताव किया था कि चीनी विकास कोष से उत्पादन सब्सिडी सीधे किसानों के बैंक खातों में डाली जाए। मौजूदा व्यवस्था के तहत चीनी मिलों को केंद्र द्वारा तय एफआरपी या गन्ने की सारी कीमत का भुगतान करना होता है।
एफआरपी वह न्यूनतम कीमत है जिसका भुगतान तो गन्ना किसानों को करना ही होता है। बीते दो सत्रों में चीनी मिलों को चीनी निर्यात सब्सिडी दी गई थी ताकि उन्हें किसानों को भुगतान में मदद की जा सके। लेकिन डब्ल्यूटीओ दायित्वों के चलते इस बार इसे बंद कर दिया गया। देश में इस सीजन में 2.6-2.7 करोड़ टन चीनी उत्पादन का अनुमान है और लगातार छठे साल देश में चीनी का उत्पादन अधिशेष रहना अनुमानित है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, 'यह फैसला इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सरकार गन्ने की एफआरपी की जिम्मेदारी लेने से बच नहीं रही है और सीधे गन्ने की कीमतों में अपनी हिस्सेदारी दे रही है जबकि अब तक सिर्फ मिल मालिकों पर बोझ डाला जाता था। इससे गन्ने के प्रति उद्योग की जिम्मेदारी कम होगी और घाटा भी।'
सरकार द्वारा मिल मालिकों द्वारा कमाई के आधार पर किए जाने वाले गन्ने के भुगतान और सरकार की मर्जी के मुताबिक किसानों को होने वाली आय के बीच के अंतर को पाटने से गन्ना किसानों का बकाया कम होगा। वर्मा ने कि हालांकि अगर चीनी की कीमतें सीजन के दौरान नहीं सुधरीं तो उद्योग और किसानों को सरकार के बजट से मदद की जरूरत होगी।' उत्तर प्रदेश योजना बोर्ड के एक सदस्य और किसान जागृति मंच के अध्यक्ष सुधीर पंवार ने कहा कि यह अपनी तरह का अनोखा प्रयास और लेकिन सब्सिडी के तौर पर दी जाने वाली रकम काफी कम है और कई राज्य सरकारें किसानों को इससे अधिक मदद दे रही हैं।  (BS Hindi)

18 November 2015

Tamilnadu urad crop damaged

Tamilnadu urad crop damaged its confirmed in cuddalore district and villupuram district urad sowing was very good but the rains in both the districts crop is under water for last one week still it's raining. Weather reports say that rain will continue for another one week

Government’s decision to give Rs. 4.50 per quintal of sugarcane crushed in 2015-16

The sugar industry welcomes Government’s decision to give Rs. 4.50 per quintal of sugarcane crushed in 2015-16 SS. As per estimated cane crushing during 2015-16 sugar season, it will work out to around Rs. 1100 crore.

This decision is significant as it means that the Government is no longer shying away from owning up the FRP it fixes for sugarcane, by directly contributing for a part of the cane price, instead of continuously burdening the millers. It will reduce industry’s liabilities towards cane to that extent, reducing a part of its losses.
This concept of the Government to bridge the gap, at least partially, between what the sugar mills cane pay to farmers as per their revenue realization, and what the Government wants to give to farmers, will help to reduce cane price arrears. However, at current low sugar prices, the losses will be more than Rs. 1100 crore and, therefore, if sugar prices do not improve to cover costs during the season, the industry and farmers may seek further help from the Government’s budget.

फसल संरक्षण होगी दूसरी हरित क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता


फसल संरक्षण करने वाले केमिकल फसल के नुकसान को कम कर उत्पादन में 25-50% वृद्धि ला सकते हैं फिक्की रिपोर्ट
नई दिल्ली, 18 नवंबर 2015:  बढ़ती जनसंख्या के साथ ही भारत में भोजन के उपभोग के तरीकों में भी बदलाव देखा जा रहा है। खेती योग्य भूमि के कम होने और परजीवियों के कारण फसल का नुकसान भविष्य के लिए खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के मार्ग में एक महत्वपूर्ण चुनौती के रुप में खड़े हैं।
 भारत एक ओर मूल्य के लिहाज़ से अपने कुल खाद्य उत्पादन का करीब 40% जैसा बड़ा हिस्सा बर्बाद करता है और दूसरी ओर 2020 तक भारत में कृषि कामगारों की संख्या करीब 50% घटने का अनुमान है। इस कारण,  भविष्य में देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत में दूसरी हरित क्रांति शुरु करने का लगातार दबाव है।
 इस संबंध में फिक्की और टाटा स्ट्रैटजिक मैनेजमेंट ग्रुप (टीएसएमजी) ने अशरिंग इन दि सेकण्ड ग्रीन रिवोल्यूशन- रोल ऑफ क्रॉप प्रोटेक्शन केमिकल्सरिपोर्ट को जारी किया है। इस रिपोर्ट को 18 नवंबर 2015 को फेडरेशन हाऊस, नई दिल्ली में आयोजित फिक्की की नेशनल कांफ्रेंस ऑन एग्रोकेमिकल्स में जारी किया गया।
 हालांकि,  संकर बीजों (हाईब्रिड सीड्स) और  फसल संरक्षण केमिकल आदि के कारण प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादन दोगुना हो चुका है, फिर भी खेती के क्षेत्र में उत्पादकता को बढ़ाने की बड़ी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। वैश्विक फसल का करीब 25% परजीवी हमलों, खरपतवार और बीमारियों के कारण नष्ट हो जाता है जो कि खेती के लिए शुभ संकेत नहीं है।  अधिक उपज और उत्पादकता में वृद्धि के लिए फसल संरक्षण केमिकल्स (एग्रोकेमिकल्स) बेहद महत्वपूर्ण हो जाएंगे।  रिपोर्ट के अनुसार,  भावी दूसरी हरित क्रांति की एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता फसल सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित होना होगा।
 अमेरिका, जापान और चीन के बाद वैश्विक रुप से भारत चौथा सबसे बड़ा फसल संरक्षण केमिकल उत्पादक है। भारतीय फसल संरक्षण रसायन उद्योग वित्त वर्ष 2014 में 4.25 बिलियन अमरीकी डॉलर का होने का अनुमान था और 12% की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (सीएजीआर) से वित्त वर्ष 2019 में इसके 7.5 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।  भारत के फसल संरक्षण उद्योग का 50% निर्यात केंद्रित है और 16% वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (सीएजीआर) के साथ वित्त वर्ष 2019 तक इसके 4.2 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है जो भारत के फसल संरक्षण उद्योग का 60% है। दूसरी ओर घरेलू बाज़ार 8% सीएजीआर से बढ़कर वित्त वर्ष 2019 तक 3.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहने का अनुमान है,  हालांकि यह मुख्य रुप से मानसून पर निर्भर रहता है।
 फसल संरक्षण केमिकल के उपयोग से परजीवियों से होने वाले नुकसान को कम करते हुए फसल उत्पादकता 25-50% तक बढ़ाई जा सकती है। अनुमान के अनुसार पूरी दुनिया का 25% कृषि उत्पाद फसल कटाई के बाद होने वाले परजीवी हमलों से नष्ट हो जाता है। मुख्य फसलों पर हमले करने वाले कुल परजीवियों की संख्या 1940 से अब तक काफी बढ़ चुकी है। उदाहरण के लिए धान के लिए नुकसानदायक परजीवियों की संख्या 10 से बढ़कर 17 हो चुकी है जबकि गेहूं के परजीवी 2 से बढ़कर 19 हो चुके हैं। यह एग्रोकेमिकल्स के उपयोग के महत्व को रेखांकित करता है।
 आगामी वर्षों में कीटनाशकों के सुरक्षित और विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एग्रोकेमिकल्स उत्पादकों, शिक्षा क्षेत्र,  सरकार और नियामक संस्थाओं, किसान संघों  और किसानों के एक सहयोगात्मक मंच के विकास की आवश्यकता होगी। सरकार व  फसल संरक्षण केमिकल उत्पादकों के लिए महत्वपूर्ण है कि वह कीटनाशकों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए किसानों को शिक्षित करने और नए अनुसंधानों व विकास के लिए उन किसानों  के साथ मिलकर काम करें। ग्रीन केमिस्ट्री (हरित रसायन) पर ध्यान स्थिरता के मूल सिद्धांत के साथ नए उत्पाद तैयार करने में सहायक होगा।
 सरकार को देश में उच्च खाद्य उत्पादन और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर नकली कीटनाशकों के खतरे को रोकने पर भी ध्यान देना होगा।
 

प्याज के बाद अब टमाटर की बारी!


राष्ट्रीय राजधानी में टमाटर के भाव बीते एक महीने में लगभग 50 प्रतिशत चढ़कर 62 रुपये प्रति किलो हो गए हैं। आपूर्ति में कमी के कारण टमाटर के भावों में यह उछाल आया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में टमाटर के भाव महीने भर पहले 41 रुपये थे जो अब बढकर 62 रुपये प्रति किलो हो गए हैं। इसी तरह सभी प्रमुख बिक्री केंद्रों पर टमाटर की औसत कीमत बढ़कर 42.5 रूपए प्रति किलो हो गई है जो एक महीना पहले 30 रुपये प्रति किलो थी। हालांकि, आजादपुर मंडल के कारोबारियों के अनुसार आपूर्ति बढने से बीते दो दिनों में टमाटर की थोक कीमत में गिरावट आनी शुरू हुई है। आजादपुर मंडी में एक टमाटर व्यापारी सुभाष चुक ने कहा, 'बीते सप्ताह त्योहारी सीजन की छुट्टियों के चलते आवक घटने के कारण बाजार में टमाटर के भावों में उछाल आया था।  उन्होंने कहा कि थोक बाजारों में अच्छी गुणवत्ता वाला टमाटर 20-25 रुपये प्रति किलो बिक रहा है जो कल 30-35 रुपये प्रति किलो था।( BS Hindi)

आभूषण निर्यात में आई गिरावट


इन दिनों भारतीय आभूषण निर्यातकों के लिए सबसे बड़ी चिंता क्रिसमस सीजन के दौरान विदेशों से मिलने वाले ऑर्डर में 25 फीसदी गिरावट आई है, वैश्विक आर्थिक मंदी और सोने की कीमतों में और गिरावट की उम्मीद में नई खरीद थम जाने की वजह से यह गिरावट देखने को मिली है। सोने की कीमतों में भारी गिरावट के मद्देनजर भारतीय आभूषण विनिर्माताओं को अमेरिका में आर्थिक वातावरण में हो सुधार की खबरों के बीच सकारात्मक क्रिसमस सीजन की उम्मीद थी। पूरी दुनिया में होने वाले आभूषण उत्पादन के करीब एक तिहाई हिस्से का उपभोग अमेरिका में होता है जिसमें भारत की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है। क्रिसमस सीजन की शुरुआत नवंबर के आखिरी सप्ताह में में थैंक्स गिविंग समारोह से होती है और यह नए साल तक जारी रहता है। पांच हफ्तों तक चलने वाले इस सीजन की कुल बिक्री में हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है और इस सीजन में ही शेष बचे सीजन का रुझान भी तय हो जाता है और इसलिए इस सीजन पर दुनिया भर के आभूषण विक्रेताओं की नजर लगी रहती है। जेम्स ऐंड ज्वैलरी एक्सपोट्र्स प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन प्रवीण शंकर पंड्या ने कहा, 'आभूषण निर्यात ऑर्डरों की आवक सामान्य के मुकाबले 75 फीसदी रह गई है जिसका सीधा आशय यह है कि पिछले वर्ष के मुकाबले इसमें 25 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा रही है।
पूरी दुनिया से ऑर्डरों की आवक में गिरावट है। हालांकि अमेरिका में कुछ हद तक सुधार देखने को मिल रहा है, लेकिन दुनिया के बाकी हिस्सों में ऑर्डर की आवक में कमी आई है और इसकी वजह आर्थिक मंदी है। आर्थिक तंगी के दौर में सबसे पहले लग्जरी क्षेत्र पर असर पड़ता है जिससे भारतीय निर्यातक प्रभावित होते हैं।' दरअसल विदेशी बाजारों से आभूषणों की मांग में कमी जीजेईपीसी द्वारा पेश किए गए सात महीनों के आंकड़ों में देखने को मिली है। अप्रैल-अक्टूबर के दौरान कुल आभूषण निर्यात 13 फीसदी घटकर 1,80,930 करोड़ डॉलर का रहा गया।
दुनिया में पैदा होने वाले प्रत्येक 13 हीरों में से 11 का प्रसंस्करण करने वाले भारतीय आभूषण विक्रेता अपने कारोबारी फैसलों पर फिर से विचार कर रहे हैं। अच्छे क्रिसमस सीजन की उम्मीद पाले भारतीय आभूषण विक्रेताओं ने अपना कच्चा माल खरीद बंद कर दिया है। परिणामस्वरूप कच्चे और पॉलिश वाले हीरों का आयात अप्रैल-अक्टूबर के दौरान करीब 30 फीसदी घटकर 1,37,390 लाख डॉलर रह गया। दिलचस्प बात यह है कि पूरी दुनिया में आभूषणों की मांग कम हो गई जबकि अमेरिका में तेजी देखने को मिल रही है।
गीतांजलि जेम्स के प्रबंध निदेशक मेहुल चोकसी ने कहा, 'मध्यम आकार के आभूषणों के ऑर्डरों के लिहाज से अमेरिका में मामूली वृद्घि दर्ज की गई है, मांग यूरोप और सुदूर पूर्व के बाजारों में कमजोर बनी हुई है।' दरअसल सोने और बहुमूल्य रत्नों की गिरती कीमतों से वैश्विक आभूषण खरीदार सोना खरीदने के लिए प्रेरित नहीं हो रहे हैं। सोने और कच्चे हीरे दोनों की कीमतों में पिछले एक महीने में करीब 5-10 फीसदी गिरावट आई है। हीरे का प्रसंस्करण करने वालों और डीलरों ने इसी अनुपात में पॉलिश वाले हीरों की कीमत में भी कटौती कर दी है।  (BS hindi)

जूट आयुक्त तय करेंगे स्टॉक सीमा

कच्चे जूट और बी ट्विल जूट बैगों की कीमतें अनियंत्रित होते देख जूट आयुक्त के कार्यालय ने जूट मिलों पर स्टॉक सीमा लगाने पर जोर दिया। इसके अलावा आयुक्त कार्यालय ने बी ट्विल जूट बैगों की कीमतों पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रस्ताव तैयार किया है। कालाबाजारी और कुछ मिल मालिकों और कारोबारियों द्वारा कीमतों से छेड़छाड़ करने की वजह से कच्चे जूट की कीमतें 49,000 रुपये प्रति टन के स्तर तक पहुंच गई हैं, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में कीमतें 28,000 रुपये प्रति टन पर थीं, इस तरह कीमतों में करीब 75 फीसदी का इजाफा हुआ है।
इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन (आईजेएमए) के चेयरमैन मनीष पोद्दार ने कहा, 'कच्चे जूट और इसके साथ ही बी ट्विल बैगों की कीमतें कालाबाजारी की वजह से चढ़ेंगी। जूट आयुक्त के कार्यालय ने स्टॉक सीमा तय करने और बी ट्विल बैगों की कीमतों पर सीमा लगाने के विषय पर हम सभी से राय मांगी है।' कच्चे जूट की कीमतों में असामान्य वृद्घि और इसके बाद बी ट्विल बैगों की कीमतों में तेजी से खरीदारों पर दबाव बढ़ गया है। इसके अलावा मिलों में कच्चे जूट की अनुपलब्धता ने बैकलॉग बढ़ाने में मदद की जो 31 अक्टूबर, 2015 तक बढ़कर 1,42,000 गांठों के स्तर पर हो गया। आईजेएमए के चेयरमैन को दिए गए पत्र में जूट उपायुक्त दीपंकर महतो ने कहा, 'अगर यही परिस्थिति बरकरार रही तो जूट उद्योग के साथ ही खाद्यान्न उत्पादन खरीद पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। खाद्य मंत्रालय बैकलॉग और कच्चे जूट की उपलब्धता के मामलों को देखता है।'
जूट आयुक्त के कार्यालय ने कच्चे जूट के स्टॉक की सीमा लगाने, जूट मिलों में कच्चे जूट के उपभोग के लिए तीन हफ्तों का स्टॉक उपलब्ध कराने जैसे विषयों पर विचार करना शुरू कर दिया। आयुक्त कार्यालय ने बी ट्विल बैगों की कीमतों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया है जिसके आधार पर सरकार इन बैगों की खरीदारी कर सकती है। साथ ही इसने कच्चे जूट की उपयुक्त कीमतों की भी सिफारिश की है।
आंध्र प्रदेश मेस्ता ट्वाइन मिल्स एसोसिएशन (एपीएमटीएमए) का मानना है कि कुछ मिलें/कारोबारी धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाने के लिए नया दृष्टिïकोण अपना रहे हैं और आपूर्ति बाधित कर रहे हैं ताकि कमजोर मिलें बंद हो जाएं और कई मिलों की कीमत पर कुछ को फायदा पहुंचाने की कोशिश है। पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री और जूट आयुक्त को भेजे गए एक पत्र में एपीएमटीएमए ने कहा कि कुछ मिलें कच्चे जूट की कीमतें बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं क्योंकि मिलों के पास मौजूद 80 फीसदी स्टॉक तीन हफ्तों से भी कम वक्त में खत्म हो जाएगा। एपीएमटीएमए ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जमाखोरी खत्म करने का अभियान चलाने की सलाह दी है। साथ ही भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा इस मामले की जांच कराने की भी सिफारिश की है। (BS Hindi)

17 November 2015

त्यौहारी मांग से भी नहीं बढ़ रहे हैं गुड़ के भाव


चालू सीजन में 10 लाख कट्टों से भी कम स्टॉक होने का अनुमान
आर एस राणा
नई दिल्ली। त्यौहारी मांग से भी गुड़ में मिठास नहीं बढ़ रही है। उत्तर प्रदेष में चीनी मिलों में पेराई में हो रही देरी के कारण किसानों को गन्ने की बिक्री सस्ते दाम पर करनी पड़ रही है जिसका फायदा खांडसारी उद्योग और कोल्हू संचालक उठा रहे हैं। गुड़ कारोबारियों को पिछले चार-पांच साल से लगातार घाटा हो रहा है इसलिए प्रमुख गुड़ मंडी मुजफ्फरनगर में नए सीजन में गुड़ का स्टॉक 10 लाख कट्टे (एक कट्टा-40 किलो) से कम ही होने का अनुमान है।
गुड़ फैडरेषन आफ ट्रेडर्स के अध्यक्ष अरुण खंडेलवाल ने बताया कि राज्य में चीनी मिलों में गन्ने की पेराई में देरी के कारण कोल्हू संचालकों को गन्ना सस्ता मिल रहा है, यहीं कारण है कि त्यौहारी सीजन के बावजूद गुड़ की कीमतों में तेजी नहीं आ पा रही है। कोल्हू और खांडसारी संचालक गन्ने की खरीद 150 से 180 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कर रही हैं जबकि पिछले साल गन्ने का राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) 280 रुपये प्रति क्विंटल था। नए सीजन के लिए अभी तक राज्य सरकार ने गन्ने का एसएपी ही तय नहीं किया है।
उन्होंने बताया कि इस समय मंडी में गुड़ की दैनिक आवक 6,000 से 7,000 मन की हो रही है तथा इसमें से ज्यादातर गुड़ चालानी में ही जा रहा है। मंडी में खुरप्पापाड़ गुड़ के भाव 930 से 960 रुपये, लड्डू के भाव 965 से 1,045 रुपये, चाकू के भाव 930 से 1,020 रुपये, षक्कर पाउडर के भाव 1,030 से 1,060 रुपये और रसकट के भाव 940 रुपये प्रति 40 किलो हैं।
गुड़ के थोक कारोबारी देषराज ने बताया कि पिछले चार-पांच सालों से गुड़ कारोबारियों को घाटा उठाना पड़ रहा है इसीलिए नए सीजन में गुड़ का स्टॉक 10 लाख कट्टों से भी कम होने की आषंका है। पिछले साल मंडी में गुड़ का स्टॉक 10 लाख कट्टे का हुआ था जबकि सबसे ज्यादा स्टॉक पांच साल पहले 26 लाख कट्टों का हुआ था।
उन्होंने बताया कि अभी तो सारा गुड़ चालानी में जा रहा है लेकिन दिसंबर में गुड़ स्टॉक में जाना षुरु होगा। उन्होंने बताया कि अभी तक राज्य की चीनी मिलों में पेराई आरंभ नहीं हुई है तथा इसमें और देरी होगी तो कोल्हू संचालकों को ज्यादा गन्ना मिलेगा। वैसे भी चालू फसल सीजन में उत्तर प्रदेष में गन्ने की पैदावार पिछले साल की तुलना में ज्यादा ही होने का अनुमान है।.................आर एस राणा

रुपये के कमजोर होने से कॉफी निर्यात में आएगी तेजी


कॉफी बोर्ड ने 1.84 लाख हेक्टेयर में फसल उगाने के लिए निर्यात परमिट दिए हैं। यह रकबा पिछले साल से 12 फीसदी अधिक है। बोर्ड का मानना है कि कमजोर रुपये की वजह से कॉफी का निर्यात बढ़ रहा है। मुंबई में जनवरी 2016 में आयोजित होने वाले इंडिया इंटरनैशनल कॉफी फेस्टिवल के छठे संस्करण की घोषणा करते हुए कॉफी बोर्ड की चेयरपर्सन लीना नायर ने कहा, 'इस साल निर्यात में इजाफा होगा। कॉफी के अंतरराष्ट्रीय दाम गिर रहे हैं और विशेष रूप से अरेबिका की कीमतें तेजी से टूटी हैं। रुपये में गिरावट से निर्यातकों को मदद मिल रही है और घरेलू खपत में इजाफा हो रहा है।'
कॉफी बोर्ड का अनुमान है कि इस साल 3,55,600 टन कॉफी का उत्पादन होगा और दक्षिण भारत में हाल में हुई बारिश का कॉफी की कटाई पर मामूली असर होगा। कॉफी की कटाई नवंबर के प्रारंभ से शुरू हो चुकी है। नायर ने कहा, 'यह बारिश अगले साल के लिए अच्छी है।' बरिस्ता, कॉफी डे और स्टारबक्स जैसे कॉफी कैफे के विस्तार के चलते महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे गैर-परंपरागत क्षेत्रों में कॉफी की खपत 43 फीसदी की दर से बढ़ रही है। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे परंपरागत क्षेत्रों में इसकी खपत में हर साल 2.5 फीसदी वृद्धि हो रही है।
इंडिया कॉफी ट्रस्ट (आईसीटी) के अध्यक्ष अनिल कुमार भंडारी ने कहा, 'इसलिए कुछ खपत 6 से 7 फीसदी की दर से बढ़ रही है।' उन्होंने कहा कि कॉफी बोर्ड और आईसीटी कैफे में कॉफी का अनुभव लेने वाले उपभोक्ताओं के बीच घर में कॉफी की खपत को बढ़ावा देगा। भारत में कॉफी की सालाना खपत 1 लाख टन पर पहुंच गई है, जो प्रति व्यक्ति खपत 90 ग्राम बैठती है।
नायर ने कहा, 'हम गैर-परंपरागत क्षेत्रों में लोगों को कॉफी पीने के लिए प्रोत्साहित कर बाजार को बढ़ा रहे हैं।' भंडारी ने कहा कि कॉफी सम्मेलन में उद्यमियों को कॉफी कारोबार में स्टार्टअप शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इंडिया इंटरनैशनल कॉफी फेस्टिवल की थीम 'सेलिब्रेटिंग दी कॉफी' रखी गई है। इसमें 400 प्रतिनिधि और 60 से अधिक कंपनियां हिस्सा लेंगी और उत्पादन रुझान और इस क्षेत्र में उभरते अवसरों पर चर्चा करेंगी। (BS Hindi)

16 November 2015

वनस्पति तेलों का आयात रिकार्ड स्तर पर

वनस्पति तेलों का आयात रिकार्ड स्तर पर
चालू तेल वर्ष में 146 लाख टन से ज्यादा हुआ है आयात
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2014-15 (नवंबर-14 से अक्टूबर 2015) के दौरान देष में 146.12 लाख टन वनस्पति तेलों का आयात हुआ है जबकि पिछले तेल वर्ष में 118.18 लाख टन खाद्य तेलों का आयात हुआ था।
साल्वेंट एक्ट्रेक्टर्स एसोसिएषन आफ इंडिया (एसईए) के अनुसार अक्टूबर महीने में खाद्य एवं अखाद्य तेलों के आयात में 34 फीसदी की भारी बढ़ोतरी होकर कुल आयात 1,670,891 टन तेलों का आयात हुआ है जबकि पिछले साल अक्टूबर महीने में इनका आयात 1,245,915 टन का आयात हुआ था। चालू तेल वर्ष में वनस्पति तेलों के कुल आयात में 23.64 फीसदी की बढ़ोतरी होकर रिकार्ड आयात 14,612,502 टन का हुआ है। कुल आयात में खाद्य तेलों की मात्रा 144.2 लाख टन और अखाद्य तेलों की मात्रा 1.9 लाख टन है।
आयातित खाद्य तेलों की कीमतों में पिछले साल की तुलना में भारी गिरावट आई है जिससे आयात में भारी बढ़ोतरी हुई है। अक्टूबर 2015 में भारतीय बंदरगाह पर आरबीडी पॉमोलीन का भाव 599 डॉलर प्रति टन रह गया जबकि अक्टूबर 2014 में इसका भाव 727 डॉलर प्रति टन था। इसी तरह से क्रुड पाम तेल का भाव इस दौरान 704 डॉलर से घटकर 562 डॉलर प्रति टन रह गया। क्रुड सोयाबीन तेल का भाव इस दौरान 838 डॉलर से घटकर 741 डॉलर प्रति टन रहा।--------आर एस राणा

चावल की सरकारी खरीद 122 लाख टन के पार


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ विपणन सीजन 2015-16 में चावल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद बढ़कर 122.22 लाख टन की हो चुकी है। चालू सीजन में मंडियों में अभी तक 201.01 लाख टन धान की आवक हो चुकी है।
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार अभी तक हुई खरीद में पंजाब की हिस्सेदारी 88.29 लाख टन, हरियाणा की 28.22 लाख टन चंडीगढ़ की 16,338 टन, गुजरात की 191 टन, जम्मू-कष्मीर की 1,729 टन, केरल की 76,933 टन, मध्य प्रदेष की 2,773 टन, तमिलनाडु की 38,360 टन, उत्तर प्रदेष की 1.74 लाख टन तथा उत्तराखंड की 39,392 टन है। चालू खरीफ में केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 300 लाख टन चावल की खरीद का लक्ष्य किया है जबकि 321.61 लाख टन चावल की खरीद हुई थी।....आर एस राणा

बासमती चावल का निर्यात 10 फीसदी बढ़ने का अनुमान


आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2015-16 में देष से बासमती चावल के निर्यात में 10 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। खाड़ी देषों के साथ ही यूरोप की मांग बढ़ने से देष से पहली छमाही अप्रैल से सितंबर के दौरान बासमती चावल का निर्यात 27 फीसीद बढ़कर 20.84 लाख टन का हो चुका है।
एपीडा के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार घरेलू मार्किट में बासमती चावल की कीमतें कम होने के कारण निर्यात में बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष में कुल निर्यात में 10 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2014-15 में देष से बासमती चावल का 37 लाख टन का निर्यात हुआ था जोकि वित्त वर्ष 2013-14 केे 37.5 लाख टन से थोड़ा कम था। इस समय साउदी अरब, इराक, यूएई, अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के देषों की आयात मांग ज्यादा है जबकि आगामी दिनों में ईरान की आयात मांग में और बढ़ोतरी होगी।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2015-16 की पहली छमाही अप्रैल से सितंबर के दौरान मूल्य के हिसाब से बासमती चावल के निर्यात में 11.05 फीसदी कमी आई है। इस दौरान 12,308.89 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल का निर्यात हुआ है जबकि वित्त वर्ष 2014-15 की पहली छमाही में 13,837.68 करोड़ रुपये का हुआ था।
उत्पादक मंडियों में पूसा-1,121 बासमती चावल सेला के भाव 3,700 से 4,000 रुपये और रॉ के भाव 4,100 से 4,500 रुपये और स्टीम के भाव 4,300 से 4,600 प्रति क्विंटल है जोकि पिछले साल की तुलना में करीब 1,000 से 1,200 रुपये प्रति क्विंटल कम हैं। डीपी सेला चावल के भाव मंडी में 3,400 रुपये, स्टीम के 3,800 रुपये रॉ के भाव 4,200 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल हैं। .......आर एस राणा

15 November 2015

Rabi Crops Sowing Crosess 123 Lakh Hactare


          As per preliminary reports received for the fields, sowing of Rabi crops has started in various parts of the country.
            The total area sown under Rabi crops as on 13th November, 2015 is 123.28 lakh hectares.
             Wheat has been sown/transplanted in 18.65 lakh hectares, pulses in 38.91 lakh hectare coarse cereals in 34.53 lakh hectares, oilseeds in 31.02 lakh hectares and Rice in 0.17 lakh hectares.           
 The details of the area covered so far and that covered during last year this time is as follows:
                                                                                                                              Lakh hectare 
Crop
Area sown in 2015-16
Area sown in 2014-15
Wheat
18.65
42.88
Pulses
38.91
34.42
Coarse Cereals
34.53
27.74
Oilseeds
31.02
53.90
Rice
0.17
0.36
Total
123.28
159.30